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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( १३ ) तरो भवेत्॥१५॥तथा दोषस्य शेषे तु शमनं याति चाल्पशः॥ दैवाद्यदुष्टतां याति यथाग्निः कुपितो भृशम् ॥ १६ ॥ जब साध्य रोग हो तब वात आदि दोषके शेषको नहीं धारण करना क्योंकि दोषके बाकी रहनेमें कष्ट हो जाता है इसलिये दोषका नाश कर दे ॥ १४॥ जैसे काल दुष्ट होता है जैसे अग्निका सूक्ष्म किनका बढ़ जाता है तैसे क्रियाको नहीं प्राप्त हुआ स्वल्प भी रोग अतिघोर हो जाता है ॥ १५ ॥ दोषके शेषमें अतिअल्परोग शांत हो जाता है परंतु दैवयोगसे यदि फिर दूषित होजाता है तो दवे अग्नि ही के समान कुपित होता है ॥ १६ ॥ अपथ्यसे हानि । यथा काष्ठचय दूरात् प्राप्य घोरतरोऽग्निकः ॥ तथा पथ्यस्य संयोगाद्भवद्धोरतरो गदः ॥ १७ ॥ कषायैश्च फलैश्चूर्णैः पिण्डलेहानुवासनैः ॥ सर्वाः क्रिया भृशं व्यर्था न शमं याति चामयः ॥ १८ ॥ जैसे काष्ठके समूहमें दूरसे प्राप्त हुआ अग्नि भयंकर होजाता है तैसे अपथ्यके संयोगसे रोग भी अतिघोर हो जाता है ॥ १७ ॥ काढा, फल, चूरन, गोली, चटनी, अनुवासन बस्तिकर्म इनकी सब क्रियायें व्यर्थ होजाती और रोग शांत नहीं होता है ॥ १८ ॥ एवं ज्ञात्वा सदा वैद्यै रोगशान्तिककारणम् ॥ कर्त्तव्यमतियोगेन येन रोगः प्रशाम्यति ॥ १९ ॥ ऐसा जानकर सब कालमें वैद्योंको रोगशांति करनेवाली क्रिया अतियोगसे अर्थात् पूर्वोक्त- क्रिया विशेष करके करनी चाहिये जिससे रोग शांत हो जावे १९ ॥ लंघनकी योग्यता । ज्ञात्वा दोषबलं धीमल्लँघनानि समाचरेत् ॥ दोषे सति न दोषाय लंघनानि बहून्यपि ॥ २० ॥ वैद्य दोषके बलको समझकर लंघन कराये । क्योंकि दोष रहनेपर बहुत भी लंघन कोई उपद्रव नहीं करते ॥ २० ॥ जठराग्निका कर्म । पचेत्प्रथममाहारं दोषानाहारसंक्षये ॥ दोषक्षयेऽनलो धातून्प्राणान्धातुक्षये सति ॥ २१ ॥

( १४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- जठराग्नि प्रथम भोजनको पकाता है और भोजनके नाश होनेमें वात आदि दोषोंको पकाता है और दोषोंके क्षय होनेमें धातुओंको पकाता है और धातुओंके क्षय होनेमें प्राणोंको पकाता है अर्थात् नाश करता है ॥ २१ ॥ सामनिराम-व्याधिकाउपक्रम । ज्ञात्वा बलाबलं व्याधेः सामं निराममेव च ॥ तदा सामे पाचनं स्यान्निरामे पथ्यसंक्रमः ॥ २२ ॥ रोगके बल और अबल, साम तथा निरामरूप रोगको जानकर पीछे साम अर्थात् आमसे संयुक्त हुए रोगमें लंघन करावे और निराम अर्थात् आमसे रहित हुए रोगमें पथ्य दिलावे ॥ २२ ॥ वैद्यकी योग्यता । सामं निराममथ संसुखसाध्यमेवं सम्यग्रुजश्च परिलक्ष्य रुजो विनाशम् ॥ एतद्भवेत्सकलवैद्यकशास्त्रसारो नैवायुषश्च बलदा- नकरो हि वैद्यः ॥ २३ ॥ दोषयुक्त, निर्दोष, इसके अनन्तर सुखसाध्य इस तरह रोग और रोगकी नाशिनी चिकित्साको देखकर कर्म करे, यही समस्त वैद्यकशास्त्रका तत्त्व है । आयुके बलको देनेवाला वैद्य नहीं ॥ २३ ॥ नो वैद्यो मनुजस्य सौख्यमथवा दुःखञ्च दातुं क्षमो जन्तोः कर्म- विपाक एव भुवने सौख्याय दुःखाय च ॥ तस्मान्मानवदुःखका- रणरुजां नाशस्य चात्र क्षमो वैद्यो बुद्धिनिधानधाम चतुरो नाम्नैव वैद्योऽपरः ॥ २४॥ सम्यग्रुजां परिज्ञानं ज्ञात्वा दोषवि- निग्रहम्॥ प्रत्याख्येयं च यः साध्यं जानाति स भवेद्भिषक् ॥ २५॥ मनुष्यको सुख अथवा दुःख देनेको वैद्य समर्थ नहीं है किंतु संसारमें सुख और दुःखको देनेवाला जीवोंके कर्मोंका विपाक है इस कारण मनुष्यको दुःख करनेवाले रोगोंके नाशनेके लिये वैद्य समर्थ है और वैद्य बुद्धिभांडारका घर है, चतुर है और इससे विपरीत जो दूसरा वैद्य हो वह नामसे ही वैद्य है ॥ २४ ॥ जो रोगोंको अच्छी तरह जानकर और दोषोंके निग्रहको समझ कर साध्य और असाध्य रोगीको जानता है उसे वैद्य कहते हैं ॥ २५ ॥ पुण्यार्थउपचार करनेयोग्य मनुष्य । तपस्वी च ब्राह्मणश्च स्त्रियो वा बालकस्तथा॥ दीनो वा दुर्बलो वापि प्राज्ञो वा पण्डितस्तथा ॥२६॥ महात्मा श्रोत्रियः साधु-

अ० ३.] भाषाटीकासमेता । ( १५ ) रनाथो बन्धुवर्जितः ॥ एतानव्याधिविनिग्रस्तान्प्रतिकुर्याद्वि- शेषतः ॥ २७ ॥ तपस्वी, ब्राह्मण, स्त्री, बालक, दीन, दुर्बल, बुद्धिमान्, पंडित ॥ २६ ॥ महात्मा, वेदपाठी, साधु, अनाथ और बंधुओंसे रहित इतने रोगियोंकी दवा विशेष करके करे ॥ २७ ॥ उपचारसे धन लेने योग्य मनुष्य । राजा च सुधनी चैव मण्डलीको बलाधिपः ॥ उपचार्य्योऽर्थसिद्धिः स्याद्वित्तं ग्राह्यं भयं न च॥ २८ ॥ राजा, धनवाला, साहूकार, छोटा राजा, ठाकुर, सेनाका स्वामी इन्होंकी चिकित्सा करे, जब वे अच्छे होजावें तब उनसे निर्भय होकर धन लेना चाहिये ॥ २८ ॥ यश मिलने योग्य मनुष्य । मध्यमा वणिजां पत्तिः पुरोधा ब्राह्मणादयः ॥ भट्टो वा गणका- ग्रण्यश्चिकित्स्यास्तु विशेषतः ॥ रोगग्रस्तेषु चैतेषु चिकित्सा कीर्तिकारिणी ॥ २९ ॥ इनसे नीचे बनियोंका व्यापार करनेवाले, पुरोहित, ब्राह्मणादिक, वेदज्ञ वा भाट, ज्योतिषी इनकी चिकित्सा ध्यानसे करें क्योंकि इन रोगियोंकी दवा करनेसे कीर्ति प्राप्त होती है॥२९॥ चिकित्सा करनेके अयोग्य मनुष्य । व्याधश्चोरस्तथा म्लेच्छो वह्निदो मत्स्यबन्धकः॥ ३० ॥ बहुद्वेषो ग्रामकूटो बन्धकी मांसविक्रयी॥ एतेषां व्याधिग्रस्तानां नैव कुर्यात्प्रतिक्रियाम् ॥ ३१ ॥ एतेभ्यः स्वार्थसिद्धिनोप- कारो हितमङ्गलम् ॥ तेषां जीवातसंजातो वैद्यो भवति दोषभाक् ॥ ३२ ॥ और कसाई, चोर, म्लेच्छ अग्नि लगानेवाला, मछलियोंको बींधनेवाला ॥ ३० ॥ बहुतोंका बैरी, ग्राममें चुगली करनेवाला, व्यभिचारिणी, मांसको बेचनेवाला इनके यदि रोग उत्पन्न हो तो वैद्य चिकित्सा नहीं करे ॥ ३१ ॥ क्योंकि इनसे स्वार्थकी सिद्धि नहीं है, न उपकार है और कल्याण भी नहीं है और मंगल भी नहीं है, इन्हें जीवदान देनेसे वैद्य दोषका भागी हो जाता है ॥ ३२ ॥ एवं ज्ञात्वा तु सद्द्यैद्यः कुर्यादथ प्रतिक्रियाम् ॥ धर्मार्थकामसम्पत्तिः कीर्तिर्लोके प्रवर्त्तते ॥ ३३ ॥ १ 'बन्धक्यसती कुलटेत्वरी' इत्यमरः ।

