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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० ५ ] भाषार्टीकासमेता । ( ३३ ) विशेषेण तु वर्जयेत् ॥३५॥ करोति कफरक्तस्य कोपनं बहुरो- गकृत् ॥ श्रमग्लानिपिपासासुतन्द्रानिद्राकरो भृशम् ॥ ३६ ॥ वस्त्रकी हवा घावपै शोजेवालेको अच्छी नहीं है और लाल वस्त्रसे उपजी हुई हवाको विशेष करके त्यागे ॥ ३५ ॥ क्योंकि लाल वस्त्रकी हवा कफ रक्तको कुपित करती है और बहुतसे रोगोंको उपजाती है और परिश्रम, ग्लानि, पिपासा, तंद्रा और नींदको अति करती है॥३६॥ वेणुवायुगुण । वैणवं व्यजनं तन्द्रानिद्राकरणमेव च ॥ रूक्षोऽतिकषायरसो न च वातप्रकोपनः ॥ ३७ ॥ बाँसका पंखा, तंद्रा और नींदको करता है, रूखा है, अतिकसैला रसवाला है और वातको कोपित नहीं करता है ॥ ३७ ॥ कांस्यपात्रवायुके गुण । कांस्यपात्रमरूद्धक्षः सोष्णो वातस्य शान्तिकृत् ॥ दाहश्रमघ्नः स्वेदघ्नो निद्रासौख्यकरो नृणाम्॥ ३८ ॥ कांस्यपात्रकी हवा रूखी है, गरम, वातको शांत करती है,दाह और श्रमको हरती है, पसीना मारती है, मनुष्योंके नींद और सुखको करती है ॥ ३८ ॥ रम्भातालपत्रवायुके गुणः। तालपत्रकरम्भाया दलस्य व्यजनो हिमः ॥ मधुरोऽतिश्रमघ्नः स्यादा‌र्द्रत्वात्कफकोपनः ॥ ३९ ॥ निद्राकरः प्रीतिकरः शोक- रोगविकारहा॥दाहपित्तश्रमग्लानिनाशनो भ्रमशान्तिकृत्४०॥ ताड़की पत्ते और केलेके पत्तेका पंखा शीतल है, मधुर है, अतिश्रमको हरता हैं और गीले- पनेसे कफको कोपता है ॥ ३९ ॥ नींद करता है, प्रीतिकरता है,शोक, रोग और विकारको नाशता है और दाह,पित्त, परिश्रम,ग्लानिको नाशता है और भ्रमकी शांति करता है ॥ ४० ॥ खस, शिखिपुच्छ व्यजनवायुके गुण । उशीरमूलरचितं व्यजनं शिखिपिच्छकैः ॥ व्यजनेन सुगन्धः स्यान्मन्दशीतगुणात्मकः ॥ ४१॥ ग्लानिम्पूर्च्छाश्रमशोषविस- र्पविषदर्पहा ॥इति पञ्चविधो वायुरुपायेन कृतो नृणाम् ॥४२॥ खसकी जड़ और मयूरके पंखका पंखा डुलानेसे सुगन्ध और कुछ शीत गुणवाला होता है ॥ ४१ ॥ ग्लानि, मूर्च्छा, श्रम, शोष, विसर्प,और विषको हटाता है, इस तरह पांच प्रकारका वायु उपायसे किया हुआ होता है ॥ ४२ ॥ ३

( ३४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- षडृतुओंमें उत्तम दिग्वायु । शिशिरे पूर्वकृद्वायुराग्नेयो हेमन्ते मरुत् । वसन्ते दक्षिणो वायु- र्ग्रीष्मे नैर्ऋत्यकस्तथा ॥ ४३ ॥ वर्षासु पश्चिमो वायुर्वायव्यः शरदि स्मृतः॥हेमन्ते शिशिरे चैव प्रशस्तश्चोत्तरोऽनिलः॥४४॥ शिशिर अर्थात् माघ,फाल्गुनमें पूर्वका वायु अच्छा है, हेमंत अर्थात् मृगशिर, पौषमें आग्नेय- दिशाका वायु अच्छा है,वसंत अर्थात् चैत्र,वैशाखमें दक्षिणका वायु अच्छा है,ग्रीष्म अर्थात् ज्येष्ठ, आषाढ़में नैर्ऋतका वायु अच्छा है॥४३॥वर्षा अर्थात् श्रावण भादुआमें पश्चिमका वायु अच्छा है, शरद् अर्थात् आश्विन,कार्तिकमें वायव्यदिशाका वायु अच्छा है,शिशिर और वसंतऋतुमेंउत्तरका वायु भी अच्छा है ॥४४॥ प्रतिदिनषडृतु । अपराह्ने वर्षा वदन्ति निपुणास्तस्मिन्निशीथे शरत्प्रोक्तः शैशि- रिकस्ततो हिमऋतुः सूर्योदयाद्यतः॥मध्याह्ने च तथा वदन्ति निपुणा ग्रीष्मस्त्वृतुः स्यात्ततो वासन्तो मुनिभिर्ऋतुस्तु कथितो पूर्वापराह्ने सदा ॥ ४५ ॥ निपुण जन दिनके तृतीय प्रहरमें वर्षा कहते हैं अर्थात् वह समय वर्षाकालके जैसा सुहावन होता है अर्द्धरात्रिमें शरत् कहा गया है यानी वह समय शरत्कासा समय समझ पड़ता है। आधी रातके अनन्तर शिशिर ऋतु होता है अर्थात् उस समय कुछ शीत सदा लगता है । सूर्योदयसे कुछ पहिले हेमंत ऋतु होता है तब भी कुछ शीत रहता ही है वही निपुण जन दोपहरके समय ग्रीष्मकाल कहते हैं क्योंकि दोपहरमें सदा गर्मी जान पड़ती है। मुनियोंका कहना है कि दिनके पूर्व और परभागमें वसन्त होता है वास्तवमें वह समय वसन्तऋतुहीकी शोभा धारण करता है ॥४५॥ अथ सविष वायु । कार्त्तिके मार्गशीर्षे वा माघे चाषाढसंज्ञके ॥ ऋतुसन्धौ च हेमन्ते सविषः स्यात्तु मारुतः ॥ ४६ ॥ कार्त्तिक, मार्गशीर्ष, माघ और अषाढ़में और छः ऋतुओंके सन्धिमें तथा हेमंत ऋतुमें वायु सविष होता है ॥ ४६ ॥ स यस्मिन्नगरे देशे ग्रामे वाऽनगरेऽपि वा ॥ संस्पृशेदुलबणो वायुर्गोमनुष्येभवाजिनाम्॥४७॥ तिलकं गोषु जानीयाद्यक्ष्माणं मानुषेषु च ॥ गजेषु पावकं विद्याद्धयानां वेद्य उच्यते ॥४८॥ जिस नगरमें जिस देशमें अथवा जिस गाममें दारुणरूप बिगड़ा हुआ वायु जब गाय, मनुष्य, हस्ती, घोडा इनको छूता है ॥ ४७ ॥ तब गायोंमें तिलक नाम रोग उपजता है, १ अपराह्ने वर्षा इति छन्दोभंगे नत्वार्षत्वे न दोषः अन्यत्रापि यत्र यत्र छन्दोभंगो दृश्यते तत्र तत्र सर्वत्रार्षो ज्ञेयः ।

