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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] षडशीतितमोऽध्यायः [ १००७

शोभित मस्तक गङ्गाजीके जलसे प्रक्षालित होता था और वे भगवान् शङ्कर उस समय बारंबार देवी उमाकी ओर देखते रहते थे ॥ १३ ॥

भस्माङ्गरगैरनुलेपिताननो महोरगैरुद्वद्धजटः सनातनः । शिरःकपालैः परिशोभितस्तदा द्रष्टुं हरिं केशवमभ्ययाच्छिवः ॥ १४ ॥

उनके मुखपर भस्मस्वरूप अङ्गराग लगा हुआ था। बड़े-बड़े सर्पोंसे उनकी जटाएँ बँधी हुई थीं । नरमुण्डोंकी मालासे सुशोभित वे सनातन शिव उस समय भगवान् केशवको देखनेके लिये उनके पास गये ॥ १४ ॥

यमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तं पुरातनं सांख्यनिबद्धदृष्टयः । यस्यापि देवस्य गुणान् समग्रां- स्तत्त्वांश्चतुर्विंशतिमाहुरेके ॥ १५ ॥

जिन्हें सांख्यदर्शी विद्वान् श्रेष्ठ, महान् एवं पुरातन पुरुष कहते हैं, जिन महादेवजीके समस्त गुणोंको ही एक श्रेणीके विद्वान् चौबीस तत्त्व कहते हैं ॥ १५ ॥

यमाहुरेकं पुरुषं पुरातनं कणादनामानमजं महेश्वरम् । दक्षस्य यज्ञं विनिहत्य यो वै विनाशय देवानसुरान् सनातनः ॥ १६ ॥

जिन्हें एकमात्र पुरातन पुरुष, कणाद नामसे प्रसिद्ध, अजन्मा महेश्वर कहा गया है; जिन सनातन महादेवने दक्षयज्ञका विध्वंस करके देवता और असुरोंको भी मार भगाया था ॥ १६ ॥

यं विदुर्भूततत्त्वज्ञं भूतेशं भूतभावनम् । वामदेवं विरूपाक्षमाहुस्तत्त्वविदो जनाः ॥ १७ ॥ महादेवं सहस्राक्षं कालमूर्तिं चतुर्भुजम् । रुद्रं रोदननामानमाहुर्विश्वेश्वरं शिवम् ॥ १८ ॥ अप्रमेयमनाधारमाहुर्महेश्वरा जनाः । नग्नं नग्नपरीतं तु नागिनं त्वग्निवर्चसम् ॥ १९ ॥ आहुर्विश्वेश्वरं शान्तं शिवमर्दि सनातनम् । तस्य मूर्तिरिमाः सर्वा धराद्याः सकला नृप ॥ २० ॥

जिन्हें तत्त्ववेत्ता पुरुष सम्पूर्ण भूतोंका तत्त्वज्ञ जानते हैं और जिन्हें भूतनाथ, भूतभावन, वामदेव तथा विरूपाक्ष कहते हैं। महादेव, सहस्राक्ष, कालमूर्ति, चतुर्भुज, रुद्र, रोदननामधारी और विश्वेश्वर शिव कहकर पुकारते हैं । जिन्हें शिवमक्त पुरुष अप्रमेय, आधाररहित, नग्न, नग्न पार्षदोंसे घिरा हुआ, नागयुक्त, अग्नितुल्य तेजस्वी, विश्वेश्वर, शान्तस्वरूप, आदि एवं सनातन शिव कहते हैं । राजन् ! ये पृथ्वी आदि सारे तत्त्व उन्हींकी मूर्ति हैं ॥ १७–२० ॥

भूमिरापोऽनलो वायुः खं सूर्यश्च तथा शशी । अग्निश्च यजमानश्च प्रकृतिश्चैवमष्टधा ॥ २१ ॥

पृथ्वीरहित जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, यजमान और प्रकृति—ये महादेवजीके आठ विग्रह हैं ॥

महादेवो महायोगी गिरीशो नीललोहितः । आदिकर्ता महाभर्ता शूलपाणिरुमापतिः । द्रष्टुं विश्वेश्वरं विष्णुं भूतसंघैः समाययौ ॥ २२ ॥

वे महादेव, महायोगी, गिरीश, नील-लोहित, आदिकर्ता, महाभर्ता, शूलपाणि एवं उमावल्लभ शिव जगदीश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये भूत-समूहोंके साथ वहाँ आये ॥ २२ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवागमनकथने पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवजीके आगमनका कथनविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥


षडशीतितमोऽध्यायः

पिशाचों, मुनियों और अप्सराओंके साथ उमासहित भगवान् शङ्करका श्रीकृष्णके समीप गमन

वैशम्पायन उवाच

तस्याग्रे समपद्यन्त भूतसंघाः सहस्रशः ।
घण्टाकर्णो विरूपाक्षः कुण्डधारः कुमुद्रहः ॥ १ ॥
दीर्घरोमा दीर्घभुजो दीर्घबाहुर्निरञ्जनः ।
ऊरुनेत्रः शतमुखः शतग्रीवः शतोदरः ॥ २ ॥
कुण्डोदरो महाग्रीवः स्थूलजिह्वो द्विबाहुकः ।
पार्श्ववक्त्रः सिंहमुख उन्नतांसो महाहनुः ॥ ३ ॥
त्रिबाहुः पञ्चबाहुश्च व्याघ्रवक्त्रः सिताननः ।
एते चान्ये च बहवो दीर्घास्या दीर्घलोचनाः ॥ ४ ॥
नृत्यन्तः प्रहसन्तश्च स्फोटयन्तः परस्परम् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय भगवान् शङ्करके आगे सहस्रों भूतसमूह चल रहे थे— घण्टाकर्ण, विरूपाक्ष, कुण्डधार, कुमुद्रह, दीर्घरोमा, दीर्घभुज, दीर्घबाहु, निरञ्जन, ऊरुनेत्र, शतमुख, शतग्रीव, शतोदर,

१०९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कुण्डोदर, महाग्रीव, स्थूलजिह्व, द्विबाहु, पार्श्ववक्त्र, सिंहमुख, उन्नतांस, महाहनु, त्रिबाहु, पञ्चबाहु, व्याघ्रवक्त्र और सितानन—ये तथा दूसरे भी बहुत-से बड़े-बड़े मुख और विशाल नेत्रवाले भूत नाचते, हँसते और परस्पर ताल ठोंकते थे ॥ १—४ १/२ ॥

तथान्ये घोररूपाश्च तथान्ये विकृताननाः ॥ ५ ॥
प्रेतभक्षाः प्रेतवाहा मांसशोणितभोजनाः ।

इनके अतिरिक्त भी बहुत-से घोर रूप और विकृत मुखवाले भूत थे, जो मुर्दे खाते, मुर्दोंको ढोकर ले जाते और मांस तथा रक्तका आहार करते थे ॥ ५ १/२ ॥

शवानि सुवहन्त्याशु भक्षयन्तस्ततस्ततः ॥ ६ ॥
पिबन्तो रुधिरं घोरं खण्डयन्तः शवान् बहून् ।

वे बहुत-से शव शीघ्रतापूर्वक इधर-उधरसे लाकर खाते थे, भयंकर रक्त पीते थे और बहुत-से शवोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे ॥ ६ १/२ ॥

कराला वितता दीर्घा धमनीस्नायुसंतताः ॥ ७ ॥
नानाविधाः सुवीराश्च शूलाग्रप्रोतमानुषाः ।
शिरोमालावृताः केचिदान्त्रपाशावपाशिताः ॥ ८ ॥

वे सब-के-सब विस्तृत, विशाल और विकराल थे । उनके शरीरमें व्याप्त हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं । वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले भूत बड़े वीर थे । उन्होंने अपने शूलोंके अग्रभागमें कितने ही मनुष्योंकी लाशें पिरो रखी थीं । कितने ही भूत नरमुण्डोंकी मालाओंसे अलंकृत थे । कितनोंने अपने-आपको आँतड़ियोंके पाशोंसे बाँध रखा था ॥ ७-८ ॥

डिण्डिमैरट्टहासैश्च नादयन्तो वसुन्धराम् ।
कपालिनो भैरवाश्च जटिला मुण्डिनस्तथा ॥ ९ ॥
एवं बहुविधा घोराः पिशाचा विकृताननाः ।
तथान्ये मुनिवीराश्च ध्यायन्तः परमेश्वरम् ॥ १० ॥
पठन्तो वेदवाक्यानि साङ्गानि विविधानि च ।

कोई नगाड़े बजाते और कोई अट्टहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे । कपाली, भैरव, जटिल और मुण्डी—ये भाँति-भाँतिके विकृत मुखवाले चार प्रकारके घोर पिशाच तथा अन्य मुनिवीर वहाँ परमेश्वरका ध्यान और अङ्गोंसहित वेदोंके विविध वाक्योंका पाठ करते थे ॥ ९-१० १/२ ॥

कुण्डिकास्थकराः केचित् केचित् कुशविचारिणः ॥ ११ ॥
कौपीनवसनाः केचित् केचित् कार्पाससंवृताः ।

कोई कमण्डलुमें हाथ डाले हुए थे, कोई कुश लेकर विचर रहे थे, कितने ही वस्त्रकी जगह कौपीनमात्र धारण करते थे और कितनोंने सूती वस्त्रोंसे अपने अङ्गोंको ढक रखा था ॥ ११ १/२ ॥

स्तुवन्तः शंकरं भक्त्या स्तोत्रैर्माहेश्वरैस्तथा ॥ १२ ॥
एकत्र ते मुनिगणा अपरत्र गणास्तथा ।
अन्यत्र सिद्धगन्धर्वाः प्रियाभिः सह संगताः ॥ १३ ॥

वे सब-के-सब भक्तिभावसे शिवसम्बन्धी स्तोत्रोंद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे । एक ओर तो मुनिगण थे और दूसरी ओर प्रमथगण । इसी तरह एक ओर सिद्ध और गन्धर्व अपनी प्रियतमाओंके साथ वहाँ आये थे ॥ १२-१३ ॥

नृत्यन्ति नृत्यकुशला गायन्ति स्म च कन्यकाः ।
विद्याधरास्तथान्यत्र स्तुवन्तः शंकरं शिवम् ॥ १४ ॥

नृत्यकुशल गन्धर्वकन्याएँ नाचती और गाती थीं । अन्यत्र विद्याधरगण कल्याणकारी भगवान् शङ्करकी स्तुति करते थे ॥ १४ ॥

