हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअं० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ( ४९ ) ) अथ सारसपानीकें गुणदोष । क्षारं घनं वातकफानुकारि त्वग्दोषदं वा कटु दीपनं च ॥ प्रोक्तं विपाके श्रमशोषकारि स्यात् सारसं नो सुखकारि वारि ४३ पर्वतकी शिला आदिसें रुकी हुई नदीका पानी जहां झिरके इकट्ठा होवे उसको सारसपानी कहते हैं। यह पानी खारा है, भारी है, वातको और कफको करता है और खालमें दोषको उप- जाता है, कडुआ है, अग्निको जगाता है, पाककालमें श्रमको और शोषको करता है और सुखको देनेवाला नहीं है ॥ ४३ ॥ अथ बावड़की जलके गुण । क्षारं कवोष्णं कफवातरोगविनाशनं पित्तकरं कटु स्यात् ॥ शस्तं सदा पित्तविकारिणाञ्च शस्तं न वाप्यं शरदि प्रदिष्टम् ॥४४ बावड़ीका पानी खारा, कुछ थोडा गरम, कफ वात रोगोंको नाश करनेवाला, पित्तकारक, तीखा और पित्तविकारी मनुष्योंको सदा हितकारी है, परन्तु शरदऋतुमें हितकारी नहीं है ॥ ४४ ॥ अथ नदियोंकी प्रकृति । इति चाष्टविधं प्रोक्तं जलं भिषजसत्तमैः ॥ नादेयं संप्रवक्ष्यामि समुद्रंगामिस्रोतसाम् ॥ ४५ ॥ ऐसे उत्तम वैद्योंने पानी आठ प्रकारसे कहा है। अब नदियोंमें समुद्रको जानेवाली नदियोंका जल कहूँगा ॥ ४५ ॥ तथा प्राच्यां गमाश्र्वान्याः पश्चिमानुगमास्तथा ॥ तासां गुणागु- णान्वक्ष्ये समासेन गुणोत्तम ! ॥ ४६ ॥ ससैकता सपाषाणा द्विविधा चाम्बुवाहिनी ॥ एवं चतुर्विधा नद्यो वातपित्त- कफात्मिकाः ॥ ४७ ॥ पूर्वमें गमन करनेवाली और पश्चिममें गमन करनेवाली जो नदियां हैं उनके गुणदोषोंको हेगुणोत्तम ! विस्तार करके कहूंगा ॥ ४६ ॥ वालुरेतवाली और पत्थरोंवाली ऐसे नदी दो प्रकारसे हैं और पूर्वोक्त दोनोंके मिलनेसे चार प्रकारकी नदी हैं, ये वात पित्त कफसे संयुक्त हैं ॥ ४७ ॥ अथ सदा बहनेवाली नदीकें गुण दोष । सदावहा वा घनवारिकोष्णा मरुत्कफानां शमनञ्च तस्याः ॥ नीरं वसन्ते हितकृद्विशेषान्नदीभवं नैव हिमागमे च ॥ ४८ ॥ ४