ऐसे जानके पीछे कुशल वैद्य चिकित्साको करे, चिकित्सासे धर्म, अर्थ, और कामकी प्राप्ति और लोकमें कीर्त्ति प्रवृत्त होती है ॥ ३३ ॥ वैद्य-कर्त्तव्यका उपसंहार । इति बहुविधियुक्तो वैद्यविद्याविचारः क्षणमपि हृदये यो धारणं संकरोति ॥ स भवति गदसंघस्याथ विध्वंसशक्तो विमलवि- दितकीर्तिः पूज्यमानो नरैन्द्रैः ॥ ३४ ॥ इति आत्रेयभाषित हारीतोत्तरे वैद्यशिक्षाविधानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ ऐसे बहुतसी विधिसे युक्त और वैद्यकविद्याको विचारनेवाला जो वैद्य एक क्षणभर भी अपने हृदयमें यह धारणा करता है, वह वैद्य रोगके समूहको नाशनेमें समर्थ, स्वच्छ तथा विख्यात कीर्तिवाला और राजा लोगोंसे पूज्यमान होता है ॥ ३४ ॥ इति बेरीनिवा- सिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रि-अनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने वैद्यशिक्षा- विधानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः ४. अथ देशकालबलाबल । इदानीं संप्रवक्ष्यामि देशकालबलाबलम् ॥ सात्म्यं प्रकृतिदेहश्च तथाग्नीनां विशेषणम् ॥ १ ॥ अब देश, काल, बल, अबल, सात्म्य, प्रकृति, देह, अग्नियोंकी विशेषता कहूँगा ॥ १ ॥ देश भेदाः । देशस्तु त्रिविधो ज्ञेयो ह्यनूपो जाङ्गलस्तथा ॥ साधारणो विशेषेण ज्ञातव्यास्ते मनीषिभिः ॥ २ ॥ और इस तरह देश तीन प्रकारके जानने चाहिये । अनूप, जाङ्गल, और साधारण। वे विद्वानों- को विशेषकरके जानने चाहिये ॥ २ ॥ अथ अनूपदेशलक्षण । बहुतरशुभनद्यश्चारुपानीयपुष्टाः सरससरउपेता शाद्वलासार- भूमिः ॥ हरितकुशजलानां शालिकेदाररम्य दिनकरकरदीप्तिं वाञ्छते यत्र लोकः ॥ ३ ॥ गुरुमधुररसाढ्या भाति चेक्षुः सदार्द्रा १ 'धारासंपात आसारः' इत्यमरः ।

अं० ५ । भाषाटीकासमेता । (: १७ ) विविधजनितवर्णाः 'शालिगो धूमयूषाः ॥ मधुररसविमुक्त्या मानवानां प्रकोपी भवति कफसमीरः स्यात्तदानूपदेशः ॥ ४ ॥ अथ अनूपदेशलक्षण-सुन्दर पानीसे पुष्टहुई बहुतसी सुन्दर नदियां, जलभरे तालाब, हरी दूब, झरनोंसे व्याप्त हुई पृथिवी जहां हो, हरिकुशा तथा पानीसे व्याप्त हुए जो चावलोंके खेतोंसे रमणीक और जहां सूर्य्यकी किरणोंकी संसार इच्छा करता है ॥ ३ ॥ और जहां भारी और मधुर रससे संयुक्त और सब कालमें गीली ऐसी ईख होती हैं और जहां अनेक वर्णोंवाले चावल, गेहूँ और यूष ।म दालका पानी या दो तरहके पात्र उपजते हैं और जहां मधुर रसको खानेसे मनुष्योंके वात और कफका कोप होता है वह अनूपदेश है ॥ ४ ॥ अथ जांगलदेशलक्षण । खरपरुषविशालाः पर्वताः कण्टकीर्णा दिशि दिशि मृगतृष्णा भूरुहाः शीर्णपर्णाः ॥अतिखररविरश्मीपांशुसम्पूर्णभूमिः सरसि रसविहीना कूपकाम्भःप्रकर्षः ॥५॥ तदनु विरससस्याहारिणो गोमहिष्यः प्रभवति रसमांसे रूक्षभावश्च सम्यक् ॥ पुनरपि हिम- वाहं शालिशस्यं न चेक्षुर्भवति रुधिरपित्तं कोपमाशु ह्युपैति ॥६॥ अथ जांगलदेशलक्षण-तीक्ष्ण, कठोर, बडे और कांटोंसे व्याप्त जहां पर्वत हैं, प्रति- दिशामें जहां मृगतृष्णा होती है, जहां विना पत्तोंके वृक्ष हैं, अति तेज सूर्यकी किरणोंके समान जल जलाती धूलवाली जहां सम्पूर्ण भूमि है, जो भूमि तालाबसे रससे हीन है, और जहां केवल कुयेंके जलसे काम निकलता है ॥ ५ ॥ और जहां विनारसका धान्य खानेवाले गाय- और भैंस हैं और जहां रस और मांसमें रूखापन उपजता है, और शीतलवायु, चावलकी खेती, ईख ये नहीं उपजते हैं और जहां रक्त और पित्त शीघ्र कोपको प्राप्त होता है उसको जांगलदेश कहते हैं ॥ ६ ॥ अथ साधारणदेशलक्षण । उभयगुणशतं वा नातिरूक्षं न स्निग्धं न च खरबहुलं चेच्चाभितः कण्टकाढ्यम् ॥ भवति च जलकीर्णं नातिशीतं न चोष्णं सम- प्रकृतिसमेतं विद्धि साधारणं च ॥ ७ ॥ अथ साधारणदेश लक्षण-जहां अनूपदेशके और जांगलदेशके बहुतसे लक्षण अर्थात गुण हों और जहां न अति रूखापन हो और न चिकनापन है और जहां तेजकी बहुलता नहीं '१ यूषं चमसांचे कसौ' इत्यमरः । 'चमसचिकसौ पात्रभेदौ' इति महेश्वरः, यूषं मंड इति वैद्यो यथा सुद्रामलकयूषस्तु ग्राही पित्तकफे हितः' । ३ 'क्षिप्तक्षुद्रामीप्सितपृथुपीवरवहुल प्रकर्षार्थाः' इत्यमरसिंहः । ६ ३

