भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

( ३० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ पित्तकी प्रकृतिका लक्षण-जो गौरी वर्णके समान पीतवर्णवाला हो, सुकुमार मूर्तिवाला हो, शीतल पदार्थमें प्रीति रखता हो, मधुसरीखे तथा पिंगवर्णके नेत्रोंवाला हो, तेज स्वभाव वाला हो और कोई क्षण भर में ही स्वभावसे गिर जाने वाला हो, उद्वेगसे संयुक्त हो, कोमल हो, कम केशवाला हो ॥ १९ ॥ और चंचलपनेमें प्रियता करनेवाला हो, कडुआ रसको खानेवाला हो, वैर करनेवाला हो, तेजसे संयुक्त हो, नवीन और गरम वस्तुको सेवनेवाला हो, अपनी स्तुतिको चाहनेवाला हो, दांतोंसे विशेष करके शुद्धवर्णवाला हो, ऐसा मनुष्य पित्तकी प्रकृतिवाला होता है ॥ २० ॥ अथ कफप्रकृतिका लक्षण । सुस्निग्धवर्णःसितनेत्रवृत्तः श्यामः सुकेशो नखदीर्घरोमा॥गम्भी- शब्दःश्रुतिशास्त्रनिद्रातन्द्राप्रियस्तिक्तकटूष्णभोजी ॥२१ ॥ स मांसलःस्निग्धरसप्रियश्चसगीतवाद्योऽतिसहिष्णुशीलः॥व्या- यामशीलो रतिलालसोऽसौ भवेत्कफस्य प्रकृतिर्मनुष्यः॥२२॥ अथ कफकी प्रकृतिका लक्षण-सुन्दर चिकने वर्णवाला हो और सफेद नेत्रोंवाला हो, वृत्त हो, श्यामवर्णवाला हो, सुंदर बालोंवाला हो, लंबे नख और रोमोंसे संयुक्त हो, गंभीर बोल- नेवाला हो, और वेद, शास्त्र, नींद, तंद्रा, इन्होंमें प्यार करनेवाला हो, कडुआ और गर्म भोजनकरनेवाला हो ॥ २१ ॥ मोटा हो स्निग्धरसको चाहनेवाला हो, गीत और बाजेको पसंद करनेवाला हो, अतिसहनेमें शीलस्वभाववाला हो, कसरतको करनेवाला हो, विषयभोगमें इच्छा- वाला हो, ऐसा मनुष्य कफकी प्रकृतिवाला होता है ॥ २२ ॥ अथ समप्रकृतिका लक्षण । संमिश्रवर्णोऽतिसुदीप्तगात्रो गम्भीरधीरोऽतिविदीर्णरोमा॥रामा- प्रियो भारसहोऽतिमिश्रो भोगेन युक्तः समता प्रकृत्या ॥ २३॥ कई प्रकारसे मिले हुए वर्णवाला हो, अतिसुन्दर प्रकाशित अंगोंवाला, गंभीर पनेमें धीर, अति विदारित हुए रोमोंवाला, स्त्रीसे प्यार करनेवाला, भार अर्थात् बोझेको सहनेवाला और सब लक्ष- णोंसे अति मिला हुआ, और भोगके भोगनेवाला ऐसा मनुष्य समप्रकृतिवाला होता है ॥ २३ ॥ अथ दिशाभेदसे वातके गुणदोष । ( पूर्वदिशाका वायु ) अथागतं वच्मि मरुत्प्रवाहं पूर्वोत्तरादक्षिणपश्चिमाञ्च ॥ तेषां गुणान्दोषविकोपनं च पृथक्पृथङ्मे गदतः शृणु त्वम् ॥ २४॥