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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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पृष्ठ 517

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८५ ) आत्रेयजी कहते हैं-चार अंगुल प्रमाण बाँसकी नलिका बना उसके चर्मकी वस्ति बांध भीतर प्रवेश करनेको पिचकारी बना उससे वस्तिकर्म अर्थात् पिचकारी चढ़ानेका कर्म करे ॥ १ ॥ अत्यंत गरमीका समय न हो और अत्यंत ठंडकका समय नहो,भोजन नहीं किया होता नींद नहीं आती हो, मूत्र तथा विष्ठाकी हाजितसे पीड़ित नहीं हो ॥ २ ॥ ऐसे पुरुषको देखि उसके वस्तिकर्म करे ॥ ३ ॥ पहिले मूत्र और विष्ठाका विसर्जन करवा गुदाको धुवाके पीछे अत्यंत शिथिल न हो ऐसी शय्यापै सुला फिर बाँये अंगकी ओर बाँये पैरको और दाहीने अंगकी ओर दहने पैरको समेटके दवा जंघाके उपरि स्थापित करि उस नलिकाको दो अंगुल प्रमाण गुदाके भीतर चढा देवे पीछे बुद्धिमान् वैद्य शनैः शनैः वस्तिको पीडित कर दो पल अर्थात् ८ तोला प्रमाण तेलसे निरूहवस्तिकर्म करे, पीछे निरूहवस्तिकर्म अर्थात् पिच- कारी चढानेका कर लेवे,तब शनैः शनैः सीधा सुलाके उपरको करवाके संकोच करवा वैद्य- जन अपने हाथसे पांच वार स्फिक् अर्थात् कूलाको मसले उससे पीछे स्वस्थ बिठाकर आमाशय और मलाशयको जरा मले इससे वस्तिदोष, उदरवातरोग इनका निवारण होता है पंडित- जन इसको निरूहवस्ति कहते हैं और इसीको वस्तिकर्मभी कहते हैं ॥ ४ ॥ इति चेरोनि- वासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां सूत्रस्थाने निरूहवस्तिकर्मविधिर्नामतृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः ४.

अथ स्वेदनविधि ।

स्वेदः सप्तविधिः प्रोक्तो लोष्टस्वेदो बाष्पस्वेदोऽग्निज्यालास्वेदः घटीस्वेदो जलस्वेदः फलस्वेदो वालुकास्वेदश्च ॥ न तैलेन विना स्वेदं कदाचिदपि कारयेत्॥ तैलेनाभ्यज्ययेत्स्वेदं स भवे- द्रुणकारकः ॥ १ ॥ तीव्रज्वरे दाहशोषे तथातीसारपीडिते ॥ मूर्च्छाभ्रमदाहार्ते च विषे स्वेदं न कारयेत् ॥२॥ शूलशोफातुरे वाते शीतश्लेष्मातुरेषु च ॥ एतेषां शस्यते स्वेदो नराणां सुखदा- यकः ॥३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे सूत्रस्थाने स्वेद- नविधिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

स्वेद अर्थात् पसीना सात प्रकारका होता है। लोष्टस्वेद, अर्थात् मृत्तिकाके पिंडआदिका स्वेद १ बाष्पस्वेद भांफोंका स्वेद २ अग्निज्वालास्वेद ३ घटीस्वेद ४ जलस्वेद, ५ फलस्वेद ६ वालुकास्वेद ७ ऐसे सात प्रकारका है ॥ तेलके चोपरे बिना किसी समयमें भी पसीना नहीं