भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अथ पञ्चमं कल्पस्थानम्। प्रथमोऽध्यायः हिमवच्छिखरे रम्ये सिद्धगन्धर्वसेविते॥ तत्रस्थं तपस्तेजस्थ- मत्रिश्च मुनिपुङ्गवम् ॥१॥ कल्पानाञ्च प्रयत्नेन हारीतः परि- पृच्छति ॥२॥ सिद्ध गन्धर्व इनसे सेवित हिमवान् पर्वतके रमणीक शिखरपै बैठे हुए तप और तेजमें स्थित मुनियोंमें श्रेष्ठ ऐसे आत्रेयजीको ॥१॥ हारीतमुनि कल्पोंकी विधिको यत्नसे पूछते भये ॥२॥ ज्ञातं चैतन्मया तात ! समासेन चिकित्सितम् ॥ इदानीं श्रोतुमिच्छामि कल्पस्थानं तु सुव्रत ॥३॥ हारीत पूछता है- हे पिता ! मैंने चिकित्सास्थान संक्षेपमात्रसे जाना है, हे सुव्रत ! अब मैं कल्पस्थानको सुननेकी इच्छा करता हूँ॥३॥ अथ हरीतकीका कल्प। अत्रिरुवाच ॥ कल्पानामभया श्रेष्ठा तस्याः शृणु गुणागुणम् ॥ ॥४॥ स्वर्गस्थामराध्यक्षस्य अमृतं पिबतस्ततः ॥ पतिता बिन्दवो भूमौ तेभ्यो जाता हरीतकी॥५॥रसैः पञ्चभिः संयुक्ता रसेनैकेन वर्जिता ॥ कषायाम्ला च कटुका तिक्ता स्वादुरसा स्मृता ॥ लवणेन वर्जिता च शृणु तस्याः पृथक् पृथक् ॥६॥ त्वचाश्रितश्च कटुकं मेदस्तस्याः कषायकम् ॥ मेदोऽन्तरे तथा चाम्लं मधुरं चास्थिसंश्रितम् ॥७॥ तिक्तश्चान्तरे तावत् तु रसैः पञ्चभिः संयुता ॥ आम्लत्वान्मारुतं हन्ति पित्तं मधुरति- क्ततः ॥ कफं कटुकषायत्वात्त्रिदोषघ्नी हरीतकी ॥८॥ हरीतकी देहभृतां हिता स्यान्मातेव चैषा हितकारिणी च॥ वरं कदाचि- त्कुपितापि माता न कुप्यते चाचरितापि पथ्या ॥ ९ ॥ तस्या

( ४९० ) हारीतसंहिता । [ पञ्चमस्थाने- उत्पत्तिनामानि वक्ष्यामि शृणु कोविद् ॥ १० ॥ विजया रोहिणी चव पूतना चामृता तथा ॥ चेतकी चाभया चैव जीवन्ती चैव सप्तमी ॥ ११ ॥ विन्ध्ये च विजया जाता अभया च हिमालये ॥ रोहिणी वैदिशे जाता पूतना मगधे स्मृता ॥१२॥ जीवन्तिका सुराष्ट्रायां चम्पायां चेतकी मता ॥ अमृता सरयूतीर इत्येताः सप्त जातयः ॥१३॥ अभया नेत्र- रोगेषु शिरोरोगेषु कालिका ॥सर्वप्रयोगेविजया रोहिणी क्षतरो- हिणी ॥ १४ ॥ पूतना लेपनार्थे च अमृता च तथा मता ॥ चेतकी सर्वतो योज्या जीवन्ती चूर्णयोगतः ॥१५॥ बालानामु- पकारार्थं विजयां परिलक्षयेत् ॥ त्र्यस्रा च रोहिणी प्रोक्ता अमृता स्थूलमांसला ॥ १६ ॥ पञ्चास्रा चाभया प्रोक्ता पूतना चतुरस्रका ॥ त्र्यस्रा तु चेतकी प्रोक्ता जीवन्ती दीर्घमांसला ॥ ॥ १७ ॥ विजया नीलवर्णा च पीता स्याद्रोहिणी भिषक् ॥ अमृता कृष्णवर्णा च किञ्चिच्छुभ्राभया तथा ॥१८॥ सार्द्ध- द्वयङ्गुलमानेन अमृतां लक्षयेद्बुधः ॥१९॥ पथ्या भवेत्पथ्य- तमा नराणां रोगांश्च सर्वान्विनिहन्ति सद्यः ॥ आयुःप्रदा तुष्टि- मतीवमेधावर्णौजतेजःस्मृतिमातनोति ॥ २० ॥ उन्मूलिनी पि- त्तकफानिलानां सन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणाम् ॥ विस्रंसिनी मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी रोगहरा नराणाम् ॥२१॥ इत्यात्रे- यभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पो नाम प्रथमो- ऽध्यायः ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-कल्पोंमें हरड़ै श्रेष्ठ हैं उसके गुण अवगुणोंको सुनो ॥ ४ ॥ स्वर्गमें स्थित हुए इंद्रके अमृत पीवते हुए पृथ्वीमें अमृतकी बिंदु गिरती भयीं उनसे हरड़ैं उत्पन्न होती भयीं ॥ ५ ॥ वह पाँच रसोंसे संयुक्त है और एक रससे रहित है, कसैली, खट्टी, चर्चरी, कडुई और मधुर रसवाली कही है, नमकके रससे वर्जित है उसके जुदे २ लक्षणोंको सुनो ॥ ६ ॥ इसकी त्वचा चर्चरी है और इसका मेद कसेला है मेदके भीतर खट्टापन है, अस्थि

मधुर है और भीतरसे कडुई है ऐसे पांच रसोंसे संयुक्त है ॥ ७ ॥ यह खट्टापनसे वातको नाशती है और मीठी तथा कड़वेपनसे पित्तको नाशती है और चरपरे तथा कसेलेपनसे कफको नाशती है ऐसे त्रिदोषको नाशनेवाली हरड़ें हैं ॥ ८ ॥ देहवारियोंको हरड़ें हित हैं और यह माताकी तरह हित करनेवाली है किसी समयमें माता तो कुपित भी हो जाती है परंतु हरडें कुपित नहीं होती है ॥ ९ ॥ हे पंडितजन ! उसकी उत्पत्ति और नामोंको कहते हैं सुनो ॥ ॥ १० ॥ विजया १ रोहिणी २ पूतना ३ अमृता ४ चेतकी ५ अभया ६ जीवंती ७ ऐसे सातप्रकारकी है ॥ ११ ॥ विजया तो विंध्याचलमें उत्पन्नहुई है और अभया हिमाचलमें हुई है रोहिणी वैदिश नगरमै उत्पन्न हुई है, पूतना मगध देशमें उत्पन्न हुई है ॥ १२ ॥ जीवंती हरड़ें सुराष्ट्रानदीपै हुई हैं, चम्पानदीपै चेतकी हुई है, अमृता हरड़ें सरयू नदीके तीरपै उत्पन्न भई हैं ॥ १३ ॥ नेत्ररोगमें अभया और शिरोरोगमें कालिका हरडै श्रेष्ठ हैं और संपूर्ण रोगमें विजया और क्षतरोगमें रोहिणी हरड़ें हित हैं ॥ १४ ॥ पूतना और अमृता हरडें लेपमें हित कही हैं, जीवंती हरडें सब योगोंमें युक्त करनी चाहिये । जीवंती हरड़ोंको चूर्णके योगमें प्रयुक्त करे ॥ १५ ॥ बालकोंके वास्ते विजया हरडैं श्रेष्ठ कही हैं रोहिणी हरड़ै तिकोटी कही हैं और अमृता हरड़ैं स्थूल मांसवाली होती हैं ॥ १६ ॥ अभया पांच कूटोंवाली और पूतना चौकूटी कही है और चेतकी तीन कूटोंवाली कही है और जीवंती दीर्घ मांसवाली कही है ॥ १७ ॥ और विजया नीलवर्णवाली कही है और हे वैद्य ! रोहिणी पीले वर्णवाली कही है, अमृता कालेवर्ण कही हैं और अभया किंचित् सफेदवर्णवाली कही है॥ ॥ १८ ॥ और जो अढाई अंगुल प्रमाणकी हो उसको बुद्धिमान् वैद्य अमृता जानें ॥ १९ ॥ पथ्या अर्थात् हरडें मनुष्योंको अत्यंत पथ्य हैं, सम्पूर्ण रोगोंको तत्काल नाशती हैं, आयुको देने- वाली हैं, तुष्टी, अत्यंत मेधा, वर्ण, पराक्रम, तेज, स्मृति इनको बढानेवाली हैं ॥ २० ॥ पित्त कफ वात इनको समान करनेवाली हैं, बुद्धि बल इंद्रिय इनको तुष्ट करनेवाली हैं, मूत्र, विष्ठा, मले इनको बहानेवाली हैं, हरडें मनुष्योंके रोगोंको हरनेवाली कही हैं ॥ २१ ॥ इति वेरीनवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरत्नविद्याधरकृतभाषानुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां पञ्चमे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः २. अथ त्रिफला क्वाथ । आत्रेय उवाचं ॥ धात्र्या विभीतकस्यापि हरीतक्यास्तथा फलम् ॥ त्रिफलेत्युच्यते वैद्यैर्वक्ष्यामि भागनिर्णयम् ॥ १ ॥ एक भागो हरीतक्या द्वौभागौ च विभीतकम् ॥ आमलक्यास्त्रि-

