हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८३ ) द्वितीयोऽध्यायः २. -०-०-०- अथ तैलपाकविधि । आत्रेय उवाच ॥ पाकश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तैलानां शृणु पुत्रक ॥ खरचिक्कणमध्यस्तु विशोषी चापरो मतः ॥ १॥ दुग्धारानाल- क्वाथश्च दधि वा शोषयत्यपि ॥ नचार्द्रता चौषधानां निष्फेनो विमलस्तु यः ॥२॥ मञ्जिष्ठारसासङ्काशो भवेत्सुखरपाकगः ॥ वातघ्नः सोऽपि विज्ञेयो मर्दनाभ्यञ्जने हितः ॥३॥सफेनो मध्य- पाकी च द्रवो भवति पिण्डितः॥नातिफेनमफेनं वा मध्यपाकं विनिर्दिशेत् ॥४॥ बस्तौ पाने च शस्तश्च त्रिदोषघ्नं भिषग्वर ॥ सफेनश्चन्द्रभो यस्य भवेत्स्वस्थसमो द्रवः ॥५ ॥ स च चि- क्कणकः पाको नस्ये प्रोक्तो हितः सदा ॥ ६ ॥ सधूमश्चातिद- ग्धश्च दग्धगन्धरसस्तथा ॥विज्ञेयो वातशोषी च वर्जितः सर्व- कर्मसु ॥ ७ ॥ मर्दने खरपाकश्च बस्तौ चिक्कणपाककः॥बस्तौ पाने मध्यपाको विशोषी वर्जितस्तथा ॥८॥ पक्षे सिध्यति तै- लञ्च सप्ताहे घृतमेव च॥कषायः प्रहरेणापि यत्नेनैव प्रसाधयेत् ॥ ९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने तैलपाक- विधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ हे पुत्र ! तैलोंका पाक चार प्रकारका कहा है सो सुनो । खर, चिक्कण, मध्य, विशोषी ऐसे हैं ॥ १ ॥ जहां दूध, कांजी इत्यादिकोंके क्वाथको सुखा केवल तैलमात्र बाकी रह जावे और औषधोंका आलापन नहींहो, झाग नहीं हो, निर्मल हो ॥ २ ॥ मँजीठके रंगके समान वर्णवाला हो वह खरपाक अर्थात् तीक्ष्ण पाकवाला तैल जानना । वह वातको नाशता है, मर्दन मालिस इनमें हित है ॥ ३ ॥ झागोंसहित हो, मध्यम पाकवाला हो और जिसके द्रवमें चलनेमें बूंदसी बंधजावे, अत्यंत झाग नहीं हों अथवा झाग हों वह मध्यमपाकी तैल कहाता है ॥४॥ हे उत्तम वैद्य ! वह तैल बस्तिकर्ममें,पीनेमें श्रेष्ठ है, त्रिदोषको नाशता है और जिसमें चंद्रमाके समान सफेद २ झाग हों और विना पका हुआ, स्वच्छ तेलके समान पतला हो ॥ ॥ ५ ॥ वह चिक्कणपाकवाला तेल कहाता है, नस्य देनेमें हित है ॥ ६ ॥ जिसमें