भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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(२४) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- अथ हेमन्तवर्णन। बहुशीतःसमीरोऽल्पश्चाल्पवासरता ऋतौ॥अल्पतेजा दिवानाथो धूमाक्रांता च दिग्भवेत् ॥ ४६ ॥ विस्तीर्णशालिकेदारा नील- धान्योज्ज्वला मही ॥ एवं गुणसमायुक्ता हैमन्ती स्म भवेद्दतुः ॥४७॥ तत्र वातकफा दोषा दृश्यंते कुपिता भृशम् ॥ अग्निसंसे- वनंपथ्यंकटुक्षाराम्लसेवनम् ॥४८॥ गौरांगामारतं शस्तं व्याया- मश्च प्रशस्यते ॥ एवं संशाम्यंति दोषाः कफवातसमुद्भवाः ॥ ॥४९॥ बलिनः शीतसंरोधा हेमन्ते प्रबलोऽनिलः ॥ भवत्यल्पे- न्धनो धातून्स पचेद्वायुनेरितः ॥ ५० ॥ अतो हिमेऽस्मिन्सेवेत स्वाद्वम्ललवणान्रसान्॥दीर्घा निशा भवेत्तर्हि प्रातरेव बुभुक्षितः॥ ॥ ५१ ॥ भवत्यकार्य्यं संभाव्य यथोक्तं शीलयेदनु ॥ ५२ ॥ अर्कन्यग्रोधखदिरकरंजककुभादिकम् ॥ प्रातर्भुक्त्वा च मधुरक- षायकटुतिक्तकम् ॥ ५३ ॥ अथ हेमंतऋतुका लक्षण और उपचार-बहुत शीत वायु अल्प चले और दिनका समय थोड़ा हो जावे और अल्प तेजवाला सूर्य रहे और धूमसे आकुलित हुई दिशा होवे॥४६॥ और विस्तारको प्राप्त हुए चावलोंके खेत होवें और नील तथा अन्नसे प्रकाशित पृथिवी होवे ऐसे गुणोंसे संयुक्त हेमंतऋतु होता है ॥ ४७ ॥ इस ऋतुमें अतिशयसे कुपित हुए वात और कफ दीखते हैं, इसमें अग्नि सेवना और चर्रचरा, खारा, खट्टा, इन्होंको सेवना पथ्य है ॥ ४८ ॥ गौरवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना और कसरत करना श्रेष्ठ है, इस तरहसे कफ वातसे उपजा दोष शांत होता है ॥ ४९ ॥ बलवाले मनुष्यके शीतको रोकनेसे हेमंतऋतुमें वायु प्रबल हो जाताहै, पीछे वायुसे प्रेरित किया यही वायु अल्प आहार आदिवाला होके धातुओंको पकाता है ॥ ५० ॥ इसलिये शीतकालमें स्वादु, खट्टा, सलोना ऐसा रस सेवे और हेमंतऋतुमें बडी रात्रियोंके होनेसे प्रभातमें ही भोजन करनेकी इच्छावाला मनुष्य हो जाता है ॥ ५१ ॥ इसवास्ते अकार्यकी संभावना करके यथोक्त द्रव्यका अभ्यास करे ॥ ५२ ॥ आक, बड़, खैर, करंजुआ, अर्जुनवृक्ष इन आदिको प्रभातमें साधन करके पीछे मधुर, कसैला, चर्रचरा, कडुुआ इन रसोंको सेवे ॥ ५३ ॥