हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
अ० ५६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६९ ) ष्टौ विषजातयः॥२॥ शृङ्गिकःकृष्णवर्णश्च वत्सनाभश्च पीतकः ॥ शुण्ठीसमानवर्णश्च शार्ङ्गवेरः स उच्यते ॥३॥ दारको हरित्- र्णश्च कालकूटो मधुप्रभः॥शंखश्चातिविषाभासःपीताभःसत्सु- कन्दुकः ॥४॥ हालाहलः कृष्णवर्णश्चाष्टौ चापि विजातयः ॥ पीतं विषं नरं दृष्ट्वा सद्यो वमनमुत्तमम्॥५॥ यावत्पीतातिवि- षञ्च तावत्तु वमयेत्सदा ॥ सिञ्चेच्छीताम्भसा वक्त्रं मन्त्रपूतेन सत्वरम् ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे वैद्य ! स्थावर और जंगम दो प्रकारका विष कहा है। शृंगिक, वत्सनाम, शृंगवेरक ॥ १ ॥ दारक, कालकूट, शंख, सत्सुकंदुक, हालाहल ऐसे आठ प्रकारके विष कहे हैं ॥ २ ॥ शृंगिक विष काला वर्णवाला, वत्सनाभ विष पीला होता है और जो सोंठके समान आकार वर्णवालाहो वह शृंगवेरक विष होता है॥३॥ दारक विष हरावर्णवाला और कालकूट विष शहद समान वर्णवाला होता है और शंख विष अतीसके समान होता है और सत्सुकन्दुक विष पीला होता है॥ ४॥हालाहल विष कालावर्णवाला होता है ऐसे आठ प्रकारकी विष जाति कही हैं जहर पीये हुए मनुष्यको देखि शीघ्र ही वमन करावे ॥ ५ ॥ जबतक पिये हुए जहरको गेरे तबतक वमन कराता ही रहे और मन्त्रसे पवित्र हुआ शीतल जलसे उसके मुखको सींचे ॥ ६ ॥ अथ मुखसिंचन मन्त्र । ॐ हर हर नीलकंठ ! अमृतं प्लावय प्लावय हुंकारेण विषं ग्रस ग्रस क्लींङ्कारेण हर हर ह्रींकारेण अमृतं प्लावय प्लावय हर हर नास्ति विष उच्चिरे उच्चिरे ॥ ७ ॥ ॐ हर हर नीलकंठ अमृतं प्लावय प्लावय हुंकारेण विषं ग्रस ग्रस क्लींकारेण हर हर ह्रौंका- रेण अमृतं प्लावय प्लावय नास्ति विष उच्चिरे उच्चिरे ॥ ७ ॥ अथ कानमें जपनेके वास्तै मंत्र । ॐ नमो हर हर नीलग्रीव श्वेताङ्गसङ्ग जटाग्रमण्डितखण्डेन्दु- स्फूर्तमन्त्ररूपाय विषमुपसंहर उपसंहर हर ३ नास्ति विष ३ उच्चिरे ३ इति कर्णेजपमन्त्रेण वारंवारं तालुमुखं सिञ्चेच्छीत- वारिणा ॥ ८ ॥
(४७०) हारीतसंहिता। [तृतीयस्थाने- ॐ नमो हर हर नीलग्रीव श्वेतांगसंगजटामण्डितखण्डेन्दुस्फूर्त्तमंत्ररूपाय विषमुपसंहर उपसं- हर हर ३ नास्तिविष ३ उच्चिरे ३ इस कर्णेजपमंत्रसे वारंवार तालुवाको और मुखको शीतल जलसे सींचे ॥८॥ अथ विषशमन औषध । ताण्डुलीयकमूलानि पिष्ट्वा चोष्णेन वारिणा ॥ पीतं पीतविषं हन्ति वमने लाघवं भवेत् ॥९॥ काकजङ्घा सहचरीमूलं चैड- गजस्य च ॥ कदरं कार्मुकञ्चापि त्वचं पीतोष्णवारिणा ॥ पीतं तच्च विषं घोरं नाशयत्याश्वसंशयः ॥१०॥ खदिरस्य च मूलञ्च तथा निम्बफलानि च ॥ उष्णोदकेन पीतानि जयेयुस्तत्क्षणाद्वि- षम् ॥११॥ वत्साह्वञ्चाश्वगन्धाञ्च पीत्वा चोष्णेन वारिणा ॥ प्रपीतञ्च विषं पाति चाशु नरस्य वेदवाक् ॥१२॥ अथ प्रधान- रक्तस्य क्षते रक्तं विषस्य च ॥ तस्य वक्ष्यामि भेषज्यं येन सम्पद्यते सुखम् ॥१३॥ मर्मस्थाने मर्मगतं तदसाध्यं भवेन्म- तम् ॥ साध्यञ्च तत्त्वग्रक्तस्थं मांसस्थं कष्टसाध्यकम् ॥१४॥ असाध्यं धातुसंप्राप्तं सखे वक्ष्यामि भेषजम् ॥ विषलिप्तं नरं ज्ञात्वा ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥१५॥ रजनीयुग्ममम्लकेन काञ्जिकेन तु पेषितम् ॥ लेपेन च विषं हन्ति प्रलिप्तं नात्र संशयः ॥१६॥ मातुलुङ्गरसेनापि धावनं काञ्जिकेन वा ॥ अतिशीतेन तोयेन प्रलिप्तं नात्र संशयः ॥१७॥ चौलाईकी जड़को गरम जलके संग पिसि पीनेसे पीया हुआ विषका नाश होता : है और वमन होके हलका होता है ॥९॥ कावली, पीला, कोरंटा, पुवाड़की जड़, सफेद खैरकी छाल इनको गरम जलके संग पीनेसे घोर विषका नाश होता है ॥१०॥ खैरकी जड, नींवके फल, निंबोली, इनको गरम जलके संग पीनेसे शीघ्र ही विषका नाश होता है ॥११॥ कूडाकी छाल, असगंध इनको गरम जलके संग पीनेसे पीया हुआ विष दूर होता है ॥१२॥ इससे अनंतर जो रक्तमें प्रधान उस विषके वास्ते उसकी औषधोंको कहेंगे उससे सुख होता है ॥१३॥ जो मर्मस्थानमें विष प्राप्त हो जावे तब असाध्य जानना और त्वचा रक्त इनमें स्थित हुआ विष कष्टसाध्य होता है ॥१४॥ और धातुमें प्राप्त हुआ विष असाध्य होता है, हे प्रिय ! उनकी
अ० ५६] भाषाटीकासमेता। (४७१) औषधोंको कहते हैं विषसे लिये हुए मनुष्यको जानके पीछे उसकी चिकित्सा करे ॥ १५ ॥ दोनों हलदियोंको विजौराके रसमें और कांजीमें पीस लेप करनेसे शरीरके लिपा हुआ विषका नाश होता है ॥ १६ ॥ विजौराके रससे अथवा कांजीसे तथा शीतल जलसे धोनेसे शरीरके लिपा हुआ विषका नाश होता है ॥ १७ ॥ अथ जंगमविषकी चिकित्सा। विषं जङ्गममित्युक्तमष्टधा भिषगुत्तम । दव्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तश्च गुण्डसाः ॥ १८ ॥ वृश्चिको गोरकश्चापि तथा च खण्डबिन्दुकः ॥ अलर्कमूषमार्जारविषं प्रोक्तमनेकधा ॥ १९ ॥ दव्वीकराणां सर्वेषामुत्तं वातात्मकं विषम् ॥ मण्डलीनाञ्च सर्वेषां पैत्तिकं विषमुच्यते ॥ २० ॥ राजिमन्तश्च ये प्रोक्तास्तेऽपि कफात्मका विषाः ॥ विचित्रगमनं मूर्द्धः पीडनं चातिदुर्भर्म् ॥ ॥ २१ ॥ हृदये व्यथनं यस्य तमसाध्यं वदन्ति च ॥ नासारक्त- स्रुतिर्यस्य नेत्रे प्लावश्च दृश्यते ॥ २२ ॥ जडा च जायते जिह्वा तमसाध्यं विदुर्बुधाः ॥ यस्य लोमानि शीर्य्यन्ते पीताभं शरीरं भवेत् ॥ २३ ॥ न स्थिरं मस्तकं यस्य तमसाध्यं भिषग्वर ॥ एभिर्विरहितं दृष्ट्वा कुर्य्यात्तस्य प्रतिक्रियाम् ॥ २४ ॥ हे उत्तम वैद्य ! जंगम विष आठ प्रकारका होता है। दर्वीकर सर्प, मंडलि, राजिमंत सर्प, गुंडस ॥ १८ ॥ वृश्चिक, गोरक, खंडविंदुक, ऐसे इन सर्पोंके विष कहे हैं और कुत्ता, मूसा, बिलाव इत्यादिकोंके अनेक विष कहे हैं ॥ १९ ॥ दर्वीकर अर्थात् करछी सरीखे फणवाले सब सर्पोंका वातवाला विष होता है, मंडलवाले सर्पोंका पित्तवाला विष होता है ॥ २० ॥ और जो राजिमंत अर्थात् रेखावाले सर्प कहे हैं उनका कफवाला विष होता है और जिस पुरुषका विचित्र गमन हो और मस्तकमें अत्यंत दुर्भर पीडा हो ॥ २१ ॥ जिसके हृदामें पीड़ाहो विषवाले उस मनुष्यको असाध्य जाने और जिसकी नासिकासे रक्त झिरे नेत्रोंमें पानी भरा रहे ॥ २२ ॥ जिह्वा जड होजावे उसको वैद्यजन असाध्य कहते हैं और जिसके रोम विखर जावें और शरीर पीला होजावे ॥ २३ ॥ मस्तक स्थिर नहीं हो हे उत्तम- वैद्य ! उसको असाध्य जाने और जो पुरुष इन लक्षणोंसे रहित हो उसका इलाज करे ॥२४॥ अथ विषबंधनमंत्रः । ॐ नमो भगवते सुग्रीवाय सकलविषोपद्रवशमनाय उग्रकाल-
( ४७२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कूटविषक्वलिने विषं बन्ध बन्ध हर हर भगवतोनीलकण्ठस्या- ज्ञा ॥ ॐ नमो हर हर विषं संहर संहर अमृतं प्लावय प्लावय नासि अरेरे विष नीलपर्वतं गच्छ गच्छ नास्ति विषम् ॐ हाहा ऊचिरे ३॥ अनेन मंत्रेण मुखमुदकेन त्रासयेत् ॥ ॐ नमो- ऽरेरे हंस अमृतं पश्य पश्य ॥ २६ ॥ ॐ नमो भगवते सुग्रीवाय सकलविषोपद्रवशमनाय उग्रकालकूटविषक्वलिने विषं बंध २ हर २ भगवतो नीलकंठस्याज्ञा । ॐ नमो हरहर विषं संहर संहर अमृतं प्लावय प्लावय नासि अरेरे विष ! नीलपर्वतं गच्छ गच्छ नास्ति विषम् ॐ हाहा ऊचिरे ३ ॥ इस मंत्रको तीनवार पढ मुखपे जलके छिड़के मारे ॐ नमो अरेरे हंस ! अमृतं पश्य पश्य ॥ २६ ॥ इति मंत्रः ॥ अथ लेप । जयकूटं वचाकुष्ठं सैन्धवं मगधा निशा ॥ लेपो दष्टव्रणे प्रोक्तो विषं हन्ति सुदारुणम् ॥ २६ ॥ सुरसा रजनी व्योषं यवानी पारिभद्रकम् ॥ सर्पदष्टव्रणे प्रोक्तं लेपनं विषशान्तये ॥ २७ ॥ कुष्ठं मुस्ता अजाजी च विडङ्गं मधुयष्टिका ॥ गुञ्जामूलं शीततो- यैर्लेपो मण्डलिना हितः ॥२८॥ राजिमन्तो विषा यस्य गृह- धूमं वचा घनम् ॥ सर्षपाश्च यवानी च पिचुमन्दफलत्रयम् ॥ लेपनं राजिमताञ्चैव व्रणतैलेन संयुतम् ॥ २९ ॥ इति राजिमतां लेपः । लोहाका चूर्ण, वच, कूठ, सैंधानमक, पीपल, हलदी, इनका लेप दष्टव्रणमें कहा है यह दारुण विषको नाशता है ॥ २६॥ और ब्राह्मी, हलदी, सोंठ, मिरच, पीपली, अजवायन, नींव इनका लेप सर्पसे उपजा दष्टव्रणपे करना हित कहा है विषकी शांति होती है ॥ २७ ॥ कूठ, नागरमोथा, जीरा, वायविडंग, मुलहटी, चिरभटीकी जड इनको शीतल जलमें पीसि लेप करनेसे मंडलवाले सर्पोंके विषका नाश होता है ॥ २८ ॥ रेखावाले सर्पोंके विषके नाशकेवास्ते घरका धूँधा, वच, नागरमोथा, शिरसम, अजवायन, नींव, त्रिफला इनको व्रणमें कहेहुए तेलमें पीसि लेप करे ॥ २९ ॥ सटीकिरातं सकटुत्रयं च वचाविशालापिचुमन्दकञ्च॥पथ्याय- वानीरजनीद्वयञ्च दष्टव्रणे लेपनमेव शस्तम् ॥ ३० ॥ स्थावरं
अ० ५७ ] भाषाटीकासमेता । ( ५७३ ) जङ्गमं वापि विषं जग्धं भिषग्वर ॥ शीघ्रं दद्याद्व्यथां गुर्वी प्रोक्तञ्च नरसत्तमैः ॥ ३१ ॥ कचूर, चिरायता, सोंठ, मिरच, पीपली, वच, इंद्रायण, नींव, हरड़ै, अजवायन, दोनों हलदी इनका लेप दष्टव्रणमें करना श्रेष्ठ है ॥ ३० ॥ हे उत्तमः वैद्य ! स्थावर अथवा जंगम भक्षण कियाहुआ विष शीघ्रही अत्यंत पीड़ा करता है ऐसा श्रेष्ठ मनुष्यों ने कहा है ॥ ३१ ॥ अथ मंत्र । ॐ नमो भगवते शिरसिशिखराय अमृतधाराधौतसकलविग्र- हाय अमृतकुम्भपरितोऽमृतं प्लावय प्लावय स्वाहा ॥ ३२ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने विषतन्त्रं नाम षट्- पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ ॐ नमो भगवते शिरसिशिखराय अमृतधाराधौतसकलविग्रहाय अमृतकुंभपरितोऽमृतं प्लावय प्लावय स्वाहा ॥ ३२ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां तृतीयस्थाने विषतंत्रनाम षट्पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५७. ❖*❖ अथ भिन्न अर्थात् शस्त्रआदिसे टूटेहुएकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ छिन्नं भिन्नं तथा भग्नं घृष्टं पिष्टं तथैव च ॥ आस्फालितं सम्प्रहारः संघातः कथ्यते बुधैः ॥१॥ शस्त्रभिन्नं नरं दृष्ट्वा कर्त्तव्या च प्रतिक्रिया ॥ २ ॥ अस्थिस्र्थं विद्यते मांसमस्थि संच्छिद्यते यदि॥ शाखाप्रशाखयोर्वापि छिन्नं तच्च निगद्यते॥३॥असन्धौ परिसंच्छिन्नं तदसाध्यं विनिर्दिशेत् ॥ खड्गार्द्धचन्द्रपरशुच्छिन्नं तु कथितं सदा॥४॥तस्यादौ चारणा- लेपधावनं परिकीर्त्तितम् ॥ पिचुना तिलतैलेन शीघ्रं संस्वेदना- न्वितम् ॥५॥यावद्वै स्रवती रक्तं तावत्तैलेन चाभ्यजेत्॥रक्ते वै विक्रतिं प्राप्ते तैलेनाभ्यञ्जनं मतम् ॥६॥शोफाद्याश्च प्रजायन्ते
( ४१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- बहुलोपद्रवा व्रणे ॥ सन्धौ छिन्नं नरं दृष्ट्वा सेचयेत्तप्तवारिणा ॥७॥ सञ्चितस्य व्रणस्यापि प्रशस्तं पिचुतैलकम्॥पूये वापि विनिर्याति निम्बारग्वधपत्रकम् ॥८॥ गुडेन पथ्यां पिष्ट्वा च लेपनं पूयशोधनम् ॥ दिनत्रये विशुद्धेऽपि तत्रैव लेपनं हितम् ॥९॥ धवार्ज्जुनकदम्बस्य वृक्षोदुम्बरयोस्त्वचम् ॥ जलेन पिष्ट्वा लेपश्च तेन संरोहते व्रणः ॥ १० ॥ आत्रेयजी कहते हैं-छिन्न कटाहुआ, भिन्न टूटाहुआ, भग्न फूटाहुआ, घृष्ट घिसाहुआ, पिष्ट पिसाहुआ, आस्फालित फटा हुआ, संप्रहार, संघात, लाठी आदिकी चोट ऐसे ये हाड आदिके टूटनेके रोग होते हैं ॥ १ ॥ शस्त्रसे कटे हुए- मनुष्यको देखि उसकी क्रिया करे ॥ ॥ २ ॥ अस्थिमें स्थित हुआ मांसभेदन होजावे अथवा शाखा प्रशाखाओंकी अस्थि छेदन होजावे वह छिन्न कहाता है ॥ ३ ॥ जो संधिके विना अन्य जगहकी हड्डी टूट जावे वह असाध्य कहाती है, खड्ग अर्धचंद्रमाके समान शस्त्र फरशा इनसे छिन्न अस्थि कही है ॥४॥ उसकी आदिमें चारण, लेप, धोवना, ये कर्म करे फिर नींव और तिलोंके तेलसे रूईके फोहे करके चोपरिके पसीना दिवावे॥५॥ जबतक रुधिर गिरे तबतक तेलसे चोपरता रहै और जब रक्त विकारको प्राप्त होजाता है तब तेलसे मालिस करना हित कहा है ॥ ६ ॥ और व्रणपै सोजा आदिक बहुतसे उपद्रव होजाते हैं, संधिमें छिन्न हुए मनुष्यको देखिके गरम जलसे सेक करे ॥ ७ ॥ फिर गरम जलसे सेक करलेवे तब फोहेसे तेल लगाना श्रेष्ठ है और जो पीव निकलती हो तो नींव, अमलतास इनके पत्ते बांधने श्रेष्ठ है ॥ ८ ॥ और हरडोंको पीस गुडके संग लेप करनेसे पीवकी शुद्धि होती है। तीन दिनतक शुद्ध होजावे तब इन आगे कही औषधोंका लेप करना हित है ॥ ९ ॥ धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, पिलखनवृक्ष, गूलर इनकी छालको जलमें पीस लेप करनेसे घाव भरता है ॥ १० ॥ अथ भिन्नअस्थिकी चिकित्सा । शक्तिशूलैश्च बाणैश्च भल्लैर्वा खड्गतोमरैः॥ क्षुरिकामुखधाराभि- र्भिन्नं तत्कथ्यते भिषक् ॥ ११॥ साध्यममर्मजं प्रोक्तं मर्मस्थं तन्न सिध्यति॥अपामार्गरसेनापि तथा कूष्माण्डकस्य च॥१२॥ धावनं काञ्जिकेनापि प्रशस्तं कथ्यते बुधैः ॥ तिलतैलेन चाभ्यङ्गो हितः स्यात्स्वस्थभिन्नके ॥ लेपनञ्च प्रयोक्तव्यं पूर्वोक्तञ्च हितावहम् ॥ १३ ॥
अ० ५७ ] भाषाटीकासमेता । ( ४७५ ) हे वैद्य ! शक्ति, शूल, बाण, भाला, तलवार, तोमर शस्त्र, छुरी, खांडा, जिनके नोकहों उनसे भेदन हुआ हाड भिन्न कहा है ॥ ११ ॥ जो मर्ममें नहीं लगा हो वह साध्य कहा है और मर्मस्थानमें लगा हुआ वह असाध्य कहा है वहां उंगाके रससे अथवा कोहलाके रससे तथा कांजीसे धोवना श्रेष्ठ कहा है ॥ १२ ॥ और वैद्योंने कांजीसे धोना श्रेष्ठ कहा है और भिन्न हुए हाडमें तिलोंके तेलकी मालिस करनी हित कही है और पहले कहा हुआ लेप करना हित कहा है ॥ १३ ॥ अथ शल्योद्धारचिकित्सा ! उरसि शिरसि शंखे कक्षयोः पादयोर्वा त्रिकजठरमुखाय्रे नेत्रयोः कर्णयोर्वा ॥ भवति हि यदि शल्यं कष्टसाध्यञ्च शस्त्रैर्भवति यदि न गूढं भेषजैस्तैर्विधिज्ञ ॥ १४ ॥ शाखाप्रशाखयोर्यच्च मर्मस्थं तन्न सिध्यति॥यन्त्रशस्त्रप्रतीकारैः शल्यं प्राज्ञः समु- द्धरेत् ॥ १५॥ द्वादशैव तु यन्त्राणि शस्त्राणि द्वादशैव तु ॥ चत्वारि च प्रबन्धनां शल्योद्धारे विनिर्दिशेत् ॥१६ ॥ गोधा- मुखं वज्रमुखं च नाम संदंशचक्राकृति कंकपादम् ॥ अथानकं शृङ्गकुण्डलञ्च श्रीवत्ससौवत्सिकपञ्चवक्त्रम् ॥ १७ ॥ द्वादशै- तानि यन्त्राणि कथितानि भिषग्वरैः॥ अथ शस्त्राणि प्रोक्तानि नामानि च पृथक्पृथक् ॥ १८ ॥ अर्द्धचन्द्रं व्रीहिमुखं कंकपत्रं कुठारिका ॥ करवीरकपत्रञ्च शलाकाकारपत्रकम् ॥ १९॥ बडिशं गृध्रपादञ्च शूली च घनमुद्गरम् ॥ शस्त्राण्येतानि प्रोक्तानि शल्यो- द्धारे पृथक्पृथक् ॥ २० ॥ अतिगुप्तं च शल्यञ्च संदंशेन समु- द्धरेत् ॥ भिन्नेन तत्प्रतीकारः कर्त्तव्यश्च सुधीमता ॥ २१ ॥ गम्भीरशल्यं ज्ञात्वा च प्रतीकारञ्च कारयेत् ॥ पाटनं कुशपत्रेण चोद्धरेत्कुङ्कुमेन च ॥ २२ ॥ भिन्नवत्प्रतीकारश्च कर्त्तव्यश्च सुधी- मता ॥ २३ ॥ यत्र शोफो भवेत्तीव्रस्तत्र शल्यं विनश्यति ॥ सशल्यं सघनं चैव रुजावन्तं निरूप्य च ॥ २४ ॥ तत्र योग्यं च यंत्रं च यन्त्रशस्त्रञ्च योग्यकम् ॥ तत्तत्र योजनीयञ्च ऊहापोह-
( ४७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
