भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1033, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1033
१०९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कुण्डोदर, महाग्रीव, स्थूलजिह्व, द्विबाहु, पार्श्ववक्त्र, सिंहमुख, उन्नतांस, महाहनु, त्रिबाहु, पञ्चबाहु, व्याघ्रवक्त्र और सितानन—ये तथा दूसरे भी बहुत-से बड़े-बड़े मुख और विशाल नेत्रवाले भूत नाचते, हँसते और परस्पर ताल ठोंकते थे ॥ १—४ १/२ ॥

तथान्ये घोररूपाश्च तथान्ये विकृताननाः ॥ ५ ॥
प्रेतभक्षाः प्रेतवाहा मांसशोणितभोजनाः ।

इनके अतिरिक्त भी बहुत-से घोर रूप और विकृत मुखवाले भूत थे, जो मुर्दे खाते, मुर्दोंको ढोकर ले जाते और मांस तथा रक्तका आहार करते थे ॥ ५ १/२ ॥

शवानि सुवहन्त्याशु भक्षयन्तस्ततस्ततः ॥ ६ ॥
पिबन्तो रुधिरं घोरं खण्डयन्तः शवान् बहून् ।

वे बहुत-से शव शीघ्रतापूर्वक इधर-उधरसे लाकर खाते थे, भयंकर रक्त पीते थे और बहुत-से शवोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ६ १/२ ॥

कराला वितता दीर्घा धमनीस्नायुसंतताः ॥ ७ ॥
नानाविधाः सुवीराश्च शूलाग्रप्रोतमानुषाः ।
शिरोमालावृताः केचिदान्त्रपाशावपाशिताः ॥ ८ ॥

वे सब-के-सब विस्तृत, विशाल और विकराल थे । उनके शरीरमें व्याप्त हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं । वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले भूत बड़े वीर थे । उन्होंने अपने शूलोंके अग्रभागमें कितने ही मनुष्योंकी लाशें पिरो रखी थीं । कितने ही भूत नरमुण्डोंकी मालाओंसे अलंकृत थे । कितनोंने अपने-आपको आँतड़ियोंके पाशोंसे बाँध रखा था ॥ ७-८ ॥

डिण्डिमैरट्टहासैश्च नादयन्तो वसुन्धराम् ।
कपालिनो भैरवाश्च जटिला मुण्डिनस्तथा ॥ ९ ॥
एवं बहुविधा घोराः पिशाचा विकृताननाः ।
तथान्ये मुनिवीराश्च ध्यायन्तः परमेश्वरम् ॥ १० ॥
पठन्तो वेदवाक्यानि साङ्गानि विविधानि च ।

कोई नगाड़े बजाते और कोई अट्टहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे । कपाली, भैरव, जटिल और मुण्डी—ये भाँति-भाँतिके विकृत मुखवाले चार प्रकारके घोर पिशाच तथा अन्य मुनिवीर वहाँ परमेश्वरका ध्यान और अङ्गोंसहित वेदोंके विविध वाक्योंका पाठ करते थे ॥ ९-१० १/२ ॥

कुण्डिकास्थकराः केचित् केचित् कुशविचारिणः ॥ ११ ॥
कौपीनवसनाः केचित् केचित् कार्पाससंवृताः ।

कोई कमण्डलुमें हाथ डाले हुए थे, कोई कुश लेकर विचर रहे थे, कितने ही वस्त्रकी जगह कौपीनमात्र धारण करते थे और कितनोंने सूती वस्त्रोंसे अपने अङ्गोंको ढक रखा था ॥ ११ १/२ ॥

स्तुवन्तः शंकरं भक्त्या स्तोत्रैर्माहेश्वरैस्तथा ॥ १२ ॥
एकत्र ते मुनिगणा अपरत्र गणास्तथा ।
अन्यत्र सिद्धगन्धर्वाः प्रियाभिः सह संगताः ॥ १३ ॥

वे सब-के-सब भक्तिभावसे शिवसम्बन्धी स्तोत्रोंद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे । एक ओर तो मुनिगण थे और दूसरी ओर प्रमथगण । इसी तरह एक ओर सिद्ध और गन्धर्व अपनी प्रियतमाओंके साथ वहाँ आये थे ॥ १२-१३ ॥

नृत्यन्ति नृत्यकुशला गायन्ति स्म च कन्यकाः ।
विद्याधरास्तथान्यत्र स्तुवन्तः शंकरं शिवम् ॥ १४ ॥

नृत्यकुशल गन्धर्वकन्याएँ नाचती और गाती थीं । अन्यत्र विद्याधरगण कल्याणकारी भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे ॥ १४ ॥

ननृतुस्तस्य पुरतो गच्छन्तोऽप्सरसां गणाः ।
एवमेतैर्महाघोरैः पिशाचैर्भूतकिन्नरैः ॥ १५ ॥
मुनिभिश्चैव प्रमथैः समं शर्वः समाययौ ।
यत्र विश्वेश्वरो विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १६ ॥
यत्र ते लोकपालाश्च तिष्ठन्ति स्म दिदृक्षया ।
उमया लोकभाविन्या गङ्गया चन्द्रशेखरः ॥ १७ ॥

उनके आगे-आगे चलती हुई अप्सराएँ नृत्य करती थीं । इस प्रकार इन महाभयंकर पिशाचों, भूतों, किन्नरों, मुनियों और प्रमथगणोंके साथ भगवान् शिव उस स्थानपर आये, जहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण अत्यन्त कठोर तपस्या करते थे और जहाँ उनके दर्शनकी इच्छासे लोकपालगण खड़े थे । लोकभाविनि उमा और गङ्गाके साथ भगवान् चन्द्रशेखर वहाँ गये ॥ १५-१७ ॥

स सर्वलोकप्रभवो भवो विभु-
र्जटी च साक्षात् प्रणवात्मकः कृती ।
द्रष्टुं हरिं विष्णुमुदारविक्रमो
ययौ यथेष्टं पिशिताशनैर्वृतः ॥ १८ ॥

सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी भगवान् भव साक्षात् प्रणवस्वरूप हैं । वे जटाधारी और कृतकृत्य हैं । उनका पराक्रम महान् है । वे पिशाचोंसे घिरकर यथेष्ट भावसे श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये गये ॥ १८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां महादेवागमने षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें महादेवजीका आगमनविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

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