भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

( ३२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- पश्चिमदिशाका वायु । अथातिसूक्ष्मो मरुतः प्रशस्तो नूनं प्रतीच्यास्तु दिशः प्रवृत्तः ॥ वायुस्तथोदीरति रक्तपित्तं शस्तो व्रणानां कफशोफिनां वा ॥३०॥ पश्चिमदिशाका अतिसूक्ष्म वायु श्रेष्ठ है और रक्तपित्तको बढाता है। यह वायु घाववालोंको और कफसे उपजे शोजेवालेको श्रेष्ठ है ॥ ३० ॥ वायव्यदिशाका वायु । वायव्यजातो मरुतः प्रशस्तः कषायसंशुष्कगुणप्रसन्नः ॥करोति वातस्य वशं नराणां शस्तो न निन्द्यो व्रणशोफिनाञ्च ॥३१॥ वायव्यदिशाका वायु श्रेष्ठ है, कसैला और सुखानेवाले गुणसे संपन्न है और मनुष्योंके हवाके वशमें करता है और घावपै शोजेवालोंको श्रेष्ठ है और निंदित नहीं है॥ ३१ ॥ उत्तरदिशाका वायु । स्वादुः कषायश्च कफप्रकोपी वायुः कुबेरस्य दिशः प्रवृत्तः ॥ करोति मेघागमनं जलस्य शीतो न चोष्णो न च निन्द्य एषः ३२ उत्तर दिशाका वायु सजल मेघको लाता है, शीतल है, गर्म नहीं है, कसैला है, स्वादु है, कफको कोपता है यह निंदाके योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥ ऐशानदिशाका वायु । शीतोऽतिलौल्यः कफवातकोपं करोति चैशानदिशः प्रवृत्तः ॥ शस्तश्च नासौ व्रणशोफकासिनां क्षयस्तथा श्वासविकारिणाञ्च३३ ईशान दिशाका वायु शीतल है, चंचल है, कफ और वातके कोपको करता है, और घाव, शोजा, खांसी, क्षय, श्वास, रोग इन विकारवालोंको अच्छा नहीं है ॥ ३३ ॥ अन्य-पंचविध वायुके गुण । वस्त्रं नानाविधं चर्म वैणवं तालव्यंजनम् ॥ उशीरं शिखिपिच्छं तु प्रत्येकेन गुणोत्तमाः ॥ ३४ ॥ अथ वस्त्रआदिके वायुका गुणदोषकथन-अनेक प्रकारका वस्त्र, चाम बांसका पंखा, ताडका पंखा, खसकी टट्टी अथवा पंखा, मोरके पंखोंका पंखा, ये सब हवाके करनेमें एकसे दूसरे उत्तम गुणवाले हैं ॥ ३४ ॥ वस्त्रवायुके गुण । वस्त्रप्रवृत्तो मरुतो न शस्तो व्रणशोफिनाम् ॥ रक्तवासःसमुत्पन्नं १. व्यजनार्थेऽत्र व्यजनमुक्तं छन्दोभङ्गभयादृषिणा । न खल्वभिमतमिदं यतोऽग्रेऽभिहितं “वैणवं व्यजनं तन्द्रा निद्राकरणमेवच”इति तथा च “ अपि माषं मषं कुर्याच्छन्दोभङ्गं न कारयेत्” ।