ननृतुस्तस्य पुरतो गच्छन्तोऽप्सरसां गणाः ।
एवमेतैर्महाघोरैः पिशाचैर्भूतकिन्नरैः ॥ १५ ॥
मुनिभिश्चैव प्रमथैः समं शर्वः समाययौ ।
यत्र विश्वेश्वरो विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १६ ॥
यत्र ते लोकपालाश्च तिष्ठन्ति स्म दिदृक्षया ।
उमया लोकभाविन्या गङ्गया चन्द्रशेखरः ॥ १७ ॥

उनके आगे-आगे चलती हुई अप्सराएँ नृत्य करती थीं । इस प्रकार इन महाभयंकर पिशाचों, भूतों, किन्नरों, मुनियों और प्रमथगणोंके साथ भगवान् शिव उस स्थानपर आये, जहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण अत्यन्त कठोर तपस्या करते थे और जहाँ उनके दर्शनकी इच्छासे लोकपालगण खड़े थे । लोकभाविनि उमा और गङ्गाके साथ भगवान् चन्द्रशेखर वहाँ गये ॥ १५-१७ ॥

स सर्वलोकप्रभवो भवो विभु-
र्जटी च साक्षात् प्रणवात्मकः कृती ।
द्रष्टुं हरिं विष्णुमुदारविक्रमो
ययौ यथेष्टं पिशिताशनैर्वृतः ॥ १८ ॥

सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी भगवान् भव साक्षात् प्रणवस्वरूप हैं । वे जटाधारी और कृतकृत्य हैं । उनका पराक्रम महान् है । वे पिशाचोंसे घिरकर यथेष्ट भावसे श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये गये ॥ १८ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां महादेवागमने षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें महादेवजीका आगमनविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

शंकरजीसे देवताओंकी प्रार्थना

भविष्यपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः [ १००९


सप्ताशीतितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णद्वारा महादेवजीकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

एवं बहुविधैर्भूतैः पिशाचैरुरागैः सह।
आगत्य भगवान् रुद्रः शंकरो वृषवाहनः ॥ १ ॥
ददर्श विष्णुं देवेशं तपन्तं तप उत्तमम्।
जुह्वानमग्निं विधिवद् द्रव्यैर्मेध्यैर्जगत्पतिम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस तरह नाना प्रकारके भूतों, पिशाचों और सर्पोंके साथ आकर सबका कल्याण करनेवाले वृषभवाहन भगवान् रुद्रने उत्तम तपस्या करते हुए देवेश्वर विष्णु (कृष्ण) को देखा। वे जगदीश्वर श्रीकृष्ण भाँति-भाँतिके पवित्र द्रव्योंद्वारा विधिपूर्वक अग्निमें आहुति देते थे ॥ १-२ ॥

गरुडाहृतकाष्ठं तु जटिलं चीरवाससम्।
चक्रेणानीतकुसुमं खड्गानीतकुशं तथा ॥ ३ ॥
गदाकृतसमाचारं देवदेवं जनार्दनम्।
इन्द्राद्यैर्देवसंघैश्च वृतं मुनिगणैः सह ॥ ४ ॥

वे सिरपर जटा और अङ्गोंमें चीर वस्त्र धारण किये बैठे थे। गरुड़जी उनके लिये समिधा ला देते थे, चक्र फूल चुन लाता था, खड्ग कुशा लाया करता था तथा गदा भी उन देवाधिदेव जनार्दनकी आवश्यक परिचर्या करती थी। वे इन्द्र आदि देवसमूहों तथा मुनिगणोंसे घिरे हुए थे ॥ ३-४ ॥

अचिन्त्यं सर्वभूतानां ध्यायन्तं किमपि प्रभुम्।
अवरुह्य वृषाच्छर्वो भगवान् भूतभावनः ॥ ५ ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा ललाटाक्ष उमापतिः।

समस्त प्राणियोंके लिये अचिन्त्य वे भगवान् श्रीकृष्ण किसी अनिर्वचनीय ध्येय वस्तुका चिन्तन कर रहे थे। उन्हें देखते ही ललाटनेत्रधारी, प्रसन्नचित्त, उमावल्लभ, भूतभावन भगवान् शर्व अपने वाहन वृषभसे उतर पड़े। उस समय वे बड़े प्रसन्न थे ॥ ५ ॥

ततो भूतपिशाचाश्च राक्षसा गुह्यकास्तथा ॥ ६ ॥
मुनयो विप्रवर्याश्च जयशब्दं प्रचक्रिरे।
जय देव जगन्नाथ जय रुद्र जनार्दन ॥ ७ ॥

तदनन्तर भूत, पिशाच, राक्षस, गुह्यक तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ मुनिगण वहाँ जय-जयकार करने लगे—'देव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। रुद्रस्वरूप जनार्दन ! आपकी जय हो ॥ ६-७ ॥

जय विष्णो हृषीकेश नारायण परायण।
जय रुद्र पुराणात्मन्नजय देव हरेश्वर ॥ ८ ॥

'इन्द्रियोंके प्रेरक, सर्वव्यापी, नारायण ! आपकी जय हो। सबको आश्रय देनेवाले रुद्रदेव ! आपकी जय हो ! पुराणात्मन् ! देव ! हरेश्वर ! आपकी जय हो ॥ ८ ॥

आदिदेव जगन्नाथ जय शंकर भावन।
जय कौस्तुभदीप्ताङ्ग जय भस्मविराजित ॥ ९ ॥

'आदिदेव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। शङ्कर ! सबके पालक एवं उत्पादक देव ! आपकी जय हो। कौस्तुभमणिसे उद्भासित अङ्गवाले नारायण ! आपकी जय हो। भस्ममय अङ्गरागसे विराजमान शिव ! आपकी जय हो ॥ ९ ॥

जय चक्रगदापाणे जय शूलित्रिलोचन।
जय मौक्तिकदीप्ताङ्ग जय नागविभूषण ॥ १० ॥

'हाथोंमें चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायण ! आपकी जय हो। शूलधारी त्रिलोचन ! आपकी जय हो। मोतियोंकी मालासे उद्भासित अङ्गवाले श्रीकृष्ण ! आपकी जय हो। नागहारसे विभूषित महादेव ! आपकी जय हो' ॥

इति ते मुनयः सर्वे प्रणामं चक्रिरे हरिम्।
तत उत्थाय भगवान् दृष्ट्वा देवमवस्थितम् ॥ ११ ॥
वृषध्वजं विरूपाक्षं शंकरं नीललोहितम्।
ततो हृष्टमना विष्णुस्तुष्टाव हरमीश्वरम् ॥ १२ ॥

इस प्रकार स्तुति करके उन समस्त मुनियोंने वहाँ श्रीहरिको प्रणाम किया। उस समय वृषभध्वज, विरूपाक्ष, एवं नीललोहित रूपवाले पापहारी, ईश्वर, शङ्करदेवको वहाँ उपस्थित देख श्रीकृष्णका चित्त हर्षसे खिल उठा और उन्होंने महादेवजीकी स्तुति आरम्भ की ॥ ११-१२ ॥

श्रीभगवानुवाच

नमस्ते शितिकण्ठाय नीलग्रीवाय वेधसे।
नमस्ते शोचिषे अस्तु नमस्ते उपवासिने ॥ १३ ॥

श्रीभगवान् बोले—जिनके कण्ठमें हालाहल विष है, अतएव जो नीलग्रीव (नीलकण्ठ) कहे गये हैं। वेधा (जगत्के स्रष्टा), दीप्तिमान् तथा उपवास-व्रतमें तत्पर उन महादेवजीको नमस्कार है ॥ १३ ॥

नमस्ते मीडुषे अस्तु नमस्ते गदिने हर।
नमस्ते विश्वतनवे वृषाय वृषरूपिणे ॥ १४ ॥

हर ! आप सेचन करनेमें समर्थ हैं, आपको नमस्कार है। आप गदाधारी हैं, आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है, आपको नमस्कार है। आप वृषभरूपधारीधर्म हैं, आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥

अमूर्ताय च देवाय नमस्तेऽस्तु पिनाकिने।
नमः कुञ्जाय कूपाय शिवाय शिवरूपिणे ॥ १५ ॥

१०१०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आप अमूर्त देवता तथा पिनाकधारी हैं; आपको नमस्कार है। आप कुञ्ज, कूपमें निवास करनेवाले और कल्याणस्वरूप शिव हैं, आपको नमस्कार है ॥ १५ ॥

नमस्तुष्टाय तुण्डाय नमस्तुट्टिटुटाय च ।
नमः शिवाय शान्ताय गिरिशाय च ते नमः॥ १६ ॥

आप संतुष्ट रहनेवाले, मुखस्वरूप तथा दुष्टोंकी हिंसा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप पर्वतपर शयन करनेवाले शान्तस्वरूप शिव हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ १६ ॥

नमो हराय हिप्राय नमो हरिहराय च ।
नमोऽघोराय घोराय घोराघोरप्रियाय च ॥ १७ ॥

आप हर, हिप्र ( रेचक एवं पूकरूप ) तथा हरिहर-स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप अघोर, घोर तथा घोराघोरप्रिय हैं, आपको नमस्कार है ॥ १७ ॥

नमोऽघण्टाय घण्टाय नमो घटिघटाय च ।
नमः शिवाय शान्ताय गिरिशाय च ते नमः ॥ १८ ॥

आप घण्टारहित, घण्टायुक्त तथा घटिघट ( घड़ेके भी घड़ा ) हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आप पर्वतपर शयन करनेवाले शान्तस्वरूप शिव हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ १८ ॥

नमो विरूपरूपाय पुराय पुरहारिणे ।
नम आद्याय बीजाय शुचयेऽष्टस्वरूपिणे ॥ १९ ॥

आप विरूप रूप धारण करनेवाले हैं, क्षेत्रस्वरूप तथा असुरोंके तीनों पुरोंका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप सबके आदि-बीज, परम पवित्र तथा अष्टमूर्तिधारी हैं, आपको नमस्कार है ॥ १९ ॥

नमः पिनाकहस्ताय नमः शूलासिधारिणे ।
नमः खट्वाङ्गहस्ताय नमस्ते कृत्तिवाससे ॥ २० ॥

आपके हाथमें पिनाक शोभा पाता है, आपको नमस्कार है। आप शूल और खङ्ग धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप अपने हाथमें खट्वाङ्ग धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप गजासुरके चर्मको वस्त्रके रूपमे ओढ़ते हैं, आपको नमस्कार है ॥ २० ॥

नमस्ते देवदेवाय नम आकाशमूर्तये ।
हराय हरिरूपाय नमस्ते तिग्मतेजसे ॥ २१ ॥

देवताओंके भी देवता आपको नमस्कार है। आकाश-स्वरूप आपको नमस्कार है। हरिरूपधारी आप भगवान् हरको नमस्कार है। प्रचण्ड तेजवाले सूर्यतुल्य आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥

