भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ४७ ) तौषारसंज्ञक औसका पानी हलका है, शीतल है, श्रमको हरता है, पित्तके रोगको शांत करता है, दोषोंको शांत करता है, जलके रोगको हरता है, सब रोगोंको नाशता है और कुष्ठ, श्लीपद रोग और मकडीके विषको नाशता है, पामाको और विसर्परोगको हरता है, क्षीणपुरुषोंको और क्षतशोषियोंको हितकारी है इसवास्ते मनुष्योंको सेवना चहिये ॥ ३२ ॥ अथ हिमपानीके गुण । हैमं घनञ्च मधुरञ्च कफात्मकञ्च मूर्च्छाश्रमार्त्तिशमनं भ्रमनाशनञ्च ॥ पित्तासृजः प्रशमनं रुधिरक्षमञ्च शान्ति करोति हिमसंभववारि सद्यः ॥ ३३ ॥ हैमसंज्ञक बर्फका पानी भारी है, मधुर है, कफकारी है, मूर्च्छाको, श्रमको और भ्रमको हरता है, रक्तपित्तको शांत करता है, रक्तको बंद करता है और शान्तिको शीघ्र करनेवाला है॥ ३३ ॥ अथ धार पानीके गुण । धारं पृथिव्यां पतितं पयस्तु तत्रैव जातं गुणभेदभिन्नम्॥ नानाविधैर्भेदगुणैश्च सम्यग्जातं जलं चाष्टविधं वदन्ति ॥३४॥ धारसंज्ञक पानी पृथिवीमें पतित हुआ वहां ही गुणोंके भेदोंसे भिन्न हो जाता है, पीछे अनेक प्रकारके भेद गुणोंसे अच्छीतरह संयुक्त हुआ वही पानी आठ प्रकारसे कहा है ॥ ३४ ॥ अथ नदीआदिके आठ प्रकारका जल । नद्यौद्भिदं प्रस्रवणं च चौण्ड्यं कौपं तडागं सरसोद्भवञ्च ॥ वाप्युद्भवं तत्प्रवदन्ति धीरा नीरं समासेन वदन्ति चात्र ॥३५॥ नदीका, पृथ्वीका, झरनेका, चौंडयका, कूपका, तडागका, सरसका और बावडीका जल धीरलोग बताते हैं अर्थात् इतनीभांतिका जल और भी होता है ॥ ३५ ॥ अथ नदीके पानीका गुण । यच्छ्रीमताचैव महीपतीनां सेव्यं तथा योग्यतमं प्रदिष्टम् ॥ लघ्वम्बु नादेयमिदं प्रियं १ च रूक्षं तथोष्णं शमनञ्च वायोः ॥३६॥ सन्दीपनं सस्यविनाशनञ्च हिमागम वा शिशिरे निषेव्यम् ॥ बलप्रदं पथ्यकरं नराणां प्रदिष्टमेतत्त सदा भिषग्भिः ॥३७॥ नदीका पानी लक्ष्मीवालोंको और राजालोगोंको अतियोग्य कहा है और लघु है, मधुर है, रूखा है, गरम है, वायुको शांत करता है ॥३६॥ जठराग्निको जगाता है, खेतीको नाशता है, शीतके आगमनमें अथवा शिशिरऋतुमें सेवने योग्य है और बलको देता है, मनुष्योंको पथ्य है ऐसे पंडितोंने सब कालमें कहा है ॥ ३७ ॥ १ "स्वादुप्रियो तु मधुरौ" इत्यमरः ।