भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( २३ ) गुणोंसे संयुक्त वर्षाऋतु होती है ऐसा ऋतुओंको जाननेवालोंने कहा है ॥ ३८ ॥ इस ऋतुमें मनुष्योंको अतिशय वात, कफका कोप होता है ऐसे कुशल वैद्य जानके उस कोपकी चिकित्सा करें ॥ ३९ ॥ स्वेदन अर्थात् पसीनोंका लाना, मर्दन अर्थात् शरीरको दाबना और वातको नहीं सेवना, गौर वर्णकी स्त्रीसे रति करना, कसरत करना ये सब वात कफके कोपमें श्रेष्ठ पथ्य हैं ॥ ४० ॥ चर्रचरा, खट्टा, खारा ये रस सेवतसे वात कफको नाशते हैं निरूह और बस्तिकर्म्म, कफ और वातकी पीड़ाको नाशते हैं ॥ ४१ ॥ अथ शरदृतुका लक्षण । मेघाः सूर्य्यशिला समानरुचयो ह्यल्पस्रवालपस्वना हंसालीजल- जालिमण्डितजलं पद्माकरं शोभनम्॥ तीव्रस्निग्धमयूखचन्द्रवि- मला सानन्दिनी कौमुदी चित्रा घर्माविपक्वतोयसुरसास्यान्निर्मलं पुष्करम् ॥ ४२ ॥ तत्र शीतलगतं वयोगतं जातपित्तरुधिरस्य योग्यताम् ॥ पथ्यमत्र च नरस्य शीतलं दृश्यते कथमपि त्रयो- द्भवम् ॥ ४३ ॥ शृतं क्षीरं सितापथ्यं चन्द्रिकासेवनं निशि ॥ श्यमारामारतं शस्तं प्रभाते निर्मलं दधि ॥४४॥ कामिन्यालि- ङ्गनानन्दश्रान्तः शीतसरोरुहैः ॥ चंदनादीनि सेवेत दृष्टं शरदि कोपनम् ॥ एवं प्रशमनं दृष्टं शरत्पित्तप्रकोपने ॥ ४५ ॥ अथ शरदृतुका लक्षण और उपचार-सूर्य्य और शिलाके समान रुचिवाले और अल्प झरनेवाले और अल्पशब्दको करनेवाले ऐसे मेघ हो जावें और हंसोंकी पंक्ति तथा कमलोंकी पंक्ति उसकरके मंडित जलवाला और शोभित कमलोंका स्थान हो जावे और तीव्र तथा स्निग्धरूपी किरणोंवाले चंद्रमासे स्वच्छ और आनंदवाली और चित्ररूपवाली और घामसे पके हुए पानीसे सुरसरूप ऐसी चांदनी हो और मलसे रहित पानी होवे ॥ ४२ ॥ ऐसी शरदऋतुमें आकाशका पानी और पित्तरक्तके योग्य पदार्थ और शीतल पदार्थ ये सब पथ्य हैं इस ऋतुमें सन्निपातका कोप कदाचित् होता है ॥ ४३ ॥ घृत, दुध, मिश्री, रात्रिमें चांदकी चांदनीको सेवना, श्यामरंगकी बाला स्त्रीसे भोग, प्रभातमें निर्मल दही ये सब शरद्ऋ- तुमें पथ्य हैं॥ ४४ ॥ स्त्रीके आलिंगनसे प्राप्त हुए आनंदसे श्रांत हुए पुरुष कमलोंकरके अपने श्रम दूर करें, और शरद्ऋतुमें पित्तका प्रकोप होनेसे चंदनादिकोंका लेप करे यह कमलधारण और चंदनानुलेपन शरद्ऋतुमें पित्तके प्रकोपका शमनकारी है ऐसा देखा है ॥ ४५ ॥