भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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पृष्ठ 54

( ३२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- दरी सस्यावृता श्यामला भात्येवं पवनस्य कोपनकरी वर्षा- ऋतुः श्रेयसी ॥३५॥ किञ्चिद्भौर्भोद्भवानि स्युः सस्यानां दृढता- गमः॥ बहुसस्या भवेद्धात्री वारिपूर्णा शरन्मुहुः ॥३६॥ नद्यः पूर्णाम्भसोत्खातशीर्णपातास्तटद्रुमाः ॥ कुल्याप्रस्रवणानां तु स्रवत्यम्भो दिशो दिशः॥३७॥बहूदकधरा मेघा बहुवृक्षा घन- स्वनाः॥एवंगुणसमायुक्ता वर्षा स्यादृतुकोविदैः ॥३८॥ तस्मा- द्वातकफः कोऽपि जायते च नृणां भृशम्॥इति ज्ञात्वा भिषक्श्रेष्ठः कुर्यात्तस्यां प्रतिक्रियाम् ॥३९॥ स्वेदनं मर्दनं पथ्यं निर्वात- सेवनं तथा ॥ गौराशामारतं शस्तं व्यायामक्रमविक्रमः ॥४०॥ कट्वम्लक्षारसुरसाः सेव्या वातकफापहाः ॥ निरूहबस्तिकर्मात्र कफवातरुजापहम् ॥ ४१ ॥ अथ ऋतुलक्षण-प्रथम वर्षाऋतुका लक्षण और उपचार-मोटे बादल और पानीसे अच्छी तरह आकुल, संपूर्ण तरहसे सुंदर पानी करके पूरित, मदसहित वायुको करनेवाली सब विदिशा और दिशा होवें और आनंदित हुए कीडोंको धारण करने वाली पृथिवी होवे ॥ ३२ ॥ और नीलीकी खेती और दूब घाससे प्रकाशित पृथिवी होवे, पानीसे मग्न हुए और नये हुए छोटी नदीके किनारे होवे, इंद्रगोप अर्थात् तीज नामवाले कीडोंकी पंक्तियोंसे शोभित और पंक अर्थात् कीचडरूपी गहनोंसे विभूषित ऐसी पृथिवी हो जावे ॥३३॥ऊपरको निकल आयेहुए आमके अंकुरोंवाले पर्वत हो जावे और वन प्रकाशित हो जावें और भौरै तथा मोर मधुर शब्दको करें और बादलोंका शब्द हो और सब जीव बलवंत प्राप्त हो जावें ॥ ३४ ॥ वनमें मोर बोलें और सरोवर पक्षियोंकारके रहित तथा पानीसे पूरित हो जावे और हंस मानस सरोवरमें आके प्राप्त होजावे और कमल म्लानपनेको प्राप्त होजावे गर्जता हुआ मेघ और महेंद्र करके फटीहुई कंदरावाली और खेतीसे आवृत्त और श्यामरूपवाली ऐसी पृथिवी प्रकाशित होजावे ऐसी वर्षाऋतु श्रेष्ठ होती है यह वायुको कोपित करती है ॥३५॥और खेतियोंके कल्लुक गाभा तथा दृढपना उपजे और बहुतसी खेतीसे संयुक्त और पानीसे पूर्ण ऐसी पृथिवी होवे और वारंवार शरदऋतुके भी कल्लुक लक्षण मिलें ॥३६ ॥ और नदीमें नहीं पूरित हुए पानीसे उखाडे हुए और गिरेहुए पत्तोंवाले ऐसे तटके वृक्ष होवें और नाली झरनोंके द्वारा दिशा दिशामें पानीको झिरावे ॥ ३७ ॥ और बहुत पानीको धारनेवाले और बहुतसे शब्दको करनेवाले ऐसे मेघ होजावें और बहुतसे वृक्ष उपजें ऐसे