विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1032, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] षडशीतितमोऽध्यायः [ १००७
शोभित मस्तक गङ्गाजीके जलसे प्रक्षालित होता था और वे भगवान् शङ्कर उस समय बारंबार देवी उमाकी ओर देखते रहते थे ॥ १३ ॥
भस्माङ्गरगैरनुलेपिताननो महोरगैरुद्वद्धजटः सनातनः । शिरःकपालैः परिशोभितस्तदा द्रष्टुं हरिं केशवमभ्ययाच्छिवः ॥ १४ ॥
उनके मुखपर भस्मस्वरूप अङ्गराग लगा हुआ था। बड़े-बड़े सर्पोंसे उनकी जटाएँ बँधी हुई थीं । नरमुण्डोंकी मालासे सुशोभित वे सनातन शिव उस समय भगवान् केशवको देखनेके लिये उनके पास गये ॥ १४ ॥
यमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तं पुरातनं सांख्यनिबद्धदृष्टयः । यस्यापि देवस्य गुणान् समग्रां- स्तत्त्वांश्चतुर्विंशतिमाहुरेके ॥ १५ ॥
जिन्हें सांख्यदर्शी विद्वान् श्रेष्ठ, महान् एवं पुरातन पुरुष कहते हैं, जिन महादेवजीके समस्त गुणोंको ही एक श्रेणीके विद्वान् चौबीस तत्त्व कहते हैं ॥ १५ ॥
यमाहुरेकं पुरुषं पुरातनं कणादनामानमजं महेश्वरम् । दक्षस्य यज्ञं विनिहत्य यो वै विनाशय देवानसुरान् सनातनः ॥ १६ ॥
जिन्हें एकमात्र पुरातन पुरुष, कणाद नामसे प्रसिद्ध, अजन्मा महेश्वर कहा गया है; जिन सनातन महादेवने दक्षयज्ञका विध्वंस करके देवता और असुरोंको भी मार भगाया था ॥ १६ ॥
यं विदुर्भूततत्त्वज्ञं भूतेशं भूतभावनम् । वामदेवं विरूपाक्षमाहुस्तत्त्वविदो जनाः ॥ १७ ॥ महादेवं सहस्राक्षं कालमूर्तिं चतुर्भुजम् । रुद्रं रोदननामानमाहुर्विश्वेश्वरं शिवम् ॥ १८ ॥ अप्रमेयमनाधारमाहुर्महेश्वरा जनाः । नग्नं नग्नपरीतं तु नागिनं त्वग्निवर्चसम् ॥ १९ ॥ आहुर्विश्वेश्वरं शान्तं शिवमर्दि सनातनम् । तस्य मूर्तिरिमाः सर्वा धराद्याः सकला नृप ॥ २० ॥
जिन्हें तत्त्ववेत्ता पुरुष सम्पूर्ण भूतोंका तत्त्वज्ञ जानते हैं और जिन्हें भूतनाथ, भूतभावन, वामदेव तथा विरूपाक्ष कहते हैं। महादेव, सहस्राक्ष, कालमूर्ति, चतुर्भुज, रुद्र, रोदननामधारी और विश्वेश्वर शिव कहकर पुकारते हैं । जिन्हें शिवमक्त पुरुष अप्रमेय, आधाररहित, नग्न, नग्न पार्षदोंसे घिरा हुआ, नागयुक्त, अग्नितुल्य तेजस्वी, विश्वेश्वर, शान्तस्वरूप, आदि एवं सनातन शिव कहते हैं । राजन् ! ये पृथ्वी आदि सारे तत्त्व उन्हींकी मूर्ति हैं ॥ १७–२० ॥
भूमिरापोऽनलो वायुः खं सूर्यश्च तथा शशी । अग्निश्च यजमानश्च प्रकृतिश्चैवमष्टधा ॥ २१ ॥
पृथ्वीरहित जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, यजमान और प्रकृति—ये महादेवजीके आठ विग्रह हैं ॥
महादेवो महायोगी गिरीशो नीललोहितः । आदिकर्ता महाभर्ता शूलपाणिरुमापतिः । द्रष्टुं विश्वेश्वरं विष्णुं भूतसंघैः समाययौ ॥ २२ ॥
वे महादेव, महायोगी, गिरीश, नील-लोहित, आदिकर्ता, महाभर्ता, शूलपाणि एवं उमावल्लभ शिव जगदीश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये भूत-समूहोंके साथ वहाँ आये ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवागमनकथने पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवजीके आगमनका कथनविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
षडशीतितमोऽध्यायः
पिशाचों, मुनियों और अप्सराओंके साथ उमासहित भगवान् शङ्करका श्रीकृष्णके समीप गमन
वैशम्पायन उवाच
तस्याग्रे समपद्यन्त भूतसंघाः सहस्रशः ।
घण्टाकर्णो विरूपाक्षः कुण्डधारः कुमुद्रहः ॥ १ ॥
दीर्घरोमा दीर्घभुजो दीर्घबाहुर्निरञ्जनः ।
ऊरुनेत्रः शतमुखः शतग्रीवः शतोदरः ॥ २ ॥
कुण्डोदरो महाग्रीवः स्थूलजिह्वो द्विबाहुकः ।
पार्श्ववक्त्रः सिंहमुख उन्नतांसो महाहनुः ॥ ३ ॥
त्रिबाहुः पञ्चबाहुश्च व्याघ्रवक्त्रः सिताननः ।
एते चान्ये च बहवो दीर्घास्या दीर्घलोचनाः ॥ ४ ॥
नृत्यन्तः प्रहसन्तश्च स्फोटयन्तः परस्परम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय भगवान् शङ्करके आगे सहस्रों भूतसमूह चल रहे थे— घण्टाकर्ण, विरूपाक्ष, कुण्डधार, कुमुद्रह, दीर्घरोमा, दीर्घभुज, दीर्घबाहु, निरञ्जन, ऊरुनेत्र, शतमुख, शतग्रीव, शतोदर,