हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ औद्भिद पानीका गुण दोष । औद्भिद्यमुष्णं लघु वातहारि सपैत्तिकं तृड्ज्वरनाशनञ्च ॥ कुष्ठव्रणानां श्रमशोषिणाञ्च शस्तं न च क्षारगुणोपपन्नम् ॥३८॥ पृथिवीको विदारित कर बड़ी धारासे निकलनेवाला पानी औद्भिद कहाता है, यह पानी गरम है, हलका है, वातको हरता है, पित्तसे संयुक्त है, तृषाको और ज्वरको नाशता है, कुष्ठ और घाव- वालोंको, श्रम और शोषवालोंको श्रेष्ठ नहीं है, क्योंकि नमकके गुणसे युक्त है ॥ ३८ ॥ अथ झरनेके पानीका गुण दोष । उष्णं कषायं स्रवणोद्भवञ्च श्लेष्मापहं गुल्महृदामयघ्नम् ॥ कण्डूविसर्पक्षयरोगकारि नानाविधं दोषचयं करोति ॥३९॥ पर्वतके झरनासे उपजा पानी गरम है, कसैला है, कफको हरता है, गुल्मरोगको और हृद्रोगको नाशता है, खाज, विसर्परोग और क्षयरोगको करता है, और अनेक प्रकारके दोषोंको संचित करता है ॥ ३९ ॥ अथ चौंडचसंज्ञक पानीका गुण दोष । वदन्ति चौंड्यं लवणं तथा गुरु कफात्मकं वारि विकारकर्तृ॥ हिक्काज्वरं शूलमरोचनं तथा करोति नूनं त्वचि दोषसंग्रहम् ॥४० आप ही शिलासे आकीर्ण हुआ छिद्रमें नीले अंजनके समान पानी हो और लता वेल आदिसे आच्छादित हो तिसको चौंडयसंज्ञक पानी कहते हैं यह पानी सलोना है भारी है, कफको करता है, विकारको उपजाता है हिचकी, शूल, अरोचकको उपजाता ^है और त्वचा अर्थात् खालमें दोषको और रोगको उपजाता है ॥ ४० ॥ अथ कुएंके पानीके गुण दोष । रूक्षं कफघ्नं लवणात्मकञ्च सन्दीपनं पित्तकरं लघूष्णम् ॥ कौपं जलं वातहरं प्रदिष्टं शरद्ऋतौ नैव हितं न शस्तम् ॥४१॥ कुएंका पानी रूखा है, कफका नाश करता है, नमकसे संयुक्त है, अग्निको जगाताहै, पित्तको करता है, हलका है, गर्म है, वातको हरता है ऐसा कहा गया है, किन्तु शरद्ऋतुमें न तो हितकर है न प्रशंसनीय है ॥ ४१ ॥ अथ तलावके पानीके गुण दोष । घनं कषायञ्च तडागजं स्यात्स्वादु प्रपाके मधुरं तथैव ॥ सरस्तु शस्तं कफकृत्सवातं ग्रीष्मे हितं न प्रवदन्ति धीराः॥४२॥ सुंदर पृथिवीके भागमें जहां बहुत वर्षाका पानी इकट्ठा हो उसको तलावका पानी कहते हैं । यह गाढा है, कसैला है, स्वादु है, पाकमें मधुर हैं, शरद्ऋतुमें अर्थात् आश्विन, कार्तिकमें श्रेष्ठ है, कफको करता है, वायुसे सहित है, ग्रीष्मऋतु अर्थात् ज्येष्ठ आषाढमें हित नहीं है ॥ ४२ ॥