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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४१ ) चर्चरा रस नेत्रसे आंसू गिराता है, मुखको विशेष करके दग्ध करता है, कानोंमें जलन पैदा करता है, भयानकरूप मुखको करता है, पित्तको और रक्तको कुपित करता है, जठराग्नि- को जगाता है, घावको जलाता है, और पुराना चर्चरा रस श्रेष्ठ नहीं होता है, वायुको नाशता है, कफको दग्ध करता है और अति दारुणरूप है ॥ ११ ॥ अथ खट्टे रसका वर्णन । जिह्वाक्लेदं जनयति तथा नेत्रनिम्मीलनं च बीभत्सं वा जनयति सदा वातरोगापहारी॥ कण्डूकुष्ठक्षतरुजकरो नो हितः शोफिनः स्यादम्लः प्रोक्तो मरुतशमनोऽस्रप्रकोपं तनोति ॥ १२ ॥ खट्टा रस जीभमें पानी लाता है, नेत्रोंको मीचता है, सब कालमें भयानकपनेको उपजाता है, वातके रोगको हारता है, खाज कुष्ठ, घाव रोग उपजाता है, शोजावालेको हित नहीं है, वायु- को शांत करता है, रक्तके कोपको विस्तृत करता है, ऐसा तिक्त रस कहा गया है ॥ १२ ॥ अथ कसैले रसका वर्णन । जिह्वां कण्ठं ग्रसति नितरां ग्राहकश्चातिसारे श्लेष्मव्याधेरुप- शमकरः श्वासकासापहर्त्ता ॥ हिक्कां शूलं हरति नितरां शोधनः स्याद्व्रणानां प्रोक्तश्चायं समधिकगुणः श्रेष्ठकषायनामा ॥१३॥ कसैला रस जीभको और कंठको ग्रसता है, अतीसारको बंद करता है, कफकी व्याधिको शांत करता है, श्वास और खाँसीको नाशता है, हिचकीको और शूलको हरता है और घावोंको निरंतर शोधता है, यह रस अधिक गुणोंवाला कहा है ॥ १३ ॥ अथ खारारसके वीर्य्यका वर्णन । क्षारः क्लेदं जनयति मुखेऽस्वादुरुष्णो विदाही शूलश्लेष्मारुचि हर्तृषामूत्रकृच्छोषणश्च॥आमाहारं जनयति पुनर्वाह्निसन्धुक्षणः स्याच्छ्रेष्ठः प्रोक्तः स हि रसमहान्सर्वतो योग्यभूतः ॥ १४ ॥ इति षड्रसवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ खारा रस मुखमें ग्लानि उपजाता है, स्वादु नहीं है, गर्म है, विशेष करके दाहको करता है, और शूल, कफ, अरुचि, तृषा, मूत्र इन्होंको करता है, शोषनेवाला है, बारंबार अफाराको उपजाता हैं, जठराग्निको जगाता है, सब जगह योग्य नहीं है कहीं कहीं अच्छा भी है ॥१४॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने षड्रसवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