हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८२ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने- ॥८॥ चतुष्कुडवैः प्रस्थः स्याच्चतुष्प्रस्थैस्तथाढकः॥ चतुराढ- कः स्याद्द्रोणो मानसंख्या प्रकीर्त्तिता ॥ ९ ॥ वमनं च विरे- कञ्च प्रदद्यात्कर्षमात्रकम् ॥ सन्तर्पणं पलमात्रं चूर्णं कर्षकमा- त्रकम् ॥ १०॥ क्षारमेव पलार्द्धं च कर्षं चैव हरीतकीम् ॥ पलं रसोनकल्कञ्च पलं गुग्गुलुमेव च ॥११॥ पलञ्च सूरणं कल्कं दापयेच्च सुपण्डितः॥अन्यानि चूर्णलोहानि कर्षमात्राणि दाप- येत्॥१२॥ज्ञात्वा देहबलं सम्यगुत्तमाधममध्यमम् ॥ लेहं चूर्णं कषायं च दापयेद्विधिवत्सुधीः॥ १३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने तुलामानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥ सातसौ अरसठ ७६८ जवोंका एक पल, चार पलोंका एक कुडव, चार कुडवोंका एक प्रस्थ, चार प्रस्थोंका एक आढक होता है, चार आढकोंका एक कंस होता है और दो पलोंकी एक प्रसृति होती है ॥ ३ ॥ दहीका मस्तु, तेल, कांजी, दूध, मंड अर्थात् छाहकी कूही, गुड़, मिसरी और शहद, मदिरा, दाख, खजूर, गूगल ॥ ४ ॥ लस्सन, नमक इनका गीला प्रमाण अर्थात् सूखी औषधोंसे दूना प्रमाण कहा है और बिडालपदिका यह शब्द कर्ष प्रमाणका वाचक है ॥ ५ ॥ वट, उदुम्बर अर्थात् गूलरका फल इन शब्दोंसे पल अर्थात् चार तोला प्रमाणका ग्रहण जानना और चार पलोंका बिल्वसंज्ञक प्रमाण होता है और दो पलोंको अञ्जलि कहते हैं ॥ ६॥ दो अञ्जलियोंका एक कुडव होता है। हे महामते ! ऐते प्रमाण कहा है ॥ ७ ॥ चार अंगुल प्रमाणका और चार अंगुल ऊंचा ऐसा काष्ठका पात्र अथवा मृत्तिकाका पात्र उसको कुडव कहते हैं ॥ ८ ॥ और चार कुडवोंका प्रस्थ होता है और चार प्रस्थोंका आढक होता है,चार आढ- कोंका द्रोण होता है, ऐसे प्रमाणकी संख्या कही है ॥ ९ ॥ वमन और जुलाबमें कर्षप्रमाण मात्रा देनी और संतर्पण औषध पलप्रमाण देनी और चूर्ण कर्षप्रमाण देना चाहिये ॥ १० ॥ क्षार औषधका आधा पल प्रमाण है हरड़ेका कर्षप्रमाण देना है और लहसुनका कल्क,गूगल,इनका पलप्रमाण है ॥ ११ ॥ उत्तम वैद्य जमीकन्दके कल्कको भी पलप्रमाण देवे और अन्य लोहआदिकोंके चूर्णको कर्षप्रमाण देवे ॥ १२ ॥ सम्यक् प्रकारसे देहके बलाबलको विचारि उत्तम, मध्यम, अधम ऐसे तीन प्रकारकी मात्रा देनी चाहिये ॥ १३ ॥ इति बेरीनिवासि- बुधशिवसहाय० हारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने तुलामानविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