हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४०) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- वातादिकोंमें रसयोजना । स्वाद्वम्ललवणान्वाते तिक्तस्वादुकषायकान् ॥ पित्ते कफे तिक्तकटुकषायान्योजयेद्रसान् ॥ ८ ॥ मधुराम्लौ क्षारकटुकौ तिक्तकषायकौ चैत्येतान्योन्यरसविरोधिनौ न भवेताम् । वायुमें मधुर, खट्टा, सलोना रस युक्त करे, पित्तमें कडुआ, मीठा, कसैला रस युक्त करे, कफमें कडुआ, चरपरा, कसैला रस युक्त करे ॥ ८ ॥ मधुर रस और खट्टा रस अविरोधी हैं । खारा और चर्चरा रस अविरोधी हैं, कडुआ और कसैला रस अविरोधी हैं ॥ अथ मधुर रसका वर्णन । यः स्वादुर्भमशोषहारिबलकृद्वीर्य्यप्रदः पुष्टिदः प्रह्लादं रसने करोति तदनु श्लेष्मप्रवृद्धिं ततः॥ पित्तानां दमनः श्रमोपशमनो वृष्यो नराणां हितः क्षीणानां क्षतपाण्डुनेत्ररुजसंहर्त्ता भवेन्म- धुरः॥ ९ ॥ जो स्वादु हो श्रम और शोषका हरता हो, बलको करता हो, वीर्य्यको देनेवाल हो,पुष्टिको देता हो, खानेके समय आनन्द देता हो, पीछे कफकी वृद्धिको करता हो, पित्तको हरता हो, परिश्रमको शांत करता हो, मनुष्योंको पुष्ट करता हो, क्षीण मनुष्योंका कल्याण करनेवला हो, और घाव पाण्डुरोगनेत्ररोगोंको हरता हो वह मधुर रस है ॥ ९ ॥ अथ कडुआरसका वर्णन । यस्तिक्तः कफवायुसंहतिकरः कुष्ठादिदोषापहः शान्तः सर्वरु- जापहो श्रमहरो रुच्यो न संक्लेदनः॥जिह्वास्फोटकनाशनोऽथ भवति क्षीणक्षतानां हितो वक्त्रोल्लासकरः प्रकृष्टकथितो निम्बादिकास्वादकृत् ॥ १० ॥ कडुआ रस कफवायुका संहार करता है, कुष्ठादि दोषको नाशता है, शांतस्वरूप है, सब रोगोंको हरता है, भ्रमको हरता है, रुचिकर है, गीलापन नहीं लाता, और जीभकी फुन्सि- योंको नाशता है, क्षीण और घाववालोंको हित है, मुखमें आनन्दको करता है और नींब आदिके स्वादको करता है ॥ १० ॥ अथ चरपरे रसका वर्णन । नेत्रं स्रावयते मुखं विदहते कर्णस्य तापं वहन्बीभत्सं तनुते मुखं विकुरुते पित्तासृजः कोपनम् ॥ अग्नीनध्युषते क्षतं विदहते जीर्णों न शस्तो भवेद्वातान्नाशयते कफस्य कटुको रौद्रो महान्दाहकः १ न जाने कुत्रत्योऽयं विचारः सत्योऽपि महर्षिकथनसरणिं नावति प्रतीयते प्रक्षिप्तः ।