( १८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- हो और जो सब ओरसे कांटोंसे व्याप्त न हो रहा हो और जहां साधारण पानी हो और न अति शीत अर्थात् जाडा हो और न अति गर्मी हो और समानप्रकृतिसे संयुक्त हो तिसको साधारण देश कहते हैं ॥ ७ ॥ अथ कालज्ञान । कालस्तु त्रिविधो ज्ञेयोऽतीतोऽनागत एव च ॥ वर्त्तमानस्तृतीयस्तु वक्ष्यामि शृणु लक्षणम् ॥८ ॥ अथ कालज्ञान-काल तीन प्रकारका है, अतीत अर्थात् बीता हुआ, अनागत अर्थात् आनेवाला, वर्त्तमान अर्थात् वर्तता हुआ इन्होंने लक्षण कहताहूँ तुम सुनो ॥ ८ ॥ कालका स्वरूप । कालःकालयते लोकं कालःकालयते जगत् ॥ कालःकालयते विश्वं तेन कालो विधीयते ॥९॥ कालस्य वशगाःसर्वे देवार्षि- सिद्धकिन्नराः ॥ कालो हि भगवान्देवः स साक्षात्परमेश्वरः ॥१०॥ सर्गपालनसंहर्त्ता स कालःसर्वतः समः॥ कालेन काल्यते विश्व तेन कालो विधीयते ॥ ११ ॥ काल लोककी संख्या करता है, काल जगत्की संख्या करता है, काल विश्वकी संख्या करता है, इससे काल कहाता है ॥ ९ ॥ सब देव, ऋषि, सिद्ध, किन्नर, ये सब कालके वशमें हैं और भगवान् देव साक्षात् परमेश्वर ऐसा काल ही है ॥ १० ॥ सृष्टि, स्थिति, संहार, इन्होंने करनेवाला और सब जगहसे समान ऐसा काल ही है, कालसे विश्व संख्याको प्राप्त होता है इससे काल कहाता है ॥ ११ ॥ उत्पादक-कालका स्वरूप । येनोत्पत्तिश्च जायेत येन वै कल्पते कला ॥ सत्त्ववांस्तु भवेत्कालो जगदुत्पत्तिकारकः ॥ १२ ॥ जिससे प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है, जिससे कलायें कल्पित होती हैं और जो बलवान् है, जगत्को अर्थात् पञ्चमहाभूतादिको जो बनाता है वही काल है ॥ १२ ॥ प्रवर्त्तक-कालका स्वरूप । यः कर्माणि प्रपश्येत प्रकर्षं वर्त्तमानके ॥ सोऽपि प्रवर्त्तको ज्ञेयः कालः स्यात्प्रतिकाल्कः ॥ १३ ॥ जो वर्तमानके कर्मोंको देखता है और उनके अनुकूल आगेके लिये भविष्यत् के निर्माण करता है, एक दूसरेके बाद आनेवाला वह काल प्रवर्त्तक काल कहलाता है ॥ १३ ॥

अ०४ ] भाषाटीकासमेता । (१९) संहार-कालका स्वरूप । येन मृत्युवशं याति कृतं येन लयं व्रजेत् ॥ संहर्त्ता सोऽपि विज्ञेयः कालः स्यात्कलनापरः ॥ १४ ॥ जिस काल करके जीव मृत्युके वशको प्राप्त होता है और जिस करके कृत अर्थात् किया हुआ कार्य लयको प्राप्त होता है वही काल संहार करनेवाला जानना, यही काल ग्रास करनेवाला है ॥ १४ ॥ कालका सनातनत्व । कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ॥ कालः स्वपिति जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥ १५ ॥ काल ही जीवोंको रचता है, काल ही प्रजाको हरता है, काल ही शयन करता है, काल ही जागता है, क्योंकि काल दुरतिक्रम है अर्थात् उल्लंघन नहीं किया जाता ॥ १५ ॥ कालका नाशकस्वरूप । काले देवा विनश्यन्ति काले चासुरपन्नगाः ॥ नरेन्द्राः सर्वजीवाश्च काले सर्वं विनश्यति ॥ १६ ॥ काल अर्थात् समयमें देवता नष्ट हो जाते हैं और कालमें ही दैत्य और सर्प नष्ट होते हैं राजा ही क्यों सब जीव कालमें ही नष्ट होते हैं, कालमें संपूर्ण नष्ट होता है ॥ १६ ॥ अथ अन्यकालोंके स्वरूप । त्रिकालात्परतो ज्ञेय आगन्तुर्गतचेष्टकः ॥ सूक्ष्मोऽपि सर्वगः सर्वैर्व्यक्ताव्यक्ततरः शुभः ॥ १७ ॥ तथा वर्षाहिमोष्णाख्या- स्त्रयः काला इमे मताः॥ तथा त्रयोऽन्येऽपि ज्ञेया उदयमध्या- स्तमेव च ॥ १८ ॥ आगंतुक किन्तु चेष्टासे रहित, सूक्ष्म होनेपर भी सर्वगत, सबसे अतिव्यक्त होकर भी अत्यंत अव्यक्त और शुभ ऐसा काल त्रिकालसे परे जानना चाहिये ॥ १७ ॥ वर्षा, शीत, गर्मी ये तीन काल माने गये हैं और उदय, मध्य, अस्त ऐसे तीन अन्य भी काल जानने ॥ १८ ॥ अथ ऋतुचर्या । वर्षा शरच्च हेमन्तः शिशिरश्च वसन्तकः ॥ ग्रीष्मोऽतिक्रमतो ज्ञेय एवं षडृतवः स्मृताः ॥ १९ ॥ पृथक्पृथक् प्रवक्ष्यामि

(२०) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- रवेर्गतिविशेषणैः ॥ प्रकोपं शमनं ज्ञात्वा अयने द्वे स्मृते बुधैः ॥ २० ॥ दक्षिणायनमेकं स्याद्द्वितीयं चोत्तरायणम् ॥ अथ ऋतुचर्या-वर्षा, शरद्, हेमंत, शिशिर, वसंत और ग्रीष्म एक दूसरेके बाद आने- वाले क्रमसे छः ऋतु कहे हैं ॥ १९ ॥ इन ऋतुओंको पृथक् पृथक् कहूंगा । सूर्यकी गतिके विशेषसे प्रकोप और शमनको जान पंडितोंने दो अयन कहे हैं ॥ २० ॥ एक दक्षिणायन होता है दूसरा उत्तरायण होता है ॥ अयनोंका वर्णन । वर्षा शरच्च हेमन्तो दक्षिणायनमध्यगाः ॥ २१ ॥ शिशिरश्च वसन्तश्च ग्रीष्मः स्यादुत्तरायणे ॥ वर्षा, शरद्, हेमंत ये तीन ऋतु दक्षिणायनमें होते हैं ॥ २१ ॥ शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, ये तीन ऋतु उत्तरायणमें होते हैं ॥ दक्षिणायनका लक्षण । याम्ये गतिर्यदा भानोस्तदा चान्द्रगुणा मही ॥ २२ ॥ वारि शीतलसम्भूतं शीतं तत्र प्रजायते ॥ बलिनो मधुरास्तिक्ताः कषायास्तु विशेषतः ॥२३॥ जीवानां सात्म्यमतुलमोषधीनां च वीर्यता ॥ आर्द्रत्वं भूधराणाञ्च दिशश्चाप्यतिशीतलाः २४॥ सक्लेदा पृथिवी सर्वा तस्मादार्द्रा सफेनिला।कथं चिकित्सयेत् पित्तं कोपं याति विलीयते ॥ २५ ॥ तस्मादृतुविपर्य्यासाद्रु- पचारेण शाम्यति ॥ जब सूर्यकी गति दक्षिणमें होती है तब चंद्रमाके गुणोंवाली पृथिवी हो जाती है ॥२२॥ और शीतल पानी हो जाता है और शीत पडने लगता है और मधुर तिक्त कसैला ये रस विशेष करके बलवाले हो जाते हैं ॥ २३ ॥ और ओषधी अर्थात् अन्न आदिकोंकी तथा जीवोंकी प्रकृति बहुत ही अच्छी रहती है और पर्वत भी गीले होजाते हैं और दिशाभी अति शीतल हो जाती हैं ॥ २४ ॥ क्लेदभावसहित संपूर्ण पृथिवी हो जाती है और इसी कारणसे गीली और झागोंवाली पृथिवी होजाती है इसमें कभी पित्त कोपको प्राप्त हो जाता है और लीन होजाता है २५ ॥ इस कारणसे कि विपर्य्यास करके चिकित्सासे पित्त शांत होता है ॥

