हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( २९ ) अथ प्रकृतिका ज्ञान । मध्यसात्म्यश्च स्थूलः स्याद्बलवान्सत्त्ववान्नरः ॥ सचांऽप्युत्तमसात्म्यः स्याद्बलवत्समुपाचरेत् ॥ १५ ॥ मध्यप्रकृतिवाला नर स्थूल और बलवान होता है। उत्तमप्रकृतिवाला पुरुष सत्त्वगुणसे युक्त बलवान् होता है॥ १५ ॥ अथ वातादिप्रकृतिका ज्ञान । अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रकृतिज्ञानमुत्तमम् ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥ १६ ॥ इसके बाद वात, पित्त, कफ और सन्निपातकी प्रकृतिका ज्ञान कहूँगा ॥ १६ ॥ अथ वातप्रकृतिका लक्षण । यः कृष्णवर्णश्चपलोऽतिसूक्ष्मः केशालपरूक्षो बलवान्क्षमः स्यात्॥ सूक्ष्मातिदन्तो नखवृद्धिमेति दीर्घस्वनश्चक्रमणक्षमो- ऽसौ ॥ १७॥ दीर्घाक्रमो लोलुपहीन सत्त्वस्तथैव चाम्लीरसभो- जनेच्छुः ॥ संस्वेदनेनातिविमर्दनेन सौख्यं समागच्छति वातलो नरः ॥ १८ ॥ अथ वातकी प्रकृतिका लक्षण-जो मनुष्य कृष्णवर्ण, चपल व अतिकृश शरीर, अल्पबाल, रूखा, बलवाला, समर्थ, अतिसूक्ष्म दंतोंवाला, नखोंकी वृद्धिको प्राप्त होवे तथा बडा और लंबा बोलनेवाला, चलने फिरनेमें समर्थ ॥ १७ ॥ बहुत कूदनेवाला, लोभी, सत्त्वसे वर्जित, खट्टे रसको खानेकी इच्छावाला और अच्छी तरह पसीना देनेसे तथा मर्दन करनेसे सुखको प्राप्त होता हो वह वातकी प्रकृतिवाला हो ॥ १८ ॥ अथ पित्तप्रकृतिका लक्षण । गौरातिपिङ्गः सुकुमारमूर्त्तिः प्रीतः सुशीते मधुपिंगनेत्रः ॥ तीक्ष्णोऽपि कोडपिं क्षणभङ्गुरश्च त्रासी मृदुगात्रमलोमकं स्यात्॥१९॥ लौल्यप्रियस्तिक्तरसानुभोगी द्वेषी च तीक्ष्णश्च नवोष्णसेवी ॥ स्तुतिप्रियो दन्तविशुद्धवर्णो जातः स पित्त- प्रकृतिर्मनुष्यः ॥ २० ॥