हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( ३७ ) अरहरका यूष, मूली, सहिंजना, कचूर, सरसों और राईका शाक अथवा इन्होंसे संयुक्त शाक खानेसे और वर्षाऋतुमें रात्रिके जागने, युद्ध करने, परिश्रम करनेसे शरद्ऋतुमें पित्त कोपको प्राप्त होता है ॥ ५९ ॥ अति खट्टे पदार्थसे, गरम समयमें, अतिशय करके दिनके मध्यभागमें, अर्ध रात्रिमें, भोजनका रस जीर्ण होते समय और खानेहीके समय विद्वान् वैद्योंने पित्तका प्रकोप बताया है ॥ ६० ॥ अथ कफप्रकोपका निदान । निशाजागरे वासरे वातिनिद्रा सुशीतोदसंसेवने शीतले वा ॥ पयःपानपीयूषमिक्षुस्तिलैस्तु तथा गृञ्जनैः कन्दशाकैरथापि ॥ ६१ ॥ सदा सेवितैर्वास्तुकैश्चाण्डमत्स्यैर्दधिं पिच्छिलैर्माषमद्यै- र्गुरुभिः॥अतिस्निग्धसंसेवनैर्भोजनेषु प्रदिष्टः कफस्य प्रकोपो वसन्ते ॥ ६२ ॥ दिनान्ते प्रभाते निशान्ते नरस्य प्रकोपः प्रदि- ष्टोऽपि भुक्ते न जीर्णे॥प्रदिष्टो बुधैः कोविदैरेव रोगःकफस्योपप- त्ति च जानीहि कष्टाम् ॥ ६३ ॥ सशीतेऽथवा शीतकाले निशान्ते नरस्य प्रकोपः प्रदिष्टोऽपि भुक्तेः॥ न जीर्णे प्रदिष्टो बुधै रोगवेगो निदानं कफस्येति चोक्तं सुधीभिः ॥ ६४ ॥ रात्रिमें जागनेसे और दिनमें अति शयन करनेसे और सुन्दर शीतल पानीको तथा शीतल देशको सेवनेसे,नवीन ब्याई गायका दूध, ईख, तिल, गाजर, कन्दशाकके सेवनेसे ॥ ६१ ॥ बकराके अण्डे तथा मछलीको सदा सेवनेसे और दही,लव्सादार पदार्थ, उडद, मदिरा, भारी पदार्थ, अतिचिकने पदार्थ सेवनेसे वसन्तमें दुष्ट हुए कफका कोप होता है ॥ ६२ ॥ दिनके अन्तमें, प्रभातमें, रात्रिके अन्तमें, भोजनके न पकनेसे कफका कोप होता है इसे विद्वान् वैद्य रोग ही कहते हैं इस भांति कफकी उत्पत्ति कष्ट करनेवाली जानो ॥ ६३ ॥ शीतल देशमें, शीतल समयमें, रात्रिके अन्तमें,भोजनको नहीं जीर्ण होनेमें, मनुष्यके कफका प्रकोप बुद्धिमानोंने कहा है ॥ ६४ ॥ अथ दो दोषोंके कोपकी उत्पत्ति । ऋतौ विपर्य्यासगते यदा च प्रकोपनं यस्य यथा प्रदिष्टम् ॥ तत्सेवमानस्य नरस्य रोगः स्याद्वन्द्वजो नाम विकारकारी ॥ ६५ ॥ यस्मिन्नृतौ वातविकोप उक्तस्तस्मिन्यदि श्लेष्मवि- कोपनानि ॥ संसेवते वा मनुजस्तदास्य भवेत्प्रकोपःकफवात- १ अत्र छन्दोभङ्गः ।