भक्तप्रियाय भक्ताय भक्तानां वरदायिने ।
नमोऽभ्रमूर्तये देव जगन्मूर्तिधराय च ॥ २२ ॥

आप भक्तोंके प्रिय, स्वयं भी श्रीहरिके भक्त तथा भक्तोंको वर देनेवाले हैं। देव ! आप मेघस्वरूप हैं तथा विश्वरूप धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥

नमश्चन्द्राय देवाय सूर्याय च नमो नमः।
नमः प्रधानदेवाय भूतानां पतये नमः ॥ २३ ॥

आप चन्द्रदेवको नमस्कार है। आप सूर्यदेवको भी बारंबार नमस्कार है। आप प्रधान देवता तथा सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं, आपको बारंबार नमस्कार है ॥ २३ ॥

करालाय च मुण्डाय विकृताय कपर्दिने ।
अजाय च नमस्तुभ्यं भूतभावनभावन ॥ २४ ॥

आप विकराल रूपधारी, मूँड़ मुँड़ाये हुए संन्यासी, विकृतस्वरूप तथा जटा-जूटधारी हैं। भूतभावनभावन ! आप अजन्मा हैं, आपको नमस्कार है ॥ २४ ॥

नमोऽस्तु हरिकेशाय पिङ्गलाय नमो नमः।
नमस्तेऽभीपुहस्ताय भीरुभीरुहराय च ॥ २५ ॥

सूर्यकी किरणें आपके केश हैं, आपको नमस्कार है। आपकी अङ्गकान्ति पिङ्गलवर्णकी है, आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही मुझ श्रीकृष्णके रूपमें पार्थके सारथि बनकर हाथमें चाबुक लिये रहते हैं। आप भीरु-से-भीरु ( अत्यन्त भयभीत ) तथा हर ( महान् संहारकारी ) हैं, आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥

हराय भीतिरूपाय घोराणां भीतिदायिने ।
नमो दक्षमखघ्नाय भग्ननेत्रापहारिणे ॥ २६ ॥

आप भीतिस्वरूप हर तथा भयंकर दैत्योंको भय देनेवाले हैं, दक्षके यज्ञका विध्वंस तथा भग देवताके नेत्रका अपहरण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ २६ ॥

उमापते नमस्तुभ्यं कैलासनिलयाय च।
आदिदेवाय देवाय भवाय भवरूपिणे ॥ २७ ॥

उमापते ! आप कैलासवासी, आदि देवता, देवमय, जगत्स्वरूप तथा भवनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है ॥

नमः कपालहस्ताय नमोऽजमथनाय च ।
त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं त्र्यक्षाय च शिवाय च॥ २८ ॥

आप हाथमें कपाल धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आपने ब्रह्माजीके सिरको मथ डाला है, आपको नमस्कार है। आप त्रिनेत्रधारी होनेके कारण त्र्यम्बक और त्र्यक्ष कहलाते हैं, आप भगवान् शिवको नमस्कार है ॥

वरदाय वरेण्याय नमस्ते चन्द्रशेखर ।
नम इध्माय हविषे ध्रुवाय च कुशाय च ॥ २९ ॥

चन्द्रशेखर ! आप वरदायक एवं वरणीय देवताको नमस्कार है, आप ही समिधा, हविष्य, ध्रुव एवं कुशरूप हैं, आपको नमस्कार है ॥ २९ ॥

भविष्यपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [ १०११


नमस्ते शक्तियुक्ताय नागपाशप्रियाय च।
विरूपाय सुरूपाय भद्रपानप्रियाय च॥ ३०॥
आप शक्तिसे संयुक्त, नागपाशको पसंद करनेवाले, विरूप एवं सुन्दर रूप धारण करनेवाले तथा मद्यपान (मङ्गलकारी पेय रस) के प्रेमी हैं, आपको नमस्कार है॥ ३०॥

श्मशानरतये नित्यं जयशब्दप्रियाय च।
खरप्रियाय खर्वाय खराय खररूपिणे॥ ३१॥
आप श्मशानभूमिमें प्रसन्नताका अनुभव करते हैं, जय-जयकारका शब्द आपको सदा ही प्रिय है, खर नामक राक्षस आपकी प्रीतिका पात्र था, आपका स्वरूप खर्व (नाटा) है, आप खर (तीव्र या कर्कश स्वभाववाले) हैं, खर (गर्दभ या राक्षस) आपका ही रूप है, आपको नमस्कार है॥ ३१॥

भद्रप्रियाय भद्राय भद्ररूपधराय च।
विरूपाय सुरूपाय महाघोराय ते नमः॥ ३२॥
आपको माङ्गलिक वस्तु प्रिय है, आप मङ्गलमय हैं, मङ्गलरूपधारी हैं, विरूप, सुन्दर रूपवाले तथा महाभयंकर हैं, आपको नमस्कार है॥ ३२॥

घण्टाय घण्टभूषाय घण्टभूषणभूषिणे।
तीव्राय तीव्ररूपाय तीव्ररूपप्रियाय च॥ ३३॥
आप घण्टारूप हैं, घण्टासे विभूषित हैं और घण्टायुक्त भूषण धारण करते हैं। आप तीव्र हैं, तीव्र रूपधारी हैं तथा तीव्र रूपवाले पदार्थ आपको विशेष प्रिय हैं, आपको नमस्कार है॥ ३३॥

नग्नाय नग्नरूपाय नग्नरूपप्रियाय च।
भूतावास नमस्तुभ्यं सर्वावास नमो नमः॥ ३४॥
आप नग्न हैं, नग्नरूपधारी हैं तथा नग्नरूपवाले आपको विशेष प्रिय हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंके आवासस्थान हैं, आपको नमस्कार है। सबके आश्रयभूत महेश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ३४॥

नमः सर्वात्मने तुभ्यं नमस्ते भूतिदायक।
नमस्ते वामदेवाय महादेवाय ते नमः॥ ३५॥
आप सर्वात्माको नमस्कार है। ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले रुद्रदेव! आपको नमस्कार है। आप वामदेव हैं, आपको नमस्कार है। आप महादेव हैं, आपको नमस्कार है॥ ३५॥

का नु वाक्स्तुतिरूपा ते को नु स्तोतुं प्रशक्नुयात्।
कस्य वा स्फुरते जिह्वा स्तुतौ स्तुतिमतां वर॥ ३६॥
भला कौन ऐसी वाणी है, जो आपकी स्तुतिके अनुरूप होगी (आपकी महिमा वाणीकी पहुँचसे बाहर है)? कौन पुरुष आपकी स्तुति कर सकता है? स्तुतिमानों (स्तवनीय महापुरुषों) में श्रेष्ठ महेश्वर! किसकी जिह्वा आपकी स्तुतिके लिये सचेष्ट हो सकती है?॥ ३६॥

क्षमस्व भगवन् देव भक्तोऽहं त्राहि मां हर।
सर्वात्मन् सर्वभूतेश त्राहि मां सततं हर॥ ३७॥
रक्ष देव जगन्नाथ लोकान् सर्वात्मना हर।
त्राहि भक्तान् सदा देव भक्तप्रिय सदा हर॥ ३८॥
भगवन्! महादेव! मेरा अपराध क्षमा कीजिये। हर! मैं आपका भक्त हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। सर्वात्मन्! सर्वभूतेश्वर हर! आप निरन्तर मेरा संरक्षण करें। देव! जगन्नाथ! हर! आप सम्पूर्ण लोकोंका सब प्रकारसे संरक्षण करें। देव! सदा अपने भक्तोंसे प्रेम करनेवाले हर! भक्तजनोंकी सदा रक्षा कीजिये॥ ३७-३८॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां विष्णुकृतेश्वरस्तुतौ सप्ताशीतितमोऽध्यायः॥ ८७॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णकृत महादेवस्तुतिविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८७॥


अष्टाशीतितमोऽध्यायः

भगवान् शिवद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच
ततो वृषध्वजो देवः शूली साक्षादुमापतिः।
करं करेण संस्पृश्य विष्णोश्चक्रधरस्य ह॥ १॥
प्रोवाच भगवान् रुद्रः केशवं गरुडध्वजम्।
शृण्वतां सर्वदेवानां मुनीनां भावितात्मनाम्॥ २॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले देवता, त्रिशूलधारी साक्षात् उमावल्लभ भगवान् रुद्र चक्रधारी श्रीकृष्णका हाथ अपने हाथमें लेकर समस्त देवताओं तथा पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके सुनते हुए गरुड़ध्वज केशवसे इस प्रकार बोले—॥ १-२॥

किमिदं देवदेवेश चक्रपाणे जनार्दन।
तपश्चर्या किमर्थं ते प्रार्थना तव का विभो॥ ३॥
‘देवदेवेश्वर! चक्रपाणे! जनार्दन! आप यह क्या कर रहे हैं? आपकी यह तपश्चर्या किसलिये हो रही है? प्रभो! आपकी प्रार्थना क्या है?॥ ३॥

स्वयं विष्णुर्भवान् नित्यस्तपस्त्वं तपसां हरे।
पुत्रार्थे यदि ते देव तपश्चर्या जनार्दन॥ ४॥

१०१२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

पुत्रो दत्तो मया देव पूर्वमेव जगत्पते। शृणु तत्रापि भगवन् कारणं कारणात्मक ॥ ५ ॥ 'हरे ! आप स्वयं नित्य-स्वरूप भगवान् विष्णु हैं, तपस्याओंकी भी तपस्या हैं। देव ! जनार्दन ! जगत्पते ! यदि आपकी यह तपस्या पुत्रके लिये हो रही है तो मैंने पहलेसे ही आपको पुत्र दे रखा है। देव ! भगवन् ! कारणात्मक नारायण ! इसमें जो कारण है, उसे आप सुनिये ॥ ४-५ ॥

तपश्चर्तुं प्रवृत्तोऽहं कुतश्चित् कारणाद्धरे । वर्षायुतं महाघोरं पुरा कृतयुगे तदा ॥ ६ ॥ 'हरे ! प्राचीन कालके कृतयुगकी बात है कि मैं उन दिनों किसी कारणवश दस हजार वर्षोंके लिये महाघोर तपस्यामें संलग्न हुआ था ॥ ६ ॥

भवानी तत्र मे देव परिचर्तुं तदाभवत् । पित्रा नियुक्ता देवेश उमैषा वरवर्णिनी ॥ ७ ॥ 'देव ! देवेश्वर ! उस समय वहाँ यह मेरी धर्मपत्नी परम सुन्दरी उमा अपने पिताकी आज्ञासे मेरी सेवा करती थी ॥

