भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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पृष्ठ 58

( २६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- और उष्ण गुणसे अन्वित हुआ वसंतऋतु होता है यह कफको उपजाता है ॥ ५७ ॥ इस ऋतुमें वमन, नस्य, रूखा पदार्थ इनका सेवन कफके कोपको नाशता है ॥ ५८ ॥ अनेक प्रकारसे कामदेवका आनन्द और अच्छी तरह चलना, फिरना कफको दूर करता है और इस ऋतुमें कसरतके परिश्रमको करनेसे स्वेदित और श्रांत मनवाला मनुष्य सुखी रहता है ॥ ५९ ॥ और चर्चरा, खारा, खट्टा ये रस सेवने चाहिये ये कफको शोषते हैं ऐसी क्रियाको प्राप्त हुआ मनुष्य शीघ्र सुखी हो जाता है ॥ ६० ॥ अथ ग्रीष्मवर्णन । दीर्घवास रसस्तीक्ष्णं ज्वालामालाकुलं जगत्॥दिशि दिशि मृग- तृष्णाचोष्णं भृशं भवेद्रजः॥६१॥नैर्ऋतोमारुतो रूक्षःशीर्णपर्णा महीरुहः॥ दग्धतृणाकुलारण्यं दावाग्निसङ्कुला दिशः ॥६२॥ एवं तु लक्ष्म ग्रीष्मस्य पित्तरक्तमुदीर्यते ॥ तस्मात् क्रियाप्रती- कारं कुर्य्यात् संशमनं भिषक् ॥६३॥ जलक्रीडा दिवा निद्रासे- वनं सुखसाधनम् ॥ श्यामारामारतं शस्तं किञ्चल्कं कुञ्जशीत- लम् ॥ ६४ ॥ नीलनालदलोपेतः श्रमघ्नो व्यजनानिलः ॥ केत- क्यामोदकुसुमं चन्दनोशीरशीतलैः ॥ ६५ ॥ लेपनं शीतलं सम्यग्धारागाराशयः पुनः ॥ एवं क्रियासमापन्नो ग्रीष्मे च सुख- सङ्गमः॥ ६६॥ इति आत्रेयभाषिते ऋतुचर्यानाम चतुर्थो- ऽध्यायः ॥४॥ अथ ग्रीष्मऋतुका लक्षण और उपचार-बड़े दिन होवें और तीक्ष्ण होवें और गरमीके समूहसे जगत् व्याकुल हो जावे और दिशा दिशामें मृगतृष्णा होवे और अतिगर्मी और धूली उड़े॥ ६१॥ नैर्ऋतदिशाका रूखा वायु चले, वृक्षोंके पत्ते उडजावें, दग्धहुए तृणोंके समूहसे व्याप्त वन होवे, और दावाग्निसे संकुलित दिशा होजावें ॥ ६२ ॥ उसको ग्रीष्मऋतु कहते हैं, इसमें पित्त और रक्त बढ़ता है इसलिये वैद्य रक्तपित्तको शमन करनेवाली क्रियाको करे ॥ ६३ ॥ इस ऋतुमें जलकी क्रीडा, दिनमें शयन, श्यामवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना, और कछुक शीतल वस्तुको सेवना ये पथ्य हैं ॥ ६४ ॥ नीले कमलके पत्तोंसे संयुक्त हुए पंखेकी पवन ग्रीष्मके परिश्रमको हरता है और केतकीके खिले हुए फूल, सफेद चंदन, खस, शीतल चीजों करके ॥ ६५ ॥ अच्छी तरह लेप करना और फूहाराके स्थानमें बसना ऐसे क्रियाको प्राप्त हुआ मनुष्य ग्रीष्मऋतुमें सुखी रहता है ॥ ६६॥ इति वेरीनिवासिसुधशिवसहायसूनुवैद्यरवि- त्तशास्त्रि-अनुवादित-हारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने ऋतुचर्यानाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