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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८३ ) द्वितीयोऽध्यायः २. -०-०-०- अथ तैलपाकविधि । आत्रेय उवाच ॥ पाकश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तैलानां शृणु पुत्रक ॥ खरचिक्कणमध्यस्तु विशोषी चापरो मतः ॥ १॥ दुग्धारानाल- क्वाथश्च दधि वा शोषयत्यपि ॥ नचार्द्रता चौषधानां निष्फेनो विमलस्तु यः ॥२॥ मञ्जिष्ठारसासङ्काशो भवेत्सुखरपाकगः ॥ वातघ्नः सोऽपि विज्ञेयो मर्दनाभ्यञ्जने हितः ॥३॥सफेनो मध्य- पाकी च द्रवो भवति पिण्डितः॥नातिफेनमफेनं वा मध्यपाकं विनिर्दिशेत् ॥४॥ बस्तौ पाने च शस्तश्च त्रिदोषघ्नं भिषग्वर ॥ सफेनश्चन्द्रभो यस्य भवेत्स्वस्थसमो द्रवः ॥५ ॥ स च चि- क्कणकः पाको नस्ये प्रोक्तो हितः सदा ॥ ६ ॥ सधूमश्चातिद- ग्धश्च दग्धगन्धरसस्तथा ॥विज्ञेयो वातशोषी च वर्जितः सर्व- कर्मसु ॥ ७ ॥ मर्दने खरपाकश्च बस्तौ चिक्कणपाककः॥बस्तौ पाने मध्यपाको विशोषी वर्जितस्तथा ॥८॥ पक्षे सिध्यति तै- लञ्च सप्ताहे घृतमेव च॥कषायः प्रहरेणापि यत्नेनैव प्रसाधयेत् ॥ ९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने तैलपाक- विधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ हे पुत्र ! तैलोंका पाक चार प्रकारका कहा है सो सुनो । खर, चिक्कण, मध्य, विशोषी ऐसे हैं ॥ १ ॥ जहां दूध, कांजी इत्यादिकोंके क्वाथको सुखा केवल तैलमात्र बाकी रह जावे और औषधोंका आलापन नहींहो, झाग नहीं हो, निर्मल हो ॥ २ ॥ मँजीठके रंगके समान वर्णवाला हो वह खरपाक अर्थात् तीक्ष्ण पाकवाला तैल जानना । वह वातको नाशता है, मर्दन मालिस इनमें हित है ॥ ३ ॥ झागोंसहित हो, मध्यम पाकवाला हो और जिसके द्रवमें चलनेमें बूंदसी बंधजावे, अत्यंत झाग नहीं हों अथवा झाग हों वह मध्यमपाकी तैल कहाता है ॥४॥ हे उत्तम वैद्य ! वह तैल बस्तिकर्ममें,पीनेमें श्रेष्ठ है, त्रिदोषको नाशता है और जिसमें चंद्रमाके समान सफेद २ झाग हों और विना पका हुआ, स्वच्छ तेलके समान पतला हो ॥ ॥ ५ ॥ वह चिक्कणपाकवाला तेल कहाता है, नस्य देनेमें हित है ॥ ६ ॥ जिसमें

( ४८४ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने-

धूवाँ हो, अत्यन्त दग्ध हो गया हो और जिसका रस गंध दग्ध हो गया हो वह विशोषी पाकवाला तेल कहाता है वह सब कर्मोंमें वर्जित है ॥ ७ ॥ मर्दन करनेमें खरपाक अर्थात् तीक्ष्ण पाकवाला तेल हित है और बस्तिकर्ममें चिकणपाकवाला तेल हित है और मध्यपाकी तेल बस्तिमें तथा पीनेमें श्रेष्ठ है, विशोषी तेल सब कर्मोंमें वर्जित है ॥ ८ ॥ तेल पंद्रह दिनमें सिद्ध होता है अर्थात् बरतनेलायक होता है, घृत सात दिनमें सिद्ध होता है, काथ एक पहरमें सिद्ध होता है ऐसे यत्नकरके सिद्ध करे ॥ ९ ॥ इति बेरीनिवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने तैलपाकविधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

तृतीयोऽध्यायः ३. अथ निरूहबस्तिक्रमविधिः ।

आत्रेय उवाच ॥ चतुरङ्गुलां वेणुमयीं नाडीं प्रतिलक्षणं कृत्वा तया बस्तिप्रतिकर्म कुर्यात् ॥ १ ॥ नातिचोष्णे च काले च न शीते न च भोजिते ॥ न च निद्रालौ मूत्रार्त्ते विष्ठार्त्ते न च वेदभाक् ॥ २॥ निरूहं बस्तिकर्म च कारयेत्तं नरस्य च ॥ ३ ॥ आदौ मूत्रविष्ठोत्सर्गं कृत्वा गुदं प्रक्षाल्य नातिशिथिलशय्यायां शाययित्वा वामाङ्गे वामपादं दक्षिणाङ्गे दक्षिणपादं च सं- कोच्य जंघोपरि संस्थाप्य गुदाभ्यन्तरे द्व्यङ्गुलमात्रां नाडीं सञ्चारयेत्सुधीः॥ ततः शनैः शनैर्बस्तिं निष्पीड्य द्विपलपरिमित- ततैलेन निरूहं कुर्यात्॥ निरूहानन्तरं शनैः शनैरुत्तानं शाय- यित्वा ऊर्ध्वीकृत्वा च पश्चात्संकोच्य पाणिभिः पञ्चवारान्स्फि- क्पिण्डांस्त्रोटयेत्॥ ततः स्वस्थं कृत्वा क्षणेनापि आमाशयं मल- स्थानं बोधयति॥ बस्त्युदरवातान्दोषान्निवारयति॥ पण्डितास्तं बस्तिनिरूहं तद्बस्तिकर्म च विदुः॥ ४॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने निरूहबस्तिकर्मविधिर्नाम तृतीयो- ऽध्यायः ॥ ३ ॥

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८५ ) आत्रेयजी कहते हैं-चार अंगुल प्रमाण बाँसकी नलिका बना उसके चर्मकी वस्ति बांध भीतर प्रवेश करनेको पिचकारी बना उससे वस्तिकर्म अर्थात् पिचकारी चढ़ानेका कर्म करे ॥ १ ॥ अत्यंत गरमीका समय न हो और अत्यंत ठंडकका समय नहो,भोजन नहीं किया होता नींद नहीं आती हो, मूत्र तथा विष्ठाकी हाजितसे पीड़ित नहीं हो ॥ २ ॥ ऐसे पुरुषको देखि उसके वस्तिकर्म करे ॥ ३ ॥ पहिले मूत्र और विष्ठाका विसर्जन करवा गुदाको धुवाके पीछे अत्यंत शिथिल न हो ऐसी शय्यापै सुला फिर बाँये अंगकी ओर बाँये पैरको और दाहीने अंगकी ओर दहने पैरको समेटके दवा जंघाके उपरि स्थापित करि उस नलिकाको दो अंगुल प्रमाण गुदाके भीतर चढा देवे पीछे बुद्धिमान् वैद्य शनैः शनैः वस्तिको पीडित कर दो पल अर्थात् ८ तोला प्रमाण तेलसे निरूहवस्तिकर्म करे, पीछे निरूहवस्तिकर्म अर्थात् पिच- कारी चढानेका कर लेवे,तब शनैः शनैः सीधा सुलाके उपरको करवाके संकोच करवा वैद्य- जन अपने हाथसे पांच वार स्फिक् अर्थात् कूलाको मसले उससे पीछे स्वस्थ बिठाकर आमाशय और मलाशयको जरा मले इससे वस्तिदोष, उदरवातरोग इनका निवारण होता है पंडित- जन इसको निरूहवस्ति कहते हैं और इसीको वस्तिकर्मभी कहते हैं ॥ ४ ॥ इति चेरोनि- वासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने निरूहवस्तिकर्मविधिर्नामतृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः ४.

