हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] भाषार्टीकासमेता । ( ३३ ) विशेषेण तु वर्जयेत् ॥३५॥ करोति कफरक्तस्य कोपनं बहुरो- गकृत् ॥ श्रमग्लानिपिपासासुतन्द्रानिद्राकरो भृशम् ॥ ३६ ॥ वस्त्रकी हवा घावपै शोजेवालेको अच्छी नहीं है और लाल वस्त्रसे उपजी हुई हवाको विशेष करके त्यागे ॥ ३५ ॥ क्योंकि लाल वस्त्रकी हवा कफ रक्तको कुपित करती है और बहुतसे रोगोंको उपजाती है और परिश्रम, ग्लानि, पिपासा, तंद्रा और नींदको अति करती है॥३६॥ वेणुवायुगुण । वैणवं व्यजनं तन्द्रानिद्राकरणमेव च ॥ रूक्षोऽतिकषायरसो न च वातप्रकोपनः ॥ ३७ ॥ बाँसका पंखा, तंद्रा और नींदको करता है, रूखा है, अतिकसैला रसवाला है और वातको कोपित नहीं करता है ॥ ३७ ॥ कांस्यपात्रवायुके गुण । कांस्यपात्रमरूद्धक्षः सोष्णो वातस्य शान्तिकृत् ॥ दाहश्रमघ्नः स्वेदघ्नो निद्रासौख्यकरो नृणाम्॥ ३८ ॥ कांस्यपात्रकी हवा रूखी है, गरम, वातको शांत करती है,दाह और श्रमको हरती है, पसीना मारती है, मनुष्योंके नींद और सुखको करती है ॥ ३८ ॥ रम्भातालपत्रवायुके गुणः। तालपत्रकरम्भाया दलस्य व्यजनो हिमः ॥ मधुरोऽतिश्रमघ्नः स्यादार्द्रत्वात्कफकोपनः ॥ ३९ ॥ निद्राकरः प्रीतिकरः शोक- रोगविकारहा॥दाहपित्तश्रमग्लानिनाशनो भ्रमशान्तिकृत्४०॥ ताड़की पत्ते और केलेके पत्तेका पंखा शीतल है, मधुर है, अतिश्रमको हरता हैं और गीले- पनेसे कफको कोपता है ॥ ३९ ॥ नींद करता है, प्रीतिकरता है,शोक, रोग और विकारको नाशता है और दाह,पित्त, परिश्रम,ग्लानिको नाशता है और भ्रमकी शांति करता है ॥ ४० ॥ खस, शिखिपुच्छ व्यजनवायुके गुण । उशीरमूलरचितं व्यजनं शिखिपिच्छकैः ॥ व्यजनेन सुगन्धः स्यान्मन्दशीतगुणात्मकः ॥ ४१॥ ग्लानिम्पूर्च्छाश्रमशोषविस- र्पविषदर्पहा ॥इति पञ्चविधो वायुरुपायेन कृतो नृणाम् ॥४२॥ खसकी जड़ और मयूरके पंखका पंखा डुलानेसे सुगन्ध और कुछ शीत गुणवाला होता है ॥ ४१ ॥ ग्लानि, मूर्च्छा, श्रम, शोष, विसर्प,और विषको हटाता है, इस तरह पांच प्रकारका वायु उपायसे किया हुआ होता है ॥ ४२ ॥ ३