भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० ५८ ] भाषाटीकासमेता । ( ४७९ ) अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५८. अथाग्निदग्धचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अग्निदग्धं नरं दृष्ट्वा तच्च दग्धं चतुर्विधम् ॥ ईषदग्धं मध्यदग्धमतिदग्धञ्च वेदभाक् ॥ १ ॥ सम्यग्दग्धं भिषक्श्रेष्ठ लक्षणं शृणु पुत्रक ॥ २ ॥ अतिदग्धं मांसगं स्या- द्वातपित्तकफाश्रितम् ॥ सम्यग्दग्धञ्च निर्दोषं विज्ञेयं च चतुर्वि- धम् ॥ ३ ॥ त्वचा विशीर्य्यते येन स दाहः पित्तजो भवेत् ॥ सरक्तश्च सपित्तश्च पित्तकोपात्प्रदृश्यते ॥ ४ ॥ कृष्णवर्णञ्च तत्पित्तं मांसगं तीव्रवेदनम् ॥ तस्य वक्ष्यामि संसिद्धयै भेषजं भिषजां वर ॥ ५ ॥ ईषदग्धे काञ्जिकस्य लेपनं सुखहेतवे ॥ निम्बपत्राणि सुरसा कुष्ठं धात्रीफलानि च ॥ ६ ॥ ईषदग्धे यथालाभे लेपनं भिषगुत्तम ॥ मध्यदग्धे पयस्या या लेपनी सुखकारिणी ॥ ७ ॥ मधुकुष्ठकमञ्जिष्ठाघृतं पक्वं हितं मतम् ॥ कुष्ठञ्च यष्टीमधुकं चन्दनैरण्डपत्रकम् ॥ ८ ॥ मध्यदग्धे हितो लेपो दुग्धेन परिपेषितः ॥ ९ ॥ घृतकर्पूरचूर्णञ्च गैरकं रोध्र- मेव च ॥ शुष्कचूर्णं पूयहरं दग्धं संरोहयत्यपि ॥१०॥ आम- लक्या तिलं कुष्ठं लेपनं वाग्निदग्धके ॥ रोध्रोशीरं समङ्गा च लेपनं शीतवारिणा ॥ ११ ॥ अतसीस्नेहमभ्यङ्गमधुयष्टीघृतेन तु ॥ लेपाभ्यङ्गे हितं दग्धरोहणं दाहवारणम् ॥१२॥ आत्रेयजी कहते हैं-अग्निसे दग्ध हुए मनुष्यको देखे, चारप्रकारका अग्निदग्ध होता है कुछेक दग्ध, मध्यदग्ध, अतिदग्ध ॥ १ ॥ सम्यक्दग्ध, ऐसे चारप्रकारका होता है। हे पुत्र ! अब इनके लक्षणोंको सुनो ॥२॥ जो अत्यंत दग्ध हो वह मांसमें प्राप्त होता है और वात, पित्त, कफ इनके आश्रय होता है, जो सम्यक् अर्थात् सारा दग्ध होजावे वह दोषोंसे रहित दग्ध होता है वह चार प्रकारका दग्ध होता है ॥ ३ ॥ जिसमें त्वचा विखर जावे और दाह हो और रक्त तथा पित्त दीखे वहां दग्ध हुएमें पित्तका कोप जानना ॥ ४ ॥ और