अथ स्वेदनविधि ।

स्वेदः सप्तविधिः प्रोक्तो लोष्टस्वेदो बाष्पस्वेदोऽग्निज्यालास्वेदः घटीस्वेदो जलस्वेदः फलस्वेदो वालुकास्वेदश्च ॥ न तैलेन विना स्वेदं कदाचिदपि कारयेत्॥ तैलेनाभ्यज्ययेत्स्वेदं स भवे- द्रुणकारकः ॥ १ ॥ तीव्रज्वरे दाहशोषे तथातीसारपीडिते ॥ मूर्च्छाभ्रमदाहार्ते च विषे स्वेदं न कारयेत् ॥२॥ शूलशोफातुरे वाते शीतश्लेष्मातुरेषु च ॥ एतेषां शस्यते स्वेदो नराणां सुखदा- यकः ॥३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने स्वेद- नविधिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

स्वेद अर्थात् पसीना सात प्रकारका होता है। लोष्टस्वेद, अर्थात् मृत्तिकाके पिंडआदिका स्वेद १ बाष्पस्वेद भांफोंका स्वेद २ अग्निज्वालास्वेद ३ घटीस्वेद ४ जलस्वेद, ५ फलस्वेद ६ वालुकास्वेद ७ ऐसे सात प्रकारका है ॥ तेलके चोपरे बिना किसी समयमें भी पसीना नहीं

( ४८६ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने- दिवाना चाहिये, तेल चोपरि के जो पसीना दियाया जाता है वह गुण करनेवाला है ॥ १ ॥ तीव्रज्वर, दाहशोष, अतिसारसे पीडित, मूर्च्छा, भ्रम, दाह इनसे पीड़ित विषसे युक्त इन पुरुषोंके पसीना नहीं दिवावे ॥ २ ॥ शूल, शोजा इनसे पीड़ित, वातसे युक्त, शीत, कफ, इनसे पीड़ित इन पुरुषोंको पसीना दिवाना श्रेष्ठ कहा है । सुख देनेवाला है ॥ ३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने स्वेदविधिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ५. अथ रक्तावसेचन फस्त खुलानेकी विधि । रक्तावसेचनं चतुर्भिः प्रकारैर्भवति ॥ शिराविरेचनेनापि अला- बुभिस्तथैव च ॥ श्लक्ष्णशृङ्गैर्जलौकाभी रक्तञ्च स्रावयेद्बुधः ॥ १॥ पूर्वाह्ने चापराह्वे च नात्युष्णे नातिशीतले ॥ यवागूपरि- पीतस्य शोणितं मोक्षयेद्विषक् ॥२॥ शिरोरोगेषु सर्वेषु नासा- मध्यपुटे तथा ॥ असृजं रेचयेद्यत्नात्सर्वदा भिषगुत्तमः ॥ ३ ॥ ललाटमध्ये भ्रुवोरुपरिष्टादङ्गुलद्वयं त्यक्त्वा शिरां रेचयेत् ॥ बाह्वोः कूर्परमध्ये शिरां बन्धयेत् ॥ मणिबन्धसन्धौ अङ्गुष्ठ- मूलचतुष्टयमङ्गुलञ्च विहाय शिरां बन्धयेत् ॥ नातिपार्श्वे चतु- रङ्गुलं विहाय शिरां बन्धयेत् ॥ घुण्टिकां शिरां पादे बन्धयेत् ॥ अपरमपि ग्रंथविस्तारभयान्नोक्तम् ॥ अलाबुशृङ्गैः रक्तावसेचनं सर्वैरपि ज्ञातव्यम् ॥ ४ ॥ आत्रेयजी कहते हैं—बुद्धिमान् मनुष्य चारप्रकारसे रक्तकी फस्त खुलाये । नसोंपे फस्त खुलाना, तूंबियोंसे फस्त खुलाना, बारीक सींगियोंसे फस्त खुलाना, जोकोंसे रुधिर निकसाना ऐसे चारप्रकारसे रक्तावसेचन होता है ॥ १ ॥ दुपहरे पहिले अथवा तीसरे पहरमें अत्यंत गरमी नहीं हो और अत्यंत ठंडक नहींहो तब यवागू अर्थात् गुड़िय़ानी पिलाये हुए मनुष्यका रुधिर निकसावे ॥ २ ॥ और उत्तम वैद्यको सम्पूर्ण शिरके रोगोंमें नासिकाके मध्य पुटमें फस्त खुलानी चाहिये ॥ ३ ॥ मस्तकमें भुकुटियोंसे ऊपरि दो अंगुल जगहको त्याग नाड़ीको बींधै और बाहुओंकी नाड़ीको कोहनीके मध्यमें बींधै और पोहचेकी सन्धिमें अंगुठेकी जड़में

अ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८७ ) चार अंगुल जगहको त्यागके नाड़ीको वींधै, चार अंगुल जगहको त्याग अतिसमीपकी नसको नहीं वींधे और पैरमें टांकनेकी नसोंको वींधे और अन्य प्रकरण ग्रन्थके विस्तार होनेके भयसे नहीं कहा है । इस प्रकरणमें तुम्बी सींगी इत्यादिकोंसे रुधिरका निकसाना सबको ज्ञात है और श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ अथ रक्तलक्षण । सकृष्णं फेनिलं श्यामं रक्तं तद्वातदोषजम् ॥ सर्वलक्षणसंपन्नं विज्ञेयं तन्त्रिदोषजम् ॥५॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने रक्तावसेचनविधिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ जो काला तथा झागोंवाला रक्तहो वह वातके दोषका रुधिर जानना, जो सब लक्षणोंसे संयुक्त हो वह त्रिदोषसे रुधिर जानना ॥ ५ ॥ इति वेरीनिवासिशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादि- तहारीतसंहिताभाषाटीकायां चतुर्थे सूत्रस्थाने रक्तावसेचनविधिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः ६. अथ जलौकाचारविधि । आत्रेय उवाच ॥ जलौकाश्चतुर्विधाः प्रोक्ता इन्द्रायुधा रोहिणी कालिका धूम्रा चेति ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-जोंक चार प्रकारकी कही हैं इंद्रायुधा १ रोहिणी २ कालिका ३ धूम्रा ४ ॥ १ ॥ अथ इंद्रायुधाके लक्षण । नीलवर्णा पार्श्वेरक्ता तीक्ष्णमुखी गम्भीरनिर्मलोदके पाषाण- सन्धौ च प्रविशति ॥ तया विद्रध्युदरदाहशोफमूर्च्छाविषायुप- द्रवयति ॥ २ ॥ जो नीलवर्णवालीहो, पशलियोंकी ओर लालहो, तीक्ष्णमुखवाली हो यह जोक गंभीर निर्मलजलमें और पर्वतकी संधिमें रहती है इसकरके विद्रधि, उदररोग, दाह, शोष, मूर्च्छा, विष इत्यादिकोंको करती है ॥ २ ॥ अथ रोहिणीके लक्षण । नीलवर्णा पार्श्वपीता शङ्खमुखी पद्मनाले प्रविशति ॥ तया विद्रधिविसर्पशोफायुपद्रवयति ॥ ३ ॥

( ४८८ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने-अ० ६ ] नीलेवर्णवाली और पशलियोंकी ओर पीलेवर्णवाली शंखसरीखे मुखवाली ऐसी रोहिणी जोख होती है यह कमलकी नालीमें रहती है इसके लगानेसे विष, विद्रधि, शोजा ये उपद्रव होते हैं ॥ ३ ॥ अथ कालिका जोखके लक्षण । कृष्णा कालिका मत्स्याशये दूरे त्याज्या ॥ ४ ॥ कालेवर्णवाली जोख मत्स्याशय अर्थात् मच्छोंके वासमें रहती है। यह दूरसे त्याग देनी चाहिये ॥ ४ ॥ अथ धुम्राजोखके लक्षण । धूम्रा कपोतमहिषवर्णा पीतोदरी अर्द्धचन्द्रमुखी कर्दमे कलुषो- दके प्रविशति ॥ सा रक्तावसेचनयोग्या निरुपद्रवा च ॥ ५॥ धूम्रा जोख, कपोत और भैंससरीखे वर्णवाली होती है, पीले उदरवाली होती है, आध चंद्रमाके समान मुखवाली होती है। यह कीचमें और गिधलेहुए जलमें रहती है यह रुधिर निकालनेके योग्य कही है और उपद्रवोंसे रहित है ॥ ५ ॥ अथ जोख लगवानेका क्रम अवस्थानं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य नवनीतेन म्रक्षयित्वा उष्णोदकेन प्रक्षालयेत् ॥ पश्चात् तत्र जलौकावचारणीया ॥ ६ ॥जलौका रक्तपूर्णा पश्चात् पातिता॥ तस्या मुखं लवणेन मूत्रेण वा प्रक्षा- लयेत् ॥ अथवा शनैर्गोस्तनवदुह्यते॥पुनर्नवनीतेन मुखमालि- प्यावचारणीया ॥ दुष्टरक्ते विनिर्गते दंशं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य घृतमधुनाभ्यज्य वस्त्रेण बध्नीयात् ॥ ७ ॥ इत्यात्रेयभा०हा० चतुर्थसूत्रस्थाने जलौकावचारविधिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ॥ जोख लगवानेके योग्य जगहको कांजीसे धोके नौनीघृत लगा पीछे गरम जलसे धोके पीछे जोख लगवानी चाहिये ॥ ६ ॥ जब जोख रक्तसे पूरण होजाये तब उसको गिरा देवे और उसके मुखको नमकसे अथवा गोमूत्रसे धो देवे अथवा शनैः शनैः गौके थनकी तरह सूत देवे पीछे मुखके नौनीघृत लगाके फिर लगवा देवे और जब दुष्ट रुधिर निकल जावे तब जोखके डंकस्थानको कांजीसे धोके घृत और शहदसे चोपरी वस्त्रसे बांध देवे ॥७ ॥ इति बेरीनिवासि०हारीतसं०भा० सूत्रस्थाने जलौकाचारविधिर्नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमं कल्पस्थानम्। प्रथमोऽध्यायः हिमवच्छिखरे रम्ये सिद्धगन्धर्वसेविते॥ तत्रस्थं तपस्तेजस्थ- मत्रिश्च मुनिपुङ्गवम् ॥१॥ कल्पानाञ्च प्रयत्नेन हारीतः परि- पृच्छति ॥२॥ सिद्ध गन्धर्व इनसे सेवित हिमवान् पर्वतके रमणीक शिखरपै बैठे हुए तप और तेजमें स्थित मुनियोंमें श्रेष्ठ ऐसे आत्रेयजीको ॥१॥ हारीतमुनि कल्पोंकी विधिको यत्नसे पूछते भये ॥२॥ ज्ञातं चैतन्मया तात ! समासेन चिकित्सितम् ॥ इदानीं श्रोतुमिच्छामि कल्पस्थानं तु सुव्रत ॥३॥ हारीत पूछता है- हे पिता ! मैंने चिकित्सास्थान संक्षेपमात्रसे जाना है, हे सुव्रत ! अब मैं कल्पस्थानको सुननेकी इच्छा करता हूँ॥३॥ अथ हरीतकीका कल्प। अत्रिरुवाच ॥ कल्पानामभया श्रेष्ठा तस्याः शृणु गुणागुणम् ॥ ॥४॥ स्वर्गस्थामराध्यक्षस्य अमृतं पिबतस्ततः ॥ पतिता बिन्दवो भूमौ तेभ्यो जाता हरीतकी॥५॥रसैः पञ्चभिः संयुक्ता रसेनैकेन वर्जिता ॥ कषायाम्ला च कटुका तिक्ता स्वादुरसा स्मृता ॥ लवणेन वर्जिता च शृणु तस्याः पृथक् पृथक् ॥६॥ त्वचाश्रितश्च कटुकं मेदस्तस्याः कषायकम् ॥ मेदोऽन्तरे तथा चाम्लं मधुरं चास्थिसंश्रितम् ॥७॥ तिक्तश्चान्तरे तावत् तु रसैः पञ्चभिः संयुता ॥ आम्लत्वान्मारुतं हन्ति पित्तं मधुरति- क्ततः ॥ कफं कटुकषायत्वात्त्रिदोषघ्नी हरीतकी ॥८॥ हरीतकी देहभृतां हिता स्यान्मातेव चैषा हितकारिणी च॥ वरं कदाचि- त्कुपितापि माता न कुप्यते चाचरितापि पथ्या ॥ ९ ॥ तस्या

( ४९० ) हारीतसंहिता । [ पञ्चमस्थाने- उत्पत्तिनामानि वक्ष्यामि शृणु कोविद् ॥ १० ॥ विजया रोहिणी चव पूतना चामृता तथा ॥ चेतकी चाभया चैव जीवन्ती चैव सप्तमी ॥ ११ ॥ विन्ध्ये च विजया जाता अभया च हिमालये ॥ रोहिणी वैदिशे जाता पूतना मगधे स्मृता ॥१२॥ जीवन्तिका सुराष्ट्रायां चम्पायां चेतकी मता ॥ अमृता सरयूतीर इत्येताः सप्त जातयः ॥१३॥ अभया नेत्र- रोगेषु शिरोरोगेषु कालिका ॥सर्वप्रयोगेविजया रोहिणी क्षतरो- हिणी ॥ १४ ॥ पूतना लेपनार्थे च अमृता च तथा मता ॥ चेतकी सर्वतो योज्या जीवन्ती चूर्णयोगतः ॥१५॥ बालानामु- पकारार्थं विजयां परिलक्षयेत् ॥ त्र्यस्रा च रोहिणी प्रोक्ता अमृता स्थूलमांसला ॥ १६ ॥ पञ्चास्रा चाभया प्रोक्ता पूतना चतुरस्रका ॥ त्र्यस्रा तु चेतकी प्रोक्ता जीवन्ती दीर्घमांसला ॥ ॥ १७ ॥ विजया नीलवर्णा च पीता स्याद्रोहिणी भिषक् ॥ अमृता कृष्णवर्णा च किञ्चिच्छुभ्राभया तथा ॥१८॥ सार्द्ध- द्वयङ्गुलमानेन अमृतां लक्षयेद्बुधः ॥१९॥ पथ्या भवेत्पथ्य- तमा नराणां रोगांश्च सर्वान्विनिहन्ति सद्यः ॥ आयुःप्रदा तुष्टि- मतीवमेधावर्णौजतेजःस्मृतिमातनोति ॥ २० ॥ उन्मूलिनी पि- त्तकफानिलानां सन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणाम् ॥ विस्रंसिनी मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी रोगहरा नराणाम् ॥२१॥ इत्यात्रे- यभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पो नाम प्रथमो- ऽध्यायः ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-कल्पोंमें हरड़ै श्रेष्ठ हैं उसके गुण अवगुणोंको सुनो ॥ ४ ॥ स्वर्गमें स्थित हुए इंद्रके अमृत पीवते हुए पृथ्वीमें अमृतकी बिंदु गिरती भयीं उनसे हरड़ैं उत्पन्न होती भयीं ॥ ५ ॥ वह पाँच रसोंसे संयुक्त है और एक रससे रहित है, कसैली, खट्टी, चर्चरी, कडुई और मधुर रसवाली कही है, नमकके रससे वर्जित है उसके जुदे २ लक्षणोंको सुनो ॥ ६ ॥ इसकी त्वचा चर्चरी है और इसका मेद कसेला है मेदके भीतर खट्टापन है, अस्थि