भीत इन्द्रस्तदा देव मारं मां प्रैषयत्तदा । मधुना सह संयुक्तो मारो मामागतस्तदा ॥ ८ ॥ 'देव ! मेरी उस तपस्यासे इन्द्रको भय हुआ, अतः उस समय उन्होंने कामदेवको मेरे पास भेजा। तब कामदेव अपने सखा वसन्तको साथ लेकर मेरे समीप आया ॥ ८ ॥

लक्ष्यं मामकरोत् तत्र बाणस्य प्रेषितस्य ह। एष मां सेवते तत्र दानात्पुष्पादिनां हरे ॥ ९ ॥ 'हरे ! वहाँ पहुँचते ही कामदेवने मुझे अपने चलाये हुए बाणका निशाना बनाया। यह पार्वती वहाँ फूल आदि जुटाने-के द्वारा मेरी सेवा करती थी ॥ ९ ॥

ततः क्रुद्धोऽहमभवं दृष्ट्वा मारं तथाविधम् । क्रुद्धवतो मम देवेश नेत्रादग्निः पपात ह ॥ १० ॥ 'देवेश्वर ! कामदेवको अपने ऊपर बाण चलाते देख मैं उसके ऊपर कुपित हो उठा। क्रोध करनेपर मेरे ललाटस्थ नेत्रसे सहसा अग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १० ॥

सोऽयमग्निस्तदा मारं भस्मसात् कृतवान् हरे । अचिन्तयं तदा विष्णो शक्रस्यैतच्चिकीर्षितम् ॥ ११ ॥ 'सर्वव्यापी हरे ! उस अग्निने उस समय कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया, तब मेरे ध्यानमें यह बात आयी कि यह सारी करतूत इन्द्रकी थी ॥ ११ ॥

ततः प्रभृति देवेश दया तं प्रति वर्तते। ब्रह्मणा च नियुक्तोऽस्मि प्रीतस्तत्र जनार्दन ॥ १२ ॥ 'देवेश्वर ! जनार्दन ! तभीसे कामदेवके प्रति मुझे बड़ी दया आती है। मैं मन-ही-मन उसपर प्रसन्न हूँ। ब्रह्माजीने भी मुझे प्रेरित किया है कि मैं उसके लिये नूतन शरीर-धारणका अवसर दूँ ॥ १२ ॥

नियुक्तः पुत्ररूपेण स ते देव जगत्पते। ज्येष्ठस्त्वं सुतो देव प्रद्युम्नेत्यभिविश्रुतः ॥ १३ ॥ स्मरं तं विद्धि देवेश नात्र कार्या विचारणा । 'देव ! जगत्पते ! अतः मैंने कामदेवको आपके पुत्र-रूपसे नियुक्त किया है। देव ! वह प्रद्युम्न नामसे विख्यात आपका ज्येष्ठ पुत्र होगा। देवेश्वर ! आप उसे कामदेव ही समझें, इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है' ॥ १३३॥

इत्युक्त्वा पुनराहेदं याथात्म्यं दर्शयन्निव ॥ १४ ॥ मुनीनां श्रोतुकामाનાં याथात्म्यं तत्र सत्तमः। अञ्जलिं सम्पुटं कृत्वा विष्णुमुद्दिश्य शंकरः ॥ १५ ॥ उमया सार्धमीशानो याथात्म्यं वक्तुमर्हत। ऐसा कहकर श्रीहरिके यथार्थ स्वरूपको सुननेकी इच्छा-वाले मुनियोंके समक्ष उनके यथावत् स्वरूपका परिचय देते हुए-से सत्पुरुषशिरोमणि सर्वेश्वर भगवान् शङ्कर उमादेवीके साथ श्रीकृष्णके लिये हाथ जोड़कर फिर इस प्रकार बोलने-उनकी यथार्थताका प्रतिपादन करनेको उद्यत हुए ॥

हरे कुर्वन्ति तत्रैवमञ्जलिं कुरुसत्तम ॥ १६ ॥ मुनयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह किन्नराः। अञ्जलिं चक्रिरे विष्णौ देवदेवेश्वरे हरौ ॥ १७ ॥ कुरुश्रेष्ठ ! वहाँ महादेवजीके इस प्रकार हाथ जोड़नेपर दूसरे-दूसरे मुनि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा किन्नरोंने भी उन सर्वव्यापी देवदेवेश्वर श्रीहरिके समीप हाथ जोड़ लिये ॥

महेश्वर उवाच

यत्तत् कारणमाहुस्तत् सांख्याः प्रकृतिसंज्ञकम्! ततो महान् समुत्पन्नः प्रकृतिर्यस्य कारणम् ॥ १८ ॥ महेश्वर बोले—सांख्यशास्त्रके विद्वान् जिस प्रकृति-संज्ञक कारणतत्त्वका वर्णन करते हैं, उससे 'महान्' (मह-त्तत्त्व या समष्टि बुद्धि) उत्पन्न हुआ, जिसका उपादान कारण प्रकृति है ॥ १८ ॥

त्रिधा भूतं जगद्योनिं प्रधानं कारणात्मकम् । सत्त्वं रजस्तमो विष्णो जगदण्डं जनार्दन ॥ १९ ॥ तस्य कारणमाहुस्त्वां सांख्यप्रकृतिसंज्ञकम् । तद्रूपेण भवान् विष्णो परिणम्याधितिष्ठति ॥ २० ॥ सर्वव्यापी जनार्दन ! कारणस्वरूप जो प्रधान (प्रकृति) है, वही इस जगत्की योनि है। उसके तीन भेद हैं—सत्त्व, रज और तम। इस त्रिगुणमयी प्रकृतिसे ही यह विश्व ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। इसका कारणभूत जो सांख्य-प्रकृति है, उसे विद्वान् पुरुष आपका ही स्वरूप बताते हैं । विष्णो !

भविष्यपर्व.] अष्टाशीतितमोऽध्यायः १०१३


उसके रूपमें आप ही परिणामको प्राप्त होकर उसके अधिष्ठाता बने रहते हैं ॥ १९-२० ॥

तस्मात्तु महतो घोरादहंकारो महानभूत् ।
स त्वमादौ जगन्नाथ परिणामस्तथा हि सः ॥ २१ ॥

उस घोर महान् (महत्तत्त्व) से महान् (समष्टिभूत) अहङ्कार प्रकट हुआ। जगन्नाथ! आदिकालमें प्रकट हुआ वह महत्तत्त्वका वैसा (अहंकारात्मक) परिणाम आप ही हैं ॥

अहंकारात् प्रभो देव कारणानि महान्ति च ।
तन्मात्राणि तथा पञ्च भूतानि प्रभवन्त्युत ॥ २२ ॥

प्रभो! देव! अहङ्कारसे 'तन्मात्र' नामक महान् कारण उत्पन्न हुए, जिनसे पञ्च महाभूतोंका प्राकट्य हुआ है ॥ २२ ॥

तानि त्वामाहुरीशानं भूतानीह जगत्पते ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ २३ ॥

जगत्पते! इस जगत्में जो वे पाँचों महाभूत हैं, उन्हें भी आप सर्वेश्वरका ही स्वरूप बताते हैं। उनके नाम ये हैं- पृथिवी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ भूत अग्नि ॥ २३ ॥

चक्षुर्घाणं तथा स्पर्शो रसनं श्रोत्रमेव च ।
मनः षष्ठं तथा देव प्रेरकं तत्र तत्र ह ॥ २४ ॥

देव! नेत्र, नासिका, त्वचा, रसना और कान—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन्हींके साथ छठा मन है, जो उन इन्द्रियोंको विभिन्न विषयोंमें जानेके लिये प्रेरित करता है ॥ २४ ॥

कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि वागादीनि जनार्दन ।
त्वमेव तानि सर्वाणि करोषि नियतात्मवान् ॥ २५ ॥
स्वेषु स्वेषु जगन्नाथ विषयेषु तथा हरे ।
निवेशयसि देवेश योग्यामिन्द्रियपद्धतिम् ॥ २६ ॥

जनार्दन! वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ और हैं। जगन्नाथ! हरे! अपने मनको संयममें रखनेवाले आप परमात्मा ही उन सब इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंमें नियुक्त करते हैं। देवेश्वर! आप ही योग्य इन्द्रिय-मार्गकी स्थापना करते हैं ॥ २५-२६ ॥

यदा त्वं रजसा युक्तस्तदा भूतानि सृष्टवान् ।
यदा च सत्त्वयुक्तोऽसि तदा पाता जगत्त्रयम् ॥ २७ ॥
यदा त्वं तमसाऽऽकृष्टस्तदा संहरसे जगत् ।

जब आप रजोगुणसे संयुक्त हुए, तब आपने समस्त प्राणियोंकी सृष्टि की। जब आप सत्त्वगुणसे युक्त होते हैं, तब तीनों लोकोंका पालन करते हैं और जब तमोगुणसे आकृष्ट होते हैं, तब जगत्का संहार करते हैं ॥ २७½ ॥

त्रिभिरेव गुणैर्युक्तः सृष्टिरक्षाविनाशने ॥ २८ ॥
धत्तसे त्रिविधां भूतिमादाय नियतात्मवान् ।

इस प्रकार आप नियतात्मा परमेश्वर तीनों ही गुणोंसे युक्त होकर अपनी त्रिविध ऐश्वर्य (शक्ति) को साथ रखते हुए सृष्टि, रक्षा और संहारके कार्यमें सदा संलग्न रहते हैं ॥

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नियोजयसि माधव ॥ २९ ॥
प्राणिनामुपभोगार्थमन्तः स्थित्वा जगद्गुरो ।
तस्मात् सर्वत्र भूतेषु वर्तते सर्वभोगवान् ॥ ३० ॥

माधव! जगद्गुरो! आप प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित होकर उनके उपभोगके लिये इन्द्रियोंको विषयोंमें लगाते हैं। इसलिये सम्पूर्ण भूतोंमें आप ही समस्त भोगोंसे सम्पन्न हैं ॥

ब्रह्मा त्वं सृष्टिकाले तु स्थितौ विष्णुरसि प्रभो ।
संहारे रुद्रनामासि त्रिधामा त्वमसि प्रभो ॥ ३१ ॥

प्रभो! सृष्टिकालमें आप ही ब्रह्मा हैं, पालनकालमें विष्णु कहलाते हैं तथा संहारकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं। भगवन्! इस प्रकार आप तीन धामवाले हैं ॥ ३१ ॥