विशारदैः ॥ २५ ॥ या वेदना शल्यनिपातजाता तीव्रा शरीरे प्रतनौति जन्तोः ॥ घृतेन संशान्तिमुपैति तिक्ता कोष्णेन यष्टी- मधुनान्वितेन ॥ २६ ॥ सर्जार्जुनोदुम्बरमर्कटीनां रोध्रं समङ्गा- सुरसासमेतम् ॥ जलेन पिष्ट्वा प्रतिलेपनाय शल्योद्धृतौ सौख्य- मिदं करोति ॥ २७ ॥ शेषा क्रिया च पूर्वोक्ता छिन्ने भिन्ने हिता तु या ॥ कर्त्तव्यो वालुकास्वेदो घटीस्वेदश्च तत्र च ॥ २८ ॥ छाती, शिर, कनपटी, दोनों कांख, दोनों पैर, कटिस्थान, उदर, मुख इनके आगे नेत्र कानमें यदि बाण आदि शल्य हो तो शस्त्रोंसेंभी कष्टसाध्य कही है, जो अधिक भीतर नहीं होवे तो औष- धोंसे निकल जाती है ॥ १४ ॥ शाखा प्रशाखा हाथ पैर अंगुली आदिस्थान मर्मस्थान, इनमें लगी हुई शल्य नहीं निकलती है और यंत्र शस्त्रोंके प्रकार इनसे बुद्धिमान् पुरुष शल्यको निकासे ॥ १५ ॥ बारह यंत्र हैं और बारह प्रकारके शस्त्र कहे हैं और शल्योद्धारमें चार प्रबंध अर्थात् बंधन आदिक पट्टी कही है ॥ १६ ॥ गोवामुख, वज्रमुख, संदंश, चक्राकृति, कंकपाद, आनक, शृंगक, कुंडल, श्रीवत्स, सौवस्तिक, पंचवक्र ॥ १७ ॥ ऐसे ये बारह प्रकारके यंत्र, वैद्यजनोंने कहे हैं और जुदे २ नामोंवाले बारह प्रकारके शस्त्र कहे हैं॥ १८ ॥ अर्धचंद्रमाके समान, व्रीहिमुख, कंकपत्र, कुठारिका, करवीरकपत्र, कुशपत्र, शलाकाकारपत्र ॥ १९ ॥ बडिशशस्त्र, गृध्रपाद, शूली, घनमुद्गर, ऐसे ये जुदे २ शस्त्र शल्योद्धारमें कहे हैं॥२०॥ जो अतिगुप्त शल्य हो वह संदंश अर्थात् चिमटासरीखे यंत्रसे निकालना चाहिये और भिन्न हुई अस्थिके समान उसकी चिकित्सा करनी चाहिये॥२१॥गंभीर शस्त्रको जानले उसको कुशपत्रशस्त्रसे फाडना चाहिये, कुंकुमशस्त्रसे निकासे और ॥२२॥उस शल्यकी चिकित्सा भिन्नहुए अस्थिके समान करे॥२३॥ जहां अत्यंत सोजा हो गया हो वहां शल्य नहीं दीखता है वहां शल्य सहित और कडा पीड़ावाला ऐसा सोजा जानके ॥ २४ ॥ वहां जैसा योग्य हो वैसाही यंत्र और शस्त्रको बुद्धिमान वैद्य अपनी बुद्धिसे विचारके प्रयुक्त करे ॥ २५ ॥ जो बाणआ दि शल्यके लगनेसे पीड़ा हुई हो वह मनुष्यके शरीरमें ज्यादा बढजावे वहां कुटकी, मुलहटी, शहद, इनसे संयुक्त किये हुए, कलुक गरम २ घृतसे सेकनेसे वह पीड़ा शांत होती है ॥ २६ ॥ और रालका वृक्ष, अर्जुनवृक्ष, गूलर, कौंच, लोध, मँजीठ, तुलसी, इनको जलमें पीस शल्य निकासी हुई जगहपे लेप करनेसे सुख होता है ॥ २७ ॥ बाकी जो पहले वालुकास्वेद, घटीस्वेद, इत्यादिक क्रिया कही है वे और अस्थिच्छिन्न, भिन्नअस्थि इनमें जो क्रिया हित कही हैं वे सब करनी चाहिये ॥ २८ ॥ अथ अस्थिभग्नकी चिकित्सा । भग्नास्थिश्च नरं दृष्ट्वा तस्य वक्ष्यामि भेषजम् ॥ मणिबन्धे
अ० ५७ ] भाषाटीकासमेता । ( ४७७ ) कूर्परे च जानौ भग्ने कटौ तथा ॥ २९ ॥ पृष्ठवंशे विभग्ने च साध्यान्येतानि सत्तम् ॥ ग्रीवादेशे चेन्द्रबस्तौ रोहिण्यां कूर्परा- द्धधः ॥ ३० ॥ स्कन्धकूर्परमध्ये च तथा च त्रिकमध्यतः ॥ उर- सि चैव क्रोडे च विभग्नं तदसाध्यकम् ॥ ३१ ॥ विभग्नं च नरं दृष्ट्वा वेणुखण्डेन बन्धयेत् ॥ म्रक्षयेन्नवनीतेनैरण्डपत्रैश्च वेष्टयेत् ॥ ३२ ॥ उष्णाम्भसा सेचयेच्च वस्त्रेण मृदु बन्धयेत् ॥ ३३ ॥ धवार्ज्जुनकदम्बानां वल्कलं काञ्जिकेन तु ॥ पिष्ट्वा हितः प्रले- पश्च तेन सौख्यं प्रजायते ॥ ३४ ॥ स्वेदयेत्तानि चोष्णेन आ- वासं कारयेत्पुनः ॥ एवं क्रियासमाप्तौ ततो बन्धं विमोचयेत् ॥ ३५ ॥ एकाहान्तरितेनापि पूर्ववत्तत्प्रबन्धयेत् ॥ यावद्ग्रन्थि न बध्नाति तावन्न स्नापयेन्नरम् ॥ ३६ ॥ भग्न अस्थिवाले मनुष्यकेवास्ते औषध कहते हैं, पौंहचा कोहनी, गोडे कटी ॥ २९ ॥ पीठका बांस, ये जो भग्न हो जावें तो साध्य कहे हैं और ग्रीवाके समीप, बस्तिस्थान कोहनी के नीचेकी जगह ॥ ३० ॥ कांधा, कोहनीके बीचका स्थान, कटि, कलेजा, छाती, इनमें भग्न हुई अस्थि असाध्य कही है ॥ ३१ ॥ भग्न अस्थि हुए मनुष्यको देखिके बांसकी फाटकोंसे बांध देवे और नौनीघृतका लेप कर अरंडके पत्तोंसे बांध देवे ॥ ३२ ॥ और गरम जलसे सेंक करे वस्त्रसे कोमल बांध देवे ॥ ३३ ॥ धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, इनकी छालको कांजीमें पीस लेप करनेसे सुख होजाता है ॥ ३४ ॥ पीछे गरम २ वस्त्र होजावे तबतक पसीना दिवावे वस्त्रको वहां बांधा रक्खे ऐसी क्रिया हो लेवे तब बंधनको खोल देवे ॥ ३५ ॥ एकदिन खुला रक्खे और एकदिन बांधा रक्खे और जबतक टूटे हुए हाड़की जगह ग्रंथि नहीं बंधै तबतक स्नान नहीं करवावे ॥ ३६ ॥ अथ घृष्ट हाडकी चिकित्सा । घृष्टञ्चैव नरं दृष्ट्वा धावनं काञ्जिकेन च ॥ मूत्रेण शीततोयेन धावनञ्च हितं मतम् ॥ ३७॥ यावद्वै स्रवति रक्तं तावत्तैलेन से- चयेत् ॥ अल्पानि चौषधान्यत्र कारयेद्विविधानि च ॥ ३८ ॥ घृष्ट अर्थात् किसी वस्तुसे घिसके दब जावे वह घृष्ट हाड़ कहाता है,उसको कांजीसे धोवें अथवा गोमूत्रसे तथा शीतल जलसे धोवना हित है ॥ ३७ ॥ जबतक रुधिर गिरे तबतक तेलसे सेकता रहे और वैद्यजनको यहां स्वल्प औषध करनी चाहिये ॥ ३८ ॥