अ० ४] भाषाटीकासमेता । (२१) उत्तरायणका लक्षण । यदोदीच्यां गतिर्भानोस्तदा सूर्यो जलाधिपः ॥ २६ ॥ तस्मादुष्णगुणास्तीव्राः सम्भवन्ति विदाहिनः ॥ खरसूर्यां- शुजालैस्तु शुष्यते वनकाननम् ॥२७॥ संशुष्का मेदिनी सर्वा दिशः पानादनीरसाः॥बलिनोऽम्लकषटुक्षाराः सम्भवन्ति विदा- हिनः ॥ २८ ॥ तस्मात्संंकुप्यते पित्तं रक्तेन सह मूच्छितम् ॥ संशुष्क ओषधिरसो गोजातीनां पयांसि च ॥ २९ ॥ अल्पं बलं च जन्तूनां कथञ्चित्कफसम्भवः ॥ दृश्यते च वसन्ते च स्वयमेव शमं व्रजेत्॥३०॥ एवं ज्ञात्वा सुधीः सम्यक्कुर्यात्सर्व- प्रतिक्रियाम् ॥ ३१ ॥ जब उत्तर दिशामें सूर्य्यकी गति होती है तब सूर्य्य जलोंका स्वामी हो जाता है ॥ २६ ॥ इसलिये उष्णगुणवाले तीव्र और विदाही पदार्थ होते हैं ॥ २७ ॥ और संपूर्ण पृथिवी सूख जाती है और जल आदिसे रहित सब दिशा हो जाती हैं और खट्टा, चर्चरा, खारा ये रस बलवाले और विशेष करके दाहको करनेवाले होते हैं ॥ २८ ॥ उससे रक्तके साथ मूच्छित हुआ पित्त कुपित होता है और ओषधियोंका रस और गाय आदिका दूध सूख जाता है ॥ २९ ॥ और जीवोंमें अल्प बल उपजता है और कदाचित् कफकी भी उत्पत्ति होजाती है और वहां कफकी उत्पत्ति वसंत ऋतु अर्थात् चैत्र वैशाखमें दीखती है और आप ही शांत हो जाती है ॥ ३० ॥ ऐसे अच्छी तरह वैद्य जानके सब रोगोंकी चिकित्साको करे ॥ ३१ ॥ अथ वर्षर्तुका लक्षण । सघनवारिद्वारिसमाकुला अखिलवत्प्रवरोदकपूरिताः॥समद्- वातकरा विदिशो दिशः प्रमुदितक्रिमिकीटभृता मही ॥३२॥ नीलसस्यहरितोज्ज्वला मही कुल्यका सलिलसंप्लुता नवा ॥ इन्द्रगोपकविराजिता वरा पङ्कभूषणविभूषिता धरा ॥ ३३ ॥ उद्भिन्नचूताङ्कुरभूधरः स्याद्वेजे वनं वा मधुरं व्यकूजन् ॥ भृङ्ग मयूरा जलदस्य घोषं सर्वेऽपि जीवा बलमाप्नुवन्ति॥३४॥केकी कूजति कानने च सरसी म्लानाम्बुपूर्णा तथा हंसा मानसमात्र- जन्ति कमलान्यम्म्लानतां यान्ति च॥गर्जन्मेघमहेन्द्रकन्दर-

( ३२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- दरी सस्यावृता श्यामला भात्येवं पवनस्य कोपनकरी वर्षा- ऋतुः श्रेयसी ॥३५॥ किञ्चिद्भौर्भोद्भवानि स्युः सस्यानां दृढता- गमः॥ बहुसस्या भवेद्धात्री वारिपूर्णा शरन्मुहुः ॥३६॥ नद्यः पूर्णाम्भसोत्खातशीर्णपातास्तटद्रुमाः ॥ कुल्याप्रस्रवणानां तु स्रवत्यम्भो दिशो दिशः॥३७॥बहूदकधरा मेघा बहुवृक्षा घन- स्वनाः॥एवंगुणसमायुक्ता वर्षा स्यादृतुकोविदैः ॥३८॥ तस्मा- द्वातकफः कोऽपि जायते च नृणां भृशम्॥इति ज्ञात्वा भिषक्श्रेष्ठः कुर्यात्तस्यां प्रतिक्रियाम् ॥३९॥ स्वेदनं मर्दनं पथ्यं निर्वात- सेवनं तथा ॥ गौराशामारतं शस्तं व्यायामक्रमविक्रमः ॥४०॥ कट्वम्लक्षारसुरसाः सेव्या वातकफापहाः ॥ निरूहबस्तिकर्मात्र कफवातरुजापहम् ॥ ४१ ॥ अथ ऋतुलक्षण-प्रथम वर्षाऋतुका लक्षण और उपचार-मोटे बादल और पानीसे अच्छी तरह आकुल, संपूर्ण तरहसे सुंदर पानी करके पूरित, मदसहित वायुको करनेवाली सब विदिशा और दिशा होवें और आनंदित हुए कीडोंको धारण करने वाली पृथिवी होवे ॥ ३२ ॥ और नीलीकी खेती और दूब घाससे प्रकाशित पृथिवी होवे, पानीसे मग्न हुए और नये हुए छोटी नदीके किनारे होवे, इंद्रगोप अर्थात् तीज नामवाले कीडोंकी पंक्तियोंसे शोभित और पंक अर्थात् कीचडरूपी गहनोंसे विभूषित ऐसी पृथिवी हो जावे ॥३३॥ऊपरको निकल आयेहुए आमके अंकुरोंवाले पर्वत हो जावे और वन प्रकाशित हो जावें और भौरै तथा मोर मधुर शब्दको करें और बादलोंका शब्द हो और सब जीव बलवंत प्राप्त हो जावें ॥ ३४ ॥ वनमें मोर बोलें और सरोवर पक्षियोंकारके रहित तथा पानीसे पूरित हो जावे और हंस मानस सरोवरमें आके प्राप्त होजावे और कमल म्लानपनेको प्राप्त होजावे गर्जता हुआ मेघ और महेंद्र करके फटीहुई कंदरावाली और खेतीसे आवृत्त और श्यामरूपवाली ऐसी पृथिवी प्रकाशित होजावे ऐसी वर्षाऋतु श्रेष्ठ होती है यह वायुको कोपित करती है ॥३५॥और खेतियोंके कल्लुक गाभा तथा दृढपना उपजे और बहुतसी खेतीसे संयुक्त और पानीसे पूर्ण ऐसी पृथिवी होवे और वारंवार शरदऋतुके भी कल्लुक लक्षण मिलें ॥३६ ॥ और नदीमें नहीं पूरित हुए पानीसे उखाडे हुए और गिरेहुए पत्तोंवाले ऐसे तटके वृक्ष होवें और नाली झरनोंके द्वारा दिशा दिशामें पानीको झिरावे ॥ ३७ ॥ और बहुत पानीको धारनेवाले और बहुतसे शब्दको करनेवाले ऐसे मेघ होजावें और बहुतसे वृक्ष उपजें ऐसे