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( ३५ ) और मनुष्योंमें राजरोग उपजता है और हस्तियोंमें पावक अर्थात् अग्नि उपजता है और घोडोंमें वेद्य पीडा उपजती है ॥ ४८ ॥ रक्षणीयं गजे पित्तं श्लेष्मा वाजिषु सर्वदा ॥ पवनोऽयं मनुष्याणां प्रायो रक्षेत् सर्वदा ॥ ४९ ॥ कुशल वैद्यको हस्तीकी पित्तसे, घोडोंकी सर्वकाल कफसे, मनुष्योंकी वायुसे रक्षा करनी चाहिये ॥ ४९ ॥ ऋतु भेदसे वातादिकोंका संचय, कोप, उपराम। वर्षे वायुः कुप्यतेऽन्तः शरत्सु लीनो वायुः कुप्यते पित्तरोगे ॥ लीयेत्पित्तं शैशिरे श्लेष्मकुञ्जे हेमन्ते वा चीयमानस्तथापि ५० ॥ कोपं याति श्लेष्मरोगो वसन्ते तस्माच्छान्तिः श्लेष्मरोगस्य चोष्णे ॥ पित्तं यायात्कोपतां ग्रीष्मकाले दृष्टा शान्तिः पैत्तिकी वार्षिके च ॥ ५१ ॥ ग्रीष्ममें संचित वायु वर्षामें कुपित होता है । वर्षाका कुपित वही वायु शरद्में अन्तर्लीन होकर पित्तरोगका प्रकोप करता है । हेमन्त और वर्षामें लीन हुआ वही पित्त वसन्तमें श्लेष्माका प्रकोप करता है । इसलिये श्लेष्मरोग की शान्ति उष्ण कालमें होती है, ग्रीष्ममें पित्त कोपको प्राप्त होता है और उसी पित्तकी शान्ति वर्षामें देखी जाती है ॥ ५० ॥ ५१ ॥ अथ वायुका कोप । अधोवातमूत्रपुरीषस्य रोधात् कषायातिशीतान्निशाजागरेषु ॥ व्यवायेऽथ वाहःश्रमाद्भातिमुक्त्याऽध्वनि प्रायशो भाषणेनाति- भीत्या॥५२॥विरूक्षैरतिक्षारतिक्तैः कटूभिस्तथा यानदोलाश्व- कोष्ठे रथे वा॥खरे कुञ्जरे मन्दिरारोहणेनोपवासे भवेन्मारुतस्य प्रकोपः ॥ ५३ ॥ सुशीते दिने दुर्दिने स्नानपीतेऽपराह्ने निशा जागरे वासरे वा। प्रकोपं मरुद्याति वर्षास्ववश्यं तथा सेवितो याति भुक्तस्य जीर्णम् ॥ ५४॥ मसूराः कलायाश्च निष्पावकाश्च महामाषशुश्रा यवाश्चामलाः स्युः॥ महाचावलाः कृष्णधान्याः प्रदिष्टा हिमाः कङ्गुनीवाररक्ताश्च शालयः ॥ ५५ ॥ १ वर्षशब्दः अकारान्तोऽपि वृष्टिवाचकः ( श.स्तो, ) २ (‘भुजङ्गप्रयतं भवेद्वैश्वतुर्भिरेरिति वृत्तलाकरानु- रोधात्' द्वितीययगणे त्रवर्णस्य धैर्यमावश्यकं परमार्षत्वात् क्षन्तव्यमिति ।

( ३६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- तथा कोद्रवश्चान्नं श्यामाक एतैः कृतं चौदनं वा यवागूश्चृतं वा ॥ कलिङ्गानि वास्तूकाचिल्लीकपूती पलाण्डुस्तथा गृञ्जनं कन्दशा- कम् ॥ ५६ ॥ इमान्सेवितादत्यर्थमेति प्रकोपं समीरस्य चोक्तः सुरासम्भवस्तु ॥ ततो यत्नतो रक्षणीयं मनुष्यैः शुभं चेहसे त्वं सदा रोगशान्तिम् ॥ ५७ ॥ अधोवात--मूत्र--विष्ठा--के रोकनेसे कसैले और शीतल पदार्थको सेवनेसे और रात्रिमें जागनेसे, मैथुनके करनेसे, नित्यप्रति श्रम करनेसे, अति भोजनको खानेसे और मार्गमें अति चलनेसे, ज्यादे बोलनेसे, अति भयसे ॥ ५२ ॥ रूखे पदार्थसे और अत्यंत नमकीन कडुआ, चर्चरा, खानेसे, डोला अर्थात् पीनस-घोडा, ऊंट, रथ, गधा, हस्ती और ऊंचे मकानमें चढनेसे उपवाससे रहनेसे वायुका प्रकोप होता है ॥ ५३ ॥ बहुत शीतल दिनमें मेघआदिसे आच्छादित हुए दुर्दिनमें दोपहरके पीछे स्नान करनेसे तथा रात्रिमें जागकर जल पीनेसे और वर्षाऋतुमें दिनमें वायु कोपको प्राप्त होता है और सेवित किया वायु कियेहुए भोजनको जराता है ॥ ५४ ॥ मसूर, मटर, मोठ, चौला, जुवार, जब, मोटेचावल, कृष्णअन्न, शीतल अन्न, कांगनी, नीवार धान्य, लाल अन्न, तूरीअन्न ॥ ५५ ॥ कोदूअन्न, शामकका भात या मांड, इन्द्रजव, बथुवा, चाकवत अर्थात् बथुवा विशेष, प्याज, गाजर, कंद शाक ॥ ५६ ॥ इनके जादे सेवनेसे वायुका प्रकोप होता है । इसलिये यदि तुम शुभ और रोगकी शान्ति सदा चाहते हो तो मनुष्योंको इनसे सदा बचाना ॥ ५७ ॥ अथ पित्तप्रकोपकानिदान । तथात्युष्णकट्वम्लरूक्षैर्विदाहैः ससीधूसुरासेवनेनोपवासैः ॥ सुधर्मेण क्रोधेन वा स्वेदनेन व्यवायेन वा याति कोपञ्च पित्तम् ॥ ५८ ॥ कुलित्थाढकीयूषमूलाकशिश्रुशठीसर्षपाराजिकाशा- कमेव ॥ निशाजागरेणापि युद्धे श्रमे वा घनान्ते शरत्सु प्रकोपः प्रदिष्टः॥५९॥सदम्लेन वाप्युष्णकाले शरत्सु भृशं वासरे मध्यमे वा निशीथे ॥ सुजीर्णे रसे भुक्तमात्रे प्रकोपः प्रदिष्टो विदैः कोविदैः पैत्तिकः स्यात् ॥ ६० ॥ अतिगर्म, चर्चरा, खट्टा, रूखा, और विदाही, सीधू तथा मदिराके, सेवनेसे, गर्मीसे, क्रोधसे पसीना निकालने और भोग करनेसे पित्त कोपको प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥ कुलथी १ 'यवागूरूष्णिका श्राणा विलेपी तरला च सा' इत्यमरः । यवागू षड्गुणजले सिद्धा स्यात् कृष्णा घना। "तण्डुलैमुद्गमाषैश्च तिलैर्वा साधिता हिता । यवागूर्ग्राहिणी बल्या तर्पणी वातनाशिनी ॥ शांङ्गधरे।

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( ३७ ) अरहरका यूष, मूली, सहिंजना, कचूर, सरसों और राईका शाक अथवा इन्होंसे संयुक्त शाक खानेसे और वर्षाऋतुमें रात्रिके जागने, युद्ध करने, परिश्रम करनेसे शरद्ऋतुमें पित्त कोपको प्राप्त होता है ॥ ५९ ॥ अति खट्टे पदार्थसे, गरम समयमें, अतिशय करके दिनके मध्यभागमें, अर्ध रात्रिमें, भोजनका रस जीर्ण होते समय और खानेहीके समय विद्वान् वैद्योंने पित्तका प्रकोप बताया है ॥ ६० ॥ अथ कफप्रकोपका निदान । निशाजागरे वासरे वातिनिद्रा सुशीतोदसंसेवने शीतले वा ॥ पयःपानपीयूषमिक्षुस्तिलैस्तु तथा गृञ्जनैः कन्दशाकैरथापि ॥ ६१ ॥ सदा सेवितैर्वास्तुकैश्चाण्डमत्स्यैर्दधिं पिच्छिलैर्माषमद्यै- र्गुरुभिः॥अतिस्निग्धसंसेवनैर्भोजनेषु प्रदिष्टः कफस्य प्रकोपो वसन्ते ॥ ६२ ॥ दिनान्ते प्रभाते निशान्ते नरस्य प्रकोपः प्रदि- ष्टोऽपि भुक्ते न जीर्णे॥प्रदिष्टो बुधैः कोविदैरेव रोगःकफस्योपप- त्ति च जानीहि कष्टाम् ॥ ६३ ॥ सशीतेऽथवा शीतकाले निशान्ते नरस्य प्रकोपः प्रदिष्टोऽपि भुक्तेः॥ न जीर्णे प्रदिष्टो बुधै रोगवेगो निदानं कफस्येति चोक्तं सुधीभिः ॥ ६४ ॥ रात्रिमें जागनेसे और दिनमें अति शयन करनेसे और सुन्दर शीतल पानीको तथा शीतल देशको सेवनेसे,नवीन ब्याई गायका दूध, ईख, तिल, गाजर, कन्दशाकके सेवनेसे ॥ ६१ ॥ बकराके अण्डे तथा मछलीको सदा सेवनेसे और दही,लव्सादार पदार्थ, उडद, मदिरा, भारी पदार्थ, अतिचिकने पदार्थ सेवनेसे वसन्तमें दुष्ट हुए कफका कोप होता है ॥ ६२ ॥ दिनके अन्तमें, प्रभातमें, रात्रिके अन्तमें, भोजनके न पकनेसे कफका कोप होता है इसे विद्वान् वैद्य रोग ही कहते हैं इस भांति कफकी उत्पत्ति कष्ट करनेवाली जानो ॥ ६३ ॥ शीतल देशमें, शीतल समयमें, रात्रिके अन्तमें,भोजनको नहीं जीर्ण होनेमें, मनुष्यके कफका प्रकोप बुद्धिमानोंने कहा है ॥ ६४ ॥ अथ दो दोषोंके कोपकी उत्पत्ति । ऋतौ विपर्य्यासगते यदा च प्रकोपनं यस्य यथा प्रदिष्टम् ॥ तत्सेवमानस्य नरस्य रोगः स्याद्वन्द्वजो नाम विकारकारी ॥ ६५ ॥ यस्मिन्नृतौ वातविकोप उक्तस्तस्मिन्यदि श्लेष्मवि- कोपनानि ॥ संसेवते वा मनुजस्तदास्य भवेत्प्रकोपःकफवात- १ अत्र छन्दोभङ्गः ।