( ४९२ ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थाने- भागश्च सहैकत्र प्रयोजयेत्॥२॥त्रिफला कफपित्तघ्नी महाकुष्ठ- विनाशिनी॥आयुष्या दीपनी चैव चक्षुष्या व्रणशोधिनी ॥३॥ वर्णप्रदायिनी घृष्टा विषमज्वरनाशिनी ॥ दृष्टिप्रदा कण्डु- हरा वमिगुल्मार्शनाशिनी ॥ ४ ॥ सर्वरोगप्रशमनी मेधा- स्मृतिकरी परा ॥ वक्ष्यामि योगयुक्तिञ्च रोगेरोगे पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥ वाते घृतगुडोपेता पित्ते समधुशर्करा ॥ श्लेष्मे त्रिकटु- कोपेता मेहे समधुवारिणा ॥ ६ ॥ कुष्ठे च घृतसंयुक्ता सैन्धवे- नाग्निमान्द्यहा ॥ चक्षुर्धावनके क्वाथो नेत्ररोगनिवारणः ॥७॥ घृतेन हरते कण्डूं मातुलुङ्गरसैर्वमिम् ॥ ८ ॥ गुल्मार्शो गुडसू- रणैः स स्यात्तु गुडकारकः ॥ क्षीरेण राजयक्ष्माणं पाण्डुरोगं गुडेन च ॥ ९ ॥ भृङ्गराजरसेनापि घृतेन सह योजितः ॥ वली- पलितहन्ता च तथा मेधाकरः स्मृतः ॥ १० ॥ सक्षीरः सगुडः क्वाथो विषमज्वरनाशनः ॥ सशर्करावृतः क्वाथः सर्वजीर्णज्व- रापहः ॥ ११ ॥ एषा नराणां हितकारिणी च सर्वप्रयोगे त्रिफला स्मृता च॥सर्वामयानां शमनी च सद्यः सतेजकान्ति प्रतिमां करोति ॥ १२ ॥ शोफे तथा कामलपाण्डुरोगे तथोदरे मूत्रयुता हिता च ॥ हिताऽतिसारे ग्रहणीविकारे हिता च तक्रेण फलत्रिका च ॥ १३ ॥ क्षीणेन्द्रिये जीर्णज्वरे च यक्ष्मे क्षीरेण युक्ता त्रिफला हिता च ॥ स्यान्नेत्ररोगे च शिरोगदे च कुष्ठे च कण्डूव्रणपीडने च ॥ १४ ॥ मूत्रग्रहे कामलकेऽग्निमा- न्द्ये जलेन पीतस्त्रिफलादिकल्कः ॥ सशीतकाले गुडनागरेण सशर्करा क्षीरयुता तथोष्णे ॥ १५ ॥ वर्षासु शुण्ठीसहिता फलत्रिका फलत्रिका सर्वरुजाहरा स्यात् ॥ १६ ॥ इत्या- त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने त्रिफलाक्वाथो नाम द्विती- योऽध्यायः ॥ २ ॥

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (४९३) आत्रेयजी कहते हैं--हरडै, आंवला, बहेड़ा इनके फलको वैद्यजन त्रिफला कहते हैं । अब इनके भागका निर्णय करते हैं ॥ १ ॥ हरड़ै १ भाग, बहेडा २ भाग, आंवला ३ तीन भाग इस प्रकार इनको एक जगह मिलावे ॥ २ ॥ यह त्रिफला कफपित्तको नाशता है, महाकु- ष्ठको नाशता है, आयुमें हित है, दीपन है, नेत्रोंमें हित है, व्रणको शोधन करनेवाला है॥३ ॥ घिसके लगानेसे व्रणको भरनेवाला है, ज्वरको नाशता है,दृष्टिको देनेवाला है,खाजिको हरता है, वमन, गुल्म, बवासीर इनको नाशता है ॥ ४ ॥ संपूर्ण रोगोंको शांत करता है और मेधा, स्मृति इनको करनेवाला है। अब रोग २ में जुदी २ योगकी युक्तिको कहेंगे ॥ ५॥ वितमें घृत और गुडसे संयुक्त त्रिफला देना चाहिये । पित्तमें शहद और खांड़के संग, कफमें सूंठ, मिरच, पीपल इनके संग देना चाहिये । प्रमेह रोगमें शहद और जलके संग देवे ॥ ॥ ६ ॥ कुष्ठ रोगमें घृतके संग, मन्दाग्निमें सेंधानमकके संग देना चाहिये और इसके क्वाथसे नेत्रोंको धोनेसे नेत्रोंके रोगोंका नाश होता है ॥ ७ ॥ और घृतके संग सेवनेसे खाजिका नाश होता है, बिजौराके रसके संग देनेसे वमनका नाश होता है ॥ ८॥ गुड और जमीकंदके संग देनेसे गुल्म, बवासीर इनका नाश होता है, दूधके संग देनेसे राजयक्ष्मा रोगका नाश होता है गुडके संग देनेसे पांडुरोगका नाश होता है ॥ ९ ॥ और भंगराके रस तथा घृतके संग देनेसे वलीपेलित अर्थात् बुढापेके सफेद बालआदिरोग इनका नाश होता है और बुद्धि बढती है ॥ १० ॥ और गुड मिला दूधका क्वाथ बना उसके संग देनेसे विष- मज्वरका नाश होता है और खांड तथा घृतके संग क्वाथ बनाके देनेसे संपूर्ण जीर्णज्वरोंका नाश होता है ॥ ११ ॥ यह त्रिफला मनुष्योंको हित करनेवाली है और सब प्रयोगोंमें त्रिफला कहाता है तत्काल सब रोगोंको शांत करनेवाला कहा है और तेज कांति सुंदर मूर्ति इनको करनेवाला कहा है ॥ १२ ॥ और शोजा, कामला, पांडुरोग, उदररोग इनमें .गोमूत्रके संग त्रिफला देना हित है और अतीसार संग्रहणी इन रोगोंमें तक्रके संग त्रिफला देना हित है ॥ १३ ॥ और क्षीण इंद्रियवाला, जीर्णज्वर, राजयक्ष्मा, इनमें दूधके संग त्रिफला देना हित है और नेत्ररोग, शिरोरोग, कुष्ठ, खाजी, व्रणकी पीड़ा ॥ १४ ॥ मूत्रग्रह, कामला, मंदाग्नि इन रोगोंमें जलके संग त्रिफलाका कल्क बनाके देना हित है और ठंडककी समयमें गुड सोंठके संग और गरमीके समय खांड़ दूध इनके संग देना हित है ॥ १५ ॥ और वर्षासमयमें सोंठके संग त्रिफला दीहुई हित है यह त्रिफला सबरोगोंको नाशनेवाली है॥ १६ ॥ इति बेरीनिवासिबुध ० हारीतसंहिताभाषाटीकायां पंचमे कल्पस्थाने त्रिफलाक्वाथो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

