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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

( ५० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- सब कालमें बहनेवाली नदियां भारी पानीवाली होती हैं, कुछ गर्म होती हैं, वायुको और कफको शांत करती हैं; तिन्होंका पानी चैत्र और वैशाख मासमें विशेष करके हितको करता है और जाडेके आगमनमें अच्छा नहीं है ॥ ४८ ॥ अथ पत्थरोंवाली नदीके गुण दोष । घनविमलशिलानां स्फालनाज्जातफेनं बहलसजलवीचीच्छन्न- संक्षोभदत्तम् ॥ ननु लघु सुखशीतं नाति चोष्णं घनञ्च हरति पवनपित्तं श्लेष्मकृद्वारि सम्यक् ॥ ४९ ॥ भारी और विशेषकरके मलोंवाले ऐसे पत्थरोंके संयोगसे झागोंवाला और बहुतसे तरंगोंके क्षोभसे गर्मको प्राप्त हुआ और सुन्दर शीतल और अतिगर्म नहीं और भारी ऐसा पानी वातको और पित्तको अच्छीतरह हरता है और कफको पैदा करता है ॥ ४९ ॥ अथ वालूरेतवाली नदीके पानीके गुण दोष । सघनविमलतोयं सैकतायाः प्रवाहे न च भवति लघुत्वं श्लेष्म- कृद्धन्ति पित्तम् ॥ भवति मधुरमेवं किञ्चिदुष्णं कषायं भवति पवनकारि शोषमूर्च्छा निहन्ति ॥ ५० ॥ वालू रेतके प्रवाहमें यह पानी भारी नहीं है, विशेष करके मलसे रहित नहीं है, हलका भी नहीं है, कफको करता है, पित्तको हरता है, मधुर है कुछ गर्म है, कसैला है, पवनको करता है, शोषको और मूर्च्छाको नाशता है ॥ ५० ॥ अथ उत्तरसे बहनेवाली नदियोंके और पानीके गुण दोष । हिमवत्प्रभवा नद्यःपुण्या देवर्षिसेविताः॥ घनपाषाणसिकतावा- हिन्यो विमलोदकाः ॥ ५१ ॥ हन्ति वातकफं तोयं श्रमशोषवि- नाशनम् ॥ किञ्चित्करोति वा पित्तं त्रिदोषशमनं जलम् ॥ ५२ ॥ मलयप्रभवा नद्यः शीततोयामृतोपमाः ॥ घ्नंति वातञ्च पित्तञ्च शोषभ्रमश्रमापहाः ॥ ५३ ॥ गङ्गा सरस्वती शोणो यमुना सरयू शची ॥ वेणा शरावती नीला उत्तरापूर्ववाहिनी ॥ ५४ ॥ हिम- वत्प्रभवा ह्येता हिमसंभवशीतलाः॥ समाः सर्वगुणैर्नद्यो वात- श्लेष्महरा नृणाम् ॥ ५५ ॥ आसां नवशतैर्युक्ता गङ्गा प्रोक्ता मनीषिभिः ॥ तथा चर्म्मण्वती वेत्रवती पारावती तथा ॥ ५६ ॥ क्षिप्रा महापदी पीता मृत्सकान्या मनस्विनी ॥ शेवती शैवलि-