: ( ३८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- योश्च ॥ ६६ ॥ यस्मिन्मरुत्कुप्यति सेवते यः पित्तस्य कोपप्र- कराणि यानि ॥ विपर्य्ययो वा ऋतुधान्ययोश्च स पित्तवातप्रभ- वस्तदा स्यात् ॥ ६७ ॥ जब विपरीतपनेको ऋतु प्राप्त हो जावे तब जिसका कोप जैसे कहा है उसको सेवने- वाले मनुष्यके द्वंद्वज अर्थात् दो दोषोंसे उपजा रोग उत्पन्न होता है ॥ ६५ ॥ जिस ऋतुमें वायुका कोप कहा है उस ही ऋतुमें जो कफको कुपितकरनेवाले पदार्थोंको मनुष्य सेवे तब उस मनुष्यके कफका और पित्तका कोप होता है ॥ ६६ ॥ जिस ऋतुमें वायु कोपता है उस ऋतुमें पित्तको कुपित करनेवाले पदार्थोंको सेवें अथवा ऋतुका और ऋतुके योग्य अन्नका विपरीतपना होवे तब पित्त वातसे उपजा रोग होता है ॥ ६७ ॥ अथ सन्निपातकी उत्पत्ति । विपर्य्यासगते काले रसे विपरिसेविते ॥ तदा स्यात्सन्निपातो हि रोगोपद्रवकारकः ॥ ६८ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे दोषप्रकोपो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ जब काल विपरीतपनेसे वर्त्ताव करे और रस भी विपरीतपनेसे सेवित किया जावे तब सन्नि- पात उपजता है यह रोगमें उपद्रव करता है ॥ ६८ ॥ इति बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रि- अनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने दोषप्रकोपो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः ६. अथ रसोंके गुणदोषका वर्णन । अथातः संप्रवक्ष्यामि रसानाञ्च गुणागुणान् ॥ येन विज्ञानमात्रेण रसानां गुणविद्भवेत् ॥ १ ॥ इसके अनन्तर रसोंके गुण और दोषको कहता हूं जिसके जाननेसे ही रसोंके गुणको जाननेवाला होजाता है ॥ १ ॥ छः रस । तिक्तः कषायो मधुरोऽम्लकश्च क्षारः कटुः षड्रसनामधेयम् ॥ द्वयं द्वयं वातकफप्रकोपनं द्वयं तथा पित्तकरं वदन्ति ॥ २ ॥ मधुर, कसैला, कडुवा, खट्टा, खारा, चर्बरा ऐसे छः प्रकारके रस हैं इन्होंमें दो दो रस वात और कफको कोपते हैं और दो रस पित्तको करते हैं ॥ २ ॥ १ अस्मिंस्तृतीयचरणे एकाक्षराधिक्यमस्ति ।

अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९ ) षड्रसके गुणदोषवर्णन । क्षारः कषायः पवनप्रकोपी कफप्रकोपी मधुरोऽथ तिक्तः ॥ कट्वम्लकौ पित्तविकारिणौ च कट्वम्लकौ वातशमौ प्रदिष्टौ ॥ ३ ॥ पित्तस्य नाशी मधुरः सतिक्तः कटूकषायौ शमनौ कफस्य ॥ अन्योन्यमेतच्छमनं वदंति परस्परं दोषविवृद्धिमन्तः ॥ ४ ॥ खारा और कसैला रस वायुको कोपता है, मधुर और कडुआ रस कफको कोपता है, चर्चरा और खट्टा रस पित्तके विकारको करता है, और कटु तथा खट्टा रस वातको शांत करता है ॥ ३॥ मधुर और कडुआ रस पित्तको नाशता है, चर्चरा और कसैला रस कफको शांत करता है यही एक दूसरेके दोषको शमन करता है और परस्पर मिलकर दोषको बढ़ाते हैं ॥ ४ ॥ अथ रसगुणोंके गुणकर । मधुरकटुकावन्योन्यस्य प्रकर्षविधायिनौ लवणवियुतोऽम्लीकः प्रोक्तो विशेषरसानुगः ॥ अविकृतस्तथा तिक्तैर्युक्तः कषायरसो लघुर्भवति सुतरां स्वादुः श्रेष्ठो गुणं प्रकरोति वै ॥ ५ ॥ मधुर और चर्चरा रस आपसके प्रकर्षको करते हैं । नमकसे विशेष करके युक्त हुआ खट्टा रस विशेष रसके पश्चात् गमन करता है, विकारको नहीं प्राप्त होता और कडुआ रससे युक्त हुआ ऐसा कसैला रस हलका होता है और अच्छीतरह स्वादु रस सेवित किया जावे तो गुणको करता है ॥ ५ ॥ वातादिविरुद्धरस । कटुतिक्तकषायाश्च कोपयंति समीरणम् ॥ कट्वम्ललवणाः पित्तं स्वाद्वम्ललवणाः कफम् ॥ ६ ॥ चर्चरा, कडुआ, कसैला ये रस वायुको कोपते हैं, चर्चरा, खट्टा, नमकीन रस पित्तको कोपते हैं. मधुर, खट्टा, सलोना ये रस कफको कोपते हैं ॥ ६ ॥ दोषोंके विरोधी रसोंका वर्णन । समीरणे तु नो देयाः कटुतिक्तकषायकाः ॥ पित्ते कट्वम्ललवणाः स्वाद्वम्ललवणाः कफे ॥ ७ ॥ चर्चरा, कडुआ, कसैला रस वायुमें नहीं देने चाहिये । चर्चरा, खट्टा, सलोना रस पित्तमें नहीं देने चाहिये । मधुर, खट्टा, सलोना, रस कफमें नहीं देने चाहिये ॥ ७ ॥