(४९४) हारीतसंहिता । [ पञ्चमस्थाने- तृतीयोऽध्यायः ३. अथ हरडोंके कल्प और वर्णोंका भेद । आत्रेय उवाच ॥ अभया द्व्यङ्गुला प्रोक्ता पूतना चतुरङ्गुला॥ सार्द्धाङ्गुला च जीवन्ती चेतकी स्यात्षडङ्गुला ॥ १ ॥ चेतकी द्विविधा प्रोक्ता आकारवर्णतस्तथा॥षडङ्गुलासिता प्रोक्ता शुक्ला चैकाङ्गुला स्मृता ॥ २ ॥ श्रेष्ठा कृष्णा समाख्याता रेचनार्थे जिगीषुणा ॥३॥ चेतकी वृक्षशाखायां यावत्तिष्ठति तां पुनः॥ भिन्दन्ति पशुपक्ष्याद्या नराणां कोऽत्र विस्मयः ॥ ४ ॥ चेतकीं यावद्विधृत्य हस्ते तिष्ठति मानवः ॥ तावद्भिनत्ति रोगां- स्तु प्रभावान्नात्र संशयः ॥५॥ नृपाणां सुकुमाराणां तथा भेष- जविद्विषाम् ॥ कृशानां हितमेवं स्यात्सुखोपायविरेचनम्॥६॥ हरीतकी दरिद्राणामनपायरसायनम् ॥पथ्यस्यान्तेऽथवा चादौ भक्ष्येच्चामयनाशिनीम् ॥ ७ ॥ तृषातुराणां हृदि कण्ठशोषे हनु- ग्रहे चापि गलग्रहे च॥ नवज्वरे क्षीणबलेन्द्रियाणां न गर्भिणी- नां कथिता प्रशस्ता ॥८ ॥ हरीतकी वा गुडनागरेण सिन्धूत्थ- युक्ता कथिता प्रयोगे ॥ आमाशयस्था जठरामयञ्च जघान चेन्द्रायुधवह्रुमाणाम्॥९॥ सशारदे वा सितया प्रयुक्ता शुण्ठी गुडेनापि हिमे प्रयोज्या॥ससैन्धवापिप्पलिका च शैशिरे हितो वसन्ते त्रिकटुर्गुडेन ॥ १०॥ ग्रीष्मे सितानागरकैश्च पथ्या वर्षासु सिन्धूत्थयुता हिता च॥निहन्ति सर्वामयमेव सद्यो घृतेन पथ्या विहिता हरीतकी ॥११॥ घृतेन देयं मनुजाय कल्कमामानिलं हन्ति नरस्य कोष्ठे ॥ दुष्टान्विकारानहरतीति सद्य एरण्डतै- लेन विपाच्य पथ्यम् ॥१२॥ खादेत्तदेवानुपिबेच्च तैलं सशूलं- विष्टम्भकृतान्विकारान् ॥ सर्वान्क्षयेत्पित्तकफानिलोत्थान्मूत्रे

[अ० ३ ] भाषाटीकासमेता। (४९५)

स्थितं सप्तदिनं महिष्याः॥१३॥पञ्चाभया मूत्रपलानि पञ्चक्षीरेण सप्ताहमतिप्रशस्तम्॥क्षीरोदशोषी परतस्तथान्ये एष त्रिसप्ताह- परः प्रयोगः ॥१४॥वातोदरं शीघ्रमियं निहन्यात्प्लीहानमाना- हमुरोग्रहञ्च॥स पाण्डुरोगं च कृमींश्च हन्ति हरीतकी धान्यतुषा- म्बुसिद्धा ॥ १५ ॥ सपिप्पलीसैन्धवयुक्तचूर्ण सोद्गारधूपं भृशम- प्यजीर्णम्॥निहन्ति सद्यो जनयेत्क्षुधाञ्च कल्कञ्च तस्याः सह नागरेण॥ १६ ॥ ससैन्धवेन ज्वरमाशु हन्ति दध्ना च तक्रेण हितातिसारे॥ सराजयक्ष्मे मधुनावलिह्यान्मूत्रेण शोफोदरना- शहेतोः ॥१७॥ सपाण्डुरोगे समशर्करायाः शोषे सदाहे सह मातुलुङ्ग्या॥रसेन युक्ता विहितातिपथ्या कल्कं समाप्तं कथितं मुनीन्द्रैः ॥ १८ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पवर्णनभेदो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अभया दो अंगुल प्रमाणकी होती है पूतना चार अंगुल प्रमाण की होती है जीवंती डेढ अंगुल प्रमाणकी होती है, चेतकी छह अंगुल प्रमाणकी होती है ॥१॥ वहां आकारसे और वर्णसे चेतकी हरडै दो प्रकारकी कही है वहां छह अंगुल प्रमाणवाली काली कही है और एक अंगुल प्रमाणवाली सफेद कही है ॥ २ ॥ जुलाबके वास्ते काली चेतकी हरडै श्रेष्ठ कही हैं ॥ ३॥ और जबतक चेतकी हरड़ों वृक्षके नीचे स्थित रहे तबतक पशु पक्षी- आदिकको भी दस्त लग जाते हैं मनुष्योंकी तो कौन बात है ॥ ४ ॥ और मनुष्य जबतक चेतकी हरड़ेको हाथमें रखे तबतक उसके दस्त लगे रहते हैं और रोगोंका नाश हो जाता है ॥ ५ ॥ और राजे तथा सुंदर कोमल शरीरवाले जन अथवा जिनसे औषध नहीं लीजावे तथा कृश, ऐसे मनुष्योंके सुखके उपायके वास्ते यही जुलाब दिवानी कही है ॥ ६ ॥ दरिद्री पुरुषोंको द्रव्य खरच करे विनाही यह हरड रसायनरूप औषध कही है पथ्य भोजनके अंतमें अथवा आदिमें भक्षणकीहुई यह हरडैं रोगोंको नाशनेवाली कही हैं ॥ ७ ॥ और तृषासे पीडित पुरुष, हृदय, कंठ इनमें शोषवाले, हनुग्रह तथा गलप्रहरोगवाले, नवीनज्वर क्षीणबल इंद्रियवाले पुरुष गर्भिणी स्त्री इनको यह हरड़ देनी पथ्य नहीं कही है ॥ ८ ॥ गुड़, सोंठ, सेंधानमक, इनके संग हरडको देवे तो आमाशयमें स्थित होनेवाले उदररोगोंका ऐसे नाश होता है कि जैसे बिजलीसे वृक्षोंका नाश हो जाता है ॥ ९ ॥ शरदऋतुमें मिश्रीके संग देनी और हिमऋतुमें गुड़, सोंठ, इनके संग देनी, शिशिरऋतुमें सेंधानमक, पीपल़ी, इनके संग देनी और

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri

( ४९६ ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थने

वसंतऋतुमें सूंठ, मिरच, पीपली, गुड, इनके संग देनी हित है ॥ १० ॥ ग्रीष्मऋतुमें मिसरी, सोंठ इनके संग देनी पथ्य हैं और वर्षासमयमें सेंधानमकके संग देनी हित कही है और घृतके संग हुई हरड़ सब रोगोंको नाशती है ॥ ११ ॥ इसका कल्क बना घृतके संग देनेसे मनुष्यके कोष्ठकी आमवातका नाश होता है और दुष्ट विकारोंको तत्काल नाशती है और अरंडीके तेलमें पकाके देना पथ्य है ॥ १२ ॥ त्रिफलाको खाके उसपै यही तेल पीवे तो शूल मलके बंधाके किये हुए विकार इनका नाश होता है और पित्त, कफ, वात, इनसे उपजे सब विकारोंके नाशके वास्ते, महिषीकेमें मूत्रमें सात दिनतक स्थापित करी हरड़ेके खानेको खावे ॥ १३ ॥ और पांच हरडे बीस तोले गोमूत्रमें और दूधमें स्थापितकर रक्खे सात दिनतक स्थापित करना श्रेष्ठ कहा है और कुछ वैद्य ऐसे कहते हैं कि सात दिनपीछे दूध और गोमूत्र सूखा जावे तबतक स्थापित रक्खे और कुछ ऐसे कहते हैं कि, इक्कीस दिन पीछेतक स्थापित रक्खे ॥ १४॥ इस प्रकारसे सिद्ध की हुई यह हरड़ें वातोदर रोग तिल्ली अफारा छातीको ग्रहण करनेवाला रोग इन रोगोंको नाशती है और धान्यकी कांजीमें सिद्ध कीहुई हरड़ पांडुरोग, क्रिमिरोग इनका नाश करती है ॥ १५ ॥ पीपली, सेंधानमक इनके चूर्णके संग दी हुई हरड़ें अढकारका धुवाँ अत्यन्त अजीर्ण इनका नाश करती है और तत्काल क्षुधाको उत्पन्न करती हैं और सोंठके संग इसका कल्क देनेसे ॥ १६ ॥ तथा सेंधानमकके संग देनेसे ज्वरको नाशती है और दही तथा तक्रके संग देनेसे अतिसारको नाशती है राजयक्ष्मा रोगमें शहदके संग चाटे और शोजा उदररोग इनके नाशकेवास्ते गोमूत्रके संग देवे ॥ १७ ॥ पांडुरोगमें बराबरकी खांडके संग और दाह, शोष इनमें बिजौराके संग देनी हित कहीहै इस प्रकारसे मुनियोंसे कहा हुआ यह हरड़को कल्क समाप्त हो चुका है ॥ १८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनु०हारीतसंहिताभाषा- टीकायां पंचमे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पवर्णनभेदो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः ४. अथ रसोनकल्प ।

अमृतस्य मन्थने जातं भीषणं जन्यं सुरासुरैः॥जहार वैनतेयस्तं चञ्चुना त्रिदिवं गतः ॥१॥ संग्रामश्रमसंप्राप्ते श्रमवेगप्रधाविते॥ आरूढे वैक्लवं प्राप्ते च्युता ह्यमृतबिन्दवः ॥ २ ॥ सकृत्संदूषिते देहे पतितास्तत्र संस्थिताः॥तस्मात्कालवशाज्जातं दुर्भिक्षं द्वाद- शाब्दिकम् ॥३॥ विशुष्काः कानने सर्वा वृक्षकण्टप्रतानिकाः ॥ तस्माच्च ऋषयः सर्वे प्रकृष्टं गहनं गताः ॥ ४ ॥ तेषां मध्ये जरा-

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

अ० ४] भाषाटीकासमेता । ( ४९७ ) ग्रस्तो गतिहीनोऽतिजर्जरः ॥ सयष्टिः सरणिक्षुण्णः शीर्णदन्ता- वलीमुखः ॥ ५ ॥ सव्यक्तस्थैः क्षुधापन्नैर्ऋषिभिस्तत्र विश्रुतः ॥ सोऽपि क्षुधातुरः सर्वां पर्यटत्युर्वर्रां महीम् ॥ ६ ॥ कुत्रचित् पुण्ययोगेन दृष्टवान्विटपान् शुभान् ॥ नीलशैवालसंकाशान् शाद्वलान्बहुलान् भुवि ॥ ७ ॥ क्षुधासंपीड़नेनापि भुक्तवान् सदलानपि ॥ ८॥ षण्मासानन्तरं शुष्कान् विटपांस्तदनन्तरम्॥ भुक्तवान्कन्दकान् सोऽपि मासमेकं तथा ऋषिः॥ ९ ॥ पश्चात् सुभिक्षे सञ्जाते सर्व्वे चैकत्र संस्थिताः ॥ सोऽपि वृद्धो युवा भूत्वा गतस्तत्र च यत्र ते ॥१०॥ तं दृष्ट्वा विस्मयापन्नाः पप्रच्छुः किं कृतं त्वया ॥ नोक्तवान्स तु किञ्चिच्च रुषा तैः शापितस्ततः ॥११॥ यत्त्वया खादितं द्रव्यं तद्भक्ष्यं द्विजातिभिः॥ दुर्गन्धमपि चि- त्रञ्च तस्माज्जातं रसोनकम् ॥१२॥ अथ वीर्य्यञ्च वक्ष्यामि रसो- नस्य महामते ॥ रसैः पञ्चभिः संयुक्तो रसोनस्तेन वर्जितः॥१३॥ अमृतमयनेके समय देवताओंका और दैत्योंका महान् युद्ध होता भया तब गरुड अमृतको हरके चोंचमें ग्रहणकर स्वर्गमें जाते भये ॥ १ ॥ फिर युद्धकी हारके श्रमसे और मार्गके खेद होनेसे युक्त हो गया तब बैठ गया वहां अमृतकी बिंदु गिरती भयी वे बूंद ॥ २ ॥ विष्ठासे दूषित किसीके शरीरपै गिरके वहां ही स्थिति होती भई पीछे कालके वशसे उस देशमें बारह वर्षतक दुर्भिक्ष काल पड़ता भया ॥ ३ ॥ उस वनमें सब वेल वृक्ष पत्ते सूखते भये इससे सब ऋषि दूर गहरवनमें जाते भये ॥ ४ ॥ उन ऋषियोंमें बुढ़ापेसे ग्रसित हुआ गमन करनेमें समर्थ नहीं, जर्जर अंगवाला यष्टिकाको पकड़े हुए क्षुधासे युक्त- हुआ, दाँत हिलते हुए ऐसा एक ऋषि था ॥ ५ ॥ सो क्षुधामें युक्त हुए कहीं एकांतमें बेमालूम हुए ऐसे अन्यऋषियोंसे विछुड़ता भया पीछे वह भी क्षुधासे युक्तहुआ सब पृथ्वीपे विचरता भया ॥ ६ ॥ पीछे पुण्यके योगसे कहींक सुंदर वृक्षोंको देखता भया और नीली सिवालाके समान कांतिवाले बहुतसे घासोंको पृथ्वीपे देखता भया ॥ ७ ॥ पीछे क्षुधासे पीड़ित होनेसे उन वृक्षोंके पत्तोंको खाता भया ॥ ८ ॥ फिर छह महीने पीछे सूखे वृक्षोंको खाता भया पीछे वह ऋषि एक महीनातक कंद अर्थात् लसुनकी जड़ोंको खाते भये वहां लहसन कंद भी खाया, फिर सुभिक्ष संवत् होगया ॥ ९ ॥ तब सब ऋषि एक जगह इकट्ठे हुए और वह वृद्ध ऋषि भी जहां वे थे उसी जगह जवान होके आया ॥ १० ॥ तब उसको देख आश्चर्यमें युक्त हो पूछते भये कि तैंने क्या किया ? फिर वह कुछ भी नहीं ३२

( ४९८ ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थाने- बोला तब उन्होंने क्रोधित होके शाप दे दिया ॥ ११ ॥ कि 'जो द्रव्य तैंने खाया है वह द्विजाति ब्राह्मणआदि जातियोंको भक्षण करनेको योग्य नहीं है इसवास्ते दुर्गंधवाला और चित्र ऐसा लहसन हो गया ॥ १२ ॥ हे महामते ! अब लहसनके गुणोंको कहेंगे यह पांच रसोंसे युक्त है और एक रससे वर्जित है इसवास्ते इसको रसोन कहते हैं ॥ १३ ॥ अथ लहसनके गुण । कट्वम्लवीर्यो लशुनो हितश्च स्निग्धो गुरुः स्वादुरसोऽथ बल्यः॥ वृद्धस्य मेधास्वरवर्णचक्षुर्भग्नास्थिसन्धानकरःसुतीक्ष्णः॥१४॥ हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूलप्रमेहहिकारुचिगुल्मशोफान् ॥दुर्नाम- कुष्ठानलश्यावजं तु समीरणं श्वासकफान् निहन्ति ॥ १५ ॥ तेन च रसोनकं नाम विख्यातं भुवनत्रये॥कुक्कुटाण्डनिभं ग्रीष्मे शीर्णपर्णं समुद्धरेत् ॥१६॥ बद्ध्वा पुटे सुनिगुप्तं धारयेत्तं महा- मते ॥ वर्षासु शिशिरे चैव कारयेन्मात्रया युतम् ॥ १७ ॥ रामठं जीरके द्वे च अजमोदा कटुत्रयम् ॥ घृतसौवर्चलोपेतं वातरोगे विशेषतः॥१८॥मातुलुङ्गरसेनापि शूलानाहे प्रकी- र्त्तितः ॥ दध्ना वातादिशमनो रसोनो विहितो बुधैः ॥ १९ ॥ जांगलादि रसान्येव भोजनार्थे प्रदापयेत् ॥ २० ॥ लहसन चरचरा और खट्टा है, हित है, स्निग्ध है, भारी है, स्वादु रसवाला है, बलदायक है, वृद्ध पुरुषकी वृद्धि, स्वर, वर्ण, नेत्र, भग्नास्थि इनको जोड़नेवाला है सुंदर तीक्ष्ण है॥१४॥ और हृदयरोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, प्रमेह, हिचकी, अरुचि, गुल्म, शोजा, बवासीर, कुष्ठ, वायुसे उपजे हुए क्रिमि, वात, श्वास, कफ इनको नाशता है ॥ १५ ॥ पांच रसोंवाला होनेसे यह रसोन नामसे प्रसिद्ध है यह ग्रीष्मऋतुमें मुरगेके अंडेके समान होता है शिथिल २ पत्ते होते हैं ॥ १६ ॥ बुद्धिमान् जन इसको पुटविधिसे बांधके गुप्त धारण रक्खे और वर्षाऋतुमें तथा ग्रीष्मऋतुमें इसको मात्रासे युक्त करे ॥१७॥ और हिंग, दोनों जीरे, अजमोद, सूंठ, मिरच, पीपल, घृत, कालानमक इनसे युक्तकर वातरोगमें देना श्रेष्ठ है ॥ १८ ॥ और बिजौराके रसके संग देनेसे शूल अफारा इनका नाश होता है और दहीके संग दिया हुआ लहसन वातआदि दोषोंको शांत करता है ॥ १९ ॥ और इसपर जांगल देशके जीवोंका रस भोजनमें हित कहा है ॥ २० ॥ अथ पेयरसोनाविधिं । निष्पीड्य च रसं तस्य गृहीत्वा मुनिसत्तम॥दुग्धेन शर्करोपेतं