मधुर है और भीतरसे कडुई है ऐसे पांच रसोंसे संयुक्त है ॥ ७ ॥ यह खट्टापनसे वातको नाशती है और मीठी तथा कड़वेपनसे पित्तको नाशती है और चरपरे तथा कसेलेपनसे कफको नाशती है ऐसे त्रिदोषको नाशनेवाली हरड़ें हैं ॥ ८ ॥ देहवारियोंको हरड़ें हित हैं और यह माताकी तरह हित करनेवाली है किसी समयमें माता तो कुपित भी हो जाती है परंतु हरडें कुपित नहीं होती है ॥ ९ ॥ हे पंडितजन ! उसकी उत्पत्ति और नामोंको कहते हैं सुनो ॥ ॥ १० ॥ विजया १ रोहिणी २ पूतना ३ अमृता ४ चेतकी ५ अभया ६ जीवंती ७ ऐसे सातप्रकारकी है ॥ ११ ॥ विजया तो विंध्याचलमें उत्पन्नहुई है और अभया हिमाचलमें हुई है रोहिणी वैदिश नगरमै उत्पन्न हुई है, पूतना मगध देशमें उत्पन्न हुई है ॥ १२ ॥ जीवंती हरड़ें सुराष्ट्रानदीपै हुई हैं, चम्पानदीपै चेतकी हुई है, अमृता हरड़ें सरयू नदीके तीरपै उत्पन्न भई हैं ॥ १३ ॥ नेत्ररोगमें अभया और शिरोरोगमें कालिका हरडै श्रेष्ठ हैं और संपूर्ण रोगमें विजया और क्षतरोगमें रोहिणी हरड़ें हित हैं ॥ १४ ॥ पूतना और अमृता हरडें लेपमें हित कही हैं, जीवंती हरडें सब योगोंमें युक्त करनी चाहिये । जीवंती हरड़ोंको चूर्णके योगमें प्रयुक्त करे ॥ १५ ॥ बालकोंके वास्ते विजया हरडैं श्रेष्ठ कही हैं रोहिणी हरड़ै तिकोटी कही हैं और अमृता हरड़ैं स्थूल मांसवाली होती हैं ॥ १६ ॥ अभया पांच कूटोंवाली और पूतना चौकूटी कही है और चेतकी तीन कूटोंवाली कही है और जीवंती दीर्घ मांसवाली कही है ॥ १७ ॥ और विजया नीलवर्णवाली कही है और हे वैद्य ! रोहिणी पीले वर्णवाली कही है, अमृता कालेवर्ण कही हैं और अभया किंचित् सफेदवर्णवाली कही है॥ ॥ १८ ॥ और जो अढाई अंगुल प्रमाणकी हो उसको बुद्धिमान् वैद्य अमृता जानें ॥ १९ ॥ पथ्या अर्थात् हरडें मनुष्योंको अत्यंत पथ्य हैं, सम्पूर्ण रोगोंको तत्काल नाशती हैं, आयुको देने- वाली हैं, तुष्टी, अत्यंत मेधा, वर्ण, पराक्रम, तेज, स्मृति इनको बढानेवाली हैं ॥ २० ॥ पित्त कफ वात इनको समान करनेवाली हैं, बुद्धि बल इंद्रिय इनको तुष्ट करनेवाली हैं, मूत्र, विष्ठा, मले इनको बहानेवाली हैं, हरडें मनुष्योंके रोगोंको हरनेवाली कही हैं ॥ २१ ॥ इति वेरीनवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरत्नविद्याधरकृतभाषानुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां पञ्चमे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः २. अथ त्रिफला क्वाथ । आत्रेय उवाचं ॥ धात्र्या विभीतकस्यापि हरीतक्यास्तथा फलम् ॥ त्रिफलेत्युच्यते वैद्यैर्वक्ष्यामि भागनिर्णयम् ॥ १ ॥ एक भागो हरीतक्या द्वौभागौ च विभीतकम् ॥ आमलक्यास्त्रि-

( ४९२ ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थाने- भागश्च सहैकत्र प्रयोजयेत्॥२॥त्रिफला कफपित्तघ्नी महाकुष्ठ- विनाशिनी॥आयुष्या दीपनी चैव चक्षुष्या व्रणशोधिनी ॥३॥ वर्णप्रदायिनी घृष्टा विषमज्वरनाशिनी ॥ दृष्टिप्रदा कण्डु- हरा वमिगुल्मार्शनाशिनी ॥ ४ ॥ सर्वरोगप्रशमनी मेधा- स्मृतिकरी परा ॥ वक्ष्यामि योगयुक्तिञ्च रोगेरोगे पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥ वाते घृतगुडोपेता पित्ते समधुशर्करा ॥ श्लेष्मे त्रिकटु- कोपेता मेहे समधुवारिणा ॥ ६ ॥ कुष्ठे च घृतसंयुक्ता सैन्धवे- नाग्निमान्द्यहा ॥ चक्षुर्धावनके क्वाथो नेत्ररोगनिवारणः ॥७॥ घृतेन हरते कण्डूं मातुलुङ्गरसैर्वमिम् ॥ ८ ॥ गुल्मार्शो गुडसू- रणैः स स्यात्तु गुडकारकः ॥ क्षीरेण राजयक्ष्माणं पाण्डुरोगं गुडेन च ॥ ९ ॥ भृङ्गराजरसेनापि घृतेन सह योजितः ॥ वली- पलितहन्ता च तथा मेधाकरः स्मृतः ॥ १० ॥ सक्षीरः सगुडः क्वाथो विषमज्वरनाशनः ॥ सशर्करावृतः क्वाथः सर्वजीर्णज्व- रापहः ॥ ११ ॥ एषा नराणां हितकारिणी च सर्वप्रयोगे त्रिफला स्मृता च॥सर्वामयानां शमनी च सद्यः सतेजकान्ति प्रतिमां करोति ॥ १२ ॥ शोफे तथा कामलपाण्डुरोगे तथोदरे मूत्रयुता हिता च ॥ हिताऽतिसारे ग्रहणीविकारे हिता च तक्रेण फलत्रिका च ॥ १३ ॥ क्षीणेन्द्रिये जीर्णज्वरे च यक्ष्मे क्षीरेण युक्ता त्रिफला हिता च ॥ स्यान्नेत्ररोगे च शिरोगदे च कुष्ठे च कण्डूव्रणपीडने च ॥ १४ ॥ मूत्रग्रहे कामलकेऽग्निमा- न्द्ये जलेन पीतस्त्रिफलादिकल्कः ॥ सशीतकाले गुडनागरेण सशर्करा क्षीरयुता तथोष्णे ॥ १५ ॥ वर्षासु शुण्ठीसहिता फलत्रिका फलत्रिका सर्वरुजाहरा स्यात् ॥ १६ ॥ इत्या- त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने त्रिफलाक्वाथो नाम द्विती- योऽध्यायः ॥ २ ॥

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (४९३) आत्रेयजी कहते हैं--हरडै, आंवला, बहेड़ा इनके फलको वैद्यजन त्रिफला कहते हैं । अब इनके भागका निर्णय करते हैं ॥ १ ॥ हरड़ै १ भाग, बहेडा २ भाग, आंवला ३ तीन भाग इस प्रकार इनको एक जगह मिलावे ॥ २ ॥ यह त्रिफला कफपित्तको नाशता है, महाकु- ष्ठको नाशता है, आयुमें हित है, दीपन है, नेत्रोंमें हित है, व्रणको शोधन करनेवाला है॥३ ॥ घिसके लगानेसे व्रणको भरनेवाला है, ज्वरको नाशता है,दृष्टिको देनेवाला है,खाजिको हरता है, वमन, गुल्म, बवासीर इनको नाशता है ॥ ४ ॥ संपूर्ण रोगोंको शांत करता है और मेधा, स्मृति इनको करनेवाला है। अब रोग २ में जुदी २ योगकी युक्तिको कहेंगे ॥ ५॥ वितमें घृत और गुडसे संयुक्त त्रिफला देना चाहिये । पित्तमें शहद और खांड़के संग, कफमें सूंठ, मिरच, पीपल इनके संग देना चाहिये । प्रमेह रोगमें शहद और जलके संग देवे ॥ ॥ ६ ॥ कुष्ठ रोगमें घृतके संग, मन्दाग्निमें सेंधानमकके संग देना चाहिये और इसके क्वाथसे नेत्रोंको धोनेसे नेत्रोंके रोगोंका नाश होता है ॥ ७ ॥ और घृतके संग सेवनेसे खाजिका नाश होता है, बिजौराके रसके संग देनेसे वमनका नाश होता है ॥ ८॥ गुड और जमीकंदके संग देनेसे गुल्म, बवासीर इनका नाश होता है, दूधके संग देनेसे राजयक्ष्मा रोगका नाश होता है गुडके संग देनेसे पांडुरोगका नाश होता है ॥ ९ ॥ और भंगराके रस तथा घृतके संग देनेसे वलीपेलित अर्थात् बुढापेके सफेद बालआदिरोग इनका नाश होता है और बुद्धि बढती है ॥ १० ॥ और गुड मिला दूधका क्वाथ बना उसके संग देनेसे विष- मज्वरका नाश होता है और खांड तथा घृतके संग क्वाथ बनाके देनेसे संपूर्ण जीर्णज्वरोंका नाश होता है ॥ ११ ॥ यह त्रिफला मनुष्योंको हित करनेवाली है और सब प्रयोगोंमें त्रिफला कहाता है तत्काल सब रोगोंको शांत करनेवाला कहा है और तेज कांति सुंदर मूर्ति इनको करनेवाला कहा है ॥ १२ ॥ और शोजा, कामला, पांडुरोग, उदररोग इनमें .गोमूत्रके संग त्रिफला देना हित है और अतीसार संग्रहणी इन रोगोंमें तक्रके संग त्रिफला देना हित है ॥ १३ ॥ और क्षीण इंद्रियवाला, जीर्णज्वर, राजयक्ष्मा, इनमें दूधके संग त्रिफला देना हित है और नेत्ररोग, शिरोरोग, कुष्ठ, खाजी, व्रणकी पीड़ा ॥ १४ ॥ मूत्रग्रह, कामला, मंदाग्नि इन रोगोंमें जलके संग त्रिफलाका कल्क बनाके देना हित है और ठंडककी समयमें गुड सोंठके संग और गरमीके समय खांड़ दूध इनके संग देना हित है ॥ १५ ॥ और वर्षासमयमें सोंठके संग त्रिफला दीहुई हित है यह त्रिफला सबरोगोंको नाशनेवाली है॥ १६ ॥ इति बेरीनिवासिबुध ० हारीतसंहिताभाषाटीकायां पंचमे कल्पस्थाने त्रिफलाक्वाथो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

