भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ५१ ) न्यश्च सिन्धुयुक्ताः समुद्रगाः॥५७॥ वातपित्तहरं नीरं त्रिदोषघ्नं मतं परम् ॥ श्रमग्लानिहरं वृष्यमुत्तराशानुगामि च ॥ ५८ ॥ हिमालय पर्वतसे उत्पन्न हुई नदियां पवित्र हैं देवता और मुनियोंसे सेवित हैं मोटें पत्थर और वालरेतको बहानेवाली हैं मलसे रहित पानीवाली हैं, ॥ ५१ ॥ इनका पानी वातको और कफको नाशता है,श्रमको और शोषको दूर करता है अथवा कुछ पित्तको करता है और त्रिदो- षको शांत करता है ॥५२॥ मलय पर्वतसे उपजी नदियाँ शीतपानीवाली हैं अमृतके समानपानी बहती हैं और वात, पित्त, शोष, भ्रम, और श्रमको नाशती है ॥ ५३ ॥ गंगाजी, सरस्वती, शोण,यमुना,सरयू,शची,वेणा,शरावती, नीला ये नदियां उत्तरको और पूर्वको बहती हैं ॥५४॥ हिमालय पर्वतसे उत्पन्न हुई और बर्फके सम्भवसे शीतल हुई ऐसी ये नदी सर्वगुणोंसे समान हैं और मनुष्योंके वातको और कफको हरती हैं ॥ ५५ ॥ इन्होंनेसे नौसौ ९०० नदियोंसे युक्त हुई गंगाजी पंडितोंने कही है तैसेही चर्मण्वती, वेत्रवती, पारावती, ॥ ५६ ॥ क्षिप्रा, महापदी, पीता,मृत्सका, मनस्विनी, शैवती, शैवलिनी,सिंधु ये सब नदी समुद्रमें गमन करती हैं ॥५७॥ इनका पानी वातको और पित्तको हरता है और त्रिदोषको हरनेवाला मानाहै परिश्रमको और ग्लानिको हरता है वीर्य्यमें हित हैऔर उत्तर दिशासे आता है ॥ ५८ ॥ अथ तापीआदिनदियोंके गुण दोष । तापी तापा च गोलोमी गोमती सलिला मही ॥ सरस्वतीयुता नद्यो नर्म्मदा पश्चिमानुगाः ॥ ५९॥ आसां जलं घनं पीतं पित्तघ्नं कफकृत्तथा॥ वातदोषहरं हृद्यं कण्डूकुष्ठविनाशनम्॥६०॥ तापी, तापा, गोलोमी, गोमती,सलिला, मही, सरस्वती,नर्मदा,ये पश्चिमसे बहती हैं॥५९॥ इनका पानी मीठाहै पीनेसे पित्तको नाशकरता है कफको करता है वातदोषको हरता है सुन्दर है खाजको और कुष्ठको नाशता है ॥ ६० ॥ पश्चिमाद्रिसमुद्भूता गौतमी पुण्यभावना ॥अस्या शीतं जलं वापि कफवातविकारकृत्॥पित्तदं शमनं बल्यं मूत्रदोषविकार- कृत् ॥ ६१ ॥ पूर्णा पयस्विनी वेत्रा प्रणीता च वरानना ॥ द्रोणा गोवर्द्धनी यान्या गौतम्यानुगता इमाः ॥ ६२॥ आसां जलं घनं नातिवातश्लेष्मविकारकृत् ॥ पूर्वसामुद्रगाश्चैव नद्यो नवशतैर्युताः ॥ ६३ ॥ कावेरी वीरकांता च भीमा चैव पय- स्विनी ॥ विभावरी विशाला च गोविन्दी मदनस्वसा ॥ पार्वती