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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 518

( ४८६ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने- दिवाना चाहिये, तेल चोपरि के जो पसीना दियाया जाता है वह गुण करनेवाला है ॥ १ ॥ तीव्रज्वर, दाहशोष, अतिसारसे पीडित, मूर्च्छा, भ्रम, दाह इनसे पीड़ित विषसे युक्त इन पुरुषोंके पसीना नहीं दिवावे ॥ २ ॥ शूल, शोजा इनसे पीड़ित, वातसे युक्त, शीत, कफ, इनसे पीड़ित इन पुरुषोंको पसीना दिवाना श्रेष्ठ कहा है । सुख देनेवाला है ॥ ३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने स्वेदविधिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ५. अथ रक्तावसेचन फस्त खुलानेकी विधि । रक्तावसेचनं चतुर्भिः प्रकारैर्भवति ॥ शिराविरेचनेनापि अला- बुभिस्तथैव च ॥ श्लक्ष्णशृङ्गैर्जलौकाभी रक्तञ्च स्रावयेद्बुधः ॥ १॥ पूर्वाह्ने चापराह्वे च नात्युष्णे नातिशीतले ॥ यवागूपरि- पीतस्य शोणितं मोक्षयेद्विषक् ॥२॥ शिरोरोगेषु सर्वेषु नासा- मध्यपुटे तथा ॥ असृजं रेचयेद्यत्नात्सर्वदा भिषगुत्तमः ॥ ३ ॥ ललाटमध्ये भ्रुवोरुपरिष्टादङ्गुलद्वयं त्यक्त्वा शिरां रेचयेत् ॥ बाह्वोः कूर्परमध्ये शिरां बन्धयेत् ॥ मणिबन्धसन्धौ अङ्गुष्ठ- मूलचतुष्टयमङ्गुलञ्च विहाय शिरां बन्धयेत् ॥ नातिपार्श्वे चतु- रङ्गुलं विहाय शिरां बन्धयेत् ॥ घुण्टिकां शिरां पादे बन्धयेत् ॥ अपरमपि ग्रंथविस्तारभयान्नोक्तम् ॥ अलाबुशृङ्गैः रक्तावसेचनं सर्वैरपि ज्ञातव्यम् ॥ ४ ॥ आत्रेयजी कहते हैं—बुद्धिमान् मनुष्य चारप्रकारसे रक्तकी फस्त खुलाये । नसोंपे फस्त खुलाना, तूंबियोंसे फस्त खुलाना, बारीक सींगियोंसे फस्त खुलाना, जोकोंसे रुधिर निकसाना ऐसे चारप्रकारसे रक्तावसेचन होता है ॥ १ ॥ दुपहरे पहिले अथवा तीसरे पहरमें अत्यंत गरमी नहीं हो और अत्यंत ठंडक नहींहो तब यवागू अर्थात् गुड़िय़ानी पिलाये हुए मनुष्यका रुधिर निकसावे ॥ २ ॥ और उत्तम वैद्यको सम्पूर्ण शिरके रोगोंमें नासिकाके मध्य पुटमें फस्त खुलानी चाहिये ॥ ३ ॥ मस्तकमें भुकुटियोंसे ऊपरि दो अंगुल जगहको त्याग नाड़ीको बींधै और बाहुओंकी नाड़ीको कोहनीके मध्यमें बींधै और पोहचेकी सन्धिमें अंगुठेकी जड़में

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