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
एताः प्रकृतयो देव भिन्नाः सर्वत्र ते हरे ॥ ३२ ॥

हरे! देव! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि (और अहङ्कार)—ये सर्वत्र उपलब्ध होनेवाली आठ भिन्न-भिन्न प्रकृतियाँ आपकी ही हैं ॥ ३२ ॥

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
सहस्रधारः साहस्त्री सहस्रात्मा दिवस्पतिः ॥ ३३ ॥

आप सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित विराट् पुरुष हैं। आपके सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर हैं, धारण करनेवाली भुजाएँ भी सहस्रों हैं। आपकी सभी वस्तुएँ सहस्रोंकी संख्यामें सुशोभित होती हैं। आपके सहस्रों रूप हैं और आप ही स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्र हैं ॥ ३३ ॥

भूमिं सर्वामिमां प्राप्य सप्तद्वीपां ससागराम् ।
अणुः सर्वत्रगो भूत्वा अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ॥ ३४ ॥

सातों द्वीपों और समुद्रोंसे युक्त इस सारी पृथ्वीको व्याप्त करके आप सूक्ष्म एवं सर्वव्यापी होकर इस ब्रह्माण्डसे दस अङ्गुल ऊपर उठे हुए हैं ॥ ३४ ॥

त्वमेवेदं जगत् सर्वं यद् भूतं यद् भविष्यति ।
त्वत्तो विराट् प्रादुर्भूतः सम्राट् चैव जनार्दन ॥ ३५ ॥

जो हुआ है और जो होनेवाला है, वह यह सम्पूर्ण जगत् आप ही हैं। जनार्दन! आपसे ही विराट् और सम्राट् (विराटके अधिष्ठाता पुरुष) की उत्पत्ति हुई है ॥ ३५ ॥

तव वक्त्राज्जगन्नाथ ब्राह्मणो लोकरक्षकः ।
प्रादुरासीत् पुराणात्मन् षट्कर्मनिरतः सदा ॥ ३६ ॥

पुराणात्मन्! जगन्नाथ! आपके मुखसे यजन-याजन आदि छः कर्मोंमें सदा तत्पर रहनेवाला लोकरक्षक ब्राह्मण प्रकट हुआ है ॥ ३६ ॥

१०१४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

राजन्यस्तु तथा बाह्वोरासीत् संरक्षणे रतः ।
ऊर्वोर्वैश्यस्तथा विष्णो पादाच्छूद्र उदाहृतः ॥ ३७ ॥
विष्णो ! आपकी भुजाओंसे रक्षामकर्ममें रत रहनेवाले क्षत्रियकी, दोनों जाँघोंसे वैश्यकी तथा पैरोंसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई बतायी गयी है ॥ ३७ ॥

एवं वर्णा जगन्नाथ तव देहाज्जनार्दन ।
मनसस्तव देवेश चन्द्रमाः समपद्यत ॥ ३८ ॥
सुखकृत् सर्वभूतानां शीतांशुग्मितप्रभः ।
जगदीश्वर ! जनार्दन ! इस प्रकार चारों वर्ण आपके शरीरसे प्रकट हुए हैं। देवेश्वर ! आपके मनसे समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले अमित कान्तिमान् शीतरश्मि चन्द्रमाकी उत्पत्ति हुई है ॥ ३८½ ॥

अक्ष्णोः सूर्यः समुत्पन्नः सर्वप्राणिविलोचनः॥ ३९ ॥
यस्य भासा जगत् सर्वं भासते भानुमानसौ ।
मुखादिन्द्रश्च अग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत ॥ ४० ॥
आपके नेत्रोंसे समस्त प्राणियोंके नेत्रस्वरूप वे भानुमान् (अंशुमाली) सूर्य उत्पन्न हुए हैं, जिनकी प्रभासे सारा जगत् प्रकाशित होता है। आपके मुखसे इन्द्र और अग्नि तथा प्राणसे वायुदेवका प्राकट्य हुआ है ॥ ३९-४० ॥

नाभेरभूदन्तरिक्षं तव देव जनार्दन ।
द्यौरासीत् तु महाघोरा शिरसस्तव गोपते ॥ ४१ ॥
देव ! जनार्दन ! आपकी नाभिसे अन्तरिक्ष प्रकट हुआ। गोपते ! आपके मस्तकसे महाघोर द्युलोकका आविर्भाव हुआ है ॥ ४१ ॥

पद्भ्यां भूमिः समुत्पन्ना दिशः श्रोत्राज्जगत्पते ।
एवं सृष्ट्वा जगत् सर्वं व्याप्य सर्वं व्यवस्थितः ॥ ४२ ॥
जगत्पते ! आपके पैरोंसे पृथ्वी और कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करके आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ ४२ ॥

व्याप्य सर्वानिमाँल्लोकान् स्थितः सर्वत्र केशव ।
ततश्च विष्णुरनामासि धातोर्व्याप्तेश्च दर्शनात् ॥ ४३ ॥
केशव ! इन सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त होकर आप सर्वत्र विराजमान हैं। इसलिये ‘विष्’ धातुके व्याप्तिरूप अर्थका दर्शन होनेसे आप ‘विष्णु’ नाम धारण करते हैं ॥ ४३ ॥

नारा आपः समाख्यातास्तासामयनमादितः ।
यतस्त्वं भूतभव्येश तन्नारायणशब्दितः ॥ ४४ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी विष्णुदेव ! जलको नार कहते हैं, उस नारके आप आदिकालसे ही अयन (आश्रय) हैं, इसलिये ‘नारायण’ कहलाते हैं ॥ ४४ ॥

हरसि प्राणिनो देव ततो हरिरिति स्मृतः ।
शंकरोऽसि सदा देव ततः शंकरतां गतः ॥ ४५ ॥
देव ! आप प्राणियों (के पाप-ताप) का हरण करते हैं, इसलिये ‘हरि’ कहे गये हैं। देव ! आप सदा सबका ‘शम्’ (कल्याण) करते हैं, इसलिये ‘शङ्कर’ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं ॥ ४५ ॥

बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तस्माद् ब्रह्मेति शब्दितः ।
मधुरिन्द्रियनामेति ततो मधुनिषूदनः ॥ ४६ ॥
बृहत् तथा वर्धनशील होनेके कारण आपको ‘ब्रह्म’ कहते हैं। मधु नाम है इन्द्रियोंका, उनका दमन करनेके कारण आप ‘मधुसूदन’ कहलाते हैं ॥ ४६ ॥

हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तेषामीशो यतो भवान् ।
हृषीकेशस्ततो विष्णो ख्यातो देवेषु केशव ॥ ४७ ॥
केशव ! विष्णो ! हृषीक कहते हैं इन्द्रियोंको । आप उनके ईश (स्वामी अथवा प्रेरक) हैं, इसलिये देवताओंमें ‘हृषीकेश’ नामसे विख्यात हैं ॥ ४७ ॥

क इति ब्रह्मणो नाम ईशोऽहं सर्वदेहिनाम् ।
आवां तवाङ्गसम्भूतौ तस्मात् केशवनामवान् ॥ ४८ ॥
‘क’—यह ब्रह्माजीका नाम है और मैं समस्त देहधारियोंका ‘ईश’ हूँ। हम दोनों आपके शरीरसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये आप ‘केशव’ नाम धारण करते हैं ॥ ४८ ॥

मा विद्या च हरे प्रोक्ता तस्या ईशो यतो भवान् ।
तस्मान्माधवनामासि धवः स्वामीति शब्दितः ॥ ४९ ॥
हरे ! ‘मा’ कहते हैं विद्याको । आप उसके ‘धव’ (ईश्वर या स्वामी) हैं, इसलिये ‘माधव’ नामसे प्रसिद्ध हैं। धव-शब्द स्वामीका वाचक है ॥ ४९ ॥

गौरेषा तु यतो वाणी तां च वेत्थ यतो भवान् ।
गोविन्दस्तु ततो देव मुनिभिः कथ्यते भवान् ॥ ५० ॥
देव ! यह वाणी ‘गो’ नामसे प्रसिद्ध है। उसे आप जानते हैं, इसलिये मुनलोग आपको ‘गोविन्द’ कहते हैं ॥ ५० ॥

त्रिरित्येव त्रयो वेदाः कीर्तिता मुनिसत्तमैः ।
क्रमते तांस्तथा सर्वोस्त्रिविक्रम इति श्रुतः ॥ ५१ ॥
श्रेष्ठ मुनियोंने तीनों वेदोंको ‘त्रि’ नाम दिया है, आप उन तीनोंको क्रान्त (व्याप्त) करके स्थित हैं; इसलिये ‘त्रिविक्रम’ नामसे विख्यात हैं ॥ ५१ ॥

अणुर्वामननामासि यतस्त्वं वामनाख्यया ।
मननान्मुनिरेवासि यमनाद् यतिरुच्यसे ॥ ५२ ॥
आप सूक्ष्म या लघु होनेसे ‘वामन’ नाम धारण करते हैं। आपके वामन नामसे प्रसिद्ध होनेका यही हेतु है। आप मनन करनेसे ‘मुनि’ हैं और यमका पालन करनेसे ‘यति’ कहलाते हैं ॥

तपश्चरसि यस्मात् त्वं तपस्वीति च शब्दितः ।
वसन्ति त्वयि भूतानि भूतावासस्ततो हरे ॥ ५३ ॥

भविष्यपर्व.] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [१०१५


अतः आप तपस्या करते हैं, इसलिये 'तपस्वी' नामसे प्रसिद्ध हैं। हरे ! सम्पूर्ण भूत आपमें निवास करते हैं, इस-लिये आप 'भूतावास' कहलाते हैं ॥ ५३ ॥

ईशस्त्वं सर्वभूतानामीश्वरोऽसि ततो हरे ।
प्रणवः सर्ववेदानां गायत्री छन्दसां प्रभो ॥ ५४ ॥
हरे ! आप सम्पूर्ण भूतोंके ईश हैं, इसीलिये 'ईश्वर' कहे गये हैं। प्रभो ! आप समस्त वेदोंमें प्रणव और सम्पूर्ण छन्दों-में 'गायत्री' हैं ॥ ५४ ॥

अक्षराणामकारस्त्वं स्फोटस्त्वं वर्णसंश्रयः ।
रुद्राणामहमेवास्मि वसूनां पावको भवान् ॥ ५५ ॥
आप अक्षरोंमें अकार हैं। वर्णोंके आश्रित रहनेवाले स्फोट^१ हैं। रुद्रोंमें मैं अर्थात् शङ्कर हूँ और वसुओंमें आप पावक हैं ॥ ५५ ॥