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( २३ ) गुणोंसे संयुक्त वर्षाऋतु होती है ऐसा ऋतुओंको जाननेवालोंने कहा है ॥ ३८ ॥ इस ऋतुमें मनुष्योंको अतिशय वात, कफका कोप होता है ऐसे कुशल वैद्य जानके उस कोपकी चिकित्सा करें ॥ ३९ ॥ स्वेदन अर्थात् पसीनोंका लाना, मर्दन अर्थात् शरीरको दाबना और वातको नहीं सेवना, गौर वर्णकी स्त्रीसे रति करना, कसरत करना ये सब वात कफके कोपमें श्रेष्ठ पथ्य हैं ॥ ४० ॥ चर्रचरा, खट्टा, खारा ये रस सेवतसे वात कफको नाशते हैं निरूह और बस्तिकर्म्म, कफ और वातकी पीड़ाको नाशते हैं ॥ ४१ ॥ अथ शरदृतुका लक्षण । मेघाः सूर्य्यशिला समानरुचयो ह्यल्पस्रवालपस्वना हंसालीजल- जालिमण्डितजलं पद्माकरं शोभनम्॥ तीव्रस्निग्धमयूखचन्द्रवि- मला सानन्दिनी कौमुदी चित्रा घर्माविपक्वतोयसुरसास्यान्निर्मलं पुष्करम् ॥ ४२ ॥ तत्र शीतलगतं वयोगतं जातपित्तरुधिरस्य योग्यताम् ॥ पथ्यमत्र च नरस्य शीतलं दृश्यते कथमपि त्रयो- द्भवम् ॥ ४३ ॥ शृतं क्षीरं सितापथ्यं चन्द्रिकासेवनं निशि ॥ श्यमारामारतं शस्तं प्रभाते निर्मलं दधि ॥४४॥ कामिन्यालि- ङ्गनानन्दश्रान्तः शीतसरोरुहैः ॥ चंदनादीनि सेवेत दृष्टं शरदि कोपनम् ॥ एवं प्रशमनं दृष्टं शरत्पित्तप्रकोपने ॥ ४५ ॥ अथ शरदृतुका लक्षण और उपचार-सूर्य्य और शिलाके समान रुचिवाले और अल्प झरनेवाले और अल्पशब्दको करनेवाले ऐसे मेघ हो जावें और हंसोंकी पंक्ति तथा कमलोंकी पंक्ति उसकरके मंडित जलवाला और शोभित कमलोंका स्थान हो जावे और तीव्र तथा स्निग्धरूपी किरणोंवाले चंद्रमासे स्वच्छ और आनंदवाली और चित्ररूपवाली और घामसे पके हुए पानीसे सुरसरूप ऐसी चांदनी हो और मलसे रहित पानी होवे ॥ ४२ ॥ ऐसी शरदऋतुमें आकाशका पानी और पित्तरक्तके योग्य पदार्थ और शीतल पदार्थ ये सब पथ्य हैं इस ऋतुमें सन्निपातका कोप कदाचित् होता है ॥ ४३ ॥ घृत, दुध, मिश्री, रात्रिमें चांदकी चांदनीको सेवना, श्यामरंगकी बाला स्त्रीसे भोग, प्रभातमें निर्मल दही ये सब शरद्ऋ- तुमें पथ्य हैं॥ ४४ ॥ स्त्रीके आलिंगनसे प्राप्त हुए आनंदसे श्रांत हुए पुरुष कमलोंकरके अपने श्रम दूर करें, और शरद्ऋतुमें पित्तका प्रकोप होनेसे चंदनादिकोंका लेप करे यह कमलधारण और चंदनानुलेपन शरद्ऋतुमें पित्तके प्रकोपका शमनकारी है ऐसा देखा है ॥ ४५ ॥

(२४) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- अथ हेमन्तवर्णन। बहुशीतःसमीरोऽल्पश्चाल्पवासरता ऋतौ॥अल्पतेजा दिवानाथो धूमाक्रांता च दिग्भवेत् ॥ ४६ ॥ विस्तीर्णशालिकेदारा नील- धान्योज्ज्वला मही ॥ एवं गुणसमायुक्ता हैमन्ती स्म भवेद्दतुः ॥४७॥ तत्र वातकफा दोषा दृश्यंते कुपिता भृशम् ॥ अग्निसंसे- वनंपथ्यंकटुक्षाराम्लसेवनम् ॥४८॥ गौरांगामारतं शस्तं व्याया- मश्च प्रशस्यते ॥ एवं संशाम्यंति दोषाः कफवातसमुद्भवाः ॥ ॥४९॥ बलिनः शीतसंरोधा हेमन्ते प्रबलोऽनिलः ॥ भवत्यल्पे- न्धनो धातून्स पचेद्वायुनेरितः ॥ ५० ॥ अतो हिमेऽस्मिन्सेवेत स्वाद्वम्ललवणान्रसान्॥दीर्घा निशा भवेत्तर्हि प्रातरेव बुभुक्षितः॥ ॥ ५१ ॥ भवत्यकार्य्यं संभाव्य यथोक्तं शीलयेदनु ॥ ५२ ॥ अर्कन्यग्रोधखदिरकरंजककुभादिकम् ॥ प्रातर्भुक्त्वा च मधुरक- षायकटुतिक्तकम् ॥ ५३ ॥ अथ हेमंतऋतुका लक्षण और उपचार-बहुत शीत वायु अल्प चले और दिनका समय थोड़ा हो जावे और अल्प तेजवाला सूर्य रहे और धूमसे आकुलित हुई दिशा होवे॥४६॥ और विस्तारको प्राप्त हुए चावलोंके खेत होवें और नील तथा अन्नसे प्रकाशित पृथिवी होवे ऐसे गुणोंसे संयुक्त हेमंतऋतु होता है ॥ ४७ ॥ इस ऋतुमें अतिशयसे कुपित हुए वात और कफ दीखते हैं, इसमें अग्नि सेवना और चर्रचरा, खारा, खट्टा, इन्होंको सेवना पथ्य है ॥ ४८ ॥ गौरवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना और कसरत करना श्रेष्ठ है, इस तरहसे कफ वातसे उपजा दोष शांत होता है ॥ ४९ ॥ बलवाले मनुष्यके शीतको रोकनेसे हेमंतऋतुमें वायु प्रबल हो जाताहै, पीछे वायुसे प्रेरित किया यही वायु अल्प आहार आदिवाला होके धातुओंको पकाता है ॥ ५० ॥ इसलिये शीतकालमें स्वादु, खट्टा, सलोना ऐसा रस सेवे और हेमंतऋतुमें बडी रात्रियोंके होनेसे प्रभातमें ही भोजन करनेकी इच्छावाला मनुष्य हो जाता है ॥ ५१ ॥ इसवास्ते अकार्यकी संभावना करके यथोक्त द्रव्यका अभ्यास करे ॥ ५२ ॥ आक, बड़, खैर, करंजुआ, अर्जुनवृक्ष इन आदिको प्रभातमें साधन करके पीछे मधुर, कसैला, चर्रचरा, कडुुआ इन रसोंको सेवे ॥ ५३ ॥

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । (२५) अथ शिशिरवर्णन । बहुलशिशिरवातः किञ्चिदुद्भूतसस्या भवति वसुमतीयं पक्वस- स्यैस्तु पीता॥कथमपि तु हिमं स्याल्लिङ्गवैशेषिकं वा पवनक- फविकारो जायते शैशिर वा॥ ५४॥गौरारामास्तमतिशयेनारु- णान्यम्बराणि सेव्यं तिक्तं कटुकलवणं प्रायशो ह्यम्लमेव॥स्वे- दोन्मर्दं प्रतिदिनमिदंकारयेद्यत्र सम्यग् नाशं यातोऽनिलकफ- गदौ क्वास्ति तेषां प्रकोपः ॥ ५५ ॥ अथ शिशिरऋतुका लक्षण और उपचार-बहुत शीतल वायु चले, पृथ्वीपर कछुक धान्य उत्पन्न हो, और पकी हुई खेतीसे पीली पृथिवी हो, और इनमें जाड़ा पड़े कभी अधिक चिह्नकी विशेषता हो उसको शिशिर ऋतु कहते हैं इसमें वात और कफके विकार उपजते हैं ॥ ५४ ॥ और इस ऋतुमें गौरवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना और अतिशय करके लाल रंगके वस्त्रोंको पहनना और कडुआ, चरचरा,सलोना ये रस सेवने चाहिये और विशेष करके खट्टा रस सेवना चाहिये और इस ऋतुमें पसीनोंको लाना और मर्दन करना नित्यप्रति अच्छी- तरह करना चाहिये ऐसा करनेसे वात और कफके रोग नाशको प्राप्त हो जाते हैं और उनके प्रकोपकी कौन कथा है ? ॥ ५५ ॥ अथ वसंतऋतुका वर्णन। मुदितकोकिलकूजितकाननं मदनसूचितकिंशुकशोभितम् ॥ कुसुमसौरभरञ्जितभूधरं क्वणितमत्तमधुव्रतलालसम्॥५६॥मक- रकेतनबाणसमाकुलं मुदितमेव समस्तमिदं जगत् ॥ मलय- मारुत उष्णगुणान्वितः कफकरो हि वसन्तऋतुर्भवेत् ॥५७॥ कफजकोपविनाशनलालनं वमननावनरूक्षनिषेवणम्॥५८ ॥ विविधः सुरतानन्दः सम्भ्रमः कफवारणः॥व्यायामश्रमसंरोध- खिन्नविश्रान्तमानसः ॥५९॥ कटुक्षाराम्लाः सेव्याश्च शोषणं कफसम्भवम्॥एवं क्रियासमापन्नो नरः शीघ्रं सुखी भवेत् ॥६०॥ अथ वसंतऋतुका लक्षण और उपचार-जहां आनंदित हुए कोयल पक्षी वनमें बोलें कामदेवको सूचित करते हुए टेसूके फूलोंसे शोभा हो फूलोंके गंधसे रंजित पर्वत हो और जहां खेलते हुए और मदवाले भौरोंकी शोभा हो ॥ ५६ ॥ और कामदेवके बाणसे समाकुल और आनंदित जगत् होवे तिसको वसंतऋतु कहते हैं । यह सुन्दर वायुसे

