हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- धार, कार, तौषार, हैम इन भेदोंसे पानी चार प्रकारके हैं उन्होंनेके गुण और दोषको कहता हूँ । (धार वृष्टिका जल, कार, ओलोंका जल, तुषार ओसका पानी और हैम बर्फका जल है ) ॥ २७ ॥ अथ कारजलकी उत्पत्ति । धारं चतुर्विधं प्रोक्तं वक्ष्ये कारं महामते ॥ श्रीमतामतिप्रज्ञा- नां हिताय रुजशान्तये ॥ २८॥ स्वर्णद्याः शीतवातेन मेघवि- स्फूर्जसङ्कुलम् ॥ शीताम्बु कठिनं भूत्वा शिलं जातं हिमेन तु ॥ २९॥ पश्चात् सूर्य्यस्य सन्तापात्किञ्चिद्वै द्रवते जलम् ॥ वमन्ति मेघाः सलिलशकलं शीतलं मतम् ॥ ३० ॥ धारसंज्ञक पानीको गांगआदि चार प्रकारसे मैं कह चुका हूँ। अब हे महामते ! कारसं- ज्ञक पानीको कहूँगा जो श्रीमान् और बड़े पंडितोंके कल्याणके लिये और रोगकी शांतिके लिये है कहता हूँ ॥ २८ ॥ गंगाके शीतल वायुसे और मेघकी गर्जनासे मिला शीतल जल ठंढकके मारे ओला बन जाता है ॥ २९ ॥ पीछे सूर्यके संतापसे कुछ जल द्रवित हो जाता है तब मेघ पानीके किनके अर्थात् ओलोंको वर्षाते हैं उन्हींका पानी शीतल माना है ॥ ३० ॥ अथ कारजलके गुण । कारं शीतगुणैः श्रमोपशमनं शोषार्त्तिनिर्नाशनं मूर्च्छामोहाशि- रोऽर्त्तिनाशनकरं हिक्कावमेर्वारणम् ॥ शोफानां व्रणिनां तु दोष- शमनं पित्तात्मिकानां हितं शंसंति प्रवरं गुणैः प्रतिदिनं तस्मा- न्न दूरे कृतम् ॥ ३१ ॥ यह कारसंज्ञक ओलोंका पानी शीतके गुणोंसे परिश्रमको शांत करता है और शोषरूपी पीड़ाको नाशता है और मूर्च्छा, मोह और शिरकी पीडाको नाशता है, हिचकी और छर्दिको दूर करता है, शोजावालोंके और घाववालोंके दोषको हरता हैं और पित्तकी प्रकृतिवालोंकोहित है, गुणोंसे श्रेष्ठ है, प्रति दिन इस लिये दूर नहीं किया जाता ऐसा लोग कहते हैं ॥ ३१ ॥ अथ तुषारपानीके गुण । तौषारं लघु शीतलं श्रमहरं पित्तार्त्तिशान्तिप्रदं दोषाणां शमनं जलात्तिहननं सर्व्वामयघ्नं परम्॥कुष्ठश्लीपदचर्चिकाविषहरं पामा- विसर्पापहं क्षीणानां क्षतशोषिणां हितकरं संसेव्यते मानवैः ३२ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu