हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 71, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९ ) षड्रसके गुणदोषवर्णन । क्षारः कषायः पवनप्रकोपी कफप्रकोपी मधुरोऽथ तिक्तः ॥ कट्वम्लकौ पित्तविकारिणौ च कट्वम्लकौ वातशमौ प्रदिष्टौ ॥ ३ ॥ पित्तस्य नाशी मधुरः सतिक्तः कटूकषायौ शमनौ कफस्य ॥ अन्योन्यमेतच्छमनं वदंति परस्परं दोषविवृद्धिमन्तः ॥ ४ ॥ खारा और कसैला रस वायुको कोपता है, मधुर और कडुआ रस कफको कोपता है, चर्चरा और खट्टा रस पित्तके विकारको करता है, और कटु तथा खट्टा रस वातको शांत करता है ॥ ३॥ मधुर और कडुआ रस पित्तको नाशता है, चर्चरा और कसैला रस कफको शांत करता है यही एक दूसरेके दोषको शमन करता है और परस्पर मिलकर दोषको बढ़ाते हैं ॥ ४ ॥ अथ रसगुणोंके गुणकर । मधुरकटुकावन्योन्यस्य प्रकर्षविधायिनौ लवणवियुतोऽम्लीकः प्रोक्तो विशेषरसानुगः ॥ अविकृतस्तथा तिक्तैर्युक्तः कषायरसो लघुर्भवति सुतरां स्वादुः श्रेष्ठो गुणं प्रकरोति वै ॥ ५ ॥ मधुर और चर्चरा रस आपसके प्रकर्षको करते हैं । नमकसे विशेष करके युक्त हुआ खट्टा रस विशेष रसके पश्चात् गमन करता है, विकारको नहीं प्राप्त होता और कडुआ रससे युक्त हुआ ऐसा कसैला रस हलका होता है और अच्छीतरह स्वादु रस सेवित किया जावे तो गुणको करता है ॥ ५ ॥ वातादिविरुद्धरस । कटुतिक्तकषायाश्च कोपयंति समीरणम् ॥ कट्वम्ललवणाः पित्तं स्वाद्वम्ललवणाः कफम् ॥ ६ ॥ चर्चरा, कडुआ, कसैला ये रस वायुको कोपते हैं, चर्चरा, खट्टा, नमकीन रस पित्तको कोपते हैं. मधुर, खट्टा, सलोना ये रस कफको कोपते हैं ॥ ६ ॥ दोषोंके विरोधी रसोंका वर्णन । समीरणे तु नो देयाः कटुतिक्तकषायकाः ॥ पित्ते कट्वम्ललवणाः स्वाद्वम्ललवणाः कफे ॥ ७ ॥ चर्चरा, कडुआ, कसैला रस वायुमें नहीं देने चाहिये । चर्चरा, खट्टा, सलोना रस पित्तमें नहीं देने चाहिये । मधुर, खट्टा, सलोना, रस कफमें नहीं देने चाहिये ॥ ७ ॥