भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ७ भाषाटीकासमेता । (४५) अथ कार्त्तिककी वृष्टिके गुण। कार्त्तिकीवृष्टिसम्भूतं स्वातिसन्तापशीतलम् ॥ नाशनं च त्रिदोषाणां सर्वसस्यप्रवर्धनम् ॥ २१ ॥ शीतलं बलकृद्वृष्यं विदाहज्वरनाशनम् ॥ कार्त्तिककी वर्षाका पानी स्वातिके संतापको शीतल करता है, त्रिदोषको नाशता है, सब प्रकारकी खेतीको बढ़ाता है ॥ २१ ॥ शीतल है, बलको करता है, पुष्टिमें हित है, पित्त- ज्वरको हटाता है ॥ अथ स्वातीजलके गुण । क्वचित्पुण्यतरे देशे शरद्वर्षति माधवम् ॥ २२ ॥ पित्तज्वर- विनाशाय सस्यनिष्पत्तिहेतवे ॥ अम्बरस्थं सदा पथ्यममृतं स्वातिसम्भवम्॥२३॥गगनाम्बु त्रिदोषघ्नं गृहीतं यच्च भाजने॥ बल्यं रसायनं मेध्यं यन्त्रापेक्ष्यं ततः परम् ॥ २४ ॥ कहीं कहीं अति पवित्रदेशमें शरद्ऋतु उत्तम पानीको वर्षाता है ॥ २२ ॥ यह पित्तज्वरको हरता है और खेतीकी सिद्धिका कारण है। स्वातीनक्षत्रमें आकाशसे गिरा जल पथ्य है, अमृत- रूप है ॥ २३ ॥ सुन्दरपात्रमें गृहीत किया आकाशका पानी त्रिदोषको नाशता है, बलमें हित है, रसायन है, पवित्र है। भभकेका खींचा हुवा जल इससे परे जानना ॥ २४ ॥ अथ अकालवृष्टिके लक्षण और गुण । अनार्त्तवं विमुञ्चन्ति जलं जलधरास्तु यत् ॥ पतितं तन्त्रिदोषाय सर्वेषां देहिनामपि ॥ २५ ॥ जो बादल समयके बिना पानीको वर्षाते हैं वह पानी सब मनुष्योंके त्रिदोषको करता है ॥ २५ ॥ अथ अकालमें वर्षे हुए पानीका लक्षण । अकाले वृष्टिसन्तापसम्भूतं तद्विकारकृत् ॥ विशेषाच्छ्लेष्मरोगाणां कारणं न प्रशस्यते ॥ २६ ॥ अकालमें वृष्टि और संतापसे उत्पन्न वह जल विकारी है । विशेष करके श्लेष्माके रोगोंका हेतु है उसकी प्रशंसा नहीं ॥ २६ ॥ अथ धारसंज्ञक आदि चार प्रकारके पानीका लक्षण । तथा धारं च कारं च तौषारं हैममेव च ॥ चतुर्विधं समुद्दिष्टं तेषां वच्मि गुणागुणान् ॥ २७ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu