भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

( ५४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- व बहुतसे वृक्ष और वेलोंके समूहकी छायामें जो कूप अथवा तलाव हो और उसमें पानी सदा बना रहता हो, कीडे और शिवालसे वह पानी संयुक्त हो ॥७५॥ और क्लेदपनेको प्राप्त हो और झागोंसे संयुक्त हो काला हो और वृक्षोंकी जडमें आश्रित हो और बहुतसे वृक्षोंके पत्तोंसे व्याप्त हो दुर्गन्धित हो और मूत्रके गंधके समान गंधवाला हो ॥७६॥ उसे रोगोदक जानना यह विषमरोगोंको करता है और सेवनेसे शूल, कुष्ठ, खाज इन्होंको करता है ॥७७॥ अथवा विष्ठा, मूत्र, तृण, नीला शिवाल, विष इनसे संयुक्त हो और गर्म हो, गढाहो, झागोंसेसंयुक्त हो दंतोंको ग्रहण करता हो, अकालमें वर्षा हो दुर्गंधसे युक्त हो, शिवालसे संयुक्त हो अनेकप्रकारके जीवोंसे मिश्रि- तहो, अत्यंत भारी हो, पत्तोंके समूह और कीचड़से मैला हो, चंद्रमा और सूर्यकी किरणोंसे रक्षि- त हो, ऐसा पानी भी रोगोदक कहाता है इसको भी नहीं पीना, यह सबकालमें दोषोंको उपजाता है॥७८॥ और सेवनेसे गुल्मरोग, तिल्लीरोग, बवासीर, पांडु, जलोदर इनको उपजाता है॥७९॥ अथ अंशूदकके गुणदोष । दिवा सूर्यांशुसन्तप्तं रात्रौ चन्द्रांशुशीतलम् ॥ अंशूदकमिति ख्यातं सर्वरोगनिवारकम् ॥ ८० ॥ कफमेदोऽनिलघ्नं च दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ श्वासकासहरं नीरं चक्षुष्यं नेत्ररोगहत्॥ ८१ ॥ दिनमें सूर्यके किरणोंसे तप्त हुआ और रात्रिमें चंद्रमाके किरणोंसे शीतल हुआ ऐसा पानी अंशूदक कहा है, यह सब रोगोंको दूर करता है ॥ ८० कफ, मेद, वात इन्होंको नाश करता है, जठराग्निको जगाता है, बस्तिको शोधता है, श्वासको और खाँसीको हरता है, नेत्रोंमें हित है और नेत्रके रोगोंको हरता है ॥ ८१ ॥ अथ आरोग्योदकके गुणदोष । पादशेषन्तु कथितं तच्चारोग्यजलं विदुः ॥ कासश्वासहरं पथ्यं मारुतं चापकर्षति ॥ ८२ ॥ सद्यो ज्वरं हरत्याशु समेदं कफना- शनम् ॥ प्रतिश्यायं पाचयति शूलगुल्मार्शनाशनम् ॥ ८३ ॥ दीपनञ्च हुताशस्य पाण्डुशोफोदरापहम् ॥ अजीर्णञ्च जरत्याशु पीतमुष्णोदकं निशि ॥ ८४ ॥ अग्निके द्वारा पकानेसे जो चौथाई भाग शेष रहे वह आरोग्योदक कहाता है, यह खाँसीको और श्वासको हरता है, पथ्य है, वायुको नाशता है॥ ८२ ॥नये ज्वरको शीघ्र हरता है, मेदको और कफको नाशता है, जुकाम पकाता है और शूल, गुल्मरोग, बवासीरको नाशता है ॥८३॥ अग्निको जगाता है और पांडुरोग, शोजा, उदररोगको हरता है और रात्रिमें पियाहुआ गर्मपानी अजीर्णको जलाता है ॥ ८४ ॥