भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अथ चतुर्थस्थानम् । प्रथमोऽध्यायः १. अथ तुलामानविधिः । आत्रेय उवाच ॥ सर्षपस्य चतुर्थांशोऽणुः ॥ चतुःसर्षपैर्माषः ॥ चतुर्माषैर्वल्लः ॥ चतुर्वल्लैः सुवर्णैः कर्षः॥चतुष्कर्षैः पलम्॥चतु- ष्पलैः कुडवः ॥ चतुष्कुडवैः प्रस्थः॥चतुष्प्रस्थैराढकः ॥चतु- र्भिराढकैर्द्रोणः ॥ १ ॥ शुष्काणामौषधानाञ्च मानञ्च द्विगुणं भवेत् ॥ आर्द्राणामथ सर्वेषां विज्ञातव्यस्तुलाविधिः ॥ २ ॥ सरसोंके चौथे हिस्सेको अणु कहते हैं, चार सरसोंका एक माष, चार माषोंका एक वल्ल और वल्ल प्रमाणको सुवर्णनामक भी कहते हैं और चार वल्लोंका अर्थात् चार सुवर्णोंका एक कर्ष होता है, चार कर्षोंका एक पल और चार पलोंका एक कुडव, चार कुडवोंका एक प्रस्थ, चार प्रस्थोंका एक आढक, चार आढकोंका एक द्रोण होता है ॥ १ ॥ सूखी हुई औषधोंका दूना प्रमाण लेवे और गीली औषधोंको कहे हुए प्रमाणके अनुसार लेवे ॥ २ ॥ अथ अन्यमत । सप्तभिर्यवशतैः साष्टषष्टिभिः पलं भवति ॥ चतुर्भिः पलैः कु- डवः॥ चतुर्भिः कुडवैः प्रस्थः॥ प्रस्थैश्चतुर्भिराढकः ॥ चतुर्भि- राढकैः कंसः॥ द्वे पले प्रसृतिर्भवेत् ॥ ३ ॥ मस्तुतैलारनालानां क्षीरमण्डगुडं सिता॥ मधु सद्यं तथा द्राक्षा खर्जूरं गुग्गुलुस्तथा ॥ ४॥ रसोनलवणानाञ्च प्रोक्तावर्द्धार्धमानकौ॥ बिडालपदिका- मात्रं कर्षशब्दोऽभिधीयते ॥ ५ ॥ वटोदुम्बरमात्रेण पलमौडु- म्बरं विदुः ॥ चतुष्पलं बिल्वमानं पले द्वेऽञ्जलिरुच्यते॥६॥ कुडवं चाञ्जलिद्वे च वक्ष्यमाणं महामते॥७॥चतुरंगुलविस्तारं चतुरंगुलमुन्नतम् ॥ काष्ठजं मृन्मयं वापि कुडवं तं विनिर्दिशेत् ३१