अश्वत्थो वृक्षजातीनां ब्रह्मा लोकगुरुर्भवान् ।
मेरुस्त्वं पर्वतेन्द्राणां देवर्षीणां च नारदः ॥ ५६ ॥
आप वृक्ष-जातियोंमें अश्वत्थ हैं। समस्त लोकोंके गुरु ब्रह्मा हैं। श्रेष्ठ पर्वतोंमें मेरु और देवर्षियोंमें नारद हैं ॥ ५६ ॥

दानवानां भवान् दैत्यः प्रह्लादो भक्तवत्सलः ।
सर्पाणामेव सर्वेषां भवान् वासुकिसंज्ञितः ॥ ५७ ॥
आप दानवोंमें दैत्यनन्दन भक्तवत्सल प्रह्लाद हैं। समस्त सर्पोंमें आप ही वासुकि हैं ॥ ५७ ॥

गुह्यकानां च सर्वेषां भवान् धनद एव च ।
वरुणो यादसां राज। गङ्गा त्रिपथगाग् भवान् ॥ ५८ ॥
आप समस्त गुह्यकोंमें धनदाता कुबेर हैं। जल-जन्तुओंके राजा वरुण और त्रिपथगामिनी गङ्गा भी आप ही हैं ॥ ५८ ॥

आदिस्त्वं सर्वभूतानां मध्यमन्तस्तथा भवान् ।
त्वत्तः सम्भवद्विश्वं त्वयि सर्वं प्रलीयते ॥ ५९ ॥
आप समस्त भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। आपसे इस विश्वका प्रादुर्भाव हुआ है और अन्तमें सारा जगत् आप-में ही लीन हो जाता है ॥ ५९ ॥

अहं त्वं सर्वगो देव त्वमेवाहं जनार्दन ।
आवयोरन्तरं नास्ति शब्दैरर्थैर्जगत्पते ॥ ६० ॥
जनार्दन ! देव ! मैं ही आप सर्वव्यापी देवता हैं और आप ही मैं हूँ। जगत्पते ! शब्द और अर्थसे भी हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ६० ॥

नामानि तव गोविन्द यानि लोके महान्ति च ।
तान्येव मम नामानि नात्र कार्या विचारणा ॥ ६१ ॥
गोविन्द ! लोकमें जो आपके महान् नाम हैं, वे ही मेरे भी नाम हैं। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥

त्वदुपासा जगन्नाथ सैवास्ति मम गोपते ।
यश्च त्वां द्वेष्टि देवेश स मां द्वेष्टि न संशयः ॥ ६२ ॥
जगन्नाथ ! गोपते ! आपकी जो उपासना है, वही मेरी भी है। देवेश्वर ! जो आपसे द्वेष रखता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है, इसमें संशय नहीं ॥ ६२ ॥

त्वद्विस्तारो यतो देव अहं भूतपतिस्ततः ।
न तदस्ति विना देव यत् ते विरहितं हरे ॥ ६३ ॥
देव ! आपका ही विस्तार मैं हूँ, अतः आपकीही भाँति मैं भी सम्पूर्ण भूतोंका अधिपति कहलाता हूँ। देव ! हरे ! ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो आपके बिना या आपसे रहित हो ॥ ६३ ॥

यदासीद् वर्तते यच्च यच्च भावि जगत्पते ।
सर्वं त्वमेव देवेश विना किञ्चित्त्वया न हि ॥ ६४ ॥
जगत्पते ! देवेश्वर ! जो कुछ था, जो है और जो भविष्य-में होनेवाला है, वह सब आप ही हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो आपसे रहित हो ॥ ६४ ॥

स्तुवन्ति देवाः सततं भवन्तं स्वैर्गुणैः प्रभो ।
ऋक्च त्वं यजुरेवासि सामासि सततं प्रभो ॥ ६५ ॥
प्रभो ! देवता सदा आपके निजी गुणोंका बखान करके आपकी स्तुति करते हैं। भगवन् ! आप ही नित्य-निरन्तर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं ॥ ६५ ॥

किमुच्यते मया देव सर्वं त्वं भूतभावन ।
नमः सर्वात्मना देव विष्णो माधव केशव ॥ ६६ ॥
भूतभावन देव ! मैं अधिक क्या कहूँ ! आप ही सब कुछ हैं। देव ! विष्णो ! माधव ! केशव ! आपको सब प्रकारसे नमस्कार है ॥ ६६ ॥

नमस्करोमि सर्वात्मन् नमस्तेऽस्तु सदा हरे ।
नमः पुष्करनाभाय वन्दे त्वामहमीश्वर ॥ ६७ ॥
सर्वात्मन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हरे ! आपको सदा ही नमस्कार है। आप पद्मनाभ हैं, आपको नमस्कार है। ईश्वर ! मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥ ६७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवकृतविष्णुस्तुतौ अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवकृत विष्णुकी स्तुतिविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥


१. सर्वदर्शनसंग्रहके अनुसार नित्य शब्द, जिससे वर्णात्मक शब्दोंके अर्थका ज्ञान होता है, जैसे कमल शब्दमें क, म और ल-ये तीन वर्ण हैं और इन तीनोंके अलग-अलग उच्चारणसे कुछ भी अभिप्राय नहीं निकलता, परंतु तीनों वर्णोंका साथ-साथ उच्चारण करनेपर जो स्फोट होता है, उसीसे कमल शब्दका अभिप्राय जाना जाता है। कुछ लोग इसी स्फोट (नित्य शब्द) को संसारका कारण मानते हैं।

१०१६श्रीमहाभारते खिलभागे[हरिवंशे

एकोननवतितमोऽध्यायः

भगवान् शङ्करका ऋषियोंको श्रीकृष्णतत्त्वका उपदेश देना

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा देवदेवेशं मुनीनाह पुनः शिवः।
एवं जानीत हे विप्रा ये भक्ता द्रष्टुमागताः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! देवदेवेश्वर श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर भगवान् शिवने पुनः मुनियोंसे कहा—'ब्राह्मणो ! जो भक्तजन यहाँ श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये आये हैं, वे सब यह जान लें ॥ १ ॥

एतदेव परं वस्तु नैतस्मात् परमस्ति वः।
एतदेव विजानीध्वमेतद् वः परमं तपः ॥ २ ॥

'ये श्रीकृष्ण ही परम वस्तु हैं, तुमलोगोंके लिये इनसे बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। ये ही तुम्हारी तपस्याके सर्वोत्तम फल हैं, इस बातको तुमलोग अच्छी तरह जान लो ॥ २ ॥

एतदेव सदा विप्रा ध्येयं सततमानसैः।
एतद् वः परमं श्रेय एतद् वः परमं धनम् ॥ ३ ॥

'विप्रगण ! सदा एकाग्रचित्त होकर नित्य-निरन्तर इन्हीं श्रीकृष्णका ध्यान करना चाहिये। ये ही तुम्हारे परम कल्याण हैं और ये ही तुम्हारे परम धन हैं ॥ ३ ॥

एतद् वो जन्मनः कृत्यमेतद् वस्तपसः फलम्।
एष वः पुण्यनिलय एष धर्मः सनातनः ॥ ४ ॥

'ये ही तुम्हारे जन्म और जीवनकी सफलता हैं। ये ही तुम्हारी तपस्याके फल हैं। ये ही तुम्हारे पुण्योंके भण्डार हैं और ये ही सनातन धर्म हैं ॥ ४ ॥

एष वो मोक्षदाता च एष मार्ग उदाहृतः।
एष पुण्यप्रदः साक्षादेतद् वः कर्मणां फलम् ॥ ५ ॥

'ये ही तुम्हे मोक्ष देनेवाले हैं और ये ही गन्तव्य मार्ग बताये गये हैं। ये ही साक्षात् पुण्यदायक और ये ही तुम्हारे सत्कर्मोंके फल हैं ॥ ५ ॥

एतदेव प्रशंसन्ति विद्वांसो ब्रह्मवादिनः।
एष त्रयीगतिर्विप्राः प्रार्थ्यो ब्रह्मविदां सदा ॥ ६ ॥

'ब्रह्मवादी विद्वान् सदा इनकी ही प्रशंसा करते हैं। ये ही तीनों वेदोंकी गति (आश्रय) हैं। ब्राह्मणो ! ब्रह्मवेत्ता पुरुष सदा इन्हींकी प्राप्तिके लिये प्रार्थना करते हैं ॥ ६ ॥

एतदेव प्रशंसन्ति सांख्ययोगसमाश्रिताः।
एष ब्रह्मविदां मार्गः कथितो वेदवादिभिः ॥ ७ ॥

'सांख्य और योगका आश्रय लेनेवाले विद्वान् इन्हींके गुण गाते हैं। वेदवादी विद्वानोंने इन्हींको ब्रह्मवेत्ताओंका मार्ग बताया है ॥ ७ ॥

एवमेव विजानीत नात्र कार्या विचारणा।
हरिरेकः सदा ध्येयो भवद्भिः सत्त्वमास्थितैः ॥ ८ ॥

'विप्रवरो ! तुम सदा ऐसा ही जानो। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले तुम-जैसे भक्तोंको सदा एकमात्र श्रीहरिका ही चिन्तन करना चाहिये ॥ ८ ॥

नान्यो जगति देवोऽस्ति विष्णोर्नारायणात् परः।
ओमित्येवं सदा विप्राः पठत ध्यात केशवम् ॥ ९ ॥

'संसारमें सर्वव्यापी नारायणसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। ब्राह्मणो ! तुम सदा ओम्‌का जप और भगवान् केशवका ध्यान किया करो ॥ ९ ॥

ततो निःश्रेयसप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।
एवं ध्यातो हरिः साक्षात् प्रसन्नो वो भविष्यति ॥ १० ॥

'ऐसा करनेसे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी। इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार ध्यान करनेपर साक्षात् श्रीहरि तुमलोगोंपर प्रसन्न होंगे ॥ १० ॥

भवनाशमयं देवः करिष्यति दृढं हरिः।
सदा ध्यायत हरिं विप्रा यदीच्छा प्राप्तुमच्युतम् ॥ ११ ॥

'ये भगवान् विष्णु तुम्हारे संसार-बन्धनका दृढ़तापूर्वक नाश कर डालेंगे। ब्राह्मणो ! यदि भगवान् अच्युतको प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो सदा ही उन श्रीहरिका ध्यान करो ॥ ११ ॥

एष संसारविभवं विनाशयति वो गुरुः।
स्मरध्वं सततं विष्णुं पठध्वं त्रिशरीरिणम् ॥ १२ ॥