(४०) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- वातादिकोंमें रसयोजना । स्वाद्वम्ललवणान्वाते तिक्तस्वादुकषायकान् ॥ पित्ते कफे तिक्तकटुकषायान्योजयेद्रसान् ॥ ८ ॥ मधुराम्लौ क्षारकटुकौ तिक्तकषायकौ चैत्येतान्योन्यरसविरोधिनौ न भवेताम् । वायुमें मधुर, खट्टा, सलोना रस युक्त करे, पित्तमें कडुआ, मीठा, कसैला रस युक्त करे, कफमें कडुआ, चरपरा, कसैला रस युक्त करे ॥ ८ ॥ मधुर रस और खट्टा रस अविरोधी हैं । खारा और चर्चरा रस अविरोधी हैं, कडुआ और कसैला रस अविरोधी हैं ॥ अथ मधुर रसका वर्णन । यः स्वादुर्भमशोषहारिबलकृद्वीर्य्यप्रदः पुष्टिदः प्रह्लादं रसने करोति तदनु श्लेष्मप्रवृद्धिं ततः॥ पित्तानां दमनः श्रमोपशमनो वृष्यो नराणां हितः क्षीणानां क्षतपाण्डुनेत्ररुजसंहर्त्ता भवेन्म- धुरः॥ ९ ॥ जो स्वादु हो श्रम और शोषका हरता हो, बलको करता हो, वीर्य्यको देनेवाल हो,पुष्टिको देता हो, खानेके समय आनन्द देता हो, पीछे कफकी वृद्धिको करता हो, पित्तको हरता हो, परिश्रमको शांत करता हो, मनुष्योंको पुष्ट करता हो, क्षीण मनुष्योंका कल्याण करनेवला हो, और घाव पाण्डुरोगनेत्ररोगोंको हरता हो वह मधुर रस है ॥ ९ ॥ अथ कडुआरसका वर्णन । यस्तिक्तः कफवायुसंहतिकरः कुष्ठादिदोषापहः शान्तः सर्वरु- जापहो श्रमहरो रुच्यो न संक्लेदनः॥जिह्वास्फोटकनाशनोऽथ भवति क्षीणक्षतानां हितो वक्त्रोल्लासकरः प्रकृष्टकथितो निम्बादिकास्वादकृत् ॥ १० ॥ कडुआ रस कफवायुका संहार करता है, कुष्ठादि दोषको नाशता है, शांतस्वरूप है, सब रोगोंको हरता है, भ्रमको हरता है, रुचिकर है, गीलापन नहीं लाता, और जीभकी फुन्सि- योंको नाशता है, क्षीण और घाववालोंको हित है, मुखमें आनन्दको करता है और नींब आदिके स्वादको करता है ॥ १० ॥ अथ चरपरे रसका वर्णन । नेत्रं स्रावयते मुखं विदहते कर्णस्य तापं वहन्बीभत्सं तनुते मुखं विकुरुते पित्तासृजः कोपनम् ॥ अग्नीनध्युषते क्षतं विदहते जीर्णों न शस्तो भवेद्वातान्नाशयते कफस्य कटुको रौद्रो महान्दाहकः १ न जाने कुत्रत्योऽयं विचारः सत्योऽपि महर्षिकथनसरणिं नावति प्रतीयते प्रक्षिप्तः ।

अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४१ ) चर्चरा रस नेत्रसे आंसू गिराता है, मुखको विशेष करके दग्ध करता है, कानोंमें जलन पैदा करता है, भयानकरूप मुखको करता है, पित्तको और रक्तको कुपित करता है, जठराग्नि- को जगाता है, घावको जलाता है, और पुराना चर्चरा रस श्रेष्ठ नहीं होता है, वायुको नाशता है, कफको दग्ध करता है और अति दारुणरूप है ॥ ११ ॥ अथ खट्टे रसका वर्णन । जिह्वाक्लेदं जनयति तथा नेत्रनिम्मीलनं च बीभत्सं वा जनयति सदा वातरोगापहारी॥ कण्डूकुष्ठक्षतरुजकरो नो हितः शोफिनः स्यादम्लः प्रोक्तो मरुतशमनोऽस्रप्रकोपं तनोति ॥ १२ ॥ खट्टा रस जीभमें पानी लाता है, नेत्रोंको मीचता है, सब कालमें भयानकपनेको उपजाता है, वातके रोगको हारता है, खाज कुष्ठ, घाव रोग उपजाता है, शोजावालेको हित नहीं है, वायु- को शांत करता है, रक्तके कोपको विस्तृत करता है, ऐसा तिक्त रस कहा गया है ॥ १२ ॥ अथ कसैले रसका वर्णन । जिह्वां कण्ठं ग्रसति नितरां ग्राहकश्चातिसारे श्लेष्मव्याधेरुप- शमकरः श्वासकासापहर्त्ता ॥ हिक्कां शूलं हरति नितरां शोधनः स्याद्व्रणानां प्रोक्तश्चायं समधिकगुणः श्रेष्ठकषायनामा ॥१३॥ कसैला रस जीभको और कंठको ग्रसता है, अतीसारको बंद करता है, कफकी व्याधिको शांत करता है, श्वास और खाँसीको नाशता है, हिचकीको और शूलको हरता है और घावोंको निरंतर शोधता है, यह रस अधिक गुणोंवाला कहा है ॥ १३ ॥ अथ खारारसके वीर्य्यका वर्णन । क्षारः क्लेदं जनयति मुखेऽस्वादुरुष्णो विदाही शूलश्लेष्मारुचि हर्तृषामूत्रकृच्छोषणश्च॥आमाहारं जनयति पुनर्वाह्निसन्धुक्षणः स्याच्छ्रेष्ठः प्रोक्तः स हि रसमहान्सर्वतो योग्यभूतः ॥ १४ ॥ इति षड्रसवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ खारा रस मुखमें ग्लानि उपजाता है, स्वादु नहीं है, गर्म है, विशेष करके दाहको करता है, और शूल, कफ, अरुचि, तृषा, मूत्र इन्होंको करता है, शोषनेवाला है, बारंबार अफाराको उपजाता हैं, जठराग्निको जगाता है, सब जगह योग्य नहीं है कहीं कहीं अच्छा भी है ॥१४॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने षड्रसवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

( ५२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- सप्तमोऽध्यायः ७. अथ पानीका वर्ग । अथातः संप्रवक्ष्यामि पानीयानि पृथक्पृथक् ॥ शृणुध्वं च समासेन गुणान्गुणविपर्ययम् ॥ १ ॥ अब अलग अलग पानीके गुण और अगुण संक्षेपसे कहूँगा सुनो ॥ १ ॥ अथ जलके भेद । द्विविधं चोदकं प्रोक्तमन्तरिक्षं तथौद्भिदम् ॥ आन्तरिक्षं तु द्विविधं गाङ्गं सामुद्रिकं पयः ॥ २ ॥ तच्चतुर्विधं प्रोक्तमन्तरिक्ष- समुद्भवम् ॥ भूमौ निपतितं तच्च जातं चाष्टविधं जलम् ॥ ३ ॥ गाङ्गसामुद्रविज्ञानं कथयिष्यामि सांप्रतम् ॥ धारितं येन पात्रेण लक्ष्यते तेन तद्विधम् ॥ ४ ॥ पानी दो प्रकारका कहा है आंतरिक्ष अर्थात् आकाशका, दूसरा औद्भिद अर्थात् पृथिवीका और आंतरिक्ष पानी भी दो प्रकारका है एक गांग, दूसरा सामुद्रिक ॥२॥ वैसे ही आकाशसे उपजा पानी चार प्रकारका कहा है और पृथिवीमें पतित हुआ वही पानी आठ प्रकारका है ॥ ३ ॥ गांग और सामुद्र पानीके विज्ञानको अब कहताहूँ । जिस पात्र करके धारण किया जावे उसीप्रकारसे दीखता है ॥ ४ ॥ अथ गांगपानीकी परीक्षा । धौतं शुद्धं सितं वस्त्रं चतुर्हस्तप्रमाणकम्॥दण्डास्त्रिहस्ताश्चत्वार- श्चतुष्कोणेषु बन्धयेत् ॥५॥तस्मात्परीक्ष्यं त्तोयं शुद्धे रौप्य- मयेऽथवा ॥ कांस्यपात्रे समुद्धृत्य परीक्षेत भिषग्वरः ॥ ६॥ शुद्धकार्पासतूलं वा श्वेतशाल्योदनस्य वा॥पिण्डिका तत्समा- क्षिता श्वेततां याति सा पुनः ॥ ७॥ श्वेता तु निम्र्मला पिण्डी शुद्धञ्च निर्मलं पयः ॥ तद्गाङ्गं सर्वदोषघ्नं गृहीताङ्गं सुभाजने॥८॥ धोया, शुद्ध, श्वेत चार हाथका कपड़ा तीन तीन हाथके चार दंडोंसे चारो कोनोंमें बांधे और उसमें जल छोड़के टपकावे, अथवा शुद्ध चांदीके बर्तन या काँसेके पात्रमें शुद्ध कपासकी रूई या सफेद चावलके भातकी पिण्डी छोड़े । यदि इन सब कामोंसे भी पानी साफ ही निकले तो समझ लेना चाहिये गंगाका जल है । भातकी पिंडी भी सफेद ही चाहिये और वह जल सब दोषोंका नाश करने वाला है ॥ ५ ॥ ६ ॥ ७ ॥

