हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
(२४) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- अथ हेमन्तवर्णन। बहुशीतःसमीरोऽल्पश्चाल्पवासरता ऋतौ॥अल्पतेजा दिवानाथो धूमाक्रांता च दिग्भवेत् ॥ ४६ ॥ विस्तीर्णशालिकेदारा नील- धान्योज्ज्वला मही ॥ एवं गुणसमायुक्ता हैमन्ती स्म भवेद्दतुः ॥४७॥ तत्र वातकफा दोषा दृश्यंते कुपिता भृशम् ॥ अग्निसंसे- वनंपथ्यंकटुक्षाराम्लसेवनम् ॥४८॥ गौरांगामारतं शस्तं व्याया- मश्च प्रशस्यते ॥ एवं संशाम्यंति दोषाः कफवातसमुद्भवाः ॥ ॥४९॥ बलिनः शीतसंरोधा हेमन्ते प्रबलोऽनिलः ॥ भवत्यल्पे- न्धनो धातून्स पचेद्वायुनेरितः ॥ ५० ॥ अतो हिमेऽस्मिन्सेवेत स्वाद्वम्ललवणान्रसान्॥दीर्घा निशा भवेत्तर्हि प्रातरेव बुभुक्षितः॥ ॥ ५१ ॥ भवत्यकार्य्यं संभाव्य यथोक्तं शीलयेदनु ॥ ५२ ॥ अर्कन्यग्रोधखदिरकरंजककुभादिकम् ॥ प्रातर्भुक्त्वा च मधुरक- षायकटुतिक्तकम् ॥ ५३ ॥ अथ हेमंतऋतुका लक्षण और उपचार-बहुत शीत वायु अल्प चले और दिनका समय थोड़ा हो जावे और अल्प तेजवाला सूर्य रहे और धूमसे आकुलित हुई दिशा होवे॥४६॥ और विस्तारको प्राप्त हुए चावलोंके खेत होवें और नील तथा अन्नसे प्रकाशित पृथिवी होवे ऐसे गुणोंसे संयुक्त हेमंतऋतु होता है ॥ ४७ ॥ इस ऋतुमें अतिशयसे कुपित हुए वात और कफ दीखते हैं, इसमें अग्नि सेवना और चर्रचरा, खारा, खट्टा, इन्होंको सेवना पथ्य है ॥ ४८ ॥ गौरवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना और कसरत करना श्रेष्ठ है, इस तरहसे कफ वातसे उपजा दोष शांत होता है ॥ ४९ ॥ बलवाले मनुष्यके शीतको रोकनेसे हेमंतऋतुमें वायु प्रबल हो जाताहै, पीछे वायुसे प्रेरित किया यही वायु अल्प आहार आदिवाला होके धातुओंको पकाता है ॥ ५० ॥ इसलिये शीतकालमें स्वादु, खट्टा, सलोना ऐसा रस सेवे और हेमंतऋतुमें बडी रात्रियोंके होनेसे प्रभातमें ही भोजन करनेकी इच्छावाला मनुष्य हो जाता है ॥ ५१ ॥ इसवास्ते अकार्यकी संभावना करके यथोक्त द्रव्यका अभ्यास करे ॥ ५२ ॥ आक, बड़, खैर, करंजुआ, अर्जुनवृक्ष इन आदिको प्रभातमें साधन करके पीछे मधुर, कसैला, चर्रचरा, कडुुआ इन रसोंको सेवे ॥ ५३ ॥
अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । (२५) अथ शिशिरवर्णन । बहुलशिशिरवातः किञ्चिदुद्भूतसस्या भवति वसुमतीयं पक्वस- स्यैस्तु पीता॥कथमपि तु हिमं स्याल्लिङ्गवैशेषिकं वा पवनक- फविकारो जायते शैशिर वा॥ ५४॥गौरारामास्तमतिशयेनारु- णान्यम्बराणि सेव्यं तिक्तं कटुकलवणं प्रायशो ह्यम्लमेव॥स्वे- दोन्मर्दं प्रतिदिनमिदंकारयेद्यत्र सम्यग् नाशं यातोऽनिलकफ- गदौ क्वास्ति तेषां प्रकोपः ॥ ५५ ॥ अथ शिशिरऋतुका लक्षण और उपचार-बहुत शीतल वायु चले, पृथ्वीपर कछुक धान्य उत्पन्न हो, और पकी हुई खेतीसे पीली पृथिवी हो, और इनमें जाड़ा पड़े कभी अधिक चिह्नकी विशेषता हो उसको शिशिर ऋतु कहते हैं इसमें वात और कफके विकार उपजते हैं ॥ ५४ ॥ और इस ऋतुमें गौरवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना और अतिशय करके लाल रंगके वस्त्रोंको पहनना और कडुआ, चरचरा,सलोना ये रस सेवने चाहिये और विशेष करके खट्टा रस सेवना चाहिये और इस ऋतुमें पसीनोंको लाना और मर्दन करना नित्यप्रति अच्छी- तरह करना चाहिये ऐसा करनेसे वात और कफके रोग नाशको प्राप्त हो जाते हैं और उनके प्रकोपकी कौन कथा है ? ॥ ५५ ॥ अथ वसंतऋतुका वर्णन। मुदितकोकिलकूजितकाननं मदनसूचितकिंशुकशोभितम् ॥ कुसुमसौरभरञ्जितभूधरं क्वणितमत्तमधुव्रतलालसम्॥५६॥मक- रकेतनबाणसमाकुलं मुदितमेव समस्तमिदं जगत् ॥ मलय- मारुत उष्णगुणान्वितः कफकरो हि वसन्तऋतुर्भवेत् ॥५७॥ कफजकोपविनाशनलालनं वमननावनरूक्षनिषेवणम्॥५८ ॥ विविधः सुरतानन्दः सम्भ्रमः कफवारणः॥व्यायामश्रमसंरोध- खिन्नविश्रान्तमानसः ॥५९॥ कटुक्षाराम्लाः सेव्याश्च शोषणं कफसम्भवम्॥एवं क्रियासमापन्नो नरः शीघ्रं सुखी भवेत् ॥६०॥ अथ वसंतऋतुका लक्षण और उपचार-जहां आनंदित हुए कोयल पक्षी वनमें बोलें कामदेवको सूचित करते हुए टेसूके फूलोंसे शोभा हो फूलोंके गंधसे रंजित पर्वत हो और जहां खेलते हुए और मदवाले भौरोंकी शोभा हो ॥ ५६ ॥ और कामदेवके बाणसे समाकुल और आनंदित जगत् होवे तिसको वसंतऋतु कहते हैं । यह सुन्दर वायुसे
( २६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- और उष्ण गुणसे अन्वित हुआ वसंतऋतु होता है यह कफको उपजाता है ॥ ५७ ॥ इस ऋतुमें वमन, नस्य, रूखा पदार्थ इनका सेवन कफके कोपको नाशता है ॥ ५८ ॥ अनेक प्रकारसे कामदेवका आनन्द और अच्छी तरह चलना, फिरना कफको दूर करता है और इस ऋतुमें कसरतके परिश्रमको करनेसे स्वेदित और श्रांत मनवाला मनुष्य सुखी रहता है ॥ ५९ ॥ और चर्चरा, खारा, खट्टा ये रस सेवने चाहिये ये कफको शोषते हैं ऐसी क्रियाको प्राप्त हुआ मनुष्य शीघ्र सुखी हो जाता है ॥ ६० ॥ अथ ग्रीष्मवर्णन । दीर्घवास रसस्तीक्ष्णं ज्वालामालाकुलं जगत्॥दिशि दिशि मृग- तृष्णाचोष्णं भृशं भवेद्रजः॥६१॥नैर्ऋतोमारुतो रूक्षःशीर्णपर्णा महीरुहः॥ दग्धतृणाकुलारण्यं दावाग्निसङ्कुला दिशः ॥६२॥ एवं तु लक्ष्म ग्रीष्मस्य पित्तरक्तमुदीर्यते ॥ तस्मात् क्रियाप्रती- कारं कुर्य्यात् संशमनं भिषक् ॥६३॥ जलक्रीडा दिवा निद्रासे- वनं सुखसाधनम् ॥ श्यामारामारतं शस्तं किञ्चल्कं कुञ्जशीत- लम् ॥ ६४ ॥ नीलनालदलोपेतः श्रमघ्नो व्यजनानिलः ॥ केत- क्यामोदकुसुमं चन्दनोशीरशीतलैः ॥ ६५ ॥ लेपनं शीतलं सम्यग्धारागाराशयः पुनः ॥ एवं क्रियासमापन्नो ग्रीष्मे च सुख- सङ्गमः॥ ६६॥ इति आत्रेयभाषिते ऋतुचर्यानाम चतुर्थो- ऽध्यायः ॥४॥ अथ ग्रीष्मऋतुका लक्षण और उपचार-बड़े दिन होवें और तीक्ष्ण होवें और गरमीके समूहसे जगत् व्याकुल हो जावे और दिशा दिशामें मृगतृष्णा होवे और अतिगर्मी और धूली उड़े॥ ६१॥ नैर्ऋतदिशाका रूखा वायु चले, वृक्षोंके पत्ते उडजावें, दग्धहुए तृणोंके समूहसे व्याप्त वन होवे, और दावाग्निसे संकुलित दिशा होजावें ॥ ६२ ॥ उसको ग्रीष्मऋतु कहते हैं, इसमें पित्त और रक्त बढ़ता है इसलिये वैद्य रक्तपित्तको शमन करनेवाली क्रियाको करे ॥ ६३ ॥ इस ऋतुमें जलकी क्रीडा, दिनमें शयन, श्यामवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना, और कछुक शीतल वस्तुको सेवना ये पथ्य हैं ॥ ६४ ॥ नीले कमलके पत्तोंसे संयुक्त हुए पंखेकी पवन ग्रीष्मके परिश्रमको हरता है और केतकीके खिले हुए फूल, सफेद चंदन, खस, शीतल चीजों करके ॥ ६५ ॥ अच्छी तरह लेप करना और फूहाराके स्थानमें बसना ऐसे क्रियाको प्राप्त हुआ मनुष्य ग्रीष्मऋतुमें सुखी रहता है ॥ ६६॥ इति वेरीनिवासिसुधशिवसहायसूनुवैद्यरवि- त्तशास्त्रि-अनुवादित-हारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने ऋतुचर्यानाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २७ ) पञ्चमोऽध्यायः । इसके बाद वयो ज्ञानका कथन । वयश्चतुर्विधं प्रोक्तमुत्तमाधममध्यमम् ॥ हीनं चातुर्थिकं प्रोक्तं तानि वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ १ ॥ बालं युवानं वृद्धं च मध्यमं च तथैव च॥चतुर्विधं वयः सम्यक् तत्समासेन वक्ष्यते ॥२॥ इसके अनंतर वय अर्थात् अवस्थाके ज्ञानको कहेंगे-अवस्था चार प्रकारकी कही है । उत्तम, अधम,मध्यम, और हीन । अब उन्हें कहता हूं ॥१॥ बालक,जवान,वृद्ध और मध्यम ऐसी चार प्रकारकी अवस्था हैं उसको विस्तारसे कहता हूँ ॥ २ ॥ मध्यमवयोलक्षण । पथि श्रान्तं श्रमक्षीणं बालस्त्रीसुकुमारकम् ॥ एतेषां मध्यमा संज्ञा प्रोच्यते वैद्यकागमे ॥ ३ ॥ रस्तेमें श्रांत हुआ, श्रमसे क्षीण हुआ, बालक, स्त्री और सुकुमार अर्थात् कोमल मनुष्य इनकी वैद्यकशास्त्रमें मध्यम संज्ञा कही है ॥ ३ ॥ आपोडशाद्भवेद्बालः पञ्चविंशो युवा नरः॥ मध्यमं सप्ततिर्या- वत्परतो वृद्ध उच्यते ॥४॥ तथा च सुकुमाराश्चेत्येते मध्यमसं- ज्ञकाः॥वयसः षोडशाधिक्यं समयश्च भवेत्तु यः॥५॥आविं- शति समाः प्राप्तो यथा च कृशदेहवान्॥पूर्ण वयः स्त्रियःप्राप्ता मध्यमे चाधमं वयः ॥ ६ ॥ सोलह वर्षतक बालक अवस्था, पचीस वर्षतक जवान अवस्था, सत्तर वर्षतक मध्य अवस्था होती है, इससे परे वृद्ध अवस्था है ॥ ४ ॥ मध्यमसंज्ञकोंमें सुकुमार अर्थात् कोमल, सोल- हवर्षसे ऊपर २० वर्षतक दुर्बल शरीरवाले, और पूर्ण अवस्थाको प्राप्त हुई स्त्री ये मध्यम अव- स्थामें भी अधम वय. कहाते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ पञ्चविंशत्समादूर्ध्वमापञ्चाशद्गतः पुमान् ॥ कर्मकठोरा वनिता दृश्यते चोत्तमं वयः ॥७॥ सप्तविंशत्समादूर्ध्वं पञ्चाशत्संयुताः समाः ॥ बालवृद्धिस्तथा यस्य इत्येतदुत्तमं वयः ॥ ८ ॥
( २६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- पचीस वर्षसे लेकर पचास वर्षतक पुरुषत्व बना रहता है और इतने ही में स्त्री भी क्रियामें कठोर रहती है इसलिये यह उत्तम आयु देखी जाती है । सत्ताईस वर्षसे लेकर पचास वर्ष तक जिसके लड़के हों यह उत्तम वय है ॥ ७ ॥ ८ ॥ स्थूलोऽतिदीर्घकठिनस्तथा स्त्री बृहदौदरा ॥ इत्युत्तमोऽवयववाञ्ज्ञातव्यश्चोत्तमोत्तमः ॥ ९ ॥ जो स्थूल,अतिलंबा और कठोर, ऐसा पुरुष हो और बड़े पेटवाली स्त्री हो तो समझना यह उत्तम शरीरवाला और उत्तमोत्तम मनुष्य है॥ ९ ॥ षष्ट्यूर्ध्वमशीतिसमाः प्राप्तं हीनबलं वयः ॥ तदूर्द्धं हीनहीनश्च विज्ञेयो वयसः क्रमः॥ १० ॥ साठ वर्षसे उपरांत अस्सी वर्षतक हीनबल अवस्था होती है और अस्सीवर्षसे उपरांत हीनसे भी हीन अवस्था होती है ऐसे अवस्थाका क्रम जानना चाहिये ॥ १० ॥ क्षीणोऽध्वश्रान्तसंखिन्नस्तथा रोगानुपीडितः॥ रूक्षश्चातिकृशो ज्ञेयो बालसात्म्यमुदाहृतम् ॥११॥ क्षीण मार्गमें थकनेसे खेदको प्राप्त और रोगसे पीडित, रूखा अति कृश मनुष्य बालककी प्रकृतिके समान प्रकृतिवाले होते हैं ॥ ११ ॥ सुकुमारोऽतिभीरुश्च मध्यकायस्त्रियोऽपि वा ॥ मध्यसात्म्योऽपि विज्ञेयो मध्यमो वयसात्म्यकः ॥१२॥ कोमल शरीरवाला, अति डरनेवाला, मध्यम शरीरवाला, स्त्री-मध्य प्रकृतिवाला ऐसा मनुष्य मध्य अवस्थाकी प्रकृतिवाला जानना ॥ १२ ॥ पञ्चवर्षा स्मृता बाला मुग्धा च षट्समावधिम् ॥ द्वादशाब्दं स्मृता बाला मुग्धा स्यात्सप्तमावधिम् ॥ १३ ॥ प्रौढा च नव- वर्षाणिप्रगल्भा चत्रयोदश॥चतुर्विंशद्वर्षादूर्द्धं सप्तत्रिंशतिमध्य- गाः ॥ पूर्ण वयः स्त्रियः प्राप्ता इत्येतदुत्तमं वयः ॥ १४ ॥ पांच वर्षकी स्त्री बालक कहाती है, पांचसे आगे छः वर्षतककी स्त्री मुग्धा कहाती है, बारह वर्षकी स्त्री बाला कहाती है और बारह वर्षके आगे सात वर्षतक स्त्री मुग्धा कहाती है ॥१३॥ तिसके पीछे नव वर्षतक स्त्री प्रौढा कहाती है और तिसके पीछे तेरह वर्षतककी स्त्री प्रगल्भा कहाती है. और इतने वयके बीचमें ही चौबीस वर्षसे उपरांत सैंतीस वर्षतक मध्य अवस्थाकी स्त्री पूर्ण अवस्थाको प्राप्त होती है.