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४९९ ) पित्तरोगे पिबन्नरः॥ २१ ॥ राजयक्ष्मक्षये पाण्डौ कामलायां हलीमुके ॥ शिरोरुजासु सर्वासु रक्तपित्तभ्रमेषु च॥२२॥ शोष- मूर्च्छापस्मारे च हितं चैतद्रसायनम् ॥ २३ ॥ हे उत्तम मुनि ! लहसनके रसको निचोड़ उसमें दूब और खांड़ मिला पीनेसे पित्तरोग शांत होता है ॥ २१ ॥ और राजयक्ष्मा, क्षयरोग, पांडुरोग, हलीमक, संपूर्ण शिरके रोग और रक्तपित्तसे उपजे भ्रम ॥ २२ ॥ शोष, मूर्च्छा, मृगीरोग इनमें हित है और रसायन है ॥ २३॥ परिपिष्य रसोनञ्च तत्समा त्रिवृता मता ॥ गुडैर्नैरण्डतैलेन शीतं दत्त्वा च लेहकम्॥ २४ ॥ भवत्येतत्समाहृत्य पायये- न्मूत्ररोगिणाम् ॥ शोफे गुल्मे वाऽऽमवाते हितमेतत्तदार्शसाम् ॥२५॥हरिणशशकलावातित्तिराणाञ्च मांसं ह्यथ च अज- शिखीनां कर्करासारसानाम्॥घृतमधुररसानां शालिगोधूममासां हितमिति मनुजानां गुग्गुले वा रसोने॥२६॥व्यायामयानात- पमैथुनानि क्रोधाध्वजीर्णानपरिवर्जयेच्च॥विवर्जयेद्वापि तथा- तिसारे मेहामये पाण्डुगुदामये च ॥ २७॥ न गर्भिणीनां न च बालकानां अमातुरे वा न मदातुरे च ॥ न रक्तपित्ते न च कुष्ठिनेऽपि न रक्तवाते न विसर्पके च ॥२८॥ दत्तो रसोनी यदि मूढबुद्ध्या विरेचनं वा वमनं विधेयम्॥न वान्यथा कुष्ठमथापि पाण्डुं त्वद्दोषरोषं कुरुते नरस्य ॥ सुयोग्युक्त्याऽमृतवन्नराणां वीर्येन्द्रियं पुष्टिबलं तनोति ॥ २९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने रसोनकल्पो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४ ॥ लहसनको पीस उसके समान निशोत मिला और गुड, अरंडीका तैल, दालचिनी, इनका अवलेह बनादेनेसे ॥ २४ ॥ मूत्ररोगवाले पुरुषोंके सुख होता है और शोजा, गुल्म, आमवात, बवासीर इन रोगवालोंको हित है ॥ २५ ॥ हिरन, शशा, लावा तीतर, ककेरा, मोर, सारस, बकरा इत्यादिकोंका मांस, घृत, मधुररस, शालिसंज्ञक चावल, गेहूं इनका भोजन करना गूगल तथा लहसन खानेके पीछे हित कहा है ॥ २६ ॥ कसरत, गमन करना, घाम सेवना, मैथुन करना, क्रोध, मार्गका श्रम इनको वर्ज देवे और अतिसार, प्रमेह, पांडुरोग, गुदाके रोग इन रोगोंमें लहसन नहीं देना ॥ २७ ॥ गर्भिणी स्त्री, बालक, अमातुर पुरुष, मदातुर, रक्तपित्तवाले, कुष्ठवाले, रक्तवातवाले, विसर्प रोगवाले

( ५७० ) हारीतसंहिता । [ पंचमस्थाने- इन मनुष्योंको भी लहसन नहीं देवे ॥ २८ ॥ यदि मूर्खपनेसे दियाजावे तो जुलाब दिवाना अथवा वमन कराना चाहिये नहीं तो मनुष्यके शरीरमें कुष्ठ, पांडुरोग, त्वग्दोष, इनको करदेता है और सुन्दर योगयुक्तिसे दियाहुआ लहसन मनुष्योंको अमृतके समान है वीर्य, इंद्रिय- पुष्टि, बल इनको बढाताहै ॥२९॥ इति वेरीनिवासिविबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादित हारीतसंहिताभाषाटीकायां कल्पस्थाने रसोनकल्पो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः ५. अथ गुग्गुलकल्पः । हारीत उवाच ॥ भगवन् गुग्गुलो नाम योगवीर्य्यमथोगुणम् ॥ वक्तुमर्हसि रोगेषु येषु वापि प्रशस्यते ॥ १॥ एवमुक्तस्तु शिष्येण प्रत्युवाच महातपाः ॥ २ ॥ हारीत पूछता है--हे भगवन् ! गुग्गुलनामक औषधके योग वीर्य और गुणको आप कहो जिन २ रोगोंमें श्रेष्ठ कहा है सो कहो ॥ १ ॥ ऐसे शिष्यसे पूछे हुए महान् तपवाले आत्रेयजी प्रतिवचन कहते हैं ॥ २ ॥ आत्रेय उवाच ॥ मरुभूमौ प्रजायन्ते प्रायशः पुरपादपाः ॥ भानोर्मयूखैः सततं ग्रीष्मे मुञ्चन्ति गुग्गुलम् ॥३ ॥ हिमाद्रितो वा हेमन्ते विधिवत्तं समाहरेत् ॥ जातरूपनिभं शुभ्रं पद्मराग- निभं क्वचित् ॥४॥ क्वचिन्महिषनेत्राभं यक्षदैवतवल्लभम्॥विधा- नं तस्य विधिवन्निबोध गदतो मम ॥५॥ त्रिदोषशमनो वृष्यः स्निग्धो बृंहणदीपनः॥ गुग्गुलः कटुकः पाके वर्णप्रबलवर्द्धनः ॥ ॥६॥ आयुष्यः श्रीकरः पुत्रस्मृतिमेधाविवर्द्धनः ॥ पापप्रश- मनः श्रेष्ठः शुक्रार्त्तवकरः स्मृतः ॥ ७ ॥ वर्णगन्धरसोपेतो गुग्गुलो मात्रया युतः ॥ भेषजैः सह निष्क्वाथ्यो यथा व्याधिहरैः पृथक् ॥८॥ मात्रावशिष्टं तं दृष्ट्वा चालयेच्छुक्लवाससा ॥ मृन्मये हेमपात्रे च राजते स्फाटिकेऽपि वा ॥९॥ पुण्ये तिथौ शुभे भें च जीर्णाहारः क्षमान्वितः ॥ हुत्वाऽग्निं पर्युपासीत देवब्राह्मण- भक्तितः ॥१०॥ प्रविश्य कुसुमाकीर्णे मन्दिरे च समाश्रिते ॥ १' भं नक्षत्रे गभस्तौ स्त्री पुंसि स्याद्भृगुनन्दने' इति मेदिनी।

रास्ना गुडूची चैरण्डो दशमूलं प्रसारिणी ॥ ११ ॥ क्वाथं तेषां यथायोग्यं यवान्या वातिके पिबेत् ॥ पृथक्छृतैर्जीवनीयैः पिबे- त्पित्तामयार्दितः ॥ १२ ॥ वामाचन्दनह्रीबेरं मृद्वीका तिक्तरौ- हिणी ॥ खजूरञ्च परूषञ्च तथा जीवककर्षकौ ॥ सपित्तरोगे पानाय क्वाथः स्याद्गुग्गुलान्वितः ॥१३॥ त्रिफलाव्योषगोमूत्र- निम्बधान्यकपुष्करैः॥अमृता दीप्यकः क्वाथः पटोली च कफा- र्दितः ॥१४॥ नाडीदुष्टव्रणग्रन्थिगण्डमालाऽर्बुदान्वितः ॥ त्रिफ- लाक्वाथसंयुक्तं पिबेन्मेही व्रणी तथा ॥१५॥ किरातकामृतानि- म्बवृषाव्याघ्रीदुरालभाः॥ एषां क्वाथेन संयुक्तं गुग्गुलं पाययेद्भि- षक् ॥१६॥ गुल्मे कासे क्षते श्वासे विद्रधावरुचौ व्रणे ॥ दार्वा पटोलक्वाथेन संयुक्तं गुग्गुलं पिबेत् ॥ १७ ॥ कण्डूपिटकशो- फाद्ये पिबेद्वातकफापहम् ॥ पथ्या पुनर्नवा दार्वा गोमू- त्रममृतं तथा ॥ १८ ॥ एषां क्वाथो हितः पाण्डौ शोथो- दरकिलासिनाम् ॥ भवेन्मात्रां पलं यावत्कर्षादारभ्य यत्नतः ॥ १९ ॥ जीर्णेऽश्नीयान्मुद्गयूर्षे रसैर्वा जाङ्गलैस्तथा ॥ पयसा षष्टिकात्रञ्च शालीनामोदनं मृदु ॥ २० ॥ दिनाः सप्त प्रथमा च मध्यमा द्विगुणाः स्मृताः ॥ त्रिगुणाः परमा मात्रा विज्ञेया योगचिन्तकैः॥२१॥ सेवते गुग्गुलं यो वै वर्षेणापि नरः क्र- मात् ॥ स्थावराज्जङ्गमाञ्चैव न स्यादस्य क्षतिर्विषात् ॥ २२ ॥ निर्मुक्तो वलितत्वचोपि पलितो वृद्धो युवा जायते मेधादृष्टिब- लौजवीर्यमधिकं वृद्धत्वहीनो भवेत्॥गुल्माष्ठीलहृदामवातश- मनः कुष्ठं प्रमेहाश्मरीं शूलानाहविसर्परक्तशमनो भूतोपसृष्टे हितः ॥ २३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने गुग्गुल- कल्पो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ आत्रेयजी कहते हैं—विशेष करिके गूगलके वृक्ष मरुदेशमें होते हैं सो निरन्तर सूर्य- की किरणोंसे ग्रीष्मऋतुमें गूगलको त्यागते हैं ॥ ३ ॥ और हिमाद्रिपर्वतमें गूगलवृक्षोंसे

