हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- दिनमें सूर्यके किरणोंसे तप्त हुए जो मेघ पानी वर्षाते हैं वहकफको नाशता है, प्यासको हरता है, हलका है, वातको कुपित करता है ॥ १५ ॥ अथ दुर्दिनमें बरसे पानीके गुण दोष वर्णन । दुर्दिने वृष्टिसम्पातं वातभूतं सवातलम् ॥ कफकृच्छोषहननं तर्पणं दोषकोपनम् ॥ १६ ॥ दुर्दिनमें वर्षा हुआ पानी वातल है, कफको करता है, शोषको हरता है, तृप्तिको, करता है।, दोषोंको कुपित करता है ॥ १६ ॥ अथ क्षणवृष्टिके गुण । तथा वा क्षणवृष्टिश्च दोषरोगकरी नृणाम् ॥ कण्डूत्रिदोषजननं पानीयं न प्रशस्यते ॥ १७ ॥ जो क्षण क्षण में वृष्टि होती है वह वर्षा मनुष्योंके दोषको और रोगको करती है और इसका पानी खाजको और त्रिदोषको उपजाता है और अच्छा नहीं है ॥ १७ ॥ अथ श्रावणवृष्टिके गुण । मेघा वमन्ति यत्तोयं सशैलवनकानने ॥ श्रावणे निन्द्यते भूमौ कराम्बु वर्षते रविः ॥ १८ ॥ जो श्रावणके महीनेमें सूर्य अपनीकिरणोंसे पर्वत,वन, उपवन और पृथ्वीमें वर्षा करताहै, वह निंदित जल होता है ( करांबु वर्षते रविः ) इसका अर्थ हस्तनक्षत्रपर सूर्य होता है और श्रावणमें मेघ वर्षता है वह निंदित है ऐसा कहते है ॥ १८ ॥ अथ भादोंके वृष्टिके गुण । सघनं नाभसं नीरं श्लेष्मकृद्वातकोपनम् ॥ शमनं पित्तरोगणां मधुरं रक्तदोषकृत् ॥ १९ ॥ भादोंकी वर्षाका पानी गाढ़ा है, कफको करता है, वातको कोपता है, पित्तके रोगोंको शांत करता है, मधुर है और रक्तदोषको करता है ॥ १९ ॥ अथ आश्विनीकी वृष्टिके गुण । रूक्षं पित्तकरं चाम्लं गुल्मरक्तविकारकृत् ॥ चित्रानक्षत्रसम्भूतं खरं सस्यविदोषकृत् ॥ २० ॥ आश्विनमें हुई वर्षाका पानी रूखा है, पित्तको करता है, खट्टा है, गुल्मको और रक्तके विका- रको करता है, चित्रा नक्षत्रमें वर्षा हुआ पानी तेज है और खेतीके दोषको करता है ॥ २० ॥