भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

( ३६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- तथा कोद्रवश्चान्नं श्यामाक एतैः कृतं चौदनं वा यवागूश्चृतं वा ॥ कलिङ्गानि वास्तूकाचिल्लीकपूती पलाण्डुस्तथा गृञ्जनं कन्दशा- कम् ॥ ५६ ॥ इमान्सेवितादत्यर्थमेति प्रकोपं समीरस्य चोक्तः सुरासम्भवस्तु ॥ ततो यत्नतो रक्षणीयं मनुष्यैः शुभं चेहसे त्वं सदा रोगशान्तिम् ॥ ५७ ॥ अधोवात--मूत्र--विष्ठा--के रोकनेसे कसैले और शीतल पदार्थको सेवनेसे और रात्रिमें जागनेसे, मैथुनके करनेसे, नित्यप्रति श्रम करनेसे, अति भोजनको खानेसे और मार्गमें अति चलनेसे, ज्यादे बोलनेसे, अति भयसे ॥ ५२ ॥ रूखे पदार्थसे और अत्यंत नमकीन कडुआ, चर्चरा, खानेसे, डोला अर्थात् पीनस-घोडा, ऊंट, रथ, गधा, हस्ती और ऊंचे मकानमें चढनेसे उपवाससे रहनेसे वायुका प्रकोप होता है ॥ ५३ ॥ बहुत शीतल दिनमें मेघआदिसे आच्छादित हुए दुर्दिनमें दोपहरके पीछे स्नान करनेसे तथा रात्रिमें जागकर जल पीनेसे और वर्षाऋतुमें दिनमें वायु कोपको प्राप्त होता है और सेवित किया वायु कियेहुए भोजनको जराता है ॥ ५४ ॥ मसूर, मटर, मोठ, चौला, जुवार, जब, मोटेचावल, कृष्णअन्न, शीतल अन्न, कांगनी, नीवार धान्य, लाल अन्न, तूरीअन्न ॥ ५५ ॥ कोदूअन्न, शामकका भात या मांड, इन्द्रजव, बथुवा, चाकवत अर्थात् बथुवा विशेष, प्याज, गाजर, कंद शाक ॥ ५६ ॥ इनके जादे सेवनेसे वायुका प्रकोप होता है । इसलिये यदि तुम शुभ और रोगकी शान्ति सदा चाहते हो तो मनुष्योंको इनसे सदा बचाना ॥ ५७ ॥ अथ पित्तप्रकोपकानिदान । तथात्युष्णकट्वम्लरूक्षैर्विदाहैः ससीधूसुरासेवनेनोपवासैः ॥ सुधर्मेण क्रोधेन वा स्वेदनेन व्यवायेन वा याति कोपञ्च पित्तम् ॥ ५८ ॥ कुलित्थाढकीयूषमूलाकशिश्रुशठीसर्षपाराजिकाशा- कमेव ॥ निशाजागरेणापि युद्धे श्रमे वा घनान्ते शरत्सु प्रकोपः प्रदिष्टः॥५९॥सदम्लेन वाप्युष्णकाले शरत्सु भृशं वासरे मध्यमे वा निशीथे ॥ सुजीर्णे रसे भुक्तमात्रे प्रकोपः प्रदिष्टो विदैः कोविदैः पैत्तिकः स्यात् ॥ ६० ॥ अतिगर्म, चर्चरा, खट्टा, रूखा, और विदाही, सीधू तथा मदिराके, सेवनेसे, गर्मीसे, क्रोधसे पसीना निकालने और भोग करनेसे पित्त कोपको प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥ कुलथी १ 'यवागूरूष्णिका श्राणा विलेपी तरला च सा' इत्यमरः । यवागू षड्गुणजले सिद्धा स्यात् कृष्णा घना। "तण्डुलैमुद्गमाषैश्च तिलैर्वा साधिता हिता । यवागूर्ग्राहिणी बल्या तर्पणी वातनाशिनी ॥ शांङ्गधरे।