( २६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- और उष्ण गुणसे अन्वित हुआ वसंतऋतु होता है यह कफको उपजाता है ॥ ५७ ॥ इस ऋतुमें वमन, नस्य, रूखा पदार्थ इनका सेवन कफके कोपको नाशता है ॥ ५८ ॥ अनेक प्रकारसे कामदेवका आनन्द और अच्छी तरह चलना, फिरना कफको दूर करता है और इस ऋतुमें कसरतके परिश्रमको करनेसे स्वेदित और श्रांत मनवाला मनुष्य सुखी रहता है ॥ ५९ ॥ और चर्चरा, खारा, खट्टा ये रस सेवने चाहिये ये कफको शोषते हैं ऐसी क्रियाको प्राप्त हुआ मनुष्य शीघ्र सुखी हो जाता है ॥ ६० ॥ अथ ग्रीष्मवर्णन । दीर्घवास रसस्तीक्ष्णं ज्वालामालाकुलं जगत्॥दिशि दिशि मृग- तृष्णाचोष्णं भृशं भवेद्रजः॥६१॥नैर्ऋतोमारुतो रूक्षःशीर्णपर्णा महीरुहः॥ दग्धतृणाकुलारण्यं दावाग्निसङ्कुला दिशः ॥६२॥ एवं तु लक्ष्म ग्रीष्मस्य पित्तरक्तमुदीर्यते ॥ तस्मात् क्रियाप्रती- कारं कुर्य्यात् संशमनं भिषक् ॥६३॥ जलक्रीडा दिवा निद्रासे- वनं सुखसाधनम् ॥ श्यामारामारतं शस्तं किञ्चल्कं कुञ्जशीत- लम् ॥ ६४ ॥ नीलनालदलोपेतः श्रमघ्नो व्यजनानिलः ॥ केत- क्यामोदकुसुमं चन्दनोशीरशीतलैः ॥ ६५ ॥ लेपनं शीतलं सम्यग्धारागाराशयः पुनः ॥ एवं क्रियासमापन्नो ग्रीष्मे च सुख- सङ्गमः॥ ६६॥ इति आत्रेयभाषिते ऋतुचर्यानाम चतुर्थो- ऽध्यायः ॥४॥ अथ ग्रीष्मऋतुका लक्षण और उपचार-बड़े दिन होवें और तीक्ष्ण होवें और गरमीके समूहसे जगत् व्याकुल हो जावे और दिशा दिशामें मृगतृष्णा होवे और अतिगर्मी और धूली उड़े॥ ६१॥ नैर्ऋतदिशाका रूखा वायु चले, वृक्षोंके पत्ते उडजावें, दग्धहुए तृणोंके समूहसे व्याप्त वन होवे, और दावाग्निसे संकुलित दिशा होजावें ॥ ६२ ॥ उसको ग्रीष्मऋतु कहते हैं, इसमें पित्त और रक्त बढ़ता है इसलिये वैद्य रक्तपित्तको शमन करनेवाली क्रियाको करे ॥ ६३ ॥ इस ऋतुमें जलकी क्रीडा, दिनमें शयन, श्यामवर्णवाली स्त्रीसे भोग करना, और कछुक शीतल वस्तुको सेवना ये पथ्य हैं ॥ ६४ ॥ नीले कमलके पत्तोंसे संयुक्त हुए पंखेकी पवन ग्रीष्मके परिश्रमको हरता है और केतकीके खिले हुए फूल, सफेद चंदन, खस, शीतल चीजों करके ॥ ६५ ॥ अच्छी तरह लेप करना और फूहाराके स्थानमें बसना ऐसे क्रियाको प्राप्त हुआ मनुष्य ग्रीष्मऋतुमें सुखी रहता है ॥ ६६॥ इति वेरीनिवासिसुधशिवसहायसूनुवैद्यरवि- त्तशास्त्रि-अनुवादित-हारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने ऋतुचर्यानाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥

अ० ५ ] भाषाटीकासमेता । ( २७ ) पञ्चमोऽध्यायः । इसके बाद वयो ज्ञानका कथन । वयश्चतुर्विधं प्रोक्तमुत्तमाधममध्यमम् ॥ हीनं चातुर्थिकं प्रोक्तं तानि वक्ष्यामि साम्प्रतम् ॥ १ ॥ बालं युवानं वृद्धं च मध्यमं च तथैव च॥चतुर्विधं वयः सम्यक् तत्समासेन वक्ष्यते ॥२॥ इसके अनंतर वय अर्थात् अवस्थाके ज्ञानको कहेंगे-अवस्था चार प्रकारकी कही है । उत्तम, अधम,मध्यम, और हीन । अब उन्हें कहता हूं ॥१॥ बालक,जवान,वृद्ध और मध्यम ऐसी चार प्रकारकी अवस्था हैं उसको विस्तारसे कहता हूँ ॥ २ ॥ मध्यमवयोलक्षण । पथि श्रान्तं श्रमक्षीणं बालस्त्रीसुकुमारकम् ॥ एतेषां मध्यमा संज्ञा प्रोच्यते वैद्यकागमे ॥ ३ ॥ रस्तेमें श्रांत हुआ, श्रमसे क्षीण हुआ, बालक, स्त्री और सुकुमार अर्थात् कोमल मनुष्य इनकी वैद्यकशास्त्रमें मध्यम संज्ञा कही है ॥ ३ ॥ आपोडशाद्भवेद्बालः पञ्चविंशो युवा नरः॥ मध्यमं सप्ततिर्या- वत्परतो वृद्ध उच्यते ॥४॥ तथा च सुकुमाराश्चेत्येते मध्यमसं- ज्ञकाः॥वयसः षोडशाधिक्यं समयश्च भवेत्तु यः॥५॥आविं- शति समाः प्राप्तो यथा च कृशदेहवान्॥पूर्ण वयः स्त्रियःप्राप्ता मध्यमे चाधमं वयः ॥ ६ ॥ सोलह वर्षतक बालक अवस्था, पचीस वर्षतक जवान अवस्था, सत्तर वर्षतक मध्य अवस्था होती है, इससे परे वृद्ध अवस्था है ॥ ४ ॥ मध्यमसंज्ञकोंमें सुकुमार अर्थात् कोमल, सोल- हवर्षसे ऊपर २० वर्षतक दुर्बल शरीरवाले, और पूर्ण अवस्थाको प्राप्त हुई स्त्री ये मध्यम अव- स्थामें भी अधम वय. कहाते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ पञ्चविंशत्समादूर्ध्वमापञ्चाशद्गतः पुमान् ॥ कर्मकठोरा वनिता दृश्यते चोत्तमं वयः ॥७॥ सप्तविंशत्समादूर्ध्वं पञ्चाशत्संयुताः समाः ॥ बालवृद्धिस्तथा यस्य इत्येतदुत्तमं वयः ॥ ८ ॥