( ५०२ ) हारितसंहिता। [ पंचमस्थाने-अ० ५ हेमंतऋतुमें गूगल निकसता है कहीं तो चांदीके समान सफेद होता है कहीं पद्मरागके समान होता है ॥ ४ ॥ कहीं भैंसाके नेत्रोंके समान वर्णवाला होता है वह यक्षदेवता इनको प्रिय है सो इसका विधान विधिसे कहते हुए मुझसे सुनो ॥ ५ ॥ यह त्रिदोषको शांत कर- नेवाला है वीर्यमें हित है स्निग्ध है धातुओंको बढ़ानेवाला है अग्निको दीप्त करनेवाला है और गूगल पाकमें चर्चरा है वर्ण बल इनको बढ़ानेवाला है ॥ ६ ॥ आयुमें हित है लक्ष्मी बढ़ानेवाला है, पुत्र, स्मृति, मेधा इनको बढ़ानेवाला है पापको शांत करनेवाला है श्रेष्ठ है पुरुषके वीर्य स्त्रीके आर्तव इनको करनेवाला है ॥ ७॥ और वर्ण, गंध, रस इनसे संयुक्त गूग- लमात्रसे युक्त किया हुआ और औषधोंके संग क्वाथ बनाके दिया हुआ व्याधिके अनुसार दिया हुआ सब व्याधियोंको नाशता है ॥ ८ ॥ मात्राके अनुसार उस गूगलको देखके सफेद वस्त्रसे छान लेवे पीछे मट्टीके पात्रमें अथवा सुवर्णके पात्रमें तथा चांदीके पात्रमें तथा कांचके पात्रमें ॥ ९ ॥ शुभ तिथिमें और शुभ नक्षत्रमें घाल धरे पीछे भोजन जर जावे तब क्षमासे युक्त हुआ पुरुष सुंदर पुष्पोंसे आकीर्ण हुए मंदिरमें जाके देवता ब्राह्मण इनकी भक्ति और उपासना कर ॥ १० ॥ उस गूगलको स्थापित करदेवे और वातसे उपजे रोगमें खाये हुए गूगलके ऊपर रास्ना, गिलोय, अरंड, दशमूल, खींप ॥ ११ ॥ अजवायन इनका क्वाथ यथायोग्य पीवे और पित्त रोगसे पीड़ित हुए पुरुष पृथक् २ जीवनीयगणकी औषधोंमें पकाया हुआ क्वाथ पीवे ॥ १२ ॥ बांसा, चंदन, नेत्रवाला, मुनक्का, दाख, कुटकी, खजूर, फालसा, जीवक, ऋषभक इनका क्वाथ गूगलमें युक्तकर पित्तके रोगोंमें पीना हित है ॥ १३ ॥ त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपली, गोमूत्र, नींव, धनियां, पोहकरमूल, गिलोय, अजवायन, परवल, इनके क्वाथके संग गूगल लेना कफके रोगोंमें हित है ॥ १४ ॥ दुष्टनाडीव्रण, ग्रंथिरोग, गंडमाला, अर्बुद,प्रमेह, व्रण, इन रोगोंवाला पुरुष त्रिफलाके क्वाथके संग पीवे ॥ १५ ॥ चिरायता, गिलोय, नींव, बांसा, कटेहली, धमासा इनके क्वा- थके संग गूगलको पीवे ॥ १६ ॥ तो गुल्म, खांसी, चोट, श्वास, विद्रधि, अरुचि व्रण इनका नाश होता है और दारुहलदी, परवल इनके क्वाथके संग गूगलको पीवे ॥ १७ ॥ तो खाज, पिड़िका, शोजा आदिक वात, कफ इनका नाश होता है और हरड़ै, सांठी, दारुहलदी, गोमूत्र, दूध ॥ १८ ॥ इनके क्वाथके संग गूगल पीनेसे पांडुरोग, शोजा, उदररोग, किलासकुष्ठ इनका नाश होता है और एक तोलासे लेकर चार तोला प्रमाणतक गूगलका खाना हित है ॥ १९ ॥ जब खाया हुआ गूगल जरजावे तब मूंगोंका यूष और जांगलदेशके जीवोंके रसके संग भोजन करना हित है और दूधके संग सांठी चावल और शालीसंजक चावलोंको खावे ॥ २०॥ सातदिन गूगलका सेवन करना प्रथम मात्रा है और १४ दिनतक मध्यम मात्रा और इक्कीस दिनतक सेवन करनेको परममात्रा कहते हैं, ऐसे योग युक्तिको जाननेवालोंने कहा है ॥ २१ ॥ और जो पुरुष क्रमसे वर्ष दिनतक गूगलको सेवता है उसको स्थावर और जंगमविषोंकी मात्रा दुःख नहीं देती है

[ ष०स्था०अ० १ ] भाषाटीकासमेता । (५०३) ॥ २२ ॥ और जिसकी त्वचा ढीली पड़े, बाल सफेद होजावे ऐसा वृद्ध पुरुष भी इसके खानेसे जवान हो जाता है और बुद्धि, दृष्टि, बल, वीर्य इनकी वृद्धि होती है, वृद्ध- पनेके दुःखोंसे दूर हो जाता है और गुल्म, अष्ठीला, हृदयका रोग, आमवात इनको शांत करता है, कुष्ठ, प्रमेह, पथरी, शूल, अफारा, विसर्प, रक्तदोष भूतव्याधि इनको शांत करता है ॥२३॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां कल्पस्थाने गुग्गुलुकल्पो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ इति पञ्चमं कल्पस्थानं समाप्तम् ॥ अथ षष्ठं शारीरस्थानम् । प्रथमोऽध्यायः १. अथ शारीराध्यायः । आत्रेय उवाच ॥ पञ्चभूतात्मकं देहं पञ्चेन्द्रियसमायुतम् ॥ सप्तधातुगुणोपेतं दशवातात्मकं विदुः ॥ १ ॥ जीवो मनस्त- थाकाशस्तथैव त्रिगुणात्मकः॥शुक्रशोणितसम्भूतं शरीरं दोष- भाजनम् ॥ पञ्चभूतमयं चैतद्विज्ञेयं भिषजां वर ॥२॥ चतुर्विधं शरीरं स्याद्बाल्यं प्रौढं प्रगल्भकम् ॥ स्थविरञ्च तथा प्रोक्तं बाल्यमल्पशरीरकम्॥षोडशवार्षिकं यावद्बाल्यं तावत् प्रवर्त्तते ॥३॥धातूनाञ्च बलं तत्र धातुमूलं शरीरकम् ॥ धातूनां पुष्टि- योगेन शरीरञ्चातिवर्द्धते ॥ ४ ॥ जीवितं धातुमूलं तु मृत्युर्धा- तुक्षयादपि ॥ हीनधातोश्च योगेन लभते स्वल्पजीवनम् ॥५॥ नरो धातुबलेनापि जीवितश्चात्र दृश्यते ॥ तस्माच्च मैथुनात्स- म्यग्जायते गर्भसम्भवः ॥ ६ ॥ आदौ धातुबलं तस्मात्सत्त्वं तस्माद्रजो विदुः॥रजसा जायते कामः कामात्सुरतसङ्गमः ॥७॥ मासे मासे ऋतुः स्त्रीणां दृष्ट्वा ऋतुमतीस्त्रियः ॥ रजः सप्तदिनं यावद्दतुश्च भिषजां वर ॥ ८ ॥ सप्तरात्रायोनिशुद्धि- स्तस्मादृतुमती भवेत् ॥ दृश्यते च रजः स्त्रीणां विना योगेन पुत्रक ॥ ९ ॥ दृश्यते न विना योगात्फलं स्त्रीणां तु पुत्रक ॥ संशयाद्विस्मितश्चित्ते हारीतः परिपृच्छति ॥ १० ॥

