हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- चापरा नद्यो दक्षिणादिग्गमा इमाः ॥ ६४ ॥ प्रत्यकशो न सेवेत युक्तायाश्च पृथक् पृथक् ॥ सर्वासां परिसंख्या च शतानां चैक- विंशतिः ॥ ६५ ॥ पश्चिमके पर्वतसे उपजी गौतमी पवित्रहै, इसका पानी शीतलहै, कफ और वातके विकारको करता है, पित्तकारक है, दोषशामक है, बलकारक है, मूत्रदोषके विकारको करता है ॥ ६१ ॥ पूर्ण, पयस्विनी, वेत्रा, प्रणीता, वरानना, द्रोणा, गोवर्द्धनी इत्यादि नदी गौतमी नदीके अनुगमन करती हैं ॥ ६२ ॥ इनका पानी अति भारी नहीं है, वातके और कफके विकारको करता है और पूर्वके समुद्रमें गमन करनेवाली नौसौ ९०० नदियां हैं ॥ ६३ ॥ कावेरी, वीरकांता, भीमा, पयस्विनी, विभावरी, विशाला, गोविंदी, मदनस्वसा, पार्वती इत्यादि नदी दक्षिणदिशाको गमन करती हैं ६४ ॥ एक एक नदीको नहीं सेवे, मिली हुई नदीकासेवन करे क्योंकि सब नदियोंकी २१०० इक्की- ससौ संख्या अर्थात् गिनती ॥ ६५ ॥ क्रोशे क्रोशे भवेत् कुल्या योजने योजने नदी ॥ द्वियोजना च विज्ञेया महानीरा बुधैर्नदी ॥ ६६ ॥ कोश कोश में विस्तारंवाली कुल्या कहाती है और चार चार कोशमें विस्तार वाली नदी कहाती हैं और आठ आठ कोशमें विस्तारवाली महानदी कहाती है ॥ ६६ ॥ ॥ अथ पृथिवीके भागका पानी । भूमिः पञ्चविधा ज्ञेया कृष्णा रक्ता तथा सिता ॥ पीता नीला भवेच्चान्या गुणास्तासां प्रकीर्त्तिताः ॥ ६७ ॥ कृष्णा च मधुरा रूक्षा कषाया पीतवर्णिनी ॥ रक्ता सा च भवेत्तिक्ता मधुरामला- सिता स्मृता ॥ ६८ ॥ नीला सकटुका चैवं भूमिभागजलं विदुः ॥ सघनं मधुरं नीरं कृष्णं भूमिपरिश्रितम् ॥ ६९ ॥ पी- ताश्रितं कषायञ्च रक्तायाः क्षारमाधुरम् ॥ सितायामम्लमधुरं भूमिभागेन लक्षयेत् ॥ ७० ॥ तथा चतुर्विधं तोयं वक्ष्यामि शृणु कोविद् ॥ पापोदकं रोगोदकमंशुदकारोग्योदकौ ॥ ७१ ॥ काली, लाल, सफेद, पीली, नीली, इन भेदोंसे पृथ्वी पांचप्रकारकी है उनके गुण कहते हैं ॥ ६७ ॥ काली पृथ्वी मधुर है, रुखी है, पीली पृथ्वी कसली है, लाल पृथिवी कडुवी है सफेद पृथिवी मधुर और खट्टी है ॥ ६८ ॥ नीली पृथिवी चर्चरी जाननी ऐसेही पृथिवीके भागका पानी कहा है, काली भूमिक जल घना, मीठा, होता है ॥ ६९ ॥ पीली पृथिवीका कसैला पानी है, लाल पृथिवीका पानी खारा और मधुर है, सफेद पृथिवीका