( २६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- पचीस वर्षसे लेकर पचास वर्षतक पुरुषत्व बना रहता है और इतने ही में स्त्री भी क्रियामें कठोर रहती है इसलिये यह उत्तम आयु देखी जाती है । सत्ताईस वर्षसे लेकर पचास वर्ष तक जिसके लड़के हों यह उत्तम वय है ॥ ७ ॥ ८ ॥ स्थूलोऽतिदीर्घकठिनस्तथा स्त्री बृहदौदरा ॥ इत्युत्तमोऽवयववाञ्ज्ञातव्यश्चोत्तमोत्तमः ॥ ९ ॥ जो स्थूल,अतिलंबा और कठोर, ऐसा पुरुष हो और बड़े पेटवाली स्त्री हो तो समझना यह उत्तम शरीरवाला और उत्तमोत्तम मनुष्य है॥ ९ ॥ षष्ट्यूर्ध्वमशीतिसमाः प्राप्तं हीनबलं वयः ॥ तदूर्द्धं हीनहीनश्च विज्ञेयो वयसः क्रमः॥ १० ॥ साठ वर्षसे उपरांत अस्सी वर्षतक हीनबल अवस्था होती है और अस्सीवर्षसे उपरांत हीनसे भी हीन अवस्था होती है ऐसे अवस्थाका क्रम जानना चाहिये ॥ १० ॥ क्षीणोऽध्वश्रान्तसंखिन्नस्तथा रोगानुपीडितः॥ रूक्षश्चातिकृशो ज्ञेयो बालसात्म्यमुदाहृतम् ॥११॥ क्षीण मार्गमें थकनेसे खेदको प्राप्त और रोगसे पीडित, रूखा अति कृश मनुष्य बालककी प्रकृतिके समान प्रकृतिवाले होते हैं ॥ ११ ॥ सुकुमारोऽतिभीरुश्च मध्यकायस्त्रियोऽपि वा ॥ मध्यसात्म्योऽपि विज्ञेयो मध्यमो वयसात्म्यकः ॥१२॥ कोमल शरीरवाला, अति डरनेवाला, मध्यम शरीरवाला, स्त्री-मध्य प्रकृतिवाला ऐसा मनुष्य मध्य अवस्थाकी प्रकृतिवाला जानना ॥ १२ ॥ पञ्चवर्षा स्मृता बाला मुग्धा च षट्समावधिम् ॥ द्वादशाब्दं स्मृता बाला मुग्धा स्यात्सप्तमावधिम् ॥ १३ ॥ प्रौढा च नव- वर्षाणिप्रगल्भा चत्रयोदश॥चतुर्विंशद्वर्षादूर्द्धं सप्तत्रिंशतिमध्य- गाः ॥ पूर्ण वयः स्त्रियः प्राप्ता इत्येतदुत्तमं वयः ॥ १४ ॥ पांच वर्षकी स्त्री बालक कहाती है, पांचसे आगे छः वर्षतककी स्त्री मुग्धा कहाती है, बारह वर्षकी स्त्री बाला कहाती है और बारह वर्षके आगे सात वर्षतक स्त्री मुग्धा कहाती है ॥१३॥ तिसके पीछे नव वर्षतक स्त्री प्रौढा कहाती है और तिसके पीछे तेरह वर्षतककी स्त्री प्रगल्भा कहाती है. और इतने वयके बीचमें ही चौबीस वर्षसे उपरांत सैंतीस वर्षतक मध्य अवस्थाकी स्त्री पूर्ण अवस्थाको प्राप्त होती है.यह उन्होंकी उत्तम अवस्था है ॥ १४ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( २९ ) अथ प्रकृतिका ज्ञान । मध्यसात्म्यश्च स्थूलः स्याद्बलवान्सत्त्ववान्नरः ॥ सचांऽप्युत्तमसात्म्यः स्याद्बलवत्समुपाचरेत् ॥ १५ ॥ मध्यप्रकृतिवाला नर स्थूल और बलवान होता है। उत्तमप्रकृतिवाला पुरुष सत्त्वगुणसे युक्त बलवान् होता है॥ १५ ॥ अथ वातादिप्रकृतिका ज्ञान । अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रकृतिज्ञानमुत्तमम् ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥ १६ ॥ इसके बाद वात, पित्त, कफ और सन्निपातकी प्रकृतिका ज्ञान कहूँगा ॥ १६ ॥ अथ वातप्रकृतिका लक्षण । यः कृष्णवर्णश्चपलोऽतिसूक्ष्मः केशालपरूक्षो बलवान्क्षमः स्यात्॥ सूक्ष्मातिदन्तो नखवृद्धिमेति दीर्घस्वनश्चक्रमणक्षमो- ऽसौ ॥ १७॥ दीर्घाक्रमो लोलुपहीन सत्त्वस्तथैव चाम्लीरसभो- जनेच्छुः ॥ संस्वेदनेनातिविमर्दनेन सौख्यं समागच्छति वातलो नरः ॥ १८ ॥ अथ वातकी प्रकृतिका लक्षण-जो मनुष्य कृष्णवर्ण, चपल व अतिकृश शरीर, अल्पबाल, रूखा, बलवाला, समर्थ, अतिसूक्ष्म दंतोंवाला, नखोंकी वृद्धिको प्राप्त होवे तथा बडा और लंबा बोलनेवाला, चलने फिरनेमें समर्थ ॥ १७ ॥ बहुत कूदनेवाला, लोभी, सत्त्वसे वर्जित, खट्टे रसको खानेकी इच्छावाला और अच्छी तरह पसीना देनेसे तथा मर्दन करनेसे सुखको प्राप्त होता हो वह वातकी प्रकृतिवाला हो ॥ १८ ॥ अथ पित्तप्रकृतिका लक्षण । गौरातिपिङ्गः सुकुमारमूर्त्तिः प्रीतः सुशीते मधुपिंगनेत्रः ॥ तीक्ष्णोऽपि कोडपिं क्षणभङ्गुरश्च त्रासी मृदुगात्रमलोमकं स्यात्॥१९॥ लौल्यप्रियस्तिक्तरसानुभोगी द्वेषी च तीक्ष्णश्च नवोष्णसेवी ॥ स्तुतिप्रियो दन्तविशुद्धवर्णो जातः स पित्त- प्रकृतिर्मनुष्यः ॥ २० ॥

( ३० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ पित्तकी प्रकृतिका लक्षण-जो गौरी वर्णके समान पीतवर्णवाला हो, सुकुमार मूर्तिवाला हो, शीतल पदार्थमें प्रीति रखता हो, मधुसरीखे तथा पिंगवर्णके नेत्रोंवाला हो, तेज स्वभाव वाला हो और कोई क्षण भर में ही स्वभावसे गिर जाने वाला हो, उद्वेगसे संयुक्त हो, कोमल हो, कम केशवाला हो ॥ १९ ॥ और चंचलपनेमें प्रियता करनेवाला हो, कडुआ रसको खानेवाला हो, वैर करनेवाला हो, तेजसे संयुक्त हो, नवीन और गरम वस्तुको सेवनेवाला हो, अपनी स्तुतिको चाहनेवाला हो, दांतोंसे विशेष करके शुद्धवर्णवाला हो, ऐसा मनुष्य पित्तकी प्रकृतिवाला होता है ॥ २० ॥ अथ कफप्रकृतिका लक्षण । सुस्निग्धवर्णःसितनेत्रवृत्तः श्यामः सुकेशो नखदीर्घरोमा॥गम्भी- शब्दःश्रुतिशास्त्रनिद्रातन्द्राप्रियस्तिक्तकटूष्णभोजी ॥२१ ॥ स मांसलःस्निग्धरसप्रियश्चसगीतवाद्योऽतिसहिष्णुशीलः॥व्या- यामशीलो रतिलालसोऽसौ भवेत्कफस्य प्रकृतिर्मनुष्यः॥२२॥ अथ कफकी प्रकृतिका लक्षण-सुन्दर चिकने वर्णवाला हो और सफेद नेत्रोंवाला हो, वृत्त हो, श्यामवर्णवाला हो, सुंदर बालोंवाला हो, लंबे नख और रोमोंसे संयुक्त हो, गंभीर बोल- नेवाला हो, और वेद, शास्त्र, नींद, तंद्रा, इन्होंमें प्यार करनेवाला हो, कडुआ और गर्म भोजनकरनेवाला हो ॥ २१ ॥ मोटा हो स्निग्धरसको चाहनेवाला हो, गीत और बाजेको पसंद करनेवाला हो, अतिसहनेमें शीलस्वभाववाला हो, कसरतको करनेवाला हो, विषयभोगमें इच्छा- वाला हो, ऐसा मनुष्य कफकी प्रकृतिवाला होता है ॥ २२ ॥ अथ समप्रकृतिका लक्षण । संमिश्रवर्णोऽतिसुदीप्तगात्रो गम्भीरधीरोऽतिविदीर्णरोमा॥रामा- प्रियो भारसहोऽतिमिश्रो भोगेन युक्तः समता प्रकृत्या ॥ २३॥ कई प्रकारसे मिले हुए वर्णवाला हो, अतिसुन्दर प्रकाशित अंगोंवाला, गंभीर पनेमें धीर, अति विदारित हुए रोमोंवाला, स्त्रीसे प्यार करनेवाला, भार अर्थात् बोझेको सहनेवाला और सब लक्ष- णोंसे अति मिला हुआ, और भोगके भोगनेवाला ऐसा मनुष्य समप्रकृतिवाला होता है ॥ २३ ॥ अथ दिशाभेदसे वातके गुणदोष । ( पूर्वदिशाका वायु ) अथागतं वच्मि मरुत्प्रवाहं पूर्वोत्तरादक्षिणपश्चिमाञ्च ॥ तेषां गुणान्दोषविकोपनं च पृथक्पृथङ्मे गदतः शृणु त्वम् ॥ २४॥

