हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] भाषाटीकासमेता । (२५) अथ शिशिरवर्णन । बहुलशिशिरवातः किञ्चिदुद्भूतसस्या भवति वसुमतीयं पक्वस- स्यैस्तु पीता॥कथमपि तु हिमं स्याल्लिङ्गवैशेषिकं वा पवनक- फविकारो जायते शैशिर वा॥ ५४॥गौरारामास्तमतिशयेनारु- णान्यम्बराणि सेव्यं तिक्तं कटुकलवणं प्रायशो ह्यम्लमेव॥स्वे- दोन्मर्दं प्रतिदिनमिदंकारयेद्यत्र सम्यग् नाशं यातोऽनिलकफ- गदौ क्वास्ति तेषां प्रकोपः ॥ ५५ ॥ अथ शिशिरऋतुका लक्षण और उपचार-बहुत शीतल वायु चले, पृथ्वीपर कछुक धान्य उत्पन्न हो, और पकी हुई खेतीसे पीली पृथिवी हो, और इनमें जाड़ा पड़े कभी अधिक चिह्नकी विशेषता हो उसको शिशिर ऋतु कहते हैं इसमें वात और कफके विकार उपजते हैं ॥ ५४ ॥ और इस ऋतुमें गौरवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना और अतिशय करके लाल रंगके वस्त्रोंको पहनना और कडुआ, चरचरा,सलोना ये रस सेवने चाहिये और विशेष करके खट्टा रस सेवना चाहिये और इस ऋतुमें पसीनोंको लाना और मर्दन करना नित्यप्रति अच्छी- तरह करना चाहिये ऐसा करनेसे वात और कफके रोग नाशको प्राप्त हो जाते हैं और उनके प्रकोपकी कौन कथा है ? ॥ ५५ ॥ अथ वसंतऋतुका वर्णन। मुदितकोकिलकूजितकाननं मदनसूचितकिंशुकशोभितम् ॥ कुसुमसौरभरञ्जितभूधरं क्वणितमत्तमधुव्रतलालसम्॥५६॥मक- रकेतनबाणसमाकुलं मुदितमेव समस्तमिदं जगत् ॥ मलय- मारुत उष्णगुणान्वितः कफकरो हि वसन्तऋतुर्भवेत् ॥५७॥ कफजकोपविनाशनलालनं वमननावनरूक्षनिषेवणम्॥५८ ॥ विविधः सुरतानन्दः सम्भ्रमः कफवारणः॥व्यायामश्रमसंरोध- खिन्नविश्रान्तमानसः ॥५९॥ कटुक्षाराम्लाः सेव्याश्च शोषणं कफसम्भवम्॥एवं क्रियासमापन्नो नरः शीघ्रं सुखी भवेत् ॥६०॥ अथ वसंतऋतुका लक्षण और उपचार-जहां आनंदित हुए कोयल पक्षी वनमें बोलें कामदेवको सूचित करते हुए टेसूके फूलोंसे शोभा हो फूलोंके गंधसे रंजित पर्वत हो और जहां खेलते हुए और मदवाले भौरोंकी शोभा हो ॥ ५६ ॥ और कामदेवके बाणसे समाकुल और आनंदित जगत् होवे तिसको वसंतऋतु कहते हैं । यह सुन्दर वायुसे