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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २७ ) पञ्चमोऽध्यायः । इसके बाद वयो ज्ञानका कथन । वयश्चतुर्विधं प्रोक्तमुत्तमाधममध्यमम् ॥ हीनं चातुर्थिकं प्रोक्तं तानि वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ १ ॥ बालं युवानं वृद्धं च मध्यमं च तथैव च॥चतुर्विधं वयः सम्यक् तत्समासेन वक्ष्यते ॥२॥ इसके अनंतर वय अर्थात् अवस्थाके ज्ञानको कहेंगे-अवस्था चार प्रकारकी कही है । उत्तम, अधम,मध्यम, और हीन । अब उन्हें कहता हूं ॥१॥ बालक,जवान,वृद्ध और मध्यम ऐसी चार प्रकारकी अवस्था हैं उसको विस्तारसे कहता हूँ ॥ २ ॥ मध्यमवयोलक्षण । पथि श्रान्तं श्रमक्षीणं बालस्त्रीसुकुमारकम् ॥ एतेषां मध्यमा संज्ञा प्रोच्यते वैद्यकागमे ॥ ३ ॥ रस्तेमें श्रांत हुआ, श्रमसे क्षीण हुआ, बालक, स्त्री और सुकुमार अर्थात् कोमल मनुष्य इनकी वैद्यकशास्त्रमें मध्यम संज्ञा कही है ॥ ३ ॥ आपोडशाद्भवेद्बालः पञ्चविंशो युवा नरः॥ मध्यमं सप्ततिर्या- वत्परतो वृद्ध उच्यते ॥४॥ तथा च सुकुमाराश्चेत्येते मध्यमसं- ज्ञकाः॥वयसः षोडशाधिक्यं समयश्च भवेत्तु यः॥५॥आविं- शति समाः प्राप्तो यथा च कृशदेहवान्॥पूर्ण वयः स्त्रियःप्राप्ता मध्यमे चाधमं वयः ॥ ६ ॥ सोलह वर्षतक बालक अवस्था, पचीस वर्षतक जवान अवस्था, सत्तर वर्षतक मध्य अवस्था होती है, इससे परे वृद्ध अवस्था है ॥ ४ ॥ मध्यमसंज्ञकोंमें सुकुमार अर्थात् कोमल, सोल- हवर्षसे ऊपर २० वर्षतक दुर्बल शरीरवाले, और पूर्ण अवस्थाको प्राप्त हुई स्त्री ये मध्यम अव- स्थामें भी अधम वय. कहाते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ पञ्चविंशत्समादूर्ध्वमापञ्चाशद्गतः पुमान् ॥ कर्मकठोरा वनिता दृश्यते चोत्तमं वयः ॥७॥ सप्तविंशत्समादूर्ध्वं पञ्चाशत्संयुताः समाः ॥ बालवृद्धिस्तथा यस्य इत्येतदुत्तमं वयः ॥ ८ ॥

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