भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

( ३४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- षडृतुओंमें उत्तम दिग्वायु । शिशिरे पूर्वकृद्वायुराग्नेयो हेमन्ते मरुत् । वसन्ते दक्षिणो वायु- र्ग्रीष्मे नैर्ऋत्यकस्तथा ॥ ४३ ॥ वर्षासु पश्चिमो वायुर्वायव्यः शरदि स्मृतः॥हेमन्ते शिशिरे चैव प्रशस्तश्चोत्तरोऽनिलः॥४४॥ शिशिर अर्थात् माघ,फाल्गुनमें पूर्वका वायु अच्छा है, हेमंत अर्थात् मृगशिर, पौषमें आग्नेय- दिशाका वायु अच्छा है,वसंत अर्थात् चैत्र,वैशाखमें दक्षिणका वायु अच्छा है,ग्रीष्म अर्थात् ज्येष्ठ, आषाढ़में नैर्ऋतका वायु अच्छा है॥४३॥वर्षा अर्थात् श्रावण भादुआमें पश्चिमका वायु अच्छा है, शरद् अर्थात् आश्विन,कार्तिकमें वायव्यदिशाका वायु अच्छा है,शिशिर और वसंतऋतुमेंउत्तरका वायु भी अच्छा है ॥४४॥ प्रतिदिनषडृतु । अपराह्ने वर्षा वदन्ति निपुणास्तस्मिन्निशीथे शरत्प्रोक्तः शैशि- रिकस्ततो हिमऋतुः सूर्योदयाद्यतः॥मध्याह्ने च तथा वदन्ति निपुणा ग्रीष्मस्त्वृतुः स्यात्ततो वासन्तो मुनिभिर्ऋतुस्तु कथितो पूर्वापराह्ने सदा ॥ ४५ ॥ निपुण जन दिनके तृतीय प्रहरमें वर्षा कहते हैं अर्थात् वह समय वर्षाकालके जैसा सुहावन होता है अर्द्धरात्रिमें शरत् कहा गया है यानी वह समय शरत्कासा समय समझ पड़ता है। आधी रातके अनन्तर शिशिर ऋतु होता है अर्थात् उस समय कुछ शीत सदा लगता है । सूर्योदयसे कुछ पहिले हेमंत ऋतु होता है तब भी कुछ शीत रहता ही है वही निपुण जन दोपहरके समय ग्रीष्मकाल कहते हैं क्योंकि दोपहरमें सदा गर्मी जान पड़ती है। मुनियोंका कहना है कि दिनके पूर्व और परभागमें वसन्त होता है वास्तवमें वह समय वसन्तऋतुहीकी शोभा धारण करता है ॥४५॥ अथ सविष वायु । कार्त्तिके मार्गशीर्षे वा माघे चाषाढसंज्ञके ॥ ऋतुसन्धौ च हेमन्ते सविषः स्यात्तु मारुतः ॥ ४६ ॥ कार्त्तिक, मार्गशीर्ष, माघ और अषाढ़में और छः ऋतुओंके सन्धिमें तथा हेमंत ऋतुमें वायु सविष होता है ॥ ४६ ॥ स यस्मिन्नगरे देशे ग्रामे वाऽनगरेऽपि वा ॥ संस्पृशेदुलबणो वायुर्गोमनुष्येभवाजिनाम्॥४७॥ तिलकं गोषु जानीयाद्यक्ष्माणं मानुषेषु च ॥ गजेषु पावकं विद्याद्धयानां वेद्य उच्यते ॥४८॥ जिस नगरमें जिस देशमें अथवा जिस गाममें दारुणरूप बिगड़ा हुआ वायु जब गाय, मनुष्य, हस्ती, घोडा इनको छूता है ॥ ४७ ॥ तब गायोंमें तिलक नाम रोग उपजता है, १ अपराह्ने वर्षा इति छन्दोभंगे नत्वार्षत्वे न दोषः अन्यत्रापि यत्र यत्र छन्दोभंगो दृश्यते तत्र तत्र सर्वत्रार्षो ज्ञेयः ।