(४९४) हारीतसंहिता । [ पञ्चमस्थाने- तृतीयोऽध्यायः ३. अथ हरडोंके कल्प और वर्णोंका भेद । आत्रेय उवाच ॥ अभया द्व्यङ्गुला प्रोक्ता पूतना चतुरङ्गुला॥ सार्द्धाङ्गुला च जीवन्ती चेतकी स्यात्षडङ्गुला ॥ १ ॥ चेतकी द्विविधा प्रोक्ता आकारवर्णतस्तथा॥षडङ्गुलासिता प्रोक्ता शुक्ला चैकाङ्गुला स्मृता ॥ २ ॥ श्रेष्ठा कृष्णा समाख्याता रेचनार्थे जिगीषुणा ॥३॥ चेतकी वृक्षशाखायां यावत्तिष्ठति तां पुनः॥ भिन्दन्ति पशुपक्ष्याद्या नराणां कोऽत्र विस्मयः ॥ ४ ॥ चेतकीं यावद्विधृत्य हस्ते तिष्ठति मानवः ॥ तावद्भिनत्ति रोगां- स्तु प्रभावान्नात्र संशयः ॥५॥ नृपाणां सुकुमाराणां तथा भेष- जविद्विषाम् ॥ कृशानां हितमेवं स्यात्सुखोपायविरेचनम्॥६॥ हरीतकी दरिद्राणामनपायरसायनम् ॥पथ्यस्यान्तेऽथवा चादौ भक्ष्येच्चामयनाशिनीम् ॥ ७ ॥ तृषातुराणां हृदि कण्ठशोषे हनु- ग्रहे चापि गलग्रहे च॥ नवज्वरे क्षीणबलेन्द्रियाणां न गर्भिणी- नां कथिता प्रशस्ता ॥८ ॥ हरीतकी वा गुडनागरेण सिन्धूत्थ- युक्ता कथिता प्रयोगे ॥ आमाशयस्था जठरामयञ्च जघान चेन्द्रायुधवह्रुमाणाम्॥९॥ सशारदे वा सितया प्रयुक्ता शुण्ठी गुडेनापि हिमे प्रयोज्या॥ससैन्धवापिप्पलिका च शैशिरे हितो वसन्ते त्रिकटुर्गुडेन ॥ १०॥ ग्रीष्मे सितानागरकैश्च पथ्या वर्षासु सिन्धूत्थयुता हिता च॥निहन्ति सर्वामयमेव सद्यो घृतेन पथ्या विहिता हरीतकी ॥११॥ घृतेन देयं मनुजाय कल्कमामानिलं हन्ति नरस्य कोष्ठे ॥ दुष्टान्विकारानहरतीति सद्य एरण्डतै- लेन विपाच्य पथ्यम् ॥१२॥ खादेत्तदेवानुपिबेच्च तैलं सशूलं- विष्टम्भकृतान्विकारान् ॥ सर्वान्क्षयेत्पित्तकफानिलोत्थान्मूत्रे

[अ० ३ ] भाषाटीकासमेता। (४९५)

स्थितं सप्तदिनं महिष्याः॥१३॥पञ्चाभया मूत्रपलानि पञ्चक्षीरेण सप्ताहमतिप्रशस्तम्॥क्षीरोदशोषी परतस्तथान्ये एष त्रिसप्ताह- परः प्रयोगः ॥१४॥वातोदरं शीघ्रमियं निहन्यात्प्लीहानमाना- हमुरोग्रहञ्च॥स पाण्डुरोगं च कृमींश्च हन्ति हरीतकी धान्यतुषा- म्बुसिद्धा ॥ १५ ॥ सपिप्पलीसैन्धवयुक्तचूर्ण सोद्गारधूपं भृशम- प्यजीर्णम्॥निहन्ति सद्यो जनयेत्क्षुधाञ्च कल्कञ्च तस्याः सह नागरेण॥ १६ ॥ ससैन्धवेन ज्वरमाशु हन्ति दध्ना च तक्रेण हितातिसारे॥ सराजयक्ष्मे मधुनावलिह्यान्मूत्रेण शोफोदरना- शहेतोः ॥१७॥ सपाण्डुरोगे समशर्करायाः शोषे सदाहे सह मातुलुङ्ग्या॥रसेन युक्ता विहितातिपथ्या कल्कं समाप्तं कथितं मुनीन्द्रैः ॥ १८ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पवर्णनभेदो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अभया दो अंगुल प्रमाणकी होती है पूतना चार अंगुल प्रमाण की होती है जीवंती डेढ अंगुल प्रमाणकी होती है, चेतकी छह अंगुल प्रमाणकी होती है ॥१॥ वहां आकारसे और वर्णसे चेतकी हरडै दो प्रकारकी कही है वहां छह अंगुल प्रमाणवाली काली कही है और एक अंगुल प्रमाणवाली सफेद कही है ॥ २ ॥ जुलाबके वास्ते काली चेतकी हरडै श्रेष्ठ कही हैं ॥ ३॥ और जबतक चेतकी हरड़ों वृक्षके नीचे स्थित रहे तबतक पशु पक्षी- आदिकको भी दस्त लग जाते हैं मनुष्योंकी तो कौन बात है ॥ ४ ॥ और मनुष्य जबतक चेतकी हरड़ेको हाथमें रखे तबतक उसके दस्त लगे रहते हैं और रोगोंका नाश हो जाता है ॥ ५ ॥ और राजे तथा सुंदर कोमल शरीरवाले जन अथवा जिनसे औषध नहीं लीजावे तथा कृश, ऐसे मनुष्योंके सुखके उपायके वास्ते यही जुलाब दिवानी कही है ॥ ६ ॥ दरिद्री पुरुषोंको द्रव्य खरच करे विनाही यह हरड रसायनरूप औषध कही है पथ्य भोजनके अंतमें अथवा आदिमें भक्षणकीहुई यह हरडैं रोगोंको नाशनेवाली कही हैं ॥ ७ ॥ और तृषासे पीडित पुरुष, हृदय, कंठ इनमें शोषवाले, हनुग्रह तथा गलप्रहरोगवाले, नवीनज्वर क्षीणबल इंद्रियवाले पुरुष गर्भिणी स्त्री इनको यह हरड़ देनी पथ्य नहीं कही है ॥ ८ ॥ गुड़, सोंठ, सेंधानमक, इनके संग हरडको देवे तो आमाशयमें स्थित होनेवाले उदररोगोंका ऐसे नाश होता है कि जैसे बिजलीसे वृक्षोंका नाश हो जाता है ॥ ९ ॥ शरदऋतुमें मिश्रीके संग देनी और हिमऋतुमें गुड़, सोंठ, इनके संग देनी, शिशिरऋतुमें सेंधानमक, पीपल़ी, इनके संग देनी और

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( ४९६ ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थने

