हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-अ० ५८ ] जहां काला वर्ण हो जावे वह मांसमें प्राप्त हुआ पित्त जानना उसमें तीव्र पीड़ा होती है। हे उत्तम वैद्य ! इसकी सिद्धिके वास्ते औषधको कहेंगे ॥ ५ ॥ कुछ दग्ध हुए पुरुषके सुखके वास्ते कांजीका लेप करना हित है और हे उत्तम वैद्य ! नींवके पत्ते, सफेद संभालू, कूठ, आँवलाके फल ॥ ६ ॥ इनमेंसे जौनसी मिले उसीका लेप करना कछुक दग्ध हुए पुरुषको हित है और मध्यम दग्ध हुए पुरुषके दूधिका लेप करनेसे सुख होता है ॥७॥ शहद कूंठ मंजीठ इनमें घृतको पका लेप करना हित है और कूठ, मुलहटी, चंदन, अरंडके पत्ते ॥ ८ ॥ इनको दूधमें पीस मध्यमदग्धहुए पुरुषके लेप करना हित है ॥ ९ ॥ और घृत, कपूरका चूर्ण, गेरू, लोध इनके सूखे चूर्णको बुरकानेसे राधका नाश होता है और दग्ध हुएका व्रण भर जाता है ॥१०॥ आंवला, तिल, कूठ इनका लेप करनेसे अग्निसे दग्ध हुआ अच्छा होता है और लोध, खश, मंजीठ इनको शीतल जलमें पीस लेप करना ॥११॥ अथवा अलसीका तेल, मुलहटी, घृत इनका लेप करना हित है । दग्ध हुएका घाव भरता है और दाहका नाश होता है ॥ १२ ॥ अथ धूमपानाच्चिकित्सा । धूमोपघाते वमनं क्षीरपानं तथोपरि ॥ जल च तरणं श्रेष्ठं धूमदाहोपशान्तये ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चिकि- त्सास्थानं नामाष्टपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इति तृतीयस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥ धूँवाँसे व्याकुल हुए पुरुषको दूध पिलाना हित है और जलमें तैरना श्रेष्ठ है और धूवाँके दाहकी निवृत्ति होती है ॥ १३ ॥ इति वेरीनवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां चिकित्सास्थाने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इति तृतीयस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