आत्रेयजी कहते हैं-पांच तत्त्वोंसे उत्पन्न होनेवाला पांच इंद्रिय और सात धातु तथा दश वायुओंसे युक्त ऐसे देहको कहते हैं ॥ १ ॥ जीव, मन, आकाश, ऐसे त्रिगुणात्मक शरीर है, वीर्य्य और शोणितसे उपजे हुए शरीरको दोषका पात्र कहते हैं । हे उत्तमवैद्य ! पांच तत्त्वोंसे उत्पन्न होनेवाला शरीर जान ॥ २ ॥ चार प्रकारका शरीर होता है, बालक १, जवान २, प्रगल्भ ३, वृद्ध ४, ऐसे चार प्रकारका कहा है, वहां बालक अल्पशरीर कहा है जबतक सोलह वर्षका हो तब तक बालक अवस्था रहती है ॥ ३ ॥ शरीरमें धातुओंका बल होता है और धातुओंकी जड़वाला शरीर कहा है और धातुओंकी पुष्टिके योगसे शरीर अत्यंत बढता है ॥ ४ ॥ जीवन धातुओंकी जड़से है और धातुक्षय होनेसे मृत्यु हो जाती है और हीन धातुके योगसे थोडा जीवन होता है ॥ ५ ॥ मनुष्यका जीवन धातुकेही बलसे दीखता है इस वास्ते मैथुनसे सम्यक् प्रकारसे गर्भ स्थित होता है ॥ ६ ॥ पहले धातुका बल, उससे सत्त्वगुण, सत्त्वगुणसे रजोगुण, उससे काम व कामसे मैथुनका संगम होताहै ॥ ७ ॥ महीना२ के प्रति ऋतु अर्थात् स्त्री रजस्वला धर्ममें होती है । हे उत्तमवैद्य ! सात दिन- तक स्त्रियोंके रज रहता है तबतक ऋतुसमय कहाता.है ॥ ८ ॥ और सात रात्री पीछे योनिकी शुद्धि हो जाती है तब वह ऋतुमती कहाती है हे पुत्र ! स्त्रियोंके रज बिनाही योगसे होता है ॥ ९ ॥ फल अर्थात् गर्भस्थिति संयोगके बिना नहीं होती है ऐसे सुनके सन्देहमें युक्त हो हारीत फिर पूछता भया ॥ १० ॥ हारीत उवाच ॥ संयोगेन विना प्राज्ञ कथं गर्भो न जायते ॥ संयोगेन विना पुष्पं फलं वा न कथं भवेत्॥ ११॥वृक्षवन्न कथं स्त्रीणां फलोत्पत्तिः प्रदृश्यते ॥ एतत्पृष्टो महाचार्य्यः प्रोवाच ऋषिपुङ्गवः ॥ १२ ॥ हारीत पूछने लगा-हे महाराज ! संगयोके बिना स्त्रियोंके गर्भ क्यों नहीं ठहरता है क्योंकि संयोगके बिना पुष्प तो हो गये फिर फल भी क्यों नहीं होता है ? ॥ ११ ॥ वृक्षकी तरहस्त्रियोंके भी गर्भकी उत्पत्ति क्यों नहीं होती ऐसे पूछा हुआ ऋषियोंमें उत्तम महान् आचार्य फिर बोलता भया ॥ १२ ॥ आत्रेय उवाच ॥ विरुद्धानाञ्च वल्लीनां स्थावराणाञ्च पुत्रक॥ तत्र धातुसमं बीजं सह योगेन वर्त्तते ॥ १३ ॥ न भिन्नदृष्टि- स्तस्येव दृश्यते शृणु पुत्रक॥स्थावराणाञ्च सर्वेषां शिवशक्ति- मयं विदुः ॥ १४ ॥ निश्चलोऽपि शिवो ज्ञेयो व्याप्तिशक्तिर्महा- मते ॥ तत्र स्त्रीपुरुषगुणा वर्त्तते समयोगतः ॥ १५ ॥ आम्र- पुष्पं फलं तद्वद्वीजं शुक्रमयं विदुः॥स्त्रीणां रजोमयं रेतो बीजा-

व्यमिन्द्रियं नरे ॥ तस्मात्संयोगतः पुत्र जायते गर्भसम्भवः ॥ ॥ १६ ॥ प्रथमेऽहनि रेतश्च संयोगात्कललं च यत् ॥ जायते बुद्बुदाकारं शोणितञ्च दशाहनि ॥ १७ ॥ घनं पञ्चदशाहे स्याद्विंशाहे मांसपिण्डकम् ॥ पञ्चविंशत्तमे प्राप्ते पञ्चभूतात्म- सम्भवः ॥ १८ ॥ मासैकेन च पिण्डस्य पञ्चतत्त्वं प्रजायते॥ पञ्चाशद्दिनसंप्राप्ते अङ्कुराणाञ्च सम्भवः ॥ १९ ॥ मासत्रये तु संप्राप्ते हस्तपादौ प्रवर्धते ॥ सार्द्धमासत्रये प्राप्ते शिरश्च सारवद्भवेत् ॥ २० ॥ चतुर्थके च लोमानां सम्भवश्चात्र दृश्यते ॥ पञ्चमे च सुजीवः स्यात्षष्ठे प्रस्फुरणं भवेत् ॥२१॥ अष्टमे मासि जाते च अग्नियोगः प्रवर्त्तते॥मासे तु नवमे प्राप्ते जायते तस्य चेष्टितम् ॥ २२ ॥ जायते तस्य वैराग्यं गर्भवा- सस्य कारणात् ॥ दशमे च प्रसूयेत तथैकादशमेऽपि वा ॥२३॥ अथ दोषबलेनापि गर्भो वापि प्रसूयते ॥ वातसंप्रेरिते गर्भे अपूर्णे दिवसैर्यदि ॥२४॥ प्रसूयते वाप्यथ तद्गर्भे बालःप्रह्र- ष्यते॥अथ वक्ष्यामि देहस्य वर्णज्ञानं महामते॥२५॥नररेतो- ऽधिकत्वेन तथा शुक्राधिकेन तु ॥ हीनरसेन्द्रियैर्वापि जायते पुरुषाधिकः ॥२६॥ स्त्रीरेतसोऽधिकत्वेन हीनशुकेन्द्रियादपि ॥ रजसोऽप्यधिकत्वेन स्त्रीसम्भूतिः प्रजायते॥२७॥ सप्तधातुबले- नापि प्रकृत्या विकृतेः समे॥ऋतुव्याप्तरजःस्त्रीणां या या भवति भावना ॥२८॥ सात्त्विकी राजसी वापि तामसी वापि सत्तम॥ तादृशं जनयेद्बालं गुणैर्वा तादृशैरपि ॥२९॥ या च भावयते चित्ते भ्रातरं पितरं नरम्॥येन वा तेन सदृशं सूयते सा भिष- ग्वर ॥ ३० ॥ वातेन श्यामः पुरुषो वातप्रकृतिसम्भवः ॥ पित्तेन गौरो भवति पित्तप्रकृतिवान्भवेत् ॥ ३१ ॥ श्लेष्मणा जायते स्निग्धः श्यामश्च लोमशस्तथा ॥ दीर्घशिरोरुहः स्थूलो दीर्घप्रकृतिसंयुक्तः ॥ ३२ ॥ वातरक्तेन कृष्णोऽपि पित्तरक्तेन

( ५०६ ) हारीतसंहिता । [ षष्ठस्थाने- पिङ्गलः ॥ पित्तवांश्च नरो रूक्षः स्निग्धः श्यामः कफासृजा ॥३३॥ भृङ्गराजाजनाकारं वातेन दृष्टिमण्डलम् ॥ सूक्ष्मलोमा च कृष्णश्च रूक्षमूर्द्धजयान्वितः॥यस्य वातेन तं विद्धि नखसू- क्ष्मासितच्छविम् ॥३४॥ पित्तेन पीतश्च भवेदलोमा पिङ्गेक्षणा- भासपिशङ्गकेशः॥अलोमशः पीतनखप्रभःस्यात्क्षुधातुरश्चो- ष्मणकेन दृप्तः ॥ ३५ ॥ सलोमशो दृप्तकठोरकेशः श्याम- च्छविर्हृततनुर्विशालः ॥ सुस्निग्धदन्तः सितनेत्ररम्यो नख- च्छविः पाण्डुसुदीर्घनासः ॥ ३६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! विरुद्ध जो स्थावर वृक्ष वेल आदिक हैं उनको तो धातुके संग बीज योगसहित प्रवृत्त होता है ॥ १३ ॥ हे पुत्र ! उनके भिन्न दृष्टि नहीं है सो सुनो संपूर्ण स्थावर वृक्ष आदिकोंके शिव और शक्तिको जान ॥ १४ ॥ वहां निश्चल तो शिव है और शक्ति व्याप्त हो रही है वहां स्त्री पुरुषके गुण संग ही प्रवृत्त होते हैं ॥ १५ ॥ इसवास्ते आमके पुष्प और फल संगमें ही प्रवृत्त होता है और बीजको वीर्यकी जगह जान और स्त्रियोंके रज ही वीर्य है और पुरुषके वीर्य बीजरूप है हे पुत्र ! इस वास्ते संयोगसे ही गर्भकी उत्पत्ति होती है ॥ १६ ॥ और पहले दिन वीर्यके संयोगसे बुलबुलाके आकार वीर्य स्थित होता है दशदिनमें रुधिर होजाता है ॥ १७ ॥ पंदरह दिनमें कड़ा होजाता है और बीसमें दिनमें मांसकी पिंडी होती है, २५ दिनमें पांच तत्त्वोंका संभव होता है ॥ १८ ॥ एक महीनामें उसके पांचों तत्त्व प्रकट होजाते हैं, पंचाशदिनोंमें अंकुरोंकी उत्पत्ति होजाती है ॥१९॥ तीन महीने होजावे तब हाथ पैर बढने लग जाते हैं साढे तीन महीनोंमें शिर प्रकट होजाता है ॥ २० ॥ चौथे महीनेमें रोम होते हैं और पांचवें महीनेमें जीव प्रकट होजाता है, छठे महीनेमें फुरने लगजाता है ॥ २१ ॥ पीछे आठमें महीनेमें उसके जठराग्निका योग होजाता है, नवमें महीनेमें उसको चेष्टा होती है ॥ २२ ॥ पीछे उसको गर्भवासके कारणसे वैराग्य होता है अर्थात् संसारसे दूर होनेका ज्ञान होता है, फिर दशवें महीनेमें उत्पन्न होता है ॥ २३ ॥ वातआदिक दोषोंके बलसे गर्भ जनता है, जो दशवां महीनातक दिन पूरे नहीं हुए हों ॥ २४ ॥ तो वह वातदोषसे प्रेरित हुआ गर्भ पहले ही उत्पन्न होजाता है हे महामते ! अब देहके वर्णज्ञानको कहते हैं ॥ २५ ॥ मनुष्यका वीर्य शुक्र अधिक होवे तो पुरुष जन्मे ॥ २६ ॥ और स्त्रीका वीर्य रज अधिक होवे और शुक्र हीन होवे तो कन्या जन्मे ॥ २७ ॥ सात धातुओंके बलसे प्रकृति और विकृति जब समान होजावे और रजस्वला होनेके स्त्रीके ऋतुसमयमें स्त्रियोंकी जैसी २ भावना हो ॥ २८ ॥ सत्त्वगुणी अथवा रजोगुणी