वसंतऋतुमें सूंठ, मिरच, पीपली, गुड, इनके संग देनी हित है ॥ १० ॥ ग्रीष्मऋतुमें मिसरी, सोंठ इनके संग देनी पथ्य हैं और वर्षासमयमें सेंधानमकके संग देनी हित कही है और घृतके संग हुई हरड़ सब रोगोंको नाशती है ॥ ११ ॥ इसका कल्क बना घृतके संग देनेसे मनुष्यके कोष्ठकी आमवातका नाश होता है और दुष्ट विकारोंको तत्काल नाशती है और अरंडीके तेलमें पकाके देना पथ्य है ॥ १२ ॥ त्रिफलाको खाके उसपै यही तेल पीवे तो शूल मलके बंधाके किये हुए विकार इनका नाश होता है और पित्त, कफ, वात, इनसे उपजे सब विकारोंके नाशके वास्ते, महिषीकेमें मूत्रमें सात दिनतक स्थापित करी हरड़ेके खानेको खावे ॥ १३ ॥ और पांच हरडे बीस तोले गोमूत्रमें और दूधमें स्थापितकर रक्खे सात दिनतक स्थापित करना श्रेष्ठ कहा है और कुछ वैद्य ऐसे कहते हैं कि सात दिनपीछे दूध और गोमूत्र सूखा जावे तबतक स्थापित रक्खे और कुछ ऐसे कहते हैं कि, इक्कीस दिन पीछेतक स्थापित रक्खे ॥ १४॥ इस प्रकारसे सिद्ध की हुई यह हरड़ें वातोदर रोग तिल्ली अफारा छातीको ग्रहण करनेवाला रोग इन रोगोंको नाशती है और धान्यकी कांजीमें सिद्ध कीहुई हरड़ पांडुरोग, क्रिमिरोग इनका नाश करती है ॥ १५ ॥ पीपली, सेंधानमक इनके चूर्णके संग दी हुई हरड़ें अढकारका धुवाँ अत्यन्त अजीर्ण इनका नाश करती है और तत्काल क्षुधाको उत्पन्न करती हैं और सोंठके संग इसका कल्क देनेसे ॥ १६ ॥ तथा सेंधानमकके संग देनेसे ज्वरको नाशती है और दही तथा तक्रके संग देनेसे अतिसारको नाशती है राजयक्ष्मा रोगमें शहदके संग चाटे और शोजा उदररोग इनके नाशकेवास्ते गोमूत्रके संग देवे ॥ १७ ॥ पांडुरोगमें बराबरकी खांडके संग और दाह, शोष इनमें बिजौराके संग देनी हित कहीहै इस प्रकारसे मुनियोंसे कहा हुआ यह हरड़को कल्क समाप्त हो चुका है ॥ १८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनु०हारीतसंहिताभाषा- टीकायां पंचमे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पवर्णनभेदो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः ४. अथ रसोनकल्प ।

अमृतस्य मन्थने जातं भीषणं जन्यं सुरासुरैः॥जहार वैनतेयस्तं चञ्चुना त्रिदिवं गतः ॥१॥ संग्रामश्रमसंप्राप्ते श्रमवेगप्रधाविते॥ आरूढे वैक्लवं प्राप्ते च्युता ह्यमृतबिन्दवः ॥ २ ॥ सकृत्संदूषिते देहे पतितास्तत्र संस्थिताः॥तस्मात्कालवशाज्जातं दुर्भिक्षं द्वाद- शाब्दिकम् ॥३॥ विशुष्काः कानने सर्वा वृक्षकण्टप्रतानिकाः ॥ तस्माच्च ऋषयः सर्वे प्रकृष्टं गहनं गताः ॥ ४ ॥ तेषां मध्ये जरा-

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० ४] भाषाटीकासमेता । ( ४९७ ) ग्रस्तो गतिहीनोऽतिजर्जरः ॥ सयष्टिः सरणिक्षुण्णः शीर्णदन्ता- वलीमुखः ॥ ५ ॥ सव्यक्तस्थैः क्षुधापन्नैर्ऋषिभिस्तत्र विश्रुतः ॥ सोऽपि क्षुधातुरः सर्वां पर्यटत्युर्वर्रां महीम् ॥ ६ ॥ कुत्रचित् पुण्ययोगेन दृष्टवान्विटपान् शुभान् ॥ नीलशैवालसंकाशान् शाद्वलान्बहुलान् भुवि ॥ ७ ॥ क्षुधासंपीड़नेनापि भुक्तवान् सदलानपि ॥ ८॥ षण्मासानन्तरं शुष्कान् विटपांस्तदनन्तरम्॥ भुक्तवान्कन्दकान् सोऽपि मासमेकं तथा ऋषिः॥ ९ ॥ पश्चात् सुभिक्षे सञ्जाते सर्व्वे चैकत्र संस्थिताः ॥ सोऽपि वृद्धो युवा भूत्वा गतस्तत्र च यत्र ते ॥१०॥ तं दृष्ट्वा विस्मयापन्नाः पप्रच्छुः किं कृतं त्वया ॥ नोक्तवान्स तु किञ्चिच्च रुषा तैः शापितस्ततः ॥११॥ यत्त्वया खादितं द्रव्यं तद्भक्ष्यं द्विजातिभिः॥ दुर्गन्धमपि चि- त्रञ्च तस्माज्जातं रसोनकम् ॥१२॥ अथ वीर्य्यञ्च वक्ष्यामि रसो- नस्य महामते ॥ रसैः पञ्चभिः संयुक्तो रसोनस्तेन वर्जितः॥१३॥ अमृतमयनेके समय देवताओंका और दैत्योंका महान् युद्ध होता भया तब गरुड अमृतको हरके चोंचमें ग्रहणकर स्वर्गमें जाते भये ॥ १ ॥ फिर युद्धकी हारके श्रमसे और मार्गके खेद होनेसे युक्त हो गया तब बैठ गया वहां अमृतकी बिंदु गिरती भयी वे बूंद ॥ २ ॥ विष्ठासे दूषित किसीके शरीरपै गिरके वहां ही स्थिति होती भई पीछे कालके वशसे उस देशमें बारह वर्षतक दुर्भिक्ष काल पड़ता भया ॥ ३ ॥ उस वनमें सब वेल वृक्ष पत्ते सूखते भये इससे सब ऋषि दूर गहरवनमें जाते भये ॥ ४ ॥ उन ऋषियोंमें बुढ़ापेसे ग्रसित हुआ गमन करनेमें समर्थ नहीं, जर्जर अंगवाला यष्टिकाको पकड़े हुए क्षुधासे युक्त- हुआ, दाँत हिलते हुए ऐसा एक ऋषि था ॥ ५ ॥ सो क्षुधामें युक्त हुए कहीं एकांतमें बेमालूम हुए ऐसे अन्यऋषियोंसे विछुड़ता भया पीछे वह भी क्षुधासे युक्तहुआ सब पृथ्वीपे विचरता भया ॥ ६ ॥ पीछे पुण्यके योगसे कहींक सुंदर वृक्षोंको देखता भया और नीली सिवालाके समान कांतिवाले बहुतसे घासोंको पृथ्वीपे देखता भया ॥ ७ ॥ पीछे क्षुधासे पीड़ित होनेसे उन वृक्षोंके पत्तोंको खाता भया ॥ ८ ॥ फिर छह महीने पीछे सूखे वृक्षोंको खाता भया पीछे वह ऋषि एक महीनातक कंद अर्थात् लसुनकी जड़ोंको खाते भये वहां लहसन कंद भी खाया, फिर सुभिक्ष संवत् होगया ॥ ९ ॥ तब सब ऋषि एक जगह इकट्ठे हुए और वह वृद्ध ऋषि भी जहां वे थे उसी जगह जवान होके आया ॥ १० ॥ तब उसको देख आश्चर्यमें युक्त हो पूछते भये कि तैंने क्या किया ? फिर वह कुछ भी नहीं ३२

