भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

अ० ७ ] भाषाटीकासमेत । ( ४३ ) गंगाजलके गुण । तद्धारयेच्च मतिमान्बल्यं मेध्यं रसायनम् ॥ श्रमक्लमपिपासाघ्नं कण्डूदोषनिवारणम् ॥ ९॥ लघु मूर्च्छातृषाच्छर्दिमूत्रस्तम्भावि- नाशनम् ॥ गाङ्गोदकस्य वृष्टिः स्याद्दिवसे वा प्रशस्यते ॥१०॥ बुद्धिमान् मनुष्य इसे धारण करे, यह बलमें हित है, पवित्र है, रसायन है, और ग्लानि, परि- श्रम, प्यास इन्होंको हरता है, खाजके दोषको दूर करता है ॥९॥ हलका है और मूर्च्छा, तृषा, छर्दि और मूत्रस्तंभको नाशता है अथवा सूर्य्यके दीखते हुए जो वर्षता है वह गांगपानी है १०॥ अथ सामुद्र पानीका लक्षण और गुण दोष वर्णन । आविलं समलं नीलं घनं पीतमथापि वा॥सक्षारं पिच्छिलं चैव सामुद्रं तन्निगद्यते ॥ ११ ॥ सघनं कफकृच्चैव कण्डूश्लीपदकार- कम् ॥ सवातलं च विज्ञेयं रक्तदोषार्त्तिकारणम् ॥ १२ ॥ साफ न हो, मलसे सहित हो, नीला हो, भारी हो, पीला हो, खारसे संयुक्त हो, गढा हो, तो उसको सामुद्रपानी कहते हैं ॥११॥ यह घनाहोता है, कफको करता है, खाजको और श्लीपद रोगको उपजाता है, वातल है, रक्तके रोगोंकी पीड़ाकी जड़ है ॥ १२ ॥ अथ चार प्रकारकी वृष्टि । द्विविधमुदकं प्रोक्तं तथा वक्ष्ये चतुर्विधम् ॥ रात्रिवृष्टिर्दिवावृष्टिर्दुर्दिनावाक्षणोद्भवा ॥ १३ ॥ इस तरह गांग और समुद्र भेदसे दो प्रकारका जल कहा, अब चार प्रकारका कहूँगा। रात्रिको दिनकी, दुर्दिनकी और चलते बादलोंकी इस तरह चार प्रकारकी वृष्टिके चार ही भांतिके जल होते हैं ॥ १३ ॥ अथ रात्रिमें वर्षाहुए पानीके गुण दोष वर्णन । निशाजलं कफकरं घनशीतगुणात्मकम् ॥ सामुद्रतोयस्य समं विज्ञेयं वातकोपनम् ॥ १४ ॥ रात्रिमें वर्षा हुआ पानी कफको करता है, भारी है, शीतल गुणवाला है, सामुद्रसंज्ञक पानीके समान है और वातको कोपता है ॥ १४ ॥ अथ दिनको बरसे पानीके गुण दोष वर्णन । दिवा सूर्य्यांशुतप्ताश्च मेघा वर्षन्ति यत्पयः ॥ तत्कफघ्नं पिपासाघ्नं लघु वातप्रकोपनम् ॥ १५ ॥

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