यह उन्होंकी उत्तम अवस्था है ॥ १४ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( २९ ) अथ प्रकृतिका ज्ञान । मध्यसात्म्यश्च स्थूलः स्याद्बलवान्सत्त्ववान्नरः ॥ सचांऽप्युत्तमसात्म्यः स्याद्बलवत्समुपाचरेत् ॥ १५ ॥ मध्यप्रकृतिवाला नर स्थूल और बलवान होता है। उत्तमप्रकृतिवाला पुरुष सत्त्वगुणसे युक्त बलवान् होता है॥ १५ ॥ अथ वातादिप्रकृतिका ज्ञान । अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रकृतिज्ञानमुत्तमम् ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥ १६ ॥ इसके बाद वात, पित्त, कफ और सन्निपातकी प्रकृतिका ज्ञान कहूँगा ॥ १६ ॥ अथ वातप्रकृतिका लक्षण । यः कृष्णवर्णश्चपलोऽतिसूक्ष्मः केशालपरूक्षो बलवान्क्षमः स्यात्॥ सूक्ष्मातिदन्तो नखवृद्धिमेति दीर्घस्वनश्चक्रमणक्षमो- ऽसौ ॥ १७॥ दीर्घाक्रमो लोलुपहीन सत्त्वस्तथैव चाम्लीरसभो- जनेच्छुः ॥ संस्वेदनेनातिविमर्दनेन सौख्यं समागच्छति वातलो नरः ॥ १८ ॥ अथ वातकी प्रकृतिका लक्षण-जो मनुष्य कृष्णवर्ण, चपल व अतिकृश शरीर, अल्पबाल, रूखा, बलवाला, समर्थ, अतिसूक्ष्म दंतोंवाला, नखोंकी वृद्धिको प्राप्त होवे तथा बडा और लंबा बोलनेवाला, चलने फिरनेमें समर्थ ॥ १७ ॥ बहुत कूदनेवाला, लोभी, सत्त्वसे वर्जित, खट्टे रसको खानेकी इच्छावाला और अच्छी तरह पसीना देनेसे तथा मर्दन करनेसे सुखको प्राप्त होता हो वह वातकी प्रकृतिवाला हो ॥ १८ ॥ अथ पित्तप्रकृतिका लक्षण । गौरातिपिङ्गः सुकुमारमूर्त्तिः प्रीतः सुशीते मधुपिंगनेत्रः ॥ तीक्ष्णोऽपि कोडपिं क्षणभङ्गुरश्च त्रासी मृदुगात्रमलोमकं स्यात्॥१९॥ लौल्यप्रियस्तिक्तरसानुभोगी द्वेषी च तीक्ष्णश्च नवोष्णसेवी ॥ स्तुतिप्रियो दन्तविशुद्धवर्णो जातः स पित्त- प्रकृतिर्मनुष्यः ॥ २० ॥
( ३० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ पित्तकी प्रकृतिका लक्षण-जो गौरी वर्णके समान पीतवर्णवाला हो, सुकुमार मूर्तिवाला हो, शीतल पदार्थमें प्रीति रखता हो, मधुसरीखे तथा पिंगवर्णके नेत्रोंवाला हो, तेज स्वभाव वाला हो और कोई क्षण भर में ही स्वभावसे गिर जाने वाला हो, उद्वेगसे संयुक्त हो, कोमल हो, कम केशवाला हो ॥ १९ ॥ और चंचलपनेमें प्रियता करनेवाला हो, कडुआ रसको खानेवाला हो, वैर करनेवाला हो, तेजसे संयुक्त हो, नवीन और गरम वस्तुको सेवनेवाला हो, अपनी स्तुतिको चाहनेवाला हो, दांतोंसे विशेष करके शुद्धवर्णवाला हो, ऐसा मनुष्य पित्तकी प्रकृतिवाला होता है ॥ २० ॥ अथ कफप्रकृतिका लक्षण । सुस्निग्धवर्णःसितनेत्रवृत्तः श्यामः सुकेशो नखदीर्घरोमा॥गम्भी- शब्दःश्रुतिशास्त्रनिद्रातन्द्राप्रियस्तिक्तकटूष्णभोजी ॥२१ ॥ स मांसलःस्निग्धरसप्रियश्चसगीतवाद्योऽतिसहिष्णुशीलः॥व्या- यामशीलो रतिलालसोऽसौ भवेत्कफस्य प्रकृतिर्मनुष्यः॥२२॥ अथ कफकी प्रकृतिका लक्षण-सुन्दर चिकने वर्णवाला हो और सफेद नेत्रोंवाला हो, वृत्त हो, श्यामवर्णवाला हो, सुंदर बालोंवाला हो, लंबे नख और रोमोंसे संयुक्त हो, गंभीर बोल- नेवाला हो, और वेद, शास्त्र, नींद, तंद्रा, इन्होंमें प्यार करनेवाला हो, कडुआ और गर्म भोजनकरनेवाला हो ॥ २१ ॥ मोटा हो स्निग्धरसको चाहनेवाला हो, गीत और बाजेको पसंद करनेवाला हो, अतिसहनेमें शीलस्वभाववाला हो, कसरतको करनेवाला हो, विषयभोगमें इच्छा- वाला हो, ऐसा मनुष्य कफकी प्रकृतिवाला होता है ॥ २२ ॥ अथ समप्रकृतिका लक्षण । संमिश्रवर्णोऽतिसुदीप्तगात्रो गम्भीरधीरोऽतिविदीर्णरोमा॥रामा- प्रियो भारसहोऽतिमिश्रो भोगेन युक्तः समता प्रकृत्या ॥ २३॥ कई प्रकारसे मिले हुए वर्णवाला हो, अतिसुन्दर प्रकाशित अंगोंवाला, गंभीर पनेमें धीर, अति विदारित हुए रोमोंवाला, स्त्रीसे प्यार करनेवाला, भार अर्थात् बोझेको सहनेवाला और सब लक्ष- णोंसे अति मिला हुआ, और भोगके भोगनेवाला ऐसा मनुष्य समप्रकृतिवाला होता है ॥ २३ ॥ अथ दिशाभेदसे वातके गुणदोष । ( पूर्वदिशाका वायु ) अथागतं वच्मि मरुत्प्रवाहं पूर्वोत्तरादक्षिणपश्चिमाञ्च ॥ तेषां गुणान्दोषविकोपनं च पृथक्पृथङ्मे गदतः शृणु त्वम् ॥ २४॥
अ० ५] भाषाटीकासमेता। ( ३१ ) शीतोऽतिमाधुर्य्यगुणः प्रयुक्तो वातप्रकोपी बलकृद्विशेषात् ॥ वाताधिकानां व्रणशोफिनाञ्च प्राचीप्रवृत्तः पवनो न शस्तः॥२५॥ अथ आठ दिशाओंमें प्रवृत्त हुए वायुके गुणदोषवर्णन-इसके अनन्तर पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिमसे आनेवाले वायु और उसके गुण दोष और कोपोंको कहता हूं तथा अलग अलग अर्थात् अन्यवायु के भी गुण दोष कोप कहते हुए मुझसे तुम सुनो ॥२४॥ शीतल स्वभाववाला अतिमधुरपनेके गुणोंसे युक्त वातको कोपनेवाला, विशेष करके बलको करनेवाला, ऐसा, पूर्वदिशाका वायु है। यह बातकी अधिकतावालोंको और घावपै शोजा- वालोंको श्रेष्ठ नहीं है ॥ २५ ॥ आग्नेयदिशाका वायु । किञ्चित्सतिक्तो मधुरान्वितः स्यात्कफःसमीरोद्गवरोगकारी ॥ सुशीतलःशोफवतां व्रणानां शस्तो न चाग्नेयसमीरणश्च॥२६॥ कछुक कडुआ है, मधुररससे अन्वित है, कफ और वातसे उपजे रोगोंको करता है, सुंदर शीतल है, शोजावाले घावोंको अच्छा नहीं है ऐसा आग्नेयदिशाका वायु है ॥ २६ ॥ दक्षिणादिशाका वायु । तिक्तः कषायो मधुरोऽतिमन्दः सुगन्धसंशीतगुणैः प्रकृष्टः॥वद- न्ति संज्ञां मलयानिलेति प्रकृष्टरामाजनचित्तहारी॥