भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( ५५ ) अथ शीतपानीके गुण । मद्यपानसमुद्भूते रोगे पित्तान्विते पुनः ॥ सन्निपातसमुत्थे च तत्र शीतोदकं हितम् ॥ ८५ ॥ मदिराके पीनेसे उपजे रोगमें और पित्तसे अन्वित हुए रोगमें और सन्निपातसे उपजे रोगमें शीतल पानी हित है ॥ ८५ ॥ गर्मपानीके गुण ! शरदृतौ तथा ग्रीष्म क्वथेत्पादावशेषितम् ॥ शिशिरे च वस- न्ते च कुर्यादर्द्धावशेषितम् ॥ ८६ ॥ विपरीतऋतौ दृष्ट्वा प्रावृषि वार्द्धभागिकम् ॥ ८७॥ क्वाथ्यमानं च निर्वेगं निष्फेनं निर्मलञ्च यत् ॥ अर्द्धावशिष्टं भवति तदुष्णोदकमुच्यते ॥८८॥ तत्पाद- हीनं वातघ्नं चार्द्धं पित्तविकारजित् ॥ कफघ्नं पादशेषन्तु पानीयं लघुपाचनम् ॥८९॥ धारापाते हि विष्टम्भि दुर्जरं पवनापहम् ॥ शृतशीतं त्रिदोषघ्नं कफान्तआमि शीतलम् ॥९०॥ दिवसे क्व- थितं तोयं रात्रौ तद्गुरू वर्जयेत्॥रात्रौ शृतं तु दिवसे गुरुत्वम- धिगच्छति ॥ ९१ ॥ शरदऋतुमें और ग्रीष्मऋतुमें पकानेमें चौथाई भाग शेष रहा पानी हित है, शिशिरमें और वसंतऋतुमें पकानेमें आधा शेष रहा पानी हित है ॥ ८६॥ हेमंतऋतुमें पकानेसे तीनहिस्से शेषरहा पानी हित है और वर्षाऋतुमें पकानेमें आधा भाग शेषरहा पानी हित है ॥ ८७ ॥ अग्निपे पका- नेमें वेगसे रहितहो, झागोंसे वर्जितहो मलसे रहितहो, पकानेमें आधा भाग शेषहो तिसको उष्णोदक कहते हैं ॥८८॥ पकानेमें चौथाई भाग जलाहुआ पानी वातको हरता है आधा भाग जलाहुआ पानी पित्तको हरता है तीन भाग जलाहुआ पानी कफको हरता है, ऐसा पानी हलका है पाचन है ॥ ८९ ॥ धाराके पातसे लिया पानी विष्टंभको करता है, मुश्किलसे जरता है, वायुको हरता है, अग्निपै पकाके शीतल किया पानी त्रिदोषको नाशता है कफको हरता है, शीतल है, ॥९०॥ दिनमें पकाये हुए पानीको रात्रिमें नहीं पीवै, यह भारी होजाता है और रात्रिमें पकाये हुए पानीको दिनमें नहीं पीवै यह भी भारी हो जाता है ॥ ९१ ॥ अथ पानीविषयकविधि । मदात्यये सदाहे च रक्तपित्ते तथोर्ध्वगे॥रक्तमेहे विशेषेण नोष्णं तोयं प्रशस्यते ॥९२॥ पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे॥ आध्माने स्तिमिते कोष्ठे सद्यःशुद्धौ नवज्वरे ॥ ९३ ॥