( ४९८ ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थाने- बोला तब उन्होंने क्रोधित होके शाप दे दिया ॥ ११ ॥ कि 'जो द्रव्य तैंने खाया है वह द्विजाति ब्राह्मणआदि जातियोंको भक्षण करनेको योग्य नहीं है इसवास्ते दुर्गंधवाला और चित्र ऐसा लहसन हो गया ॥ १२ ॥ हे महामते ! अब लहसनके गुणोंको कहेंगे यह पांच रसोंसे युक्त है और एक रससे वर्जित है इसवास्ते इसको रसोन कहते हैं ॥ १३ ॥ अथ लहसनके गुण । कट्वम्लवीर्यो लशुनो हितश्च स्निग्धो गुरुः स्वादुरसोऽथ बल्यः॥ वृद्धस्य मेधास्वरवर्णचक्षुर्भग्नास्थिसन्धानकरःसुतीक्ष्णः॥१४॥ हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूलप्रमेहहिकारुचिगुल्मशोफान् ॥दुर्नाम- कुष्ठानलश्यावजं तु समीरणं श्वासकफान् निहन्ति ॥ १५ ॥ तेन च रसोनकं नाम विख्यातं भुवनत्रये॥कुक्कुटाण्डनिभं ग्रीष्मे शीर्णपर्णं समुद्धरेत् ॥१६॥ बद्ध्वा पुटे सुनिगुप्तं धारयेत्तं महा- मते ॥ वर्षासु शिशिरे चैव कारयेन्मात्रया युतम् ॥ १७ ॥ रामठं जीरके द्वे च अजमोदा कटुत्रयम् ॥ घृतसौवर्चलोपेतं वातरोगे विशेषतः॥१८॥मातुलुङ्गरसेनापि शूलानाहे प्रकी- र्त्तितः ॥ दध्ना वातादिशमनो रसोनो विहितो बुधैः ॥ १९ ॥ जांगलादि रसान्येव भोजनार्थे प्रदापयेत् ॥ २० ॥ लहसन चरचरा और खट्टा है, हित है, स्निग्ध है, भारी है, स्वादु रसवाला है, बलदायक है, वृद्ध पुरुषकी वृद्धि, स्वर, वर्ण, नेत्र, भग्नास्थि इनको जोड़नेवाला है सुंदर तीक्ष्ण है॥१४॥ और हृदयरोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, प्रमेह, हिचकी, अरुचि, गुल्म, शोजा, बवासीर, कुष्ठ, वायुसे उपजे हुए क्रिमि, वात, श्वास, कफ इनको नाशता है ॥ १५ ॥ पांच रसोंवाला होनेसे यह रसोन नामसे प्रसिद्ध है यह ग्रीष्मऋतुमें मुरगेके अंडेके समान होता है शिथिल २ पत्ते होते हैं ॥ १६ ॥ बुद्धिमान् जन इसको पुटविधिसे बांधके गुप्त धारण रक्खे और वर्षाऋतुमें तथा ग्रीष्मऋतुमें इसको मात्रासे युक्त करे ॥१७॥ और हिंग, दोनों जीरे, अजमोद, सूंठ, मिरच, पीपल, घृत, कालानमक इनसे युक्तकर वातरोगमें देना श्रेष्ठ है ॥ १८ ॥ और बिजौराके रसके संग देनेसे शूल अफारा इनका नाश होता है और दहीके संग दिया हुआ लहसन वातआदि दोषोंको शांत करता है ॥ १९ ॥ और इसपर जांगल देशके जीवोंका रस भोजनमें हित कहा है ॥ २० ॥ अथ पेयरसोनाविधिं । निष्पीड्य च रसं तस्य गृहीत्वा मुनिसत्तम॥दुग्धेन शर्करोपेतं

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४९९ ) पित्तरोगे पिबन्नरः॥ २१ ॥ राजयक्ष्मक्षये पाण्डौ कामलायां हलीमुके ॥ शिरोरुजासु सर्वासु रक्तपित्तभ्रमेषु च॥२२॥ शोष- मूर्च्छापस्मारे च हितं चैतद्रसायनम् ॥ २३ ॥ हे उत्तम मुनि ! लहसनके रसको निचोड़ उसमें दूब और खांड़ मिला पीनेसे पित्तरोग शांत होता है ॥ २१ ॥ और राजयक्ष्मा, क्षयरोग, पांडुरोग, हलीमक, संपूर्ण शिरके रोग और रक्तपित्तसे उपजे भ्रम ॥ २२ ॥ शोष, मूर्च्छा, मृगीरोग इनमें हित है और रसायन है ॥ २३॥ परिपिष्य रसोनञ्च तत्समा त्रिवृता मता ॥ गुडैर्नैरण्डतैलेन शीतं दत्त्वा च लेहकम्॥ २४ ॥ भवत्येतत्समाहृत्य पायये- न्मूत्ररोगिणाम् ॥ शोफे गुल्मे वाऽऽमवाते हितमेतत्तदार्शसाम् ॥२५॥हरिणशशकलावातित्तिराणाञ्च मांसं ह्यथ च अज- शिखीनां कर्करासारसानाम्॥घृतमधुररसानां शालिगोधूममासां हितमिति मनुजानां गुग्गुले वा रसोने॥२६॥व्यायामयानात- पमैथुनानि क्रोधाध्वजीर्णानपरिवर्जयेच्च॥विवर्जयेद्वापि तथा- तिसारे मेहामये पाण्डुगुदामये च ॥ २७॥ न गर्भिणीनां न च बालकानां अमातुरे वा न मदातुरे च ॥ न रक्तपित्ते न च कुष्ठिनेऽपि न रक्तवाते न विसर्पके च ॥२८॥ दत्तो रसोनी यदि मूढबुद्ध्या विरेचनं वा वमनं विधेयम्॥न वान्यथा कुष्ठमथापि पाण्डुं त्वद्दोषरोषं कुरुते नरस्य ॥ सुयोग्युक्त्याऽमृतवन्नराणां वीर्येन्द्रियं पुष्टिबलं तनोति ॥ २९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने रसोनकल्पो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४ ॥ लहसनको पीस उसके समान निशोत मिला और गुड, अरंडीका तैल, दालचिनी, इनका अवलेह बनादेनेसे ॥ २४ ॥ मूत्ररोगवाले पुरुषोंके सुख होता है और शोजा, गुल्म, आमवात, बवासीर इन रोगवालोंको हित है ॥ २५ ॥ हिरन, शशा, लावा तीतर, ककेरा, मोर, सारस, बकरा इत्यादिकोंका मांस, घृत, मधुररस, शालिसंज्ञक चावल, गेहूं इनका भोजन करना गूगल तथा लहसन खानेके पीछे हित कहा है ॥ २६ ॥ कसरत, गमन करना, घाम सेवना, मैथुन करना, क्रोध, मार्गका श्रम इनको वर्ज देवे और अतिसार, प्रमेह, पांडुरोग, गुदाके रोग इन रोगोंमें लहसन नहीं देना ॥ २७ ॥ गर्भिणी स्त्री, बालक, अमातुर पुरुष, मदातुर, रक्तपित्तवाले, कुष्ठवाले, रक्तवातवाले, विसर्प रोगवाले

( ५७० ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थाने- इन मनुष्योंको भी लहसन नहीं देवे ॥ २८ ॥ यदि मूर्खपनेसे दियाजावे तो जुलाब दिवाना अथवा वमन कराना चाहिये नहीं तो मनुष्यके शरीरमें कुष्ठ, पांडुरोग, त्वग्दोष, इनको करदेता है और सुन्दर योगयुक्तिसे दियाहुआ लहसन मनुष्योंको अमृतके समान है वीर्य, इंद्रिय- पुष्टि, बल इनको बढाताहै ॥२९॥ इति वेरीनिवासिविबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादित हारीतसंहिताभाषाटीकायां कल्पस्थाने रसोनकल्पो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ५. अथ गुग्गुलकल्पः । हारीत उवाच ॥ भगवन् गुग्गुलो नाम योगवीर्य्यमथोगुणम् ॥ वक्तुमर्हसि रोगेषु येषु वापि प्रशस्यते ॥ १॥ एवमुक्तस्तु शिष्येण प्रत्युवाच महातपाः ॥ २ ॥ हारीत पूछता है--हे भगवन् ! गुग्गुलनामक औषधके योग वीर्य और गुणको आप कहो जिन २ रोगोंमें श्रेष्ठ कहा है सो कहो ॥ १ ॥ ऐसे शिष्यसे पूछे हुए महान् तपवाले आत्रेयजी प्रतिवचन कहते हैं ॥ २ ॥ आत्रेय उवाच ॥ मरुभूमौ प्रजायन्ते प्रायशः पुरपादपाः ॥ भानोर्मयूखैः सततं ग्रीष्मे मुञ्चन्ति गुग्गुलम् ॥३ ॥ हिमाद्रितो वा हेमन्ते विधिवत्तं समाहरेत् ॥ जातरूपनिभं शुभ्रं पद्मराग- निभं क्वचित् ॥४॥ क्वचिन्महिषनेत्राभं यक्षदैवतवल्लभम्॥विधा- नं तस्य विधिवन्निबोध गदतो मम ॥५॥ त्रिदोषशमनो वृष्यः स्निग्धो बृंहणदीपनः॥ गुग्गुलः कटुकः पाके वर्णप्रबलवर्द्धनः ॥ ॥६॥ आयुष्यः श्रीकरः पुत्रस्मृतिमेधाविवर्द्धनः ॥ पापप्रश- मनः श्रेष्ठः शुक्रार्त्तवकरः स्मृतः ॥ ७ ॥ वर्णगन्धरसोपेतो गुग्गुलो मात्रया युतः ॥ भेषजैः सह निष्क्वाथ्यो यथा व्याधिहरैः पृथक् ॥८॥ मात्रावशिष्टं तं दृष्ट्वा चालयेच्छुक्लवाससा ॥ मृन्मये हेमपात्रे च राजते स्फाटिकेऽपि वा ॥९॥ पुण्ये तिथौ शुभे भें च जीर्णाहारः क्षमान्वितः ॥ हुत्वाऽग्निं पर्युपासीत देवब्राह्मण- भक्तितः ॥१०॥ प्रविश्य कुसुमाकीर्णे मन्दिरे च समाश्रिते ॥ १' भं नक्षत्रे गभस्तौ स्त्री पुंसि स्याद्भृगुनन्दने' इति मेदिनी।