अ० ७ ] भाषाटीकासमेत । ( ४३ ) गंगाजलके गुण । तद्धारयेच्च मतिमान्बल्यं मेध्यं रसायनम् ॥ श्रमक्लमपिपासाघ्नं कण्डूदोषनिवारणम् ॥ ९॥ लघु मूर्च्छातृषाच्छर्दिमूत्रस्तम्भावि- नाशनम् ॥ गाङ्गोदकस्य वृष्टिः स्याद्दिवसे वा प्रशस्यते ॥१०॥ बुद्धिमान् मनुष्य इसे धारण करे, यह बलमें हित है, पवित्र है, रसायन है, और ग्लानि, परि- श्रम, प्यास इन्होंको हरता है, खाजके दोषको दूर करता है ॥९॥ हलका है और मूर्च्छा, तृषा, छर्दि और मूत्रस्तंभको नाशता है अथवा सूर्य्यके दीखते हुए जो वर्षता है वह गांगपानी है १०॥ अथ सामुद्र पानीका लक्षण और गुण दोष वर्णन । आविलं समलं नीलं घनं पीतमथापि वा॥सक्षारं पिच्छिलं चैव सामुद्रं तन्निगद्यते ॥ ११ ॥ सघनं कफकृच्चैव कण्डूश्लीपदकार- कम् ॥ सवातलं च विज्ञेयं रक्तदोषार्त्तिकारणम् ॥ १२ ॥ साफ न हो, मलसे सहित हो, नीला हो, भारी हो, पीला हो, खारसे संयुक्त हो, गढा हो, तो उसको सामुद्रपानी कहते हैं ॥११॥ यह घनाहोता है, कफको करता है, खाजको और श्लीपद रोगको उपजाता है, वातल है, रक्तके रोगोंकी पीड़ाकी जड़ है ॥ १२ ॥ अथ चार प्रकारकी वृष्टि । द्विविधमुदकं प्रोक्तं तथा वक्ष्ये चतुर्विधम् ॥ रात्रिवृष्टिर्दिवावृष्टिर्दुर्दिनावाक्षणोद्भवा ॥ १३ ॥ इस तरह गांग और समुद्र भेदसे दो प्रकारका जल कहा, अब चार प्रकारका कहूँगा। रात्रिको दिनकी, दुर्दिनकी और चलते बादलोंकी इस तरह चार प्रकारकी वृष्टिके चार ही भांतिके जल होते हैं ॥ १३ ॥ अथ रात्रिमें वर्षाहुए पानीके गुण दोष वर्णन । निशाजलं कफकरं घनशीतगुणात्मकम् ॥ सामुद्रतोयस्य समं विज्ञेयं वातकोपनम् ॥ १४ ॥ रात्रिमें वर्षा हुआ पानी कफको करता है, भारी है, शीतल गुणवाला है, सामुद्रसंज्ञक पानीके समान है और वातको कोपता है ॥ १४ ॥ अथ दिनको बरसे पानीके गुण दोष वर्णन । दिवा सूर्य्यांशुतप्ताश्च मेघा वर्षन्ति यत्पयः ॥ तत्कफघ्नं पिपासाघ्नं लघु वातप्रकोपनम् ॥ १५ ॥

( ४४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- दिनमें सूर्यके किरणोंसे तप्त हुए जो मेघ पानी वर्षाते हैं वहकफको नाशता है, प्यासको हरता है, हलका है, वातको कुपित करता है ॥ १५ ॥ अथ दुर्दिनमें बरसे पानीके गुण दोष वर्णन । दुर्दिने वृष्टिसम्पातं वातभूतं सवातलम् ॥ कफकृच्छोषहननं तर्पणं दोषकोपनम् ॥ १६ ॥ दुर्दिनमें वर्षा हुआ पानी वातल है, कफको करता है, शोषको हरता है, तृप्तिको, करता है।, दोषोंको कुपित करता है ॥ १६ ॥ अथ क्षणवृष्टिके गुण । तथा वा क्षणवृष्टिश्च दोषरोगकरी नृणाम् ॥ कण्डूत्रिदोषजननं पानीयं न प्रशस्यते ॥ १७ ॥ जो क्षण क्षण में वृष्टि होती है वह वर्षा मनुष्योंके दोषको और रोगको करती है और इसका पानी खाजको और त्रिदोषको उपजाता है और अच्छा नहीं है ॥ १७ ॥ अथ श्रावणवृष्टिके गुण । मेघा वमन्ति यत्तोयं सशैलवनकानने ॥ श्रावणे निन्द्यते भूमौ कराम्बु वर्षते रविः ॥ १८ ॥ जो श्रावणके महीनेमें सूर्य अपनीकिरणोंसे पर्वत,वन, उपवन और पृथ्वीमें वर्षा करताहै, वह निंदित जल होता है ( करांबु वर्षते रविः ) इसका अर्थ हस्तनक्षत्रपर सूर्य होता है और श्रावणमें मेघ वर्षता है वह निंदित है ऐसा कहते है ॥ १८ ॥ अथ भादोंके वृष्टिके गुण । सघनं नाभसं नीरं श्लेष्मकृद्वातकोपनम् ॥ शमनं पित्तरोगणां मधुरं रक्तदोषकृत् ॥ १९ ॥ भादोंकी वर्षाका पानी गाढ़ा है, कफको करता है, वातको कोपता है, पित्तके रोगोंको शांत करता है, मधुर है और रक्तदोषको करता है ॥ १९ ॥ अथ आश्विनीकी वृष्टिके गुण । रूक्षं पित्तकरं चाम्लं गुल्मरक्तविकारकृत् ॥ चित्रानक्षत्रसम्भूतं खरं सस्यविदोषकृत् ॥ २० ॥ आश्विनमें हुई वर्षाका पानी रूखा है, पित्तको करता है, खट्टा है, गुल्मको और रक्तके विका- रको करता है, चित्रा नक्षत्रमें वर्षा हुआ पानी तेज है और खेतीके दोषको करता है ॥ २० ॥

अ० ७ भाषाटीकासमेता । (४५) अथ कार्त्तिककी वृष्टिके गुण। कार्त्तिकीवृष्टिसम्भूतं स्वातिसन्तापशीतलम् ॥ नाशनं च त्रिदोषाणां सर्वसस्यप्रवर्धनम् ॥ २१ ॥ शीतलं बलकृद्वृष्यं विदाहज्वरनाशनम् ॥ कार्त्तिककी वर्षाका पानी स्वातिके संतापको शीतल करता है, त्रिदोषको नाशता है, सब प्रकारकी खेतीको बढ़ाता है ॥ २१ ॥ शीतल है, बलको करता है, पुष्टिमें हित है, पित्त- ज्वरको हटाता है ॥ अथ स्वातीजलके गुण । क्वचित्पुण्यतरे देशे शरद्वर्षति माधवम् ॥ २२ ॥ पित्तज्वर- विनाशाय सस्यनिष्पत्तिहेतवे ॥ अम्बरस्थं सदा पथ्यममृतं स्वातिसम्भवम्॥२३॥गगनाम्बु त्रिदोषघ्नं गृहीतं यच्च भाजने॥ बल्यं रसायनं मेध्यं यन्त्रापेक्ष्यं ततः परम् ॥ २४ ॥ कहीं कहीं अति पवित्रदेशमें शरद्ऋतु उत्तम पानीको वर्षाता है ॥ २२ ॥ यह पित्तज्वरको हरता है और खेतीकी सिद्धिका कारण है। स्वातीनक्षत्रमें आकाशसे गिरा जल पथ्य है, अमृत- रूप है ॥ २३ ॥ सुन्दरपात्रमें गृहीत किया आकाशका पानी त्रिदोषको नाशता है, बलमें हित है, रसायन है, पवित्र है। भभकेका खींचा हुवा जल इससे परे जानना ॥ २४ ॥ अथ अकालवृष्टिके लक्षण और गुण । अनार्त्तवं विमुञ्चन्ति जलं जलधरास्तु यत् ॥ पतितं तन्त्रिदोषाय सर्वेषां देहिनामपि ॥ २५ ॥ जो बादल समयके बिना पानीको वर्षाते हैं वह पानी सब मनुष्योंके त्रिदोषको करता है ॥ २५ ॥ अथ अकालमें वर्षे हुए पानीका लक्षण । अकाले वृष्टिसन्तापसम्भूतं तद्विकारकृत् ॥ विशेषाच्छ्लेष्मरोगाणां कारणं न प्रशस्यते ॥ २६ ॥ अकालमें वृष्टि और संतापसे उत्पन्न वह जल विकारी है । विशेष करके श्लेष्माके रोगोंका हेतु है उसकी प्रशंसा नहीं ॥ २६ ॥ अथ धारसंज्ञक आदि चार प्रकारके पानीका लक्षण । तथा धारं च कारं च तौषारं हैममेव च ॥ चतुर्विधं समुद्दिष्टं तेषां वच्मि गुणागुणान् ॥ २७ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