'ये ही तुम्हारे गुरु हैं। ये संसार-बन्धनका विस्तार करनेवाली मूल-अविद्याका नाश कर डालेंगे, अतः तुमलोग ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप त्रिविध शरीर धारण करनेवाले श्रीहरिका सदा स्मरण एवं कीर्तन किया करो ॥ १२ ॥

मनःसंयमनं विप्राः कुरुध्वं यत्नतः सदा।
शुद्धेऽन्तःकरणे विष्णुः प्रसीदति तपोधनाः ॥ १३ ॥

'ब्राह्मणो ! तुमलोग सदा यत्नपूर्वक मनका संयम करो। तपोधनो ! संयमसे अन्तःकरण शुद्ध हो जानेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ॥ १३ ॥

ध्यात्वा मां सर्वयत्नेन ततो जानीत केशवम्।
उपास्योऽहं सदा विप्रा उपास्येऽस्मिन् हरौ स्मृतः ॥ १४ ॥

'ब्राह्मणो ! तुम सम्पूर्ण यत्नसे मेरा चिन्तन करके फिर केशवका ज्ञान प्राप्त करो। इन उपास्यदेव श्रीहरिमें सदा मैं ही उपास्य माना गया हूँ ॥ १४ ॥

भविष्यपर्व ] नवतितमोऽध्यायः [ १०१७

उपायोऽयं मया प्रोक्तो नात्र संदेह इत्यपि ।
अयं मायी सदा विप्रा यतध्वमघनाशने ॥ १५ ॥
'विप्रगण ! यह मैंने भगवान्की प्राप्तिका उपाय बताया, इसमें संदेह नहीं है। ये भगवान् मायाके अधिपति हैं, तुम सब लोग इन पापहारी हरिकी प्राप्तिके लिये सदा प्रयत्न करते रहो ॥ १५ ॥

यथा वो बुद्धिरखिला शुद्धा भवति यत्नतः ।
तथा कुरुत विप्रेन्द्रा यथा देवः प्रसीदति ॥ १६ ॥
'विप्रवरो ! जिस प्रकारसे यत्न करनेपर तुम्हारी सारी बुद्धि शुद्ध हो जाय और जिससे भगवान् प्रसन्न हो जायें, वैसा करो' ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तास्ततः सर्वे मुनयः पुण्यशीलिनः ।
यथावदुपगृह्णाना निरसन् संशयं नृप ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! भगवान् शङ्करके ऐसा कहनेपर उन समस्त पुण्यशील मुनियोंने यथावत् रूपसे उनके उपदेशको ग्रहण किया और अपने मनसे संशयको निकाल दिया ॥ १७ ॥

एवमेवेति तं विप्राः प्राहुः प्राञ्जलयो हरम् ।
छिन्नो नः संशयः सर्वो गृहीतोऽर्थः स तादृशः ॥ १८ ॥
उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर महादेवजीसे कहा—'भगवन् ! आपने जैसा कहा है, ऐसी ही बात है। हमारा सारा संशय नष्ट हो गया और हमने वैसा ही सिद्धान्त स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥

एतदर्थं समायाता वयमद्य तवालयम् ।
संगमाद् युवयोः सर्वो नष्टो मोहो महानिह ॥ १९ ॥
'प्रभो ! हम इसीलिये आज आपके निवासस्थानपर आये थे। आप दोनोंके समागमसे यहाँ हमारा सारा महान् मोह नष्ट हो गया ॥ १९ ॥

यथा वदसि देवेश तथा नः श्रेयसे परम् ।
यथाऽऽह भगवान् रुद्रो यतामः सततं हरौ ।
इति ते मुनयः प्रीताः प्रणेमुः केशवं हरिम् ॥ २० ॥
'देवेश्वर ! आप जैसा कहते हैं, वैसा करनेसे ही हमारा परम कल्याण होगा। आप भगवान् रुद्रने जैसा कहा है, उसके अनुसार हम सदा श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये यत्न करते रहेंगे। ऐसा कहकर उन प्रसन्न हुए मुनियोंने श्रीकृष्णव हरिको प्रणाम किया ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां ऋष्युपदेशे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें भगवान् शिवका ऋषियोंको उपदेशविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥


नवतितमोऽध्यायः

भगवान् शंकरद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका कैलाससे बदरिकाश्रममें लौटना

वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् रुद्रः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
स्तुत्या प्रचक्रमे स्तोतुं विष्णुं विश्वेश्वरं हरिम् ।
अर्थाभिस्तु तदा वाग्भिर्मुनीनां शृण्वतां तथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् रुद्र सबको विस्मयमें डालते हुए-से सर्वव्यापी जगदीश्वर श्रीहरिकी स्तोत्रद्वारा स्तुति करनेको उद्यत हुए। उन्होंने उस समय मुनियोंके सुनते हुए अर्थयुक्त वाणीद्वारा इस प्रकार स्तुति आरम्भ की ॥ १ ॥

महेश्वर उवाच
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ।
यस्य भासा जगत् सर्वं भासते नित्यमच्युत ॥ २ ॥
नमो भगवते देव नित्यं सूर्यात्मने नमः ।
महेश्वर बोले—आप परम बुद्धिमान् भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। अच्युत देव ! जिनके प्रकाशसे ही यह सारा जगत् सदा प्रकाशित होता है, उन सूर्यरूप आप भगवान्को नित्य बारंबार नमस्कार है ॥ २ ॥

यः शीतयति शीतांगुर्लोकान् सर्वानिमान् विभुः ॥ ३ ॥
नमस्ते विष्णवे देव नित्यं सोमात्मने नमः ।
देव ! जो शीतरश्मि भगवान् चन्द्रमा इन सम्पूर्ण लोकोंको शीतलता प्रदान करते हैं, उन सोमरूप आप श्रीहरिको नित्य नमस्कार है ! नमस्कार है ॥ ३ ॥

यः प्रजाः प्रीणयत्येको विश्वात्मा भूतभावनः ॥ ४ ॥
नमः सर्वात्मने देव नमो वागात्मने हरे ।
देव ! हरे ! जो एकमात्र विश्वात्मा भूतभावन भगवान् समस्त प्रजाको तृप्ति प्रदान करते हैं, उन सर्वरूप और वाणीस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ४ ॥

यो दधार करेणासौ कुशचीरादि यत् सदा ॥ ५ ॥
दधार वेदान् सर्वांश्च तुभ्यं ब्रह्मात्मने नमः ।
जो सदा अपने हाथसे कुश, चीर आदि धारण करते हैं

१०१८महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तथा जिन्होंने सम्पूर्ण वेदोंको धारण किया है, वे ब्रह्मा आप ही हैं। आपको नमस्कार है॥ ५ १/२ ॥

सर्वान् संहरते यस्तु संहारे विश्वदृक् सदा ॥ ६ ॥
क्रोधात्मासि विरूपोऽसि तुभ्यं रुद्रात्मने नमः।

जो विश्वद्रष्टा भगवान् संहारकालमें सदा समस्त लोकोंका संहार करते हैं, वे आप ही हैं। आप क्रोधरूप, विकरालरूप तथा रुद्रस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है॥ ६ १/२ ॥

सृष्टौ स्रष्टा समस्तानां प्राणिनां प्राणदायिने ॥ ७ ॥
अजाय विष्णवे तुभ्यं स्रष्ट्रे विश्वसृजे नमः।

जो सृष्टिकालमें स्रष्टा बनकर समस्त प्राणियोंको प्राणदान करते हैं, उन अजन्मा, विश्वस्रष्टा, विधाता आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है॥ ७ १/२ ॥

आदौ प्रकृतिमूलाय भूतानां प्रभवाय च ॥ ८ ॥
नमस्ते देवदेवेश प्रधानाय नमो नमः।

देवदेवेश्वर ! जो आदिमें मूल-प्रकृतिरूप है और गुणोंमें क्षोभ होनेपर क्रमशः पञ्च-महाभूतोंका उत्पादक होता है, उन प्रधानस्वरूप आपको बारंबार नमस्कार है॥ ८ १/२ ॥

पृथिव्यां गन्धरूपेण संस्थितः प्राणिनां हरे ॥ ९ ॥
दृढाय दृढरूपाय तुभ्यं गन्धात्मने नमः।

प्राणियों(के पापों)का अपहरण करनेवाले हरे! आप पृथिवीमें गन्धरूपसे स्थित हैं। आप दृढ़ हैं, दृढ़ रूपधारी हैं तथा गन्धस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है॥ ९ १/२ ॥

अपां रसाय सर्वत्र प्राणिनां सुखहेतवे ॥ १० ॥
नमस्ते विश्वरूपाय रसाय च नमो नमः।

जो प्राणियोंको सुख देनेके लिये सर्वत्र जलमें रसरूपसे निवास करते हैं, उन विश्वरूपधारी रसस्वरूप आपको बारंबार नमस्कार है॥ १० १/२ ॥

तेजसा भास्करो यस्तु घृणिर्जन्तुहितः सदा ॥ ११ ॥
तस्मै देव जगन्नाथ नमो भास्कररूपिणे।

देव ! जगन्नाथ ! जो तेजसे सूर्यतुल्य, किरणोंसे प्रकाशित तथा सदा सभी जीवोंका हित करनेवाले हैं, उन भास्कररूप आपको नमस्कार है॥ ११ १/२ ॥

वायोः स्पर्शगुणो यत्र शीतोष्णसुखदुःखदः ॥ १२ ॥
नमस्ते वायुरूपाय नमः स्पर्शात्मने हरे।

हरे ! जहाँ वायुका स्पर्श नामक गुण शीत, उष्ण एवं सुख-दुःख प्रदान करनेवाला है, वहाँ उस गुणके आश्रयभूत वायु आपके ही स्वरूप हैं। स्पर्श भी आपका ही रूप है, आपको नमस्कार है॥ १२ १/२ ॥

आकाशेऽवस्थितः शब्दः सर्वश्रोत्रनिवेशनः ॥ १३ ॥
नमस्ते भगवन् विष्णो तुभ्यं सर्वात्मने नमः।

भगवन् ! विष्णो ! आकाशस्वरूप आपमें स्थित शब्द सबके कानोंमें प्रवेश करता है। आप सर्वात्मा हैं, आपको नमस्कार है॥ १३ १/२ ॥

यो दधार जगत् सर्वं मायामानुषदेहवान् ॥ १४ ॥
नमस्तुभ्यं जगन्नाथ मायिनेऽमायदायिने।

जगन्नाथ ! आपने मायामय मनुष्य-देह धारण करके भी सम्पूर्ण जगत्‌को स्वयं ही धारण कर रखा है। आप मायाके स्वामी हैं तथा मायारहित मोक्षतक प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है॥ १४ १/२ ॥

