हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ आस्फालित हाडकी चिकित्सा । विपाके रक्तस्रावश्च स्वेदनञ्च विधीयते ॥ भग्नवत्प्रतीकारश्च का- रयेद्विधिपूर्वकम् ॥ ३९ ॥ आस्फालिते प्रतीकारे ज्ञातव्यश्च भिषग्वर ॥ ऊहापोहैश्च कर्त्तव्यस्तेन सम्पद्यते सुखम् ॥ ४० ॥ पकेहुए हाड़में रुधिर गिरता हो तो पसीना दिवाना हित है और भग्न हुए हाड़के समान इसका इलाज करे ॥ ३९ ॥ ऐसे वैद्यजनोंको जानना चाहिये और अपनी बुद्धिके बलके अनुसार चिकित्सा करे, इससे रोगीको सुख होता है ॥ ४० ॥ अथ अभिघात अर्थात् चोट लगी हुईकी चिकित्सा । शिरोऽभिघातजो दोषः शिरोरोगः प्रकीर्त्तितः ॥ उरसा चाभि- घातेन यकृद्गुल्मश्च जायते ॥ ४१ ॥ इत्येवञ्च प्रतीकारं कुर्य्या- द्रक्तावसेचनम् ॥ स्वेदनञ्च प्रयोक्तव्यं भिषजा कर्मसिद्धये ॥ ४२॥ न च तैलञ्च भोक्तव्यं नात्युष्णकटुकं तथा॥ मत्स्यानि न च मांसानि घनानि च गुरूणि च ॥४३॥ श्वेतशालिसमुद्भूतं यूषं चैवाढकीषु च ॥ शशलावकवार्त्ताककङ्कोलं तण्डुलीय कम् ॥ ॥४४॥ शतपुष्पाद्यमन्यञ्च न च हिङ्गुसमन्वितम् ॥ लवणं नाति- भोक्तव्यं यदीच्छेदात्मनः सुखम् ॥४५॥ व्यायामञ्च व्यवायञ्च दिवानिद्रां तथा क्रमम् ॥ वर्जयेत्सुखसम्पत्तिर्नरश्च प्रतिपद्यते ॥ ॥४६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने भग्नचिकित्सा- नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ शिरमें चोट लगनेसे कुपित हुए दोषको शिरोरोग कहते हैं और छातीमें चोट लगनेसे यकृत् रोग गुल्म ये रोग होते हैं ॥ ४१ ॥ इनको दूर करनेके वास्ते रक्तको निकसावे और पसीना दिवावे ॥ ४२ ॥ और तेलका भोजन नहीं करे और अत्यंत गरम चर्चरा ऐसा भोजन नहीं करे और मछलियोंका मांस, कड़े तथा भारी पदार्थ इनको नहीं खावे ॥ ४३ ॥ शालिसंज्ञक सफेद चावलोंका यूष, तूरीधान्य, शशा, लावापक्षी, बत्तक इनका मांस, कंकोला, चौलाईका शाक ॥ ४४ ॥ सौंफ, हींग आदि और नमक, इनको इच्छापूर्वक कम खावे इनसे सुख होता है ॥ ४५ ॥ और कसरत, स्त्रीसंग, दिनमें सोना, टहल,कदमी करना इन्होंको वर्जदेवे तब सुख उत्पन्न होता है ॥ ४६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने भग्नचिकित्सानाम सप्तपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