( ४६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- धार, कार, तौषार, हैम इन भेदोंसे पानी चार प्रकारके हैं उन्होंनेके गुण और दोषको कहता हूँ । (धार वृष्टिका जल, कार, ओलोंका जल, तुषार ओसका पानी और हैम बर्फका जल है ) ॥ २७ ॥ अथ कारजलकी उत्पत्ति । धारं चतुर्विधं प्रोक्तं वक्ष्ये कारं महामते ॥ श्रीमतामतिप्रज्ञा- नां हिताय रुजशान्तये ॥ २८॥ स्वर्णद्याः शीतवातेन मेघवि- स्फूर्जसङ्कुलम् ॥ शीताम्बु कठिनं भूत्वा शिलं जातं हिमेन तु ॥ २९॥ पश्चात् सूर्य्यस्य सन्तापात्किञ्चिद्वै द्रवते जलम् ॥ वमन्ति मेघाः सलिलशकलं शीतलं मतम् ॥ ३० ॥ धारसंज्ञक पानीको गांगआदि चार प्रकारसे मैं कह चुका हूँ। अब हे महामते ! कारसं- ज्ञक पानीको कहूँगा जो श्रीमान् और बड़े पंडितोंके कल्याणके लिये और रोगकी शांतिके लिये है कहता हूँ ॥ २८ ॥ गंगाके शीतल वायुसे और मेघकी गर्जनासे मिला शीतल जल ठंढकके मारे ओला बन जाता है ॥ २९ ॥ पीछे सूर्यके संतापसे कुछ जल द्रवित हो जाता है तब मेघ पानीके किनके अर्थात् ओलोंको वर्षाते हैं उन्हींका पानी शीतल माना है ॥ ३० ॥ अथ कारजलके गुण । कारं शीतगुणैः श्रमोपशमनं शोषार्त्तिनिर्नाशनं मूर्च्छामोहाशि- रोऽर्त्तिनाशनकरं हिक्कावमेर्वारणम् ॥ शोफानां व्रणिनां तु दोष- शमनं पित्तात्मिकानां हितं शंसंति प्रवरं गुणैः प्रतिदिनं तस्मा- न्न दूरे कृतम् ॥ ३१ ॥ यह कारसंज्ञक ओलोंका पानी शीतके गुणोंसे परिश्रमको शांत करता है और शोषरूपी पीड़ाको नाशता है और मूर्च्छा, मोह और शिरकी पीडाको नाशता है, हिचकी और छर्दिको दूर करता है, शोजावालोंके और घाववालोंके दोषको हरता हैं और पित्तकी प्रकृतिवालोंकोहित है, गुणोंसे श्रेष्ठ है, प्रति दिन इस लिये दूर नहीं किया जाता ऐसा लोग कहते हैं ॥ ३१ ॥ अथ तुषारपानीके गुण । तौषारं लघु शीतलं श्रमहरं पित्तार्त्तिशान्तिप्रदं दोषाणां शमनं जलात्तिहननं सर्व्वामयघ्नं परम्॥कुष्ठश्लीपदचर्चिकाविषहरं पामा- विसर्पापहं क्षीणानां क्षतशोषिणां हितकरं संसेव्यते मानवैः ३२ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ४७ ) तौषारसंज्ञक औसका पानी हलका है, शीतल है, श्रमको हरता है, पित्तके रोगको शांत करता है, दोषोंको शांत करता है, जलके रोगको हरता है, सब रोगोंको नाशता है और कुष्ठ, श्लीपद रोग और मकडीके विषको नाशता है, पामाको और विसर्परोगको हरता है, क्षीणपुरुषोंको और क्षतशोषियोंको हितकारी है इसवास्ते मनुष्योंको सेवना चहिये ॥ ३२ ॥ अथ हिमपानीके गुण । हैमं घनञ्च मधुरञ्च कफात्मकञ्च मूर्च्छाश्रमार्त्तिशमनं भ्रमनाशनञ्च ॥ पित्तासृजः प्रशमनं रुधिरक्षमञ्च शान्ति करोति हिमसंभववारि सद्यः ॥ ३३ ॥ हैमसंज्ञक बर्फका पानी भारी है, मधुर है, कफकारी है, मूर्च्छाको, श्रमको और भ्रमको हरता है, रक्तपित्तको शांत करता है, रक्तको बंद करता है और शान्तिको शीघ्र करनेवाला है॥ ३३ ॥ अथ धार पानीके गुण । धारं पृथिव्यां पतितं पयस्तु तत्रैव जातं गुणभेदभिन्नम्॥ नानाविधैर्भेदगुणैश्च सम्यग्जातं जलं चाष्टविधं वदन्ति ॥३४॥ धारसंज्ञक पानी पृथिवीमें पतित हुआ वहां ही गुणोंके भेदोंसे भिन्न हो जाता है, पीछे अनेक प्रकारके भेद गुणोंसे अच्छीतरह संयुक्त हुआ वही पानी आठ प्रकारसे कहा है ॥ ३४ ॥ अथ नदीआदिके आठ प्रकारका जल । नद्यौद्भिदं प्रस्रवणं च चौण्ड्यं कौपं तडागं सरसोद्भवञ्च ॥ वाप्युद्भवं तत्प्रवदन्ति धीरा नीरं समासेन वदन्ति चात्र ॥३५॥ नदीका, पृथ्वीका, झरनेका, चौंडयका, कूपका, तडागका, सरसका और बावडीका जल धीरलोग बताते हैं अर्थात् इतनीभांतिका जल और भी होता है ॥ ३५ ॥ अथ नदीके पानीका गुण । यच्छ्रीमताचैव महीपतीनां सेव्यं तथा योग्यतमं प्रदिष्टम् ॥ लघ्वम्बु नादेयमिदं प्रियं १ च रूक्षं तथोष्णं शमनञ्च वायोः ॥३६॥ सन्दीपनं सस्यविनाशनञ्च हिमागम वा शिशिरे निषेव्यम् ॥ बलप्रदं पथ्यकरं नराणां प्रदिष्टमेतत्त सदा भिषग्भिः ॥३७॥ नदीका पानी लक्ष्मीवालोंको और राजालोगोंको अतियोग्य कहा है और लघु है, मधुर है, रूखा है, गरम है, वायुको शांत करता है ॥३६॥ जठराग्निको जगाता है, खेतीको नाशता है, शीतके आगमनमें अथवा शिशिरऋतुमें सेवने योग्य है और बलको देता है, मनुष्योंको पथ्य है ऐसे पंडितोंने सब कालमें कहा है ॥ ३७ ॥ १ "स्वादुप्रियो तु मधुरौ" इत्यमरः ।