( १७८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ आस्फालित हाडकी चिकित्सा । विपाके रक्तस्रावश्च स्वेदनञ्च विधीयते ॥ भग्नवत्प्रतीकारश्च का- रयेद्विधिपूर्वकम् ॥ ३९ ॥ आस्फालिते प्रतीकारे ज्ञातव्यश्च भिषग्वर ॥ ऊहापोहैश्च कर्त्तव्यस्तेन सम्पद्यते सुखम् ॥ ४० ॥ पकेहुए हाड़में रुधिर गिरता हो तो पसीना दिवाना हित है और भग्न हुए हाड़के समान इसका इलाज करे ॥ ३९ ॥ ऐसे वैद्यजनोंको जानना चाहिये और अपनी बुद्धिके बलके अनुसार चिकित्सा करे, इससे रोगीको सुख होता है ॥ ४० ॥ अथ अभिघात अर्थात् चोट लगी हुईकी चिकित्सा । शिरोऽभिघातजो दोषः शिरोरोगः प्रकीर्त्तितः ॥ उरसा चाभि- घातेन यकृद्गुल्मश्च जायते ॥ ४१ ॥ इत्येवञ्च प्रतीकारं कुर्य्या- द्रक्तावसेचनम् ॥ स्वेदनञ्च प्रयोक्तव्यं भिषजा कर्मसिद्धये ॥ ४२॥ न च तैलञ्च भोक्तव्यं नात्युष्णकटुकं तथा॥ मत्स्यानि न च मांसानि घनानि च गुरूणि च ॥४३॥ श्वेतशालिसमुद्भूतं यूषं चैवाढकीषु च ॥ शशलावकवार्त्ताककङ्कोलं तण्डुलीय कम् ॥ ॥४४॥ शतपुष्पाद्यमन्यञ्च न च हिङ्गुसमन्वितम् ॥ लवणं नाति- भोक्तव्यं यदीच्छेदात्मनः सुखम् ॥४५॥ व्यायामञ्च व्यवायञ्च दिवानिद्रां तथा क्रमम् ॥ वर्जयेत्सुखसम्पत्तिर्नरश्च प्रतिपद्यते ॥ ॥४६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने भग्नचिकित्सा- नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ शिरमें चोट लगनेसे कुपित हुए दोषको शिरोरोग कहते हैं और छातीमें चोट लगनेसे यकृत् रोग गुल्म ये रोग होते हैं ॥ ४१ ॥ इनको दूर करनेके वास्ते रक्तको निकसावे और पसीना दिवावे ॥ ४२ ॥ और तेलका भोजन नहीं करे और अत्यंत गरम चर्चरा ऐसा भोजन नहीं करे और मछलियोंका मांस, कड़े तथा भारी पदार्थ इनको नहीं खावे ॥ ४३ ॥ शालिसंज्ञक सफेद चावलोंका यूष, तूरीधान्य, शशा, लावापक्षी, बत्तक इनका मांस, कंकोला, चौलाईका शाक ॥ ४४ ॥ सौंफ, हींग आदि और नमक, इनको इच्छापूर्वक कम खावे इनसे सुख होता है ॥ ४५ ॥ और कसरत, स्त्रीसंग, दिनमें सोना, टहल,कदमी करना इन्होंको वर्जदेवे तब सुख उत्पन्न होता है ॥ ४६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने भग्नचिकित्सानाम सप्तपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
अ० ५८ ] भाषाटीकासमेता । ( ४७९ ) अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५८. अथाग्निदग्धचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अग्निदग्धं नरं दृष्ट्वा तच्च दग्धं चतुर्विधम् ॥ ईषदग्धं मध्यदग्धमतिदग्धञ्च वेदभाक् ॥ १ ॥ सम्यग्दग्धं भिषक्श्रेष्ठ लक्षणं शृणु पुत्रक ॥ २ ॥ अतिदग्धं मांसगं स्या- द्वातपित्तकफाश्रितम् ॥ सम्यग्दग्धञ्च निर्दोषं विज्ञेयं च चतुर्वि- धम् ॥ ३ ॥ त्वचा विशीर्य्यते येन स दाहः पित्तजो भवेत् ॥ सरक्तश्च सपित्तश्च पित्तकोपात्प्रदृश्यते ॥ ४ ॥ कृष्णवर्णञ्च तत्पित्तं मांसगं तीव्रवेदनम् ॥ तस्य वक्ष्यामि संसिद्धयै भेषजं भिषजां वर ॥ ५ ॥ ईषदग्धे काञ्जिकस्य लेपनं सुखहेतवे ॥ निम्बपत्राणि सुरसा कुष्ठं धात्रीफलानि च ॥ ६ ॥ ईषदग्धे यथालाभे लेपनं भिषगुत्तम ॥ मध्यदग्धे पयस्या या लेपनी सुखकारिणी ॥ ७ ॥ मधुकुष्ठकमञ्जिष्ठाघृतं पक्वं हितं मतम् ॥ कुष्ठञ्च यष्टीमधुकं चन्दनैरण्डपत्रकम् ॥ ८ ॥ मध्यदग्धे हितो लेपो दुग्धेन परिपेषितः ॥ ९ ॥ घृतकर्पूरचूर्णञ्च गैरकं रोध्र- मेव च ॥ शुष्कचूर्णं पूयहरं दग्धं संरोहयत्यपि ॥१०॥ आम- लक्या तिलं कुष्ठं लेपनं वाग्निदग्धके ॥ रोध्रोशीरं समङ्गा च लेपनं शीतवारिणा ॥ ११ ॥ अतसीस्नेहमभ्यङ्गमधुयष्टीघृतेन तु ॥ लेपाभ्यङ्गे हितं दग्धरोहणं दाहवारणम् ॥१२॥ आत्रेयजी कहते हैं-अग्निसे दग्ध हुए मनुष्यको देखे, चारप्रकारका अग्निदग्ध होता है कुछेक दग्ध, मध्यदग्ध, अतिदग्ध ॥ १ ॥ सम्यक्दग्ध, ऐसे चारप्रकारका होता है। हे पुत्र ! अब इनके लक्षणोंको सुनो ॥२॥ जो अत्यंत दग्ध हो वह मांसमें प्राप्त होता है और वात, पित्त, कफ इनके आश्रय होता है, जो सम्यक् अर्थात् सारा दग्ध होजावे वह दोषोंसे रहित दग्ध होता है वह चार प्रकारका दग्ध होता है ॥ ३ ॥ जिसमें त्वचा विखर जावे और दाह हो और रक्त तथा पित्त दीखे वहां दग्ध हुएमें पित्तका कोप जानना ॥ ४ ॥ और
( ४८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-अ० ५८ ] जहां काला वर्ण हो जावे वह मांसमें प्राप्त हुआ पित्त जानना उसमें तीव्र पीड़ा होती है। हे उत्तम वैद्य ! इसकी सिद्धिके वास्ते औषधको कहेंगे ॥ ५ ॥ कुछ दग्ध हुए पुरुषके सुखके वास्ते कांजीका लेप करना हित है और हे उत्तम वैद्य ! नींवके पत्ते, सफेद संभालू, कूठ, आँवलाके फल ॥ ६ ॥ इनमेंसे जौनसी मिले उसीका लेप करना कछुक दग्ध हुए पुरुषको हित है और मध्यम दग्ध हुए पुरुषके दूधिका लेप करनेसे सुख होता है ॥७॥ शहद कूंठ मंजीठ इनमें घृतको पका लेप करना हित है और कूठ, मुलहटी, चंदन, अरंडके पत्ते ॥ ८ ॥ इनको दूधमें पीस मध्यमदग्धहुए पुरुषके लेप करना हित है ॥ ९ ॥ और घृत, कपूरका चूर्ण, गेरू, लोध इनके सूखे चूर्णको बुरकानेसे राधका नाश होता है और दग्ध हुएका व्रण भर जाता है ॥१०॥ आंवला, तिल, कूठ इनका लेप करनेसे अग्निसे दग्ध हुआ अच्छा होता है और लोध, खश, मंजीठ इनको शीतल जलमें पीस लेप करना ॥११॥ अथवा अलसीका तेल, मुलहटी, घृत इनका लेप करना हित है । दग्ध हुएका घाव भरता है और दाहका नाश होता है ॥ १२ ॥ अथ धूमपानाच्चिकित्सा । धूमोपघाते वमनं क्षीरपानं तथोपरि ॥ जल च तरणं श्रेष्ठं धूमदाहोपशान्तये ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चिकि- त्सास्थानं नामाष्टपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इति तृतीयस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥ धूँवाँसे व्याकुल हुए पुरुषको दूध पिलाना हित है और जलमें तैरना श्रेष्ठ है और धूवाँके दाहकी निवृत्ति होती है ॥ १३ ॥ इति वेरीनवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां चिकित्सास्थाने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इति तृतीयस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थस्थानम् । प्रथमोऽध्यायः १. अथ तुलामानविधिः । आत्रेय उवाच ॥ सर्षपस्य चतुर्थांशोऽणुः ॥ चतुःसर्षपैर्माषः ॥ चतुर्माषैर्वल्लः ॥ चतुर्वल्लैः सुवर्णैः कर्षः॥चतुष्कर्षैः पलम्॥चतु- ष्पलैः कुडवः ॥ चतुष्कुडवैः प्रस्थः॥चतुष्प्रस्थैराढकः ॥चतु- र्भिराढकैर्द्रोणः ॥ १ ॥ शुष्काणामौषधानाञ्च मानञ्च द्विगुणं भवेत् ॥ आर्द्राणामथ सर्वेषां विज्ञातव्यस्तुलाविधिः ॥ २ ॥ सरसोंके चौथे हिस्सेको अणु कहते हैं, चार सरसोंका एक माष, चार माषोंका एक वल्ल और वल्ल प्रमाणको सुवर्णनामक भी कहते हैं और चार वल्लोंका अर्थात् चार सुवर्णोंका एक कर्ष होता है, चार कर्षोंका एक पल और चार पलोंका एक कुडव, चार कुडवोंका एक प्रस्थ, चार प्रस्थोंका एक आढक, चार आढकोंका एक द्रोण होता है ॥ १ ॥ सूखी हुई औषधोंका दूना प्रमाण लेवे और गीली औषधोंको कहे हुए प्रमाणके अनुसार लेवे ॥ २ ॥ अथ अन्यमत । सप्तभिर्यवशतैः साष्टषष्टिभिः पलं भवति ॥ चतुर्भिः पलैः कु- डवः॥ चतुर्भिः कुडवैः प्रस्थः॥ प्रस्थैश्चतुर्भिराढकः ॥ चतुर्भि- राढकैः कंसः॥ द्वे पले प्रसृतिर्भवेत् ॥ ३ ॥ मस्तुतैलारनालानां क्षीरमण्डगुडं सिता॥ मधु सद्यं तथा द्राक्षा खर्जूरं गुग्गुलुस्तथा ॥ ४॥ रसोनलवणानाञ्च प्रोक्तावर्द्धार्धमानकौ॥ बिडालपदिका- मात्रं कर्षशब्दोऽभिधीयते ॥ ५ ॥ वटोदुम्बरमात्रेण पलमौडु- म्बरं विदुः ॥ चतुष्पलं बिल्वमानं पले द्वेऽञ्जलिरुच्यते॥६॥ कुडवं चाञ्जलिद्वे च वक्ष्यमाणं महामते॥७॥चतुरंगुलविस्तारं चतुरंगुलमुन्नतम् ॥ काष्ठजं मृन्मयं वापि कुडवं तं विनिर्दिशेत् ३१
( ४८२ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने- ॥८॥ चतुष्कुडवैः प्रस्थः स्याच्चतुष्प्रस्थैस्तथाढकः॥ चतुराढ- कः स्याद्द्रोणो मानसंख्या प्रकीर्त्तिता ॥ ९ ॥ वमनं च विरे- कञ्च प्रदद्यात्कर्षमात्रकम् ॥ सन्तर्पणं पलमात्रं चूर्णं कर्षकमा- त्रकम् ॥ १०॥ क्षारमेव पलार्द्धं च कर्षं चैव हरीतकीम् ॥ पलं रसोनकल्कञ्च पलं गुग्गुलुमेव च ॥११॥ पलञ्च सूरणं कल्कं दापयेच्च सुपण्डितः॥अन्यानि चूर्णलोहानि कर्षमात्राणि दाप- येत्॥१२॥ज्ञात्वा देहबलं सम्यगुत्तमाधममध्यमम् ॥ लेहं चूर्णं कषायं च दापयेद्विधिवत्सुधीः॥ १३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने तुलामानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥ सातसौ अरसठ ७६८ जवोंका एक पल, चार पलोंका एक कुडव, चार कुडवोंका एक प्रस्थ, चार प्रस्थोंका एक आढक होता है, चार आढकोंका एक कंस होता है और दो पलोंकी एक प्रसृति होती है ॥ ३ ॥ दहीका मस्तु, तेल, कांजी, दूध, मंड अर्थात् छाहकी कूही, गुड़, मिसरी और शहद, मदिरा, दाख, खजूर, गूगल ॥ ४ ॥ लस्सन, नमक इनका गीला प्रमाण अर्थात् सूखी औषधोंसे दूना प्रमाण कहा है और बिडालपदिका यह शब्द कर्ष प्रमाणका वाचक है ॥ ५ ॥ वट, उदुम्बर अर्थात् गूलरका फल इन शब्दोंसे पल अर्थात् चार तोला प्रमाणका ग्रहण जानना और चार पलोंका बिल्वसंज्ञक प्रमाण होता है और दो पलोंको अञ्जलि कहते हैं ॥ ६॥ दो अञ्जलियोंका एक कुडव होता है। हे महामते ! ऐते प्रमाण कहा है ॥ ७ ॥ चार अंगुल प्रमाणका और चार अंगुल ऊंचा ऐसा काष्ठका पात्र अथवा मृत्तिकाका पात्र उसको कुडव कहते हैं ॥ ८ ॥ और चार कुडवोंका प्रस्थ होता है और चार प्रस्थोंका आढक होता है,चार आढ- कोंका द्रोण होता है, ऐसे प्रमाणकी संख्या कही है ॥ ९ ॥ वमन और जुलाबमें कर्षप्रमाण मात्रा देनी और संतर्पण औषध पलप्रमाण देनी और चूर्ण कर्षप्रमाण देना चाहिये ॥ १० ॥ क्षार औषधका आधा पल प्रमाण है हरड़ेका कर्षप्रमाण देना है और लहसुनका कल्क,गूगल,इनका पलप्रमाण है ॥ ११ ॥ उत्तम वैद्य जमीकन्दके कल्कको भी पलप्रमाण देवे और अन्य लोहआदिकोंके चूर्णको कर्षप्रमाण देवे ॥ १२ ॥ सम्यक् प्रकारसे देहके बलाबलको विचारि उत्तम, मध्यम, अधम ऐसे तीन प्रकारकी मात्रा देनी चाहिये ॥ १३ ॥ इति बेरीनिवासि- बुधशिवसहाय० हारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने तुलामानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८३ ) द्वितीयोऽध्यायः २. -०-०-०- अथ तैलपाकविधि । आत्रेय उवाच ॥ पाकश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तैलानां शृणु पुत्रक ॥ खरचिक्कणमध्यस्तु विशोषी चापरो मतः ॥ १॥ दुग्धारानाल- क्वाथश्च दधि वा शोषयत्यपि ॥ नचार्द्रता चौषधानां निष्फेनो विमलस्तु यः ॥२॥ मञ्जिष्ठारसासङ्काशो भवेत्सुखरपाकगः ॥ वातघ्नः सोऽपि विज्ञेयो मर्दनाभ्यञ्जने हितः ॥३॥सफेनो मध्य- पाकी च द्रवो भवति पिण्डितः॥नातिफेनमफेनं वा मध्यपाकं विनिर्दिशेत् ॥४॥ बस्तौ पाने च शस्तश्च त्रिदोषघ्नं भिषग्वर ॥ सफेनश्चन्द्रभो यस्य भवेत्स्वस्थसमो द्रवः ॥५ ॥ स च चि- क्कणकः पाको नस्ये प्रोक्तो हितः सदा ॥ ६ ॥ सधूमश्चातिद- ग्धश्च दग्धगन्धरसस्तथा ॥विज्ञेयो वातशोषी च वर्जितः सर्व- कर्मसु ॥ ७ ॥ मर्दने खरपाकश्च बस्तौ चिक्कणपाककः॥बस्तौ पाने मध्यपाको विशोषी वर्जितस्तथा ॥८॥ पक्षे सिध्यति तै- लञ्च सप्ताहे घृतमेव च॥कषायः प्रहरेणापि यत्नेनैव प्रसाधयेत् ॥ ९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने तैलपाक- विधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ हे पुत्र ! तैलोंका पाक चार प्रकारका कहा है सो सुनो । खर, चिक्कण, मध्य, विशोषी ऐसे हैं ॥ १ ॥ जहां दूध, कांजी इत्यादिकोंके क्वाथको सुखा केवल तैलमात्र बाकी रह जावे और औषधोंका आलापन नहींहो, झाग नहीं हो, निर्मल हो ॥ २ ॥ मँजीठके रंगके समान वर्णवाला हो वह खरपाक अर्थात् तीक्ष्ण पाकवाला तैल जानना । वह वातको नाशता है, मर्दन मालिस इनमें हित है ॥ ३ ॥ झागोंसहित हो, मध्यम पाकवाला हो और जिसके द्रवमें चलनेमें बूंदसी बंधजावे, अत्यंत झाग नहीं हों अथवा झाग हों वह मध्यमपाकी तैल कहाता है ॥४॥ हे उत्तम वैद्य ! वह तैल बस्तिकर्ममें,पीनेमें श्रेष्ठ है, त्रिदोषको नाशता है और जिसमें चंद्रमाके समान सफेद २ झाग हों और विना पका हुआ, स्वच्छ तेलके समान पतला हो ॥ ॥ ५ ॥ वह चिक्कणपाकवाला तेल कहाता है, नस्य देनेमें हित है ॥ ६ ॥ जिसमें
( ४८४ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने-
धूवाँ हो, अत्यन्त दग्ध हो गया हो और जिसका रस गंध दग्ध हो गया हो वह विशोषी पाकवाला तेल कहाता है वह सब कर्मोंमें वर्जित है ॥ ७ ॥ मर्दन करनेमें खरपाक अर्थात् तीक्ष्ण पाकवाला तेल हित है और बस्तिकर्ममें चिकणपाकवाला तेल हित है और मध्यपाकी तेल बस्तिमें तथा पीनेमें श्रेष्ठ है, विशोषी तेल सब कर्मोंमें वर्जित है ॥ ८ ॥ तेल पंद्रह दिनमें सिद्ध होता है अर्थात् बरतनेलायक होता है, घृत सात दिनमें सिद्ध होता है, काथ एक पहरमें सिद्ध होता है ऐसे यत्नकरके सिद्ध करे ॥ ९ ॥ इति बेरीनिवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने तैलपाकविधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः ३. अथ निरूहबस्तिक्रमविधिः ।
आत्रेय उवाच ॥ चतुरङ्गुलां वेणुमयीं नाडीं प्रतिलक्षणं कृत्वा तया बस्तिप्रतिकर्म कुर्यात् ॥ १ ॥ नातिचोष्णे च काले च न शीते न च भोजिते ॥ न च निद्रालौ मूत्रार्त्ते विष्ठार्त्ते न च वेदभाक् ॥ २॥ निरूहं बस्तिकर्म च कारयेत्तं नरस्य च ॥ ३ ॥ आदौ मूत्रविष्ठोत्सर्गं कृत्वा गुदं प्रक्षाल्य नातिशिथिलशय्यायां शाययित्वा वामाङ्गे वामपादं दक्षिणाङ्गे दक्षिणपादं च सं- कोच्य जंघोपरि संस्थाप्य गुदाभ्यन्तरे द्व्यङ्गुलमात्रां नाडीं सञ्चारयेत्सुधीः॥ ततः शनैः शनैर्बस्तिं निष्पीड्य द्विपलपरिमित- ततैलेन निरूहं कुर्यात्॥ निरूहानन्तरं शनैः शनैरुत्तानं शाय- यित्वा ऊर्ध्वीकृत्वा च पश्चात्संकोच्य पाणिभिः पञ्चवारान्स्फि- क्पिण्डांस्त्रोटयेत्॥ ततः स्वस्थं कृत्वा क्षणेनापि आमाशयं मल- स्थानं बोधयति॥ बस्त्युदरवातान्दोषान्निवारयति॥ पण्डितास्तं बस्तिनिरूहं तद्बस्तिकर्म च विदुः॥ ४॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने निरूहबस्तिकर्मविधिर्नाम तृतीयो- ऽध्यायः ॥ ३ ॥
अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८५ ) आत्रेयजी कहते हैं-चार अंगुल प्रमाण बाँसकी नलिका बना उसके चर्मकी वस्ति बांध भीतर प्रवेश करनेको पिचकारी बना उससे वस्तिकर्म अर्थात् पिचकारी चढ़ानेका कर्म करे ॥ १ ॥ अत्यंत गरमीका समय न हो और अत्यंत ठंडकका समय नहो,भोजन नहीं किया होता नींद नहीं आती हो, मूत्र तथा विष्ठाकी हाजितसे पीड़ित नहीं हो ॥ २ ॥ ऐसे पुरुषको देखि उसके वस्तिकर्म करे ॥ ३ ॥ पहिले मूत्र और विष्ठाका विसर्जन करवा गुदाको धुवाके पीछे अत्यंत शिथिल न हो ऐसी शय्यापै सुला फिर बाँये अंगकी ओर बाँये पैरको और दाहीने अंगकी ओर दहने पैरको समेटके दवा जंघाके उपरि स्थापित करि उस नलिकाको दो अंगुल प्रमाण गुदाके भीतर चढा देवे पीछे बुद्धिमान् वैद्य शनैः शनैः वस्तिको पीडित कर दो पल अर्थात् ८ तोला प्रमाण तेलसे निरूहवस्तिकर्म करे, पीछे निरूहवस्तिकर्म अर्थात् पिच- कारी चढानेका कर लेवे,तब शनैः शनैः सीधा सुलाके उपरको करवाके संकोच करवा वैद्य- जन अपने हाथसे पांच वार स्फिक् अर्थात् कूलाको मसले उससे पीछे स्वस्थ बिठाकर आमाशय और मलाशयको जरा मले इससे वस्तिदोष, उदरवातरोग इनका निवारण होता है पंडित- जन इसको निरूहवस्ति कहते हैं और इसीको वस्तिकर्मभी कहते हैं ॥ ४ ॥ इति चेरोनि- वासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने निरूहवस्तिकर्मविधिर्नामतृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ४.