अ० १ ] भाषाटीकासमेता । (५०७) तथा तामसी जैसी प्रकृति हो तैसेही गुणोंसे युक्त वैसे ही बालकको स्त्री जनती है ॥ २९ ॥ जो स्त्री उस समयमें चित्तमें आता अथवा पिता अथवा अन्यपुरुष जिसका स्मरण करती है हे उत्तमवैद्य ! उसीके सदृश पुत्रको जनती है ॥ ३० ॥ और वात- दोषसे श्यामवर्णवाला पुरुष, वातकी प्रकृतिवाला होता है, पित्तसे गौर वर्णवाला और पित्तकी प्रकृतिवाला होता है ॥ ३१ ॥ कफसे चिकना और श्यामवर्णवाला तथा रोमोंवाला होता है और बड़े बाल हों, स्थूल हो दीर्घ प्रकृतिसे युक्त होता है ॥ ३२ ॥ वात- रक्तसे काले वर्णवाला और पित्तरक्तसे पिंगल वर्णवाला होता है और पित्तवाला मनुष्य रूषा होता है और कफरक्तसे स्निग्ध और कालेवर्णवाला होता है ॥ ३३ ॥ और वात- दोषसे भौंरा तथा अंजनके आकारवाले दृष्टिमंडल होते हैं और जिसके सूक्ष्म रोम हों, काले और रूखे बाल हों और जिसके सूक्ष्म २ लाल नख हों उसकी वातकी प्रकृति जाननी ॥ ३४॥ पित्तसे पीले रोम होते हैं और पीले नेत्र तथा बांदरसरीखे केश होते हैं और रोम नख ये पीले होते हैं और क्षुधासे युक्त रहता है, मुखसे भाफ निकलती रहती है और बहुतसे रोम होते हैं गर्वीला होता है ॥ ३५ ॥ तथा कफसे कठोर बाल होते हैं श्याम कांति हो और गर्वीला तथा सुन्दर शरीर होता है चिकने दाँतहों सुन्दर रमणीक सफेद नेत्र रहते हैं नख पीले रहते हैं और दीर्घ नासिका होती है ॥ ३६ ॥ अथ नपुंसक तथा अपत्ययुग्मका विचार । समवीर्य्यरजस्त्वेन नरः स्त्रीप्रकृतिर्भवेत्॥ नपुंसकमिति ख्यातं न स्त्री न पुरुषो वदेत्॥३७॥दोषधातुविशेषेण सङ्गे सत्यङ्गसं- भवः॥कृतभ्रान्ते च संभोगे द्वाभ्याञ्च द्रवते मनः॥३८॥दृश्य- ते यमलोत्पत्तिरन्यचित्तप्रियङ्करी ॥ ३९ ॥ मैथुन करनेके समय पुरुषका वीर्य और स्त्रीका रज जो समान होवे तो नपुंसक जन्मता है वह न तो पुरुष न स्त्री होता है ॥ ३७ ॥ दोष धातु इनका विशेष करिके संग होनेसे जो अंगका संभव होता है और भ्रांत चित्त होके जो भोग करते हैं वहां दोष और धातु दोनोंसे मन द्रवता है ॥ ३८ ॥ वहां यमल अर्थात् जोडेले बालक उत्पन्न होते हैं वे अन्योंके चित्तको प्रसन्न करनेवाले हैं ॥ ३९ ॥ अथ नपुंसकका विचार । समदोषबलेनापि प्रकृत्या विकृतेरपि ॥ शुक्रास्सृक्च भवेच्छ्या- मा नपुंसककमुद्भवः ॥ ४० ॥ रज वीर्य और प्रकृति विकृति दोषधातु इनके समान होनेसे स्त्री जन्मे तो वहभी हीजडी होती है ॥ ४० ॥

( ५०८ ) हारीतसंहिता । [ षष्ठस्थाने-

अथ गर्भका विवरण । अथ बीजलेहिपञ्चभूताग्निना परिपक्वं कललं क्रियते ॥ सोऽ- पिचान्तःस्थो वायुर्बुद्बुदाकारो बाह्यवातेन संभृतो भवति॥ स च कललं भूत्वा पञ्चभूताग्निना पिण्डं जनयतिच्च तच्च पिंडं परि- पाकगतं घनसंघातञ्च जातं व्यानवातेन पञ्च तत्त्वानिहस्तपादा दीञ्छिरोवयवान्संजनयति अन्तःस्थो वायुरेकोऽपि नानास्थानं समाश्रित्य देहाकारं करोति॥ उदानो गलहृदयसंस्थितो देहमुख- द्वारं प्रकाशयति॥ उदानो गलहृदयसंस्थितो देहमुखद्वारं प्रकाश- यति॥ अपानवायुरधःस्थोऽपानद्वारं विशोधयति॥ एते चान्तः- स्थाः पृथक्पृथक् मार्गेछिद्रं कृत्वा निर्गच्छन्ति ॥ तान्येव नव- द्वाराणि मुखघ्राणकर्णनेत्रापानमेहनानि चैतानि द्वाराणि वातेन प्रभवन्ति॥तत्रान्तःस्थो वायुः प्रतानत्वेन हस्तपादाद्यानवय- वान्संजनयति ॥४१ ॥ त्वङ्मांसकेशरोमास्थिभूभागं जनये- त्तथा ॥ रसं रक्तञ्च लालाञ्च मूत्रं शुक्रं जलानि च ॥ ४२ ॥ अग्निं पित्तञ्च नेत्रञ्च तमः क्रोधादिपञ्चकम्॥ श्रुतिः स्पर्शस्तथो- च्छ्वासः स्वेदञ्चंक्रमणादि च॥४३॥वाता ह्येते परिज्ञेया अन्या प्रकृतिरेव च ॥ मनो बुद्धिस्तथा निद्रा आलस्यं मद एव च ॥ ४४ ॥ शून्यात्पञ्च प्रजायन्ते देहे देहे व्यवस्थिताः ॥ वात- रक्तेन त्वग्देहे मांसं त्वगाश्रितं मतम् ॥ ४५ ॥ शुक्रक्ष्मोद्भवो मेदो रसोऽस्थिरक्तसंभवः ॥ पित्ताश्रितं हृदयस्थं वातरक्तमयं यकृत् ॥ ४६ ॥ रक्तश्लेष्मरसाश्रित ऊरुः कफरक्तश्लेष्ममयः ॥ प्लीहाकफरक्तमय्यः पेश्यश्च ॥ ४७ ॥ पञ्चभूतमयं देहमाकाशं शून्यमेव च ॥ शून्याद्वायुः समुत्पन्नो वायोः प्राणः प्रजायते ॥ प्राणांशश्च तथा जातः सर्वसत्त्वे प्रतिष्ठितः ॥ ४८ ॥ मैथुन समयमें योनिमें प्राप्त हुए वीर्यको पंच तत्त्वोंकी अग्नि पकाके कलल कर देती है पीछे उदरमें स्थित हुआ वह कलल बाहिरकी वायुसे बुलबुलेके आकार होजाता है फिर वह कललहोके

Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu