हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 501, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६९ ) ष्टौ विषजातयः॥२॥ शृङ्गिकःकृष्णवर्णश्च वत्सनाभश्च पीतकः ॥ शुण्ठीसमानवर्णश्च शार्ङ्गवेरः स उच्यते ॥३॥ दारको हरित्- र्णश्च कालकूटो मधुप्रभः॥शंखश्चातिविषाभासःपीताभःसत्सु- कन्दुकः ॥४॥ हालाहलः कृष्णवर्णश्चाष्टौ चापि विजातयः ॥ पीतं विषं नरं दृष्ट्वा सद्यो वमनमुत्तमम्॥५॥ यावत्पीतातिवि- षञ्च तावत्तु वमयेत्सदा ॥ सिञ्चेच्छीताम्भसा वक्त्रं मन्त्रपूतेन सत्वरम् ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे वैद्य ! स्थावर और जंगम दो प्रकारका विष कहा है। शृंगिक, वत्सनाम, शृंगवेरक ॥ १ ॥ दारक, कालकूट, शंख, सत्सुकंदुक, हालाहल ऐसे आठ प्रकारके विष कहे हैं ॥ २ ॥ शृंगिक विष काला वर्णवाला, वत्सनाभ विष पीला होता है और जो सोंठके समान आकार वर्णवालाहो वह शृंगवेरक विष होता है॥३॥ दारक विष हरावर्णवाला और कालकूट विष शहद समान वर्णवाला होता है और शंख विष अतीसके समान होता है और सत्सुकन्दुक विष पीला होता है॥ ४॥हालाहल विष कालावर्णवाला होता है ऐसे आठ प्रकारकी विष जाति कही हैं जहर पीये हुए मनुष्यको देखि शीघ्र ही वमन करावे ॥ ५ ॥ जबतक पिये हुए जहरको गेरे तबतक वमन कराता ही रहे और मन्त्रसे पवित्र हुआ शीतल जलसे उसके मुखको सींचे ॥ ६ ॥ अथ मुखसिंचन मन्त्र । ॐ हर हर नीलकंठ ! अमृतं प्लावय प्लावय हुंकारेण विषं ग्रस ग्रस क्लींङ्कारेण हर हर ह्रींकारेण अमृतं प्लावय प्लावय हर हर नास्ति विष उच्चिरे उच्चिरे ॥ ७ ॥ ॐ हर हर नीलकंठ अमृतं प्लावय प्लावय हुंकारेण विषं ग्रस ग्रस क्लींकारेण हर हर ह्रौंका- रेण अमृतं प्लावय प्लावय नास्ति विष उच्चिरे उच्चिरे ॥ ७ ॥ अथ कानमें जपनेके वास्तै मंत्र । ॐ नमो हर हर नीलग्रीव श्वेताङ्गसङ्ग जटाग्रमण्डितखण्डेन्दु- स्फूर्तमन्त्ररूपाय विषमुपसंहर उपसंहर हर ३ नास्ति विष ३ उच्चिरे ३ इति कर्णेजपमन्त्रेण वारंवारं तालुमुखं सिञ्चेच्छीत- वारिणा ॥ ८ ॥