अथ स्वेदनविधि ।
स्वेदः सप्तविधिः प्रोक्तो लोष्टस्वेदो बाष्पस्वेदोऽग्निज्यालास्वेदः घटीस्वेदो जलस्वेदः फलस्वेदो वालुकास्वेदश्च ॥ न तैलेन विना स्वेदं कदाचिदपि कारयेत्॥ तैलेनाभ्यज्ययेत्स्वेदं स भवे- द्रुणकारकः ॥ १ ॥ तीव्रज्वरे दाहशोषे तथातीसारपीडिते ॥ मूर्च्छाभ्रमदाहार्ते च विषे स्वेदं न कारयेत् ॥२॥ शूलशोफातुरे वाते शीतश्लेष्मातुरेषु च ॥ एतेषां शस्यते स्वेदो नराणां सुखदा- यकः ॥३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने स्वेद- नविधिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
स्वेद अर्थात् पसीना सात प्रकारका होता है। लोष्टस्वेद, अर्थात् मृत्तिकाके पिंडआदिका स्वेद १ बाष्पस्वेद भांफोंका स्वेद २ अग्निज्वालास्वेद ३ घटीस्वेद ४ जलस्वेद, ५ फलस्वेद ६ वालुकास्वेद ७ ऐसे सात प्रकारका है ॥ तेलके चोपरे बिना किसी समयमें भी पसीना नहीं
( ४८६ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने- दिवाना चाहिये, तेल चोपरि के जो पसीना दियाया जाता है वह गुण करनेवाला है ॥ १ ॥ तीव्रज्वर, दाहशोष, अतिसारसे पीडित, मूर्च्छा, भ्रम, दाह इनसे पीड़ित विषसे युक्त इन पुरुषोंके पसीना नहीं दिवावे ॥ २ ॥ शूल, शोजा इनसे पीड़ित, वातसे युक्त, शीत, कफ, इनसे पीड़ित इन पुरुषोंको पसीना दिवाना श्रेष्ठ कहा है । सुख देनेवाला है ॥ ३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने स्वेदविधिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ५. अथ रक्तावसेचन फस्त खुलानेकी विधि । रक्तावसेचनं चतुर्भिः प्रकारैर्भवति ॥ शिराविरेचनेनापि अला- बुभिस्तथैव च ॥ श्लक्ष्णशृङ्गैर्जलौकाभी रक्तञ्च स्रावयेद्बुधः ॥ १॥ पूर्वाह्ने चापराह्वे च नात्युष्णे नातिशीतले ॥ यवागूपरि- पीतस्य शोणितं मोक्षयेद्विषक् ॥२॥ शिरोरोगेषु सर्वेषु नासा- मध्यपुटे तथा ॥ असृजं रेचयेद्यत्नात्सर्वदा भिषगुत्तमः ॥ ३ ॥ ललाटमध्ये भ्रुवोरुपरिष्टादङ्गुलद्वयं त्यक्त्वा शिरां रेचयेत् ॥ बाह्वोः कूर्परमध्ये शिरां बन्धयेत् ॥ मणिबन्धसन्धौ अङ्गुष्ठ- मूलचतुष्टयमङ्गुलञ्च विहाय शिरां बन्धयेत् ॥ नातिपार्श्वे चतु- रङ्गुलं विहाय शिरां बन्धयेत् ॥ घुण्टिकां शिरां पादे बन्धयेत् ॥ अपरमपि ग्रंथविस्तारभयान्नोक्तम् ॥ अलाबुशृङ्गैः रक्तावसेचनं सर्वैरपि ज्ञातव्यम् ॥ ४ ॥ आत्रेयजी कहते हैं—बुद्धिमान् मनुष्य चारप्रकारसे रक्तकी फस्त खुलाये । नसोंपे फस्त खुलाना, तूंबियोंसे फस्त खुलाना, बारीक सींगियोंसे फस्त खुलाना, जोकोंसे रुधिर निकसाना ऐसे चारप्रकारसे रक्तावसेचन होता है ॥ १ ॥ दुपहरे पहिले अथवा तीसरे पहरमें अत्यंत गरमी नहीं हो और अत्यंत ठंडक नहींहो तब यवागू अर्थात् गुड़िय़ानी पिलाये हुए मनुष्यका रुधिर निकसावे ॥ २ ॥ और उत्तम वैद्यको सम्पूर्ण शिरके रोगोंमें नासिकाके मध्य पुटमें फस्त खुलानी चाहिये ॥ ३ ॥ मस्तकमें भुकुटियोंसे ऊपरि दो अंगुल जगहको त्याग नाड़ीको बींधै और बाहुओंकी नाड़ीको कोहनीके मध्यमें बींधै और पोहचेकी सन्धिमें अंगुठेकी जड़में
अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८७ ) चार अंगुल जगहको त्यागके नाड़ीको वींधै, चार अंगुल जगहको त्याग अतिसमीपकी नसको नहीं वींधे और पैरमें टांकनेकी नसोंको वींधे और अन्य प्रकरण ग्रन्थके विस्तार होनेके भयसे नहीं कहा है । इस प्रकरणमें तुम्बी सींगी इत्यादिकोंसे रुधिरका निकसाना सबको ज्ञात है और श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ अथ रक्तलक्षण । सकृष्णं फेनिलं श्यामं रक्तं तद्वातदोषजम् ॥ सर्वलक्षणसंपन्नं विज्ञेयं तन्त्रिदोषजम् ॥५॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने रक्तावसेचनविधिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ जो काला तथा झागोंवाला रक्तहो वह वातके दोषका रुधिर जानना, जो सब लक्षणोंसे संयुक्त हो वह त्रिदोषसे रुधिर जानना ॥ ५ ॥ इति वेरीनिवासिशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादि- तहारीतसंहिताभाषाटीकायां चतुर्थे सूत्रस्थाने रक्तावसेचनविधिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः ६. अथ जलौकाचारविधि । आत्रेय उवाच ॥ जलौकाश्चतुर्विधाः प्रोक्ता इन्द्रायुधा रोहिणी कालिका धूम्रा चेति ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-जोंक चार प्रकारकी कही हैं इंद्रायुधा १ रोहिणी २ कालिका ३ धूम्रा ४ ॥ १ ॥ अथ इंद्रायुधाके लक्षण । नीलवर्णा पार्श्वेरक्ता तीक्ष्णमुखी गम्भीरनिर्मलोदके पाषाण- सन्धौ च प्रविशति ॥ तया विद्रध्युदरदाहशोफमूर्च्छाविषायुप- द्रवयति ॥ २ ॥ जो नीलवर्णवालीहो, पशलियोंकी ओर लालहो, तीक्ष्णमुखवाली हो यह जोक गंभीर निर्मलजलमें और पर्वतकी संधिमें रहती है इसकरके विद्रधि, उदररोग, दाह, शोष, मूर्च्छा, विष इत्यादिकोंको करती है ॥ २ ॥ अथ रोहिणीके लक्षण । नीलवर्णा पार्श्वपीता शङ्खमुखी पद्मनाले प्रविशति ॥ तया विद्रधिविसर्पशोफायुपद्रवयति ॥ ३ ॥
( ४८८ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने-अ० ६ ] नीलेवर्णवाली और पशलियोंकी ओर पीलेवर्णवाली शंखसरीखे मुखवाली ऐसी रोहिणी जोख होती है यह कमलकी नालीमें रहती है इसके लगानेसे विष, विद्रधि, शोजा ये उपद्रव होते हैं ॥ ३ ॥ अथ कालिका जोखके लक्षण । कृष्णा कालिका मत्स्याशये दूरे त्याज्या ॥ ४ ॥ कालेवर्णवाली जोख मत्स्याशय अर्थात् मच्छोंके वासमें रहती है। यह दूरसे त्याग देनी चाहिये ॥ ४ ॥ अथ धुम्राजोखके लक्षण । धूम्रा कपोतमहिषवर्णा पीतोदरी अर्द्धचन्द्रमुखी कर्दमे कलुषो- दके प्रविशति ॥ सा रक्तावसेचनयोग्या निरुपद्रवा च ॥ ५॥ धूम्रा जोख, कपोत और भैंससरीखे वर्णवाली होती है, पीले उदरवाली होती है, आध चंद्रमाके समान मुखवाली होती है। यह कीचमें और गिधलेहुए जलमें रहती है यह रुधिर निकालनेके योग्य कही है और उपद्रवोंसे रहित है ॥ ५ ॥ अथ जोख लगवानेका क्रम अवस्थानं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य नवनीतेन म्रक्षयित्वा उष्णोदकेन प्रक्षालयेत् ॥ पश्चात् तत्र जलौकावचारणीया ॥ ६ ॥जलौका रक्तपूर्णा पश्चात् पातिता॥ तस्या मुखं लवणेन मूत्रेण वा प्रक्षा- लयेत् ॥ अथवा शनैर्गोस्तनवदुह्यते॥पुनर्नवनीतेन मुखमालि- प्यावचारणीया ॥ दुष्टरक्ते विनिर्गते दंशं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य घृतमधुनाभ्यज्य वस्त्रेण बध्नीयात् ॥ ७ ॥ इत्यात्रेयभा०हा० चतुर्थसूत्रस्थाने जलौकावचारविधिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ॥ जोख लगवानेके योग्य जगहको कांजीसे धोके नौनीघृत लगा पीछे गरम जलसे धोके पीछे जोख लगवानी चाहिये ॥ ६ ॥ जब जोख रक्तसे पूरण होजाये तब उसको गिरा देवे और उसके मुखको नमकसे अथवा गोमूत्रसे धो देवे अथवा शनैः शनैः गौके थनकी तरह सूत देवे पीछे मुखके नौनीघृत लगाके फिर लगवा देवे और जब दुष्ट रुधिर निकल जावे तब जोखके डंकस्थानको कांजीसे धोके घृत और शहदसे चोपरी वस्त्रसे बांध देवे ॥७ ॥ इति बेरीनिवासि०हारीतसं०भा० सूत्रस्थाने जलौकाचारविधिर्नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ॥ ४ ॥