अ० ५] भाषाटीकासमेता। ( ३१ ) शीतोऽतिमाधुर्य्यगुणः प्रयुक्तो वातप्रकोपी बलकृद्विशेषात् ॥ वाताधिकानां व्रणशोफिनाञ्च प्राचीप्रवृत्तः पवनो न शस्तः॥२५॥ अथ आठ दिशाओंमें प्रवृत्त हुए वायुके गुणदोषवर्णन-इसके अनन्तर पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिमसे आनेवाले वायु और उसके गुण दोष और कोपोंको कहता हूं तथा अलग अलग अर्थात् अन्यवायु के भी गुण दोष कोप कहते हुए मुझसे तुम सुनो ॥२४॥ शीतल स्वभाववाला अतिमधुरपनेके गुणोंसे युक्त वातको कोपनेवाला, विशेष करके बलको करनेवाला, ऐसा, पूर्वदिशाका वायु है। यह बातकी अधिकतावालोंको और घावपै शोजा- वालोंको श्रेष्ठ नहीं है ॥ २५ ॥ आग्नेयदिशाका वायु । किञ्चित्सतिक्तो मधुरान्वितः स्यात्कफःसमीरोद्गवरोगकारी ॥ सुशीतलःशोफवतां व्रणानां शस्तो न चाग्नेयसमीरणश्च॥२६॥ कछुक कडुआ है, मधुररससे अन्वित है, कफ और वातसे उपजे रोगोंको करता है, सुंदर शीतल है, शोजावाले घावोंको अच्छा नहीं है ऐसा आग्नेयदिशाका वायु है ॥ २६ ॥ दक्षिणादिशाका वायु । तिक्तः कषायो मधुरोऽतिमन्दः सुगन्धसंशीतगुणैः प्रकृष्टः॥वद- न्ति संज्ञां मलयानिलेति प्रकृष्टरामाजनचित्तहारी॥२७॥मनो- भवस्य प्रकरो मरुत्स्यात्कफोद्भवः सम्भवति प्रचारः॥नचाति- शीतो न तथोष्णको वा शुभ्रश्च याम्यां प्रभवःसमीरः ॥२८ ॥ कडुआ है, कसेला है, मधुर है, अतिमंद हैं, और सुगंध तथा शीतल गुणोंकरके संयुक्त है और मल्यानिलसंज्ञावाला है यह स्त्रियोंके चित्तको हरता है ॥ २७ ॥ और कामदेवको जगाता है, कफके रोगोंको करता है और अतिशीतल नहीं है और अतिगर्म नहीं हैं और शुभ है ऐसा दक्षिणादिशाका वायु हैं ॥ २८ ॥ नैर्ऋत्यदिशाका वायु । रूक्षोष्णवातः प्रथमः समीरः कट्वम्लपित्तासृजि दोषकारी ॥ प्रशोषणो देहबलस्य वायुःकफान्वितो नैर्ऋतिकःसमीरः॥२९॥ रूखाहै और गर्मवायुसे संयुक्त है और वायुको शांत करताहै और कटु, अम्ल, पित्त और रक्तमें दोषको करता हो और देहके बलको शोषनेवाला है और कफसे अन्वित है ऐसा नैर्ऋतदिशाका वायु होता है ॥ २९ ॥

( ३२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- पश्चिमदिशाका वायु । अथातिसूक्ष्मो मरुतः प्रशस्तो नूनं प्रतीच्यास्तु दिशः प्रवृत्तः ॥ वायुस्तथोदीरति रक्तपित्तं शस्तो व्रणानां कफशोफिनां वा ॥३०॥ पश्चिमदिशाका अतिसूक्ष्म वायु श्रेष्ठ है और रक्तपित्तको बढाता है। यह वायु घाववालोंको और कफसे उपजे शोजेवालेको श्रेष्ठ है ॥ ३० ॥ वायव्यदिशाका वायु । वायव्यजातो मरुतः प्रशस्तः कषायसंशुष्कगुणप्रसन्नः ॥करोति वातस्य वशं नराणां शस्तो न निन्द्यो व्रणशोफिनाञ्च ॥३१॥ वायव्यदिशाका वायु श्रेष्ठ है, कसैला और सुखानेवाले गुणसे संपन्न है और मनुष्योंके हवाके वशमें करता है और घावपै शोजेवालोंको श्रेष्ठ है और निंदित नहीं है॥ ३१ ॥ उत्तरदिशाका वायु । स्वादुः कषायश्च कफप्रकोपी वायुः कुबेरस्य दिशः प्रवृत्तः ॥ करोति मेघागमनं जलस्य शीतो न चोष्णो न च निन्द्य एषः ३२ उत्तर दिशाका वायु सजल मेघको लाता है, शीतल है, गर्म नहीं है, कसैला है, स्वादु है, कफको कोपता है यह निंदाके योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥ ऐशानदिशाका वायु । शीतोऽतिलौल्यः कफवातकोपं करोति चैशानदिशः प्रवृत्तः ॥ शस्तश्च नासौ व्रणशोफकासिनां क्षयस्तथा श्वासविकारिणाञ्च३३ ईशान दिशाका वायु शीतल है, चंचल है, कफ और वातके कोपको करता है, और घाव, शोजा, खांसी, क्षय, श्वास, रोग इन विकारवालोंको अच्छा नहीं है ॥ ३३ ॥ अन्य-पंचविध वायुके गुण । वस्त्रं नानाविधं चर्म वैणवं तालव्यंजनम् ॥ उशीरं शिखिपिच्छं तु प्रत्येकेन गुणोत्तमाः ॥ ३४ ॥ अथ वस्त्रआदिके वायुका गुणदोषकथन-अनेक प्रकारका वस्त्र, चाम बांसका पंखा, ताडका पंखा, खसकी टट्टी अथवा पंखा, मोरके पंखोंका पंखा, ये सब हवाके करनेमें एकसे दूसरे उत्तम गुणवाले हैं ॥ ३४ ॥ वस्त्रवायुके गुण । वस्त्रप्रवृत्तो मरुतो न शस्तो व्रणशोफिनाम् ॥ रक्तवासःसमुत्पन्नं १. व्यजनार्थेऽत्र व्यजनमुक्तं छन्दोभङ्गभयादृषिणा । न खल्वभिमतमिदं यतोऽग्रेऽभिहितं “वैणवं व्यजनं तन्द्रा निद्राकरणमेवच”इति तथा च “ अपि माषं मषं कुर्याच्छन्दोभङ्गं न कारयेत्” ।