२७॥मनो- भवस्य प्रकरो मरुत्स्यात्कफोद्भवः सम्भवति प्रचारः॥नचाति- शीतो न तथोष्णको वा शुभ्रश्च याम्यां प्रभवःसमीरः ॥२८ ॥ कडुआ है, कसेला है, मधुर है, अतिमंद हैं, और सुगंध तथा शीतल गुणोंकरके संयुक्त है और मल्यानिलसंज्ञावाला है यह स्त्रियोंके चित्तको हरता है ॥ २७ ॥ और कामदेवको जगाता है, कफके रोगोंको करता है और अतिशीतल नहीं है और अतिगर्म नहीं हैं और शुभ है ऐसा दक्षिणादिशाका वायु हैं ॥ २८ ॥ नैर्ऋत्यदिशाका वायु । रूक्षोष्णवातः प्रथमः समीरः कट्वम्लपित्तासृजि दोषकारी ॥ प्रशोषणो देहबलस्य वायुःकफान्वितो नैर्ऋतिकःसमीरः॥२९॥ रूखाहै और गर्मवायुसे संयुक्त है और वायुको शांत करताहै और कटु, अम्ल, पित्त और रक्तमें दोषको करता हो और देहके बलको शोषनेवाला है और कफसे अन्वित है ऐसा नैर्ऋतदिशाका वायु होता है ॥ २९ ॥
( ३२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- पश्चिमदिशाका वायु । अथातिसूक्ष्मो मरुतः प्रशस्तो नूनं प्रतीच्यास्तु दिशः प्रवृत्तः ॥ वायुस्तथोदीरति रक्तपित्तं शस्तो व्रणानां कफशोफिनां वा ॥३०॥ पश्चिमदिशाका अतिसूक्ष्म वायु श्रेष्ठ है और रक्तपित्तको बढाता है। यह वायु घाववालोंको और कफसे उपजे शोजेवालेको श्रेष्ठ है ॥ ३० ॥ वायव्यदिशाका वायु । वायव्यजातो मरुतः प्रशस्तः कषायसंशुष्कगुणप्रसन्नः ॥करोति वातस्य वशं नराणां शस्तो न निन्द्यो व्रणशोफिनाञ्च ॥३१॥ वायव्यदिशाका वायु श्रेष्ठ है, कसैला और सुखानेवाले गुणसे संपन्न है और मनुष्योंके हवाके वशमें करता है और घावपै शोजेवालोंको श्रेष्ठ है और निंदित नहीं है॥ ३१ ॥ उत्तरदिशाका वायु । स्वादुः कषायश्च कफप्रकोपी वायुः कुबेरस्य दिशः प्रवृत्तः ॥ करोति मेघागमनं जलस्य शीतो न चोष्णो न च निन्द्य एषः ३२ उत्तर दिशाका वायु सजल मेघको लाता है, शीतल है, गर्म नहीं है, कसैला है, स्वादु है, कफको कोपता है यह निंदाके योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥ ऐशानदिशाका वायु । शीतोऽतिलौल्यः कफवातकोपं करोति चैशानदिशः प्रवृत्तः ॥ शस्तश्च नासौ व्रणशोफकासिनां क्षयस्तथा श्वासविकारिणाञ्च३३ ईशान दिशाका वायु शीतल है, चंचल है, कफ और वातके कोपको करता है, और घाव, शोजा, खांसी, क्षय, श्वास, रोग इन विकारवालोंको अच्छा नहीं है ॥ ३३ ॥ अन्य-पंचविध वायुके गुण । वस्त्रं नानाविधं चर्म वैणवं तालव्यंजनम् ॥ उशीरं शिखिपिच्छं तु प्रत्येकेन गुणोत्तमाः ॥ ३४ ॥ अथ वस्त्रआदिके वायुका गुणदोषकथन-अनेक प्रकारका वस्त्र, चाम बांसका पंखा, ताडका पंखा, खसकी टट्टी अथवा पंखा, मोरके पंखोंका पंखा, ये सब हवाके करनेमें एकसे दूसरे उत्तम गुणवाले हैं ॥ ३४ ॥ वस्त्रवायुके गुण । वस्त्रप्रवृत्तो मरुतो न शस्तो व्रणशोफिनाम् ॥ रक्तवासःसमुत्पन्नं १. व्यजनार्थेऽत्र व्यजनमुक्तं छन्दोभङ्गभयादृषिणा । न खल्वभिमतमिदं यतोऽग्रेऽभिहितं “वैणवं व्यजनं तन्द्रा निद्राकरणमेवच”इति तथा च “ अपि माषं मषं कुर्याच्छन्दोभङ्गं न कारयेत्” ।
अ० ५ ] भाषार्टीकासमेता । ( ३३ ) विशेषेण तु वर्जयेत् ॥३५॥ करोति कफरक्तस्य कोपनं बहुरो- गकृत् ॥ श्रमग्लानिपिपासासुतन्द्रानिद्राकरो भृशम् ॥ ३६ ॥ वस्त्रकी हवा घावपै शोजेवालेको अच्छी नहीं है और लाल वस्त्रसे उपजी हुई हवाको विशेष करके त्यागे ॥ ३५ ॥ क्योंकि लाल वस्त्रकी हवा कफ रक्तको कुपित करती है और बहुतसे रोगोंको उपजाती है और परिश्रम, ग्लानि, पिपासा, तंद्रा और नींदको अति करती है॥३६॥ वेणुवायुगुण । वैणवं व्यजनं तन्द्रानिद्राकरणमेव च ॥ रूक्षोऽतिकषायरसो न च वातप्रकोपनः ॥ ३७ ॥ बाँसका पंखा, तंद्रा और नींदको करता है, रूखा है, अतिकसैला रसवाला है और वातको कोपित नहीं करता है ॥ ३७ ॥ कांस्यपात्रवायुके गुण । कांस्यपात्रमरूद्धक्षः सोष्णो वातस्य शान्तिकृत् ॥ दाहश्रमघ्नः स्वेदघ्नो निद्रासौख्यकरो नृणाम्॥ ३८ ॥ कांस्यपात्रकी हवा रूखी है, गरम, वातको शांत करती है,दाह और श्रमको हरती है, पसीना मारती है, मनुष्योंके नींद और सुखको करती है ॥ ३८ ॥ रम्भातालपत्रवायुके गुणः। तालपत्रकरम्भाया दलस्य व्यजनो हिमः ॥ मधुरोऽतिश्रमघ्नः स्यादार्द्रत्वात्कफकोपनः ॥ ३९ ॥ निद्राकरः प्रीतिकरः शोक- रोगविकारहा॥दाहपित्तश्रमग्लानिनाशनो भ्रमशान्तिकृत्४०॥ ताड़की पत्ते और केलेके पत्तेका पंखा शीतल है, मधुर है, अतिश्रमको हरता हैं और गीले- पनेसे कफको कोपता है ॥ ३९ ॥ नींद करता है, प्रीतिकरता है,शोक, रोग और विकारको नाशता है और दाह,पित्त, परिश्रम,ग्लानिको नाशता है और भ्रमकी शांति करता है ॥ ४० ॥ खस, शिखिपुच्छ व्यजनवायुके गुण । उशीरमूलरचितं व्यजनं शिखिपिच्छकैः ॥ व्यजनेन सुगन्धः स्यान्मन्दशीतगुणात्मकः ॥ ४१॥ ग्लानिम्पूर्च्छाश्रमशोषविस- र्पविषदर्पहा ॥इति पञ्चविधो वायुरुपायेन कृतो नृणाम् ॥४२॥ खसकी जड़ और मयूरके पंखका पंखा डुलानेसे सुगन्ध और कुछ शीत गुणवाला होता है ॥ ४१ ॥ ग्लानि, मूर्च्छा, श्रम, शोष, विसर्प,और विषको हटाता है, इस तरह पांच प्रकारका वायु उपायसे किया हुआ होता है ॥ ४२ ॥ ३