( ४८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ औद्भिद पानीका गुण दोष । औद्भिद्यमुष्णं लघु वातहारि सपैत्तिकं तृड्ज्वरनाशनञ्च ॥ कुष्ठव्रणानां श्रमशोषिणाञ्च शस्तं न च क्षारगुणोपपन्नम् ॥३८॥ पृथिवीको विदारित कर बड़ी धारासे निकलनेवाला पानी औद्भिद कहाता है, यह पानी गरम है, हलका है, वातको हरता है, पित्तसे संयुक्त है, तृषाको और ज्वरको नाशता है, कुष्ठ और घाव- वालोंको, श्रम और शोषवालोंको श्रेष्ठ नहीं है, क्योंकि नमकके गुणसे युक्त है ॥ ३८ ॥ अथ झरनेके पानीका गुण दोष । उष्णं कषायं स्रवणोद्भवञ्च श्लेष्मापहं गुल्महृदामयघ्नम् ॥ कण्डूविसर्पक्षयरोगकारि नानाविधं दोषचयं करोति ॥३९॥ पर्वतके झरनासे उपजा पानी गरम है, कसैला है, कफको हरता है, गुल्मरोगको और हृद्रोगको नाशता है, खाज, विसर्परोग और क्षयरोगको करता है, और अनेक प्रकारके दोषोंको संचित करता है ॥ ३९ ॥ अथ चौंडचसंज्ञक पानीका गुण दोष । वदन्ति चौंड्यं लवणं तथा गुरु कफात्मकं वारि विकारकर्तृ॥ हिक्काज्वरं शूलमरोचनं तथा करोति नूनं त्वचि दोषसंग्रहम् ॥४० आप ही शिलासे आकीर्ण हुआ छिद्रमें नीले अंजनके समान पानी हो और लता वेल आदिसे आच्छादित हो तिसको चौंडयसंज्ञक पानी कहते हैं यह पानी सलोना है भारी है, कफको करता है, विकारको उपजाता है हिचकी, शूल, अरोचकको उपजाता ^है और त्वचा अर्थात् खालमें दोषको और रोगको उपजाता है ॥ ४० ॥ अथ कुएंके पानीके गुण दोष । रूक्षं कफघ्नं लवणात्मकञ्च सन्दीपनं पित्तकरं लघूष्णम् ॥ कौपं जलं वातहरं प्रदिष्टं शरद्ऋतौ नैव हितं न शस्तम् ॥४१॥ कुएंका पानी रूखा है, कफका नाश करता है, नमकसे संयुक्त है, अग्निको जगाताहै, पित्तको करता है, हलका है, गर्म है, वातको हरता है ऐसा कहा गया है, किन्तु शरद्ऋतुमें न तो हितकर है न प्रशंसनीय है ॥ ४१ ॥ अथ तलावके पानीके गुण दोष । घनं कषायञ्च तडागजं स्यात्स्वादु प्रपाके मधुरं तथैव ॥ सरस्तु शस्तं कफकृत्सवातं ग्रीष्मे हितं न प्रवदन्ति धीराः॥४२॥ सुंदर पृथिवीके भागमें जहां बहुत वर्षाका पानी इकट्ठा हो उसको तलावका पानी कहते हैं । यह गाढा है, कसैला है, स्वादु है, पाकमें मधुर हैं, शरद्ऋतुमें अर्थात् आश्विन, कार्तिकमें श्रेष्ठ है, कफको करता है, वायुसे सहित है, ग्रीष्मऋतु अर्थात् ज्येष्ठ आषाढमें हित नहीं है ॥ ४२ ॥

अं० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ( ४९ ) ) अथ सारसपानीकें गुणदोष । क्षारं घनं वातकफानुकारि त्वग्दोषदं वा कटु दीपनं च ॥ प्रोक्तं विपाके श्रमशोषकारि स्यात् सारसं नो सुखकारि वारि ४३ पर्वतकी शिला आदिसें रुकी हुई नदीका पानी जहां झिरके इकट्ठा होवे उसको सारसपानी कहते हैं। यह पानी खारा है, भारी है, वातको और कफको करता है और खालमें दोषको उप- जाता है, कडुआ है, अग्निको जगाता है, पाककालमें श्रमको और शोषको करता है और सुखको देनेवाला नहीं है ॥ ४३ ॥ अथ बावड़की जलके गुण । क्षारं कवोष्णं कफवातरोगविनाशनं पित्तकरं कटु स्यात् ॥ शस्तं सदा पित्तविकारिणाञ्च शस्तं न वाप्यं शरदि प्रदिष्टम् ॥४४ बावड़ीका पानी खारा, कुछ थोडा गरम, कफ वात रोगोंको नाश करनेवाला, पित्तकारक, तीखा और पित्तविकारी मनुष्योंको सदा हितकारी है, परन्तु शरदऋतुमें हितकारी नहीं है ॥ ४४ ॥ अथ नदियोंकी प्रकृति । इति चाष्टविधं प्रोक्तं जलं भिषजसत्तमैः ॥ नादेयं संप्रवक्ष्यामि समुद्रंगामिस्रोतसाम् ॥ ४५ ॥ ऐसे उत्तम वैद्योंने पानी आठ प्रकारसे कहा है। अब नदियोंमें समुद्रको जानेवाली नदियोंका जल कहूँगा ॥ ४५ ॥ तथा प्राच्यां गमाश्र्वान्याः पश्चिमानुगमास्तथा ॥ तासां गुणागु- णान्वक्ष्ये समासेन गुणोत्तम ! ॥ ४६ ॥ ससैकता सपाषाणा द्विविधा चाम्बुवाहिनी ॥ एवं चतुर्विधा नद्यो वातपित्त- कफात्मिकाः ॥ ४७ ॥ पूर्वमें गमन करनेवाली और पश्चिममें गमन करनेवाली जो नदियां हैं उनके गुणदोषोंको हेगुणोत्तम ! विस्तार करके कहूंगा ॥ ४६ ॥ वालुरेतवाली और पत्थरोंवाली ऐसे नदी दो प्रकारसे हैं और पूर्वोक्त दोनोंके मिलनेसे चार प्रकारकी नदी हैं, ये वात पित्त कफसे संयुक्त हैं ॥ ४७ ॥ अथ सदा बहनेवाली नदीकें गुण दोष । सदावहा वा घनवारिकोष्णा मरुत्कफानां शमनञ्च तस्याः ॥ नीरं वसन्ते हितकृद्विशेषान्नदीभवं नैव हिमागमे च ॥ ४८ ॥ ४

( ५० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- सब कालमें बहनेवाली नदियां भारी पानीवाली होती हैं, कुछ गर्म होती हैं, वायुको और कफको शांत करती हैं; तिन्होंका पानी चैत्र और वैशाख मासमें विशेष करके हितको करता है और जाडेके आगमनमें अच्छा नहीं है ॥ ४८ ॥ अथ पत्थरोंवाली नदीके गुण दोष । घनविमलशिलानां स्फालनाज्जातफेनं बहलसजलवीचीच्छन्न- संक्षोभदत्तम् ॥ ननु लघु सुखशीतं नाति चोष्णं घनञ्च हरति पवनपित्तं श्लेष्मकृद्वारि सम्यक् ॥ ४९ ॥ भारी और विशेषकरके मलोंवाले ऐसे पत्थरोंके संयोगसे झागोंवाला और बहुतसे तरंगोंके क्षोभसे गर्मको प्राप्त हुआ और सुन्दर शीतल और अतिगर्म नहीं और भारी ऐसा पानी वातको और पित्तको अच्छीतरह हरता है और कफको पैदा करता है ॥ ४९ ॥ अथ वालूरेतवाली नदीके पानीके गुण दोष । सघनविमलतोयं सैकतायाः प्रवाहे न च भवति लघुत्वं श्लेष्म- कृद्धन्ति पित्तम् ॥ भवति मधुरमेवं किञ्चिदुष्णं कषायं भवति पवनकारि शोषमूर्च्छा निहन्ति ॥ ५० ॥ वालू रेतके प्रवाहमें यह पानी भारी नहीं है, विशेष करके मलसे रहित नहीं है, हलका भी नहीं है, कफको करता है, पित्तको हरता है, मधुर है कुछ गर्म है, कसैला है, पवनको करता है, शोषको और मूर्च्छाको नाशता है ॥ ५० ॥ अथ उत्तरसे बहनेवाली नदियोंके और पानीके गुण दोष । हिमवत्प्रभवा नद्यःपुण्या देवर्षिसेविताः॥ घनपाषाणसिकतावा- हिन्यो विमलोदकाः ॥ ५१ ॥ हन्ति वातकफं तोयं श्रमशोषवि- नाशनम् ॥ किञ्चित्करोति वा पित्तं त्रिदोषशमनं जलम् ॥ ५२ ॥ मलयप्रभवा नद्यः शीततोयामृतोपमाः ॥ घ्नंति वातञ्च पित्तञ्च शोषभ्रमश्रमापहाः ॥ ५३ ॥ गङ्गा सरस्वती शोणो यमुना सरयू शची ॥ वेणा शरावती नीला उत्तरापूर्ववाहिनी ॥ ५४ ॥ हिम- वत्प्रभवा ह्येता हिमसंभवशीतलाः॥ समाः सर्वगुणैर्नद्यो वात- श्लेष्महरा नृणाम् ॥ ५५ ॥ आसां नवशतैर्युक्ता गङ्गा प्रोक्ता मनीषिभिः ॥ तथा चर्म्मण्वती वेत्रवती पारावती तथा ॥ ५६ ॥ क्षिप्रा महापदी पीता मृत्सकान्या मनस्विनी ॥ शेवती शैवलि-

अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ५१ ) न्यश्च सिन्धुयुक्ताः समुद्रगाः॥५७॥ वातपित्तहरं नीरं त्रिदोषघ्नं मतं परम् ॥ श्रमग्लानिहरं वृष्यमुत्तराशानुगामि च ॥ ५८ ॥ हिमालय पर्वतसे उत्पन्न हुई नदियां पवित्र हैं देवता और मुनियोंसे सेवित हैं मोटें पत्थर और वालरेतको बहानेवाली हैं मलसे रहित पानीवाली हैं, ॥ ५१ ॥ इनका पानी वातको और कफको नाशता है,श्रमको और शोषको दूर करता है अथवा कुछ पित्तको करता है और त्रिदो- षको शांत करता है ॥५२॥ मलय पर्वतसे उपजी नदियाँ शीतपानीवाली हैं अमृतके समानपानी बहती हैं और वात, पित्त, शोष, भ्रम, और श्रमको नाशती है ॥ ५३ ॥ गंगाजी, सरस्वती, शोण,यमुना,सरयू,शची,वेणा,शरावती, नीला ये नदियां उत्तरको और पूर्वको बहती हैं ॥५४॥ हिमालय पर्वतसे उत्पन्न हुई और बर्फके सम्भवसे शीतल हुई ऐसी ये नदी सर्वगुणोंसे समान हैं और मनुष्योंके वातको और कफको हरती हैं ॥ ५५ ॥ इन्होंनेसे नौसौ ९०० नदियोंसे युक्त हुई गंगाजी पंडितोंने कही है तैसेही चर्मण्वती, वेत्रवती, पारावती, ॥ ५६ ॥ क्षिप्रा, महापदी, पीता,मृत्सका, मनस्विनी, शैवती, शैवलिनी,सिंधु ये सब नदी समुद्रमें गमन करती हैं ॥५७॥ इनका पानी वातको और पित्तको हरता है और त्रिदोषको हरनेवाला मानाहै परिश्रमको और ग्लानिको हरता है वीर्य्यमें हित हैऔर उत्तर दिशासे आता है ॥ ५८ ॥ अथ तापीआदिनदियोंके गुण दोष । तापी तापा च गोलोमी गोमती सलिला मही ॥ सरस्वतीयुता नद्यो नर्म्मदा पश्चिमानुगाः ॥ ५९॥ आसां जलं घनं पीतं पित्तघ्नं कफकृत्तथा॥ वातदोषहरं हृद्यं कण्डूकुष्ठविनाशनम्॥६०॥ तापी, तापा, गोलोमी, गोमती,सलिला, मही, सरस्वती,नर्मदा,ये पश्चिमसे बहती हैं॥५९॥ इनका पानी मीठाहै पीनेसे पित्तको नाशकरता है कफको करता है वातदोषको हरता है सुन्दर है खाजको और कुष्ठको नाशता है ॥ ६० ॥ पश्चिमाद्रिसमुद्भूता गौतमी पुण्यभावना ॥अस्या शीतं जलं वापि कफवातविकारकृत्॥पित्तदं शमनं बल्यं मूत्रदोषविकार- कृत् ॥ ६१ ॥ पूर्णा पयस्विनी वेत्रा प्रणीता च वरानना ॥ द्रोणा गोवर्द्धनी यान्या गौतम्यानुगता इमाः ॥ ६२॥ आसां जलं घनं नातिवातश्लेष्मविकारकृत् ॥ पूर्वसामुद्रगाश्चैव नद्यो नवशतैर्युताः ॥ ६३ ॥ कावेरी वीरकांता च भीमा चैव पय- स्विनी ॥ विभावरी विशाला च गोविन्दी मदनस्वसा ॥ पार्वती

( ५२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- चापरा नद्यो दक्षिणादिग्गमा इमाः ॥ ६४ ॥ प्रत्यकशो न सेवेत युक्तायाश्च पृथक् पृथक् ॥ सर्वासां परिसंख्या च शतानां चैक- विंशतिः ॥ ६५ ॥ पश्चिमके पर्वतसे उपजी गौतमी पवित्रहै, इसका पानी शीतलहै, कफ और वातके विकारको करता है, पित्तकारक है, दोषशामक है, बलकारक है, मूत्रदोषके विकारको करता है ॥ ६१ ॥ पूर्ण, पयस्विनी, वेत्रा, प्रणीता, वरानना, द्रोणा, गोवर्द्धनी इत्यादि नदी गौतमी नदीके अनुगमन करती हैं ॥ ६२ ॥ इनका पानी अति भारी नहीं है, वातके और कफके विकारको करता है और पूर्वके समुद्रमें गमन करनेवाली नौसौ ९०० नदियां हैं ॥ ६३ ॥ कावेरी, वीरकांता, भीमा, पयस्विनी, विभावरी, विशाला, गोविंदी, मदनस्वसा, पार्वती इत्यादि नदी दक्षिणदिशाको गमन करती हैं ६४ ॥ एक एक नदीको नहीं सेवे, मिली हुई नदीकासेवन करे क्योंकि सब नदियोंकी २१०० इक्की- ससौ संख्या अर्थात् गिनती ॥ ६५ ॥ क्रोशे क्रोशे भवेत् कुल्या योजने योजने नदी ॥ द्वियोजना च विज्ञेया महानीरा बुधैर्नदी ॥ ६६ ॥ कोश कोश में विस्तारंवाली कुल्या कहाती है और चार चार कोशमें विस्तार वाली नदी कहाती हैं और आठ आठ कोशमें विस्तारवाली महानदी कहाती है ॥ ६६ ॥ ॥ अथ पृथिवीके भागका पानी । भूमिः पञ्चविधा ज्ञेया कृष्णा रक्ता तथा सिता ॥ पीता नीला भवेच्चान्या गुणास्तासां प्रकीर्त्तिताः ॥ ६७ ॥ कृष्णा च मधुरा रूक्षा कषाया पीतवर्णिनी ॥ रक्ता सा च भवेत्तिक्ता मधुरामला- सिता स्मृता ॥ ६८ ॥ नीला सकटुका चैवं भूमिभागजलं विदुः ॥ सघनं मधुरं नीरं कृष्णं भूमिपरिश्रितम् ॥ ६९ ॥ पी- ताश्रितं कषायञ्च रक्तायाः क्षारमाधुरम् ॥ सितायामम्लमधुरं भूमिभागेन लक्षयेत् ॥ ७० ॥ तथा चतुर्विधं तोयं वक्ष्यामि शृणु कोविद् ॥ पापोदकं रोगोदकमंशुदकारोग्योदकौ ॥ ७१ ॥ काली, लाल, सफेद, पीली, नीली, इन भेदोंसे पृथ्‍वी पांचप्रकारकी है उनके गुण कहते हैं ॥ ६७ ॥ काली पृथ्‍वी मधुर है, रुखी है, पीली पृथ्वी कसली है, लाल पृथिवी कडुवी है सफेद पृथिवी मधुर और खट्टी है ॥ ६८ ॥ नीली पृथिवी चर्चरी जाननी ऐसेही पृथिवीके भागका पानी कहा है, काली भूमिक जल घना, मीठा, होता है ॥ ६९ ॥ पीली पृथिवीका कसैला पानी है, लाल पृथिवीका पानी खारा और मधुर है, सफेद पृथिवीका