रास्ना गुडूची चैरण्डो दशमूलं प्रसारिणी ॥ ११ ॥ क्वाथं तेषां यथायोग्यं यवान्या वातिके पिबेत् ॥ पृथक्छृतैर्जीवनीयैः पिबे- त्पित्तामयार्दितः ॥ १२ ॥ वामाचन्दनह्रीबेरं मृद्वीका तिक्तरौ- हिणी ॥ खजूरञ्च परूषञ्च तथा जीवककर्षकौ ॥ सपित्तरोगे पानाय क्वाथः स्याद्गुग्गुलान्वितः ॥१३॥ त्रिफलाव्योषगोमूत्र- निम्बधान्यकपुष्करैः॥अमृता दीप्यकः क्वाथः पटोली च कफा- र्दितः ॥१४॥ नाडीदुष्टव्रणग्रन्थिगण्डमालाऽर्बुदान्वितः ॥ त्रिफ- लाक्वाथसंयुक्तं पिबेन्मेही व्रणी तथा ॥१५॥ किरातकामृतानि- म्बवृषाव्याघ्रीदुरालभाः॥ एषां क्वाथेन संयुक्तं गुग्गुलं पाययेद्भि- षक् ॥१६॥ गुल्मे कासे क्षते श्वासे विद्रधावरुचौ व्रणे ॥ दार्वा पटोलक्वाथेन संयुक्तं गुग्गुलं पिबेत् ॥ १७ ॥ कण्डूपिटकशो- फाद्ये पिबेद्वातकफापहम् ॥ पथ्या पुनर्नवा दार्वा गोमू- त्रममृतं तथा ॥ १८ ॥ एषां क्वाथो हितः पाण्डौ शोथो- दरकिलासिनाम् ॥ भवेन्मात्रां पलं यावत्कर्षादारभ्य यत्नतः ॥ १९ ॥ जीर्णेऽश्नीयान्मुद्गयूर्षे रसैर्वा जाङ्गलैस्तथा ॥ पयसा षष्टिकात्रञ्च शालीनामोदनं मृदु ॥ २० ॥ दिनाः सप्त प्रथमा च मध्यमा द्विगुणाः स्मृताः ॥ त्रिगुणाः परमा मात्रा विज्ञेया योगचिन्तकैः॥२१॥ सेवते गुग्गुलं यो वै वर्षेणापि नरः क्र- मात् ॥ स्थावराज्जङ्गमाञ्चैव न स्यादस्य क्षतिर्विषात् ॥ २२ ॥ निर्मुक्तो वलितत्वचोपि पलितो वृद्धो युवा जायते मेधादृष्टिब- लौजवीर्यमधिकं वृद्धत्वहीनो भवेत्॥गुल्माष्ठीलहृदामवातश- मनः कुष्ठं प्रमेहाश्मरीं शूलानाहविसर्परक्तशमनो भूतोपसृष्टे हितः ॥ २३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने गुग्गुल- कल्पो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ आत्रेयजी कहते हैं—विशेष करिके गूगलके वृक्ष मरुदेशमें होते हैं सो निरन्तर सूर्य- की किरणोंसे ग्रीष्मऋतुमें गूगलको त्यागते हैं ॥ ३ ॥ और हिमाद्रिपर्वतमें गूगलवृक्षोंसे

( ५०२ ) हारितसंहिता। [ पंचमस्थाने-अ० ५ हेमंतऋतुमें गूगल निकसता है कहीं तो चांदीके समान सफेद होता है कहीं पद्मरागके समान होता है ॥ ४ ॥ कहीं भैंसाके नेत्रोंके समान वर्णवाला होता है वह यक्षदेवता इनको प्रिय है सो इसका विधान विधिसे कहते हुए मुझसे सुनो ॥ ५ ॥ यह त्रिदोषको शांत कर- नेवाला है वीर्यमें हित है स्निग्ध है धातुओंको बढ़ानेवाला है अग्निको दीप्त करनेवाला है और गूगल पाकमें चर्चरा है वर्ण बल इनको बढ़ानेवाला है ॥ ६ ॥ आयुमें हित है लक्ष्मी बढ़ानेवाला है, पुत्र, स्मृति, मेधा इनको बढ़ानेवाला है पापको शांत करनेवाला है श्रेष्ठ है पुरुषके वीर्य स्त्रीके आर्तव इनको करनेवाला है ॥ ७॥ और वर्ण, गंध, रस इनसे संयुक्त गूग- लमात्रसे युक्त किया हुआ और औषधोंके संग क्वाथ बनाके दिया हुआ व्याधिके अनुसार दिया हुआ सब व्याधियोंको नाशता है ॥ ८ ॥ मात्राके अनुसार उस गूगलको देखके सफेद वस्त्रसे छान लेवे पीछे मट्टीके पात्रमें अथवा सुवर्णके पात्रमें तथा चांदीके पात्रमें तथा कांचके पात्रमें ॥ ९ ॥ शुभ तिथिमें और शुभ नक्षत्रमें घाल धरे पीछे भोजन जर जावे तब क्षमासे युक्त हुआ पुरुष सुंदर पुष्पोंसे आकीर्ण हुए मंदिरमें जाके देवता ब्राह्मण इनकी भक्ति और उपासना कर ॥ १० ॥ उस गूगलको स्थापित करदेवे और वातसे उपजे रोगमें खाये हुए गूगलके ऊपर रास्ना, गिलोय, अरंड, दशमूल, खींप ॥ ११ ॥ अजवायन इनका क्वाथ यथायोग्य पीवे और पित्त रोगसे पीड़ित हुए पुरुष पृथक् २ जीवनीयगणकी औषधोंमें पकाया हुआ क्वाथ पीवे ॥ १२ ॥ बांसा, चंदन, नेत्रवाला, मुनक्का, दाख, कुटकी, खजूर, फालसा, जीवक, ऋषभक इनका क्वाथ गूगलमें युक्तकर पित्तके रोगोंमें पीना हित है ॥ १३ ॥ त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपली, गोमूत्र, नींव, धनियां, पोहकरमूल, गिलोय, अजवायन, परवल, इनके क्वाथके संग गूगल लेना कफके रोगोंमें हित है ॥ १४ ॥ दुष्टनाडीव्रण, ग्रंथिरोग, गंडमाला, अर्बुद,प्रमेह, व्रण, इन रोगोंवाला पुरुष त्रिफलाके क्वाथके संग पीवे ॥ १५ ॥ चिरायता, गिलोय, नींव, बांसा, कटेहली, धमासा इनके क्वा- थके संग गूगलको पीवे ॥ १६ ॥ तो गुल्म, खांसी, चोट, श्वास, विद्रधि, अरुचि व्रण इनका नाश होता है और दारुहलदी, परवल इनके क्वाथके संग गूगलको पीवे ॥ १७ ॥ तो खाज, पिड़िका, शोजा आदिक वात, कफ इनका नाश होता है और हरड़ै, सांठी, दारुहलदी, गोमूत्र, दूध ॥ १८ ॥ इनके क्वाथके संग गूगल पीनेसे पांडुरोग, शोजा, उदररोग, किलासकुष्ठ इनका नाश होता है और एक तोलासे लेकर चार तोला प्रमाणतक गूगलका खाना हित है ॥ १९ ॥ जब खाया हुआ गूगल जरजावे तब मूंगोंका यूष और जांगलदेशके जीवोंके रसके संग भोजन करना हित है और दूधके संग सांठी चावल और शालीसंजक चावलोंको खावे ॥ २०॥ सातदिन गूगलका सेवन करना प्रथम मात्रा है और १४ दिनतक मध्यम मात्रा और इक्कीस दिनतक सेवन करनेको परममात्रा कहते हैं, ऐसे योग युक्तिको जाननेवालोंने कहा है ॥ २१ ॥ और जो पुरुष क्रमसे वर्ष दिनतक गूगलको सेवता है उसको स्थावर और जंगमविषोंकी मात्रा दुःख नहीं देती है