( ३४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- षडृतुओंमें उत्तम दिग्वायु । शिशिरे पूर्वकृद्वायुराग्नेयो हेमन्ते मरुत् । वसन्ते दक्षिणो वायु- र्ग्रीष्मे नैर्ऋत्यकस्तथा ॥ ४३ ॥ वर्षासु पश्चिमो वायुर्वायव्यः शरदि स्मृतः॥हेमन्ते शिशिरे चैव प्रशस्तश्चोत्तरोऽनिलः॥४४॥ शिशिर अर्थात् माघ,फाल्गुनमें पूर्वका वायु अच्छा है, हेमंत अर्थात् मृगशिर, पौषमें आग्नेय- दिशाका वायु अच्छा है,वसंत अर्थात् चैत्र,वैशाखमें दक्षिणका वायु अच्छा है,ग्रीष्म अर्थात् ज्येष्ठ, आषाढ़में नैर्ऋतका वायु अच्छा है॥४३॥वर्षा अर्थात् श्रावण भादुआमें पश्चिमका वायु अच्छा है, शरद् अर्थात् आश्विन,कार्तिकमें वायव्यदिशाका वायु अच्छा है,शिशिर और वसंतऋतुमेंउत्तरका वायु भी अच्छा है ॥४४॥ प्रतिदिनषडृतु । अपराह्ने वर्षा वदन्ति निपुणास्तस्मिन्निशीथे शरत्प्रोक्तः शैशि- रिकस्ततो हिमऋतुः सूर्योदयाद्यतः॥मध्याह्ने च तथा वदन्ति निपुणा ग्रीष्मस्त्वृतुः स्यात्ततो वासन्तो मुनिभिर्ऋतुस्तु कथितो पूर्वापराह्ने सदा ॥ ४५ ॥ निपुण जन दिनके तृतीय प्रहरमें वर्षा कहते हैं अर्थात् वह समय वर्षाकालके जैसा सुहावन होता है अर्द्धरात्रिमें शरत् कहा गया है यानी वह समय शरत्कासा समय समझ पड़ता है। आधी रातके अनन्तर शिशिर ऋतु होता है अर्थात् उस समय कुछ शीत सदा लगता है । सूर्योदयसे कुछ पहिले हेमंत ऋतु होता है तब भी कुछ शीत रहता ही है वही निपुण जन दोपहरके समय ग्रीष्मकाल कहते हैं क्योंकि दोपहरमें सदा गर्मी जान पड़ती है। मुनियोंका कहना है कि दिनके पूर्व और परभागमें वसन्त होता है वास्तवमें वह समय वसन्तऋतुहीकी शोभा धारण करता है ॥४५॥ अथ सविष वायु । कार्त्तिके मार्गशीर्षे वा माघे चाषाढसंज्ञके ॥ ऋतुसन्धौ च हेमन्ते सविषः स्यात्तु मारुतः ॥ ४६ ॥ कार्त्तिक, मार्गशीर्ष, माघ और अषाढ़में और छः ऋतुओंके सन्धिमें तथा हेमंत ऋतुमें वायु सविष होता है ॥ ४६ ॥ स यस्मिन्नगरे देशे ग्रामे वाऽनगरेऽपि वा ॥ संस्पृशेदुलबणो वायुर्गोमनुष्येभवाजिनाम्॥४७॥ तिलकं गोषु जानीयाद्यक्ष्माणं मानुषेषु च ॥ गजेषु पावकं विद्याद्धयानां वेद्य उच्यते ॥४८॥ जिस नगरमें जिस देशमें अथवा जिस गाममें दारुणरूप बिगड़ा हुआ वायु जब गाय, मनुष्य, हस्ती, घोडा इनको छूता है ॥ ४७ ॥ तब गायोंमें तिलक नाम रोग उपजता है, १ अपराह्ने वर्षा इति छन्दोभंगे नत्वार्षत्वे न दोषः अन्यत्रापि यत्र यत्र छन्दोभंगो दृश्यते तत्र तत्र सर्वत्रार्षो ज्ञेयः ।
अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( ३५ ) और मनुष्योंमें राजरोग उपजता है और हस्तियोंमें पावक अर्थात् अग्नि उपजता है और घोडोंमें वेद्य पीडा उपजती है ॥ ४८ ॥ रक्षणीयं गजे पित्तं श्लेष्मा वाजिषु सर्वदा ॥ पवनोऽयं मनुष्याणां प्रायो रक्षेत् सर्वदा ॥ ४९ ॥ कुशल वैद्यको हस्तीकी पित्तसे, घोडोंकी सर्वकाल कफसे, मनुष्योंकी वायुसे रक्षा करनी चाहिये ॥ ४९ ॥ ऋतु भेदसे वातादिकोंका संचय, कोप, उपराम। वर्षे वायुः कुप्यतेऽन्तः शरत्सु लीनो वायुः कुप्यते पित्तरोगे ॥ लीयेत्पित्तं शैशिरे श्लेष्मकुञ्जे हेमन्ते वा चीयमानस्तथापि ५० ॥ कोपं याति श्लेष्मरोगो वसन्ते तस्माच्छान्तिः श्लेष्मरोगस्य चोष्णे ॥ पित्तं यायात्कोपतां ग्रीष्मकाले दृष्टा शान्तिः पैत्तिकी वार्षिके च ॥ ५१ ॥ ग्रीष्ममें संचित वायु वर्षामें कुपित होता है । वर्षाका कुपित वही वायु शरद्में अन्तर्लीन होकर पित्तरोगका प्रकोप करता है । हेमन्त और वर्षामें लीन हुआ वही पित्त वसन्तमें श्लेष्माका प्रकोप करता है । इसलिये श्लेष्मरोग की शान्ति उष्ण कालमें होती है, ग्रीष्ममें पित्त कोपको प्राप्त होता है और उसी पित्तकी शान्ति वर्षामें देखी जाती है ॥ ५० ॥ ५१ ॥ अथ वायुका कोप । अधोवातमूत्रपुरीषस्य रोधात् कषायातिशीतान्निशाजागरेषु ॥ व्यवायेऽथ वाहःश्रमाद्भातिमुक्त्याऽध्वनि प्रायशो भाषणेनाति- भीत्या॥५२॥विरूक्षैरतिक्षारतिक्तैः कटूभिस्तथा यानदोलाश्व- कोष्ठे रथे वा॥खरे कुञ्जरे मन्दिरारोहणेनोपवासे भवेन्मारुतस्य प्रकोपः ॥ ५३ ॥ सुशीते दिने दुर्दिने स्नानपीतेऽपराह्ने निशा जागरे वासरे वा। प्रकोपं मरुद्याति वर्षास्ववश्यं तथा सेवितो याति भुक्तस्य जीर्णम् ॥ ५४॥ मसूराः कलायाश्च निष्पावकाश्च महामाषशुश्रा यवाश्चामलाः स्युः॥ महाचावलाः कृष्णधान्याः प्रदिष्टा हिमाः कङ्गुनीवाररक्ताश्च शालयः ॥ ५५ ॥ १ वर्षशब्दः अकारान्तोऽपि वृष्टिवाचकः ( श.स्तो, ) २ (‘भुजङ्गप्रयतं भवेद्वैश्वतुर्भिरेरिति वृत्तलाकरानु- रोधात्' द्वितीययगणे त्रवर्णस्य धैर्यमावश्यकं परमार्षत्वात् क्षन्तव्यमिति ।
( ३६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- तथा कोद्रवश्चान्नं श्यामाक एतैः कृतं चौदनं वा यवागूश्चृतं वा ॥ कलिङ्गानि वास्तूकाचिल्लीकपूती पलाण्डुस्तथा गृञ्जनं कन्दशा- कम् ॥ ५६ ॥ इमान्सेवितादत्यर्थमेति प्रकोपं समीरस्य चोक्तः सुरासम्भवस्तु ॥ ततो यत्नतो रक्षणीयं मनुष्यैः शुभं चेहसे त्वं सदा रोगशान्तिम् ॥ ५७ ॥ अधोवात--मूत्र--विष्ठा--के रोकनेसे कसैले और शीतल पदार्थको सेवनेसे और रात्रिमें जागनेसे, मैथुनके करनेसे, नित्यप्रति श्रम करनेसे, अति भोजनको खानेसे और मार्गमें अति चलनेसे, ज्यादे बोलनेसे, अति भयसे ॥ ५२ ॥ रूखे पदार्थसे और अत्यंत नमकीन कडुआ, चर्चरा, खानेसे, डोला अर्थात् पीनस-घोडा, ऊंट, रथ, गधा, हस्ती और ऊंचे मकानमें चढनेसे उपवाससे रहनेसे वायुका प्रकोप होता है ॥ ५३ ॥ बहुत शीतल दिनमें मेघआदिसे आच्छादित हुए दुर्दिनमें दोपहरके पीछे स्नान करनेसे तथा रात्रिमें जागकर जल पीनेसे और वर्षाऋतुमें दिनमें वायु कोपको प्राप्त होता है और सेवित किया वायु कियेहुए भोजनको जराता है ॥ ५४ ॥ मसूर, मटर, मोठ, चौला, जुवार, जब, मोटेचावल, कृष्णअन्न, शीतल अन्न, कांगनी, नीवार धान्य, लाल अन्न, तूरीअन्न ॥ ५५ ॥ कोदूअन्न, शामकका भात या मांड, इन्द्रजव, बथुवा, चाकवत अर्थात् बथुवा विशेष, प्याज, गाजर, कंद शाक ॥ ५६ ॥ इनके जादे सेवनेसे वायुका प्रकोप होता है । इसलिये यदि तुम शुभ और रोगकी शान्ति सदा चाहते हो तो मनुष्योंको इनसे सदा बचाना ॥ ५७ ॥ अथ पित्तप्रकोपकानिदान । तथात्युष्णकट्वम्लरूक्षैर्विदाहैः ससीधूसुरासेवनेनोपवासैः ॥ सुधर्मेण क्रोधेन वा स्वेदनेन व्यवायेन वा याति कोपञ्च पित्तम् ॥ ५८ ॥ कुलित्थाढकीयूषमूलाकशिश्रुशठीसर्षपाराजिकाशा- कमेव ॥ निशाजागरेणापि युद्धे श्रमे वा घनान्ते शरत्सु प्रकोपः प्रदिष्टः॥५९॥सदम्लेन वाप्युष्णकाले शरत्सु भृशं वासरे मध्यमे वा निशीथे ॥ सुजीर्णे रसे भुक्तमात्रे प्रकोपः प्रदिष्टो विदैः कोविदैः पैत्तिकः स्यात् ॥ ६० ॥ अतिगर्म, चर्चरा, खट्टा, रूखा, और विदाही, सीधू तथा मदिराके, सेवनेसे, गर्मीसे, क्रोधसे पसीना निकालने और भोग करनेसे पित्त कोपको प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥ कुलथी १ 'यवागूरूष्णिका श्राणा विलेपी तरला च सा' इत्यमरः । यवागू षड्गुणजले सिद्धा स्यात् कृष्णा घना। "तण्डुलैमुद्गमाषैश्च तिलैर्वा साधिता हिता । यवागूर्ग्राहिणी बल्या तर्पणी वातनाशिनी ॥ शांङ्गधरे।
अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( ३७ ) अरहरका यूष, मूली, सहिंजना, कचूर, सरसों और राईका शाक अथवा इन्होंसे संयुक्त शाक खानेसे और वर्षाऋतुमें रात्रिके जागने, युद्ध करने, परिश्रम करनेसे शरद्ऋतुमें पित्त कोपको प्राप्त होता है ॥ ५९ ॥ अति खट्टे पदार्थसे, गरम समयमें, अतिशय करके दिनके मध्यभागमें, अर्ध रात्रिमें, भोजनका रस जीर्ण होते समय और खानेहीके समय विद्वान् वैद्योंने पित्तका प्रकोप बताया है ॥ ६० ॥ अथ कफप्रकोपका निदान । निशाजागरे वासरे वातिनिद्रा सुशीतोदसंसेवने शीतले वा ॥ पयःपानपीयूषमिक्षुस्तिलैस्तु तथा गृञ्जनैः कन्दशाकैरथापि ॥ ६१ ॥ सदा सेवितैर्वास्तुकैश्चाण्डमत्स्यैर्दधिं पिच्छिलैर्माषमद्यै- र्गुरुभिः॥अतिस्निग्धसंसेवनैर्भोजनेषु प्रदिष्टः कफस्य प्रकोपो वसन्ते ॥ ६२ ॥ दिनान्ते प्रभाते निशान्ते नरस्य प्रकोपः प्रदि- ष्टोऽपि भुक्ते न जीर्णे॥प्रदिष्टो बुधैः कोविदैरेव रोगःकफस्योपप- त्ति च जानीहि कष्टाम् ॥ ६३ ॥ सशीतेऽथवा शीतकाले निशान्ते नरस्य प्रकोपः प्रदिष्टोऽपि भुक्तेः॥ न जीर्णे प्रदिष्टो बुधै रोगवेगो निदानं कफस्येति चोक्तं सुधीभिः ॥ ६४ ॥ रात्रिमें जागनेसे और दिनमें अति शयन करनेसे और सुन्दर शीतल पानीको तथा शीतल देशको सेवनेसे,नवीन ब्याई गायका दूध, ईख, तिल, गाजर, कन्दशाकके सेवनेसे ॥ ६१ ॥ बकराके अण्डे तथा मछलीको सदा सेवनेसे और दही,लव्सादार पदार्थ, उडद, मदिरा, भारी पदार्थ, अतिचिकने पदार्थ सेवनेसे वसन्तमें दुष्ट हुए कफका कोप होता है ॥ ६२ ॥ दिनके अन्तमें, प्रभातमें, रात्रिके अन्तमें, भोजनके न पकनेसे कफका कोप होता है इसे विद्वान् वैद्य रोग ही कहते हैं इस भांति कफकी उत्पत्ति कष्ट करनेवाली जानो ॥ ६३ ॥ शीतल देशमें, शीतल समयमें, रात्रिके अन्तमें,भोजनको नहीं जीर्ण होनेमें, मनुष्यके कफका प्रकोप बुद्धिमानोंने कहा है ॥ ६४ ॥ अथ दो दोषोंके कोपकी उत्पत्ति । ऋतौ विपर्य्यासगते यदा च प्रकोपनं यस्य यथा प्रदिष्टम् ॥ तत्सेवमानस्य नरस्य रोगः स्याद्वन्द्वजो नाम विकारकारी ॥ ६५ ॥ यस्मिन्नृतौ वातविकोप उक्तस्तस्मिन्यदि श्लेष्मवि- कोपनानि ॥ संसेवते वा मनुजस्तदास्य भवेत्प्रकोपःकफवात- १ अत्र छन्दोभङ्गः ।
: ( ३८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- योश्च ॥ ६६ ॥ यस्मिन्मरुत्कुप्यति सेवते यः पित्तस्य कोपप्र- कराणि यानि ॥ विपर्य्ययो वा ऋतुधान्ययोश्च स पित्तवातप्रभ- वस्तदा स्यात् ॥ ६७ ॥ जब विपरीतपनेको ऋतु प्राप्त हो जावे तब जिसका कोप जैसे कहा है उसको सेवने- वाले मनुष्यके द्वंद्वज अर्थात् दो दोषोंसे उपजा रोग उत्पन्न होता है ॥ ६५ ॥ जिस ऋतुमें वायुका कोप कहा है उस ही ऋतुमें जो कफको कुपितकरनेवाले पदार्थोंको मनुष्य सेवे तब उस मनुष्यके कफका और पित्तका कोप होता है ॥ ६६ ॥ जिस ऋतुमें वायु कोपता है उस ऋतुमें पित्तको कुपित करनेवाले पदार्थोंको सेवें अथवा ऋतुका और ऋतुके योग्य अन्नका विपरीतपना होवे तब पित्त वातसे उपजा रोग होता है ॥ ६७ ॥ अथ सन्निपातकी उत्पत्ति । विपर्य्यासगते काले रसे विपरिसेविते ॥ तदा स्यात्सन्निपातो हि रोगोपद्रवकारकः ॥ ६८ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे दोषप्रकोपो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ जब काल विपरीतपनेसे वर्त्ताव करे और रस भी विपरीतपनेसे सेवित किया जावे तब सन्नि- पात उपजता है यह रोगमें उपद्रव करता है ॥ ६८ ॥ इति बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रि- अनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने दोषप्रकोपो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः ६. अथ रसोंके गुणदोषका वर्णन । अथातः संप्रवक्ष्यामि रसानाञ्च गुणागुणान् ॥ येन विज्ञानमात्रेण रसानां गुणविद्भवेत् ॥ १ ॥ इसके अनन्तर रसोंके गुण और दोषको कहता हूं जिसके जाननेसे ही रसोंके गुणको जाननेवाला होजाता है ॥ १ ॥ छः रस । तिक्तः कषायो मधुरोऽम्लकश्च क्षारः कटुः षड्रसनामधेयम् ॥ द्वयं द्वयं वातकफप्रकोपनं द्वयं तथा पित्तकरं वदन्ति ॥ २ ॥ मधुर, कसैला, कडुवा, खट्टा, खारा, चर्बरा ऐसे छः प्रकारके रस हैं इन्होंमें दो दो रस वात और कफको कोपते हैं और दो रस पित्तको करते हैं ॥ २ ॥ १ अस्मिंस्तृतीयचरणे एकाक्षराधिक्यमस्ति ।
अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९ ) षड्रसके गुणदोषवर्णन । क्षारः कषायः पवनप्रकोपी कफप्रकोपी मधुरोऽथ तिक्तः ॥ कट्वम्लकौ पित्तविकारिणौ च कट्वम्लकौ वातशमौ प्रदिष्टौ ॥ ३ ॥ पित्तस्य नाशी मधुरः सतिक्तः कटूकषायौ शमनौ कफस्य ॥ अन्योन्यमेतच्छमनं वदंति परस्परं दोषविवृद्धिमन्तः ॥ ४ ॥ खारा और कसैला रस वायुको कोपता है, मधुर और कडुआ रस कफको कोपता है, चर्चरा और खट्टा रस पित्तके विकारको करता है, और कटु तथा खट्टा रस वातको शांत करता है ॥ ३॥ मधुर और कडुआ रस पित्तको नाशता है, चर्चरा और कसैला रस कफको शांत करता है यही एक दूसरेके दोषको शमन करता है और परस्पर मिलकर दोषको बढ़ाते हैं ॥ ४ ॥ अथ रसगुणोंके गुणकर । मधुरकटुकावन्योन्यस्य प्रकर्षविधायिनौ लवणवियुतोऽम्लीकः प्रोक्तो विशेषरसानुगः ॥ अविकृतस्तथा तिक्तैर्युक्तः कषायरसो लघुर्भवति सुतरां स्वादुः श्रेष्ठो गुणं प्रकरोति वै ॥ ५ ॥ मधुर और चर्चरा रस आपसके प्रकर्षको करते हैं । नमकसे विशेष करके युक्त हुआ खट्टा रस विशेष रसके पश्चात् गमन करता है, विकारको नहीं प्राप्त होता और कडुआ रससे युक्त हुआ ऐसा कसैला रस हलका होता है और अच्छीतरह स्वादु रस सेवित किया जावे तो गुणको करता है ॥ ५ ॥ वातादिविरुद्धरस । कटुतिक्तकषायाश्च कोपयंति समीरणम् ॥ कट्वम्ललवणाः पित्तं स्वाद्वम्ललवणाः कफम् ॥ ६ ॥ चर्चरा, कडुआ, कसैला ये रस वायुको कोपते हैं, चर्चरा, खट्टा, नमकीन रस पित्तको कोपते हैं. मधुर, खट्टा, सलोना ये रस कफको कोपते हैं ॥ ६ ॥ दोषोंके विरोधी रसोंका वर्णन । समीरणे तु नो देयाः कटुतिक्तकषायकाः ॥ पित्ते कट्वम्ललवणाः स्वाद्वम्ललवणाः कफे ॥ ७ ॥ चर्चरा, कडुआ, कसैला रस वायुमें नहीं देने चाहिये । चर्चरा, खट्टा, सलोना रस पित्तमें नहीं देने चाहिये । मधुर, खट्टा, सलोना, रस कफमें नहीं देने चाहिये ॥ ७ ॥
(४०) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- वातादिकोंमें रसयोजना । स्वाद्वम्ललवणान्वाते तिक्तस्वादुकषायकान् ॥ पित्ते कफे तिक्तकटुकषायान्योजयेद्रसान् ॥ ८ ॥ मधुराम्लौ क्षारकटुकौ तिक्तकषायकौ चैत्येतान्योन्यरसविरोधिनौ न भवेताम् । वायुमें मधुर, खट्टा, सलोना रस युक्त करे, पित्तमें कडुआ, मीठा, कसैला रस युक्त करे, कफमें कडुआ, चरपरा, कसैला रस युक्त करे ॥ ८ ॥ मधुर रस और खट्टा रस अविरोधी हैं । खारा और चर्चरा रस अविरोधी हैं, कडुआ और कसैला रस अविरोधी हैं ॥ अथ मधुर रसका वर्णन । यः स्वादुर्भमशोषहारिबलकृद्वीर्य्यप्रदः पुष्टिदः प्रह्लादं रसने करोति तदनु श्लेष्मप्रवृद्धिं ततः॥ पित्तानां दमनः श्रमोपशमनो वृष्यो नराणां हितः क्षीणानां क्षतपाण्डुनेत्ररुजसंहर्त्ता भवेन्म- धुरः॥ ९ ॥ जो स्वादु हो श्रम और शोषका हरता हो, बलको करता हो, वीर्य्यको देनेवाल हो,पुष्टिको देता हो, खानेके समय आनन्द देता हो, पीछे कफकी वृद्धिको करता हो, पित्तको हरता हो, परिश्रमको शांत करता हो, मनुष्योंको पुष्ट करता हो, क्षीण मनुष्योंका कल्याण करनेवला हो, और घाव पाण्डुरोगनेत्ररोगोंको हरता हो वह मधुर रस है ॥ ९ ॥ अथ कडुआरसका वर्णन । यस्तिक्तः कफवायुसंहतिकरः कुष्ठादिदोषापहः शान्तः सर्वरु- जापहो श्रमहरो रुच्यो न संक्लेदनः॥जिह्वास्फोटकनाशनोऽथ भवति क्षीणक्षतानां हितो वक्त्रोल्लासकरः प्रकृष्टकथितो निम्बादिकास्वादकृत् ॥ १० ॥ कडुआ रस कफवायुका संहार करता है, कुष्ठादि दोषको नाशता है, शांतस्वरूप है, सब रोगोंको हरता है, भ्रमको हरता है, रुचिकर है, गीलापन नहीं लाता, और जीभकी फुन्सि- योंको नाशता है, क्षीण और घाववालोंको हित है, मुखमें आनन्दको करता है और नींब आदिके स्वादको करता है ॥ १० ॥ अथ चरपरे रसका वर्णन । नेत्रं स्रावयते मुखं विदहते कर्णस्य तापं वहन्बीभत्सं तनुते मुखं विकुरुते पित्तासृजः कोपनम् ॥ अग्नीनध्युषते क्षतं विदहते जीर्णों न शस्तो भवेद्वातान्नाशयते कफस्य कटुको रौद्रो महान्दाहकः १ न जाने कुत्रत्योऽयं विचारः सत्योऽपि महर्षिकथनसरणिं नावति प्रतीयते प्रक्षिप्तः ।
अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४१ ) चर्चरा रस नेत्रसे आंसू गिराता है, मुखको विशेष करके दग्ध करता है, कानोंमें जलन पैदा करता है, भयानकरूप मुखको करता है, पित्तको और रक्तको कुपित करता है, जठराग्नि- को जगाता है, घावको जलाता है, और पुराना चर्चरा रस श्रेष्ठ नहीं होता है, वायुको नाशता है, कफको दग्ध करता है और अति दारुणरूप है ॥ ११ ॥ अथ खट्टे रसका वर्णन । जिह्वाक्लेदं जनयति तथा नेत्रनिम्मीलनं च बीभत्सं वा जनयति सदा वातरोगापहारी॥ कण्डूकुष्ठक्षतरुजकरो नो हितः शोफिनः स्यादम्लः प्रोक्तो मरुतशमनोऽस्रप्रकोपं तनोति ॥ १२ ॥ खट्टा रस जीभमें पानी लाता है, नेत्रोंको मीचता है, सब कालमें भयानकपनेको उपजाता है, वातके रोगको हारता है, खाज कुष्ठ, घाव रोग उपजाता है, शोजावालेको हित नहीं है, वायु- को शांत करता है, रक्तके कोपको विस्तृत करता है, ऐसा तिक्त रस कहा गया है ॥ १२ ॥ अथ कसैले रसका वर्णन । जिह्वां कण्ठं ग्रसति नितरां ग्राहकश्चातिसारे श्लेष्मव्याधेरुप- शमकरः श्वासकासापहर्त्ता ॥ हिक्कां शूलं हरति नितरां शोधनः स्याद्व्रणानां प्रोक्तश्चायं समधिकगुणः श्रेष्ठकषायनामा ॥१३॥ कसैला रस जीभको और कंठको ग्रसता है, अतीसारको बंद करता है, कफकी व्याधिको शांत करता है, श्वास और खाँसीको नाशता है, हिचकीको और शूलको हरता है और घावोंको निरंतर शोधता है, यह रस अधिक गुणोंवाला कहा है ॥ १३ ॥ अथ खारारसके वीर्य्यका वर्णन । क्षारः क्लेदं जनयति मुखेऽस्वादुरुष्णो विदाही शूलश्लेष्मारुचि हर्तृषामूत्रकृच्छोषणश्च॥आमाहारं जनयति पुनर्वाह्निसन्धुक्षणः स्याच्छ्रेष्ठः प्रोक्तः स हि रसमहान्सर्वतो योग्यभूतः ॥ १४ ॥ इति षड्रसवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ खारा रस मुखमें ग्लानि उपजाता है, स्वादु नहीं है, गर्म है, विशेष करके दाहको करता है, और शूल, कफ, अरुचि, तृषा, मूत्र इन्होंको करता है, शोषनेवाला है, बारंबार अफाराको उपजाता हैं, जठराग्निको जगाता है, सब जगह योग्य नहीं है कहीं कहीं अच्छा भी है ॥१४॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने षड्रसवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
( ५२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- सप्तमोऽध्यायः ७. अथ पानीका वर्ग । अथातः संप्रवक्ष्यामि पानीयानि पृथक्पृथक् ॥ शृणुध्वं च समासेन गुणान्गुणविपर्ययम् ॥ १ ॥ अब अलग अलग पानीके गुण और अगुण संक्षेपसे कहूँगा सुनो ॥ १ ॥ अथ जलके भेद । द्विविधं चोदकं प्रोक्तमन्तरिक्षं तथौद्भिदम् ॥ आन्तरिक्षं तु द्विविधं गाङ्गं सामुद्रिकं पयः ॥ २ ॥ तच्चतुर्विधं प्रोक्तमन्तरिक्ष- समुद्भवम् ॥ भूमौ निपतितं तच्च जातं चाष्टविधं जलम् ॥ ३ ॥ गाङ्गसामुद्रविज्ञानं कथयिष्यामि सांप्रतम् ॥ धारितं येन पात्रेण लक्ष्यते तेन तद्विधम् ॥ ४ ॥ पानी दो प्रकारका कहा है आंतरिक्ष अर्थात् आकाशका, दूसरा औद्भिद अर्थात् पृथिवीका और आंतरिक्ष पानी भी दो प्रकारका है एक गांग, दूसरा सामुद्रिक ॥२॥ वैसे ही आकाशसे उपजा पानी चार प्रकारका कहा है और पृथिवीमें पतित हुआ वही पानी आठ प्रकारका है ॥ ३ ॥ गांग और सामुद्र पानीके विज्ञानको अब कहताहूँ । जिस पात्र करके धारण किया जावे उसीप्रकारसे दीखता है ॥ ४ ॥ अथ गांगपानीकी परीक्षा । धौतं शुद्धं सितं वस्त्रं चतुर्हस्तप्रमाणकम्॥दण्डास्त्रिहस्ताश्चत्वार- श्चतुष्कोणेषु बन्धयेत् ॥५॥तस्मात्परीक्ष्यं त्तोयं शुद्धे रौप्य- मयेऽथवा ॥ कांस्यपात्रे समुद्धृत्य परीक्षेत भिषग्वरः ॥ ६॥ शुद्धकार्पासतूलं वा श्वेतशाल्योदनस्य वा॥पिण्डिका तत्समा- क्षिता श्वेततां याति सा पुनः ॥ ७॥ श्वेता तु निम्र्मला पिण्डी शुद्धञ्च निर्मलं पयः ॥ तद्गाङ्गं सर्वदोषघ्नं गृहीताङ्गं सुभाजने॥८॥ धोया, शुद्ध, श्वेत चार हाथका कपड़ा तीन तीन हाथके चार दंडोंसे चारो कोनोंमें बांधे और उसमें जल छोड़के टपकावे, अथवा शुद्ध चांदीके बर्तन या काँसेके पात्रमें शुद्ध कपासकी रूई या सफेद चावलके भातकी पिण्डी छोड़े । यदि इन सब कामोंसे भी पानी साफ ही निकले तो समझ लेना चाहिये गंगाका जल है । भातकी पिंडी भी सफेद ही चाहिये और वह जल सब दोषोंका नाश करने वाला है ॥ ५ ॥ ६ ॥ ७ ॥
अ० ७ ] भाषाटीकासमेत । ( ४३ ) गंगाजलके गुण । तद्धारयेच्च मतिमान्बल्यं मेध्यं रसायनम् ॥ श्रमक्लमपिपासाघ्नं कण्डूदोषनिवारणम् ॥ ९॥ लघु मूर्च्छातृषाच्छर्दिमूत्रस्तम्भावि- नाशनम् ॥ गाङ्गोदकस्य वृष्टिः स्याद्दिवसे वा प्रशस्यते ॥१०॥ बुद्धिमान् मनुष्य इसे धारण करे, यह बलमें हित है, पवित्र है, रसायन है, और ग्लानि, परि- श्रम, प्यास इन्होंको हरता है, खाजके दोषको दूर करता है ॥९॥ हलका है और मूर्च्छा, तृषा, छर्दि और मूत्रस्तंभको नाशता है अथवा सूर्य्यके दीखते हुए जो वर्षता है वह गांगपानी है १०॥ अथ सामुद्र पानीका लक्षण और गुण दोष वर्णन । आविलं समलं नीलं घनं पीतमथापि वा॥सक्षारं पिच्छिलं चैव सामुद्रं तन्निगद्यते ॥ ११ ॥ सघनं कफकृच्चैव कण्डूश्लीपदकार- कम् ॥ सवातलं च विज्ञेयं रक्तदोषार्त्तिकारणम् ॥ १२ ॥ साफ न हो, मलसे सहित हो, नीला हो, भारी हो, पीला हो, खारसे संयुक्त हो, गढा हो, तो उसको सामुद्रपानी कहते हैं ॥११॥ यह घनाहोता है, कफको करता है, खाजको और श्लीपद रोगको उपजाता है, वातल है, रक्तके रोगोंकी पीड़ाकी जड़ है ॥ १२ ॥ अथ चार प्रकारकी वृष्टि । द्विविधमुदकं प्रोक्तं तथा वक्ष्ये चतुर्विधम् ॥ रात्रिवृष्टिर्दिवावृष्टिर्दुर्दिनावाक्षणोद्भवा ॥ १३ ॥ इस तरह गांग और समुद्र भेदसे दो प्रकारका जल कहा, अब चार प्रकारका कहूँगा। रात्रिको दिनकी, दुर्दिनकी और चलते बादलोंकी इस तरह चार प्रकारकी वृष्टिके चार ही भांतिके जल होते हैं ॥ १३ ॥ अथ रात्रिमें वर्षाहुए पानीके गुण दोष वर्णन । निशाजलं कफकरं घनशीतगुणात्मकम् ॥ सामुद्रतोयस्य समं विज्ञेयं वातकोपनम् ॥ १४ ॥ रात्रिमें वर्षा हुआ पानी कफको करता है, भारी है, शीतल गुणवाला है, सामुद्रसंज्ञक पानीके समान है और वातको कोपता है ॥ १४ ॥ अथ दिनको बरसे पानीके गुण दोष वर्णन । दिवा सूर्य्यांशुतप्ताश्च मेघा वर्षन्ति यत्पयः ॥ तत्कफघ्नं पिपासाघ्नं लघु वातप्रकोपनम् ॥ १५ ॥