नम आद्याय बीजाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ १५ ॥
अचिन्त्याय सुचिन्त्याय तस्मै चिन्त्यात्मने नमः।

आप सबके आदिकारण, निर्गुण, गुणस्वरूप, अचिन्त्य, सुचिन्त्य एवं चिन्त्यरूप हैं, उन आप परमात्माको नमस्कार है॥ १५ १/२ ॥

हराय हरिरूपाय ब्रह्मणे ब्रह्मदायिने ॥ १६ ॥
नमो ब्रह्मविदे तुभ्यं ब्रह्मब्रह्मात्मने नमः।

आप हरिरूपधारी हर हैं, ब्रह्माको वेद प्रदान करनेवाले हैं, ब्रह्मवेत्ता तथा ब्रह्म और यज्ञरूप हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !!॥ १६ १/२ ॥

नमः सहस्रशिरसे सहस्रकिरणाय च ॥ १७ ॥
नमः सहस्रवक्त्राय सहस्रनयनाय च।

आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। आपके मुख और नेत्र भी सहस्र (अनन्त) हैं, आपको नमस्कार है॥ १७ १/२ ॥

विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्त्रे नमो नमः ॥ १८ ॥
विश्ववक्त्रे नमो नित्यं भूतावास नमो नमः।

आप विश्व, विश्वरूप और विश्वकर्ता हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप सम्पूर्ण विश्वको उपदेश देनेवाले (जगद्-गुरु) हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतोंके आवासस्थान विष्णुदेव ! आपको बारंबार नमस्कार है॥

इन्द्रियायेन्द्ररूपाय विषयाय सदा हरे ॥ १९ ॥
नमोऽश्वशिरसे तुभ्यं वेदाभरणरूपिणे।

हरे ! आप इन्द्रियरूप, विषयरूप और इन्द्ररूप हैं, आपको सदा नमस्कार है। वेद ही जिनका आभरण और रूप हैं, उन हयग्रीवरूपधारी आपको नमस्कार है॥ १९ १/२ ॥

अग्नयेऽग्निपते तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः ॥ २० ॥
सूर्याय सूर्यपुत्राय तेजसां पतये नमः।

अग्निपते ! आप अग्निरूप हैं, ग्रह-नक्षत्रोंके अधिपति हैं, सूर्य, सूर्यपुत्र तथा तेजके स्वामी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है॥ २० १/२ ॥

भविष्यपर्व ] नवतितमोऽध्यायः १०१९


नमः सोमाय सौम्याय नमः शीतात्मने हरे ॥ २१ ॥
नमो वषट्कृते तुभ्यं स्वाहास्वधास्वरूपिणे ।
नमो यज्ञाय इज्याय हविषे हव्यसंस्कृते ।
नमः स्रुवाय पात्राय यज्ञाङ्गाय पराय च ॥ २२ ॥
हरे ! आप सोम, सौम्य तथा शीतात्मा हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । आप वषट्कार तथा स्वाहा-स्वधा-स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है । आप यज्ञ, यज्ञोंद्वारा पूज-नीय तथा हविष्यरूप हैं, आपको नमस्कार है । हव्योंद्वारा संस्कृत आप परमात्माके प्रति नमस्कार है । आप स्रुव हैं, यज्ञपात्र हैं, यज्ञोंके अङ्गभूत उपकरण हैं और इन सबसे परे भी हैं, आपको नमस्कार है ॥ २१-२२ ॥

नमः प्रणवदेहाय क्षरायाप्यक्षराय च ।
वेदाय वेदरूपाय शङ्खिणे शङ्खरूपिणे ॥ २३ ॥
प्रणव आपका शरीर है । आप क्षर ( सम्पूर्ण भूत ) और अक्षर ( कूटस्थ ) हैं, आपको नमस्कार है । आप वेद हैं, वेदरूप हैं, शङ्ख ग्रहण करनेवाले और शङ्खरूपधारी हैं, आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥

गदिने खङ्गिने तुभ्यं शङ्खिने चक्रिणे नमः ।
शूलिने चर्मिणे नित्यं वरदाय नमो नमः ॥ २४ ॥
आप गदा, खड्ग, शङ्ख, चक्र, शूल और ढाल धारण करते हैं तथा सदा वर देनेवाले हैं, आपको बारंबार नम-स्कार है ॥ २४ ॥

बुद्धिप्रियाय बुद्धाय प्रबुद्धाय सुखाय च ।
हरये विष्णवे तुभ्यं नमः सर्वात्मने गुरो ॥ २५ ॥
गुरुदेव ! आप बुद्धिप्रिय, बोधसम्पन्न, प्रबुद्धस्वरूप एवं सुखरूप हैं । आप ही सबके आत्मा पापहारी विष्णु हैं, आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥

नमस्ते सर्वलोकेश सर्वकर्त्रे नमो नमः ।
नमः स्वभावशुद्धाय नमस्ते यज्ञसूकर ॥ २६ ॥
सर्वलोकेश्वर ! आप सबके कर्ता हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । यज्ञवाराह ! आप स्वभावसे ही शुद्ध हैं, आप-को बारंबार नमस्कार है ॥ २६ ॥

नमो विष्णो नमो विष्णो नमो विष्णो नमो हरे ।
नमस्ते वासुदेवाय वासुदेवाय धीमते ॥ २७ ॥
विष्णो ! आपको नमस्कार है । विष्णो ! आपको नम-स्कार है । विष्णो ! आपको नमस्कार है । हरे ! आपको नमस्कार है । सबके भीतर निवास करनेवाले बुद्धिमान् देवता वसुदेवनन्दन ! आपको नमस्कार है ॥ २७ ॥

नमः कृष्णाय कृष्णाय सर्वावास नमो नमः ।
नमो भूयो नमस्तेऽस्तु पाहि लोकान् जनार्दन ॥ २८ ॥
सबके आवासस्थान जनार्दन ! आप नामसे कृष्ण हैं, वर्णसे भी कृष्ण ही हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । आप-को पुनः नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये ॥ २८ ॥

इति स्तुत्वा जगन्नाथमुवाच मुनिसत्तमान् ।
इदं स्तोत्रमधीयाना नित्यं व्रजत केशवम् ॥ २९ ॥
शरण्यं सर्वभूतानां तत्र श्रेयो विधास्यति ।
इस प्रकार जगदीश्वर श्रीहरिकी स्तुति करके भगवान् शिवने उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा—'इस स्तोत्रका नित्य पाठ करते हुए तुम सब लोग भगवान् केशवकी शरणमें जाओ । वे समस्त भूतोंको शरण देनेवाले हैं, अतः तुम्हारा कल्याण करेंगे ॥ २९½ ॥

ये चेमं धारयिष्यन्ति स्तवं पापविमोचनम् ॥ ३० ॥
तेषां प्रीतः प्रसन्नात्मा पठतां शृण्वतां हरिः ।
श्रेयो दास्यति धर्मात्मा नात्र कार्या विचारणा॥ ३१ ॥
'जो लोग इस पापनाशक स्तोत्रको अपने हृदयमें धारण करेंगे; उनपर भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होंगे । प्रसन्नचित्त हुए धर्मात्मा विष्णु इसका पाठ और श्रवण करनेवाले पुरुषों-को कल्याण प्रदान करेंगे । इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३०-३१ ॥

अवश्यं मनसा ध्यात केशवं भक्तवत्सलम् ।
श्रेयः प्राप्तुं यदीच्छन्ति भवन्तः शंसितव्रताः॥ ३२ ॥
'यदि तुमलोग कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो उत्तम व्रतका पालन करते हुए निश्चय ही अपने मनसे भक्तवत्सल केशवका चिन्तन करो' ॥ ३२ ॥

इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत ।
सगणः शंकरः साक्षादुमया भूतभावनः ॥ ३३ ॥
ऐसा कहकर उमासहित भूतभावन कल्याणकारी साक्षात् भगवान् रुद्र अपने गणोंके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये ॥

नेमुस्तं मुनयः सर्वे परां निर्वृतिमाययुः ।
तमेव परमं तत्त्वं मत्वा नारायणं हरिम् ।
विस्मयं परमं गत्वा मेनिरे स्वकृतार्थताम् ॥ ३४ ॥
सब मुनियोंने उन्हें नमस्कार किया और परम संतोष प्राप्त किया । पापहारी नारायणदेवको ही परम तत्त्व मानकर उन सबको बड़ा विस्मय हुआ और उन सबने अपने-आपको कृतकृत्य माना ॥ ३४ ॥

लोकपालास्तदा विष्णुं नमस्कृत्य हरिं मुदा ।
जग्मुः स्वान्यथ वेश्मानि गणैः सर्वैर्नृपोत्तम ॥ ३५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस समय लोकपाल भी भगवान् विष्णु श्रीहरिको प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार करके समस्त सेवकगणोंके साथ अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३५ ॥

१०२०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आरुह्य भगवान् विष्णुर्गरुडं पक्षिपुङ्गवम् ।
शङ्खी चक्री गदी खड्गी शार्ङ्गी तूणी तनुत्रवान् ॥ ३६ ॥
यथागतं जगन्नाथो ययौ बदरिकाश्रमम् ।
सायाह्ने पुण्डरीकाक्षो नित्यं मुनिंनिषेवितम् ॥ ३७ ॥

तदनन्तर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण पक्षिराज गरुड़पर आरूढ़ हो शङ्ख, चक्र, गदा, खड्ग, शार्ङ्गधनुष, तरकस और कवच धारण करके जैसे आये थे, उसी प्रकार सायंकालमें मुनिजनोंद्वारा नित्य सेवित विशाला बदरीतीर्थमें लौट आये ॥ ३६-३७ ॥

तत्र गत्वा यथायोगं विनम्य हरिरीश्वरः।
अर्चिनो मुनिभिः सर्वैर्निपसाद सुखासने ॥ ३८ ॥

वहाँ जाकर वे सर्वेश्वर श्रीहरि यथायोग्य मुनियोंको प्रणाम करके सब मुनियोंद्वारा पूजित हो सुखद आसनपर विराजमान हुए ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां कृष्णप्रत्यागमने नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसंगमें 'श्रीकृष्णका लौटना' विषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥


एकनवतितमोऽध्यायः

पौण्ड्रकका राजाओंकी सभाओंमें अपनेको शङ्ख, चक्र आदिसे युक्त वासुदेव घोषित करना और श्रीकृष्णको पराजित करनेका मनसूबा बाँधना

वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नेव काले तु पौण्ड्रो नृपवरोत्तमः।
बलवान् सत्त्वसम्पन्नो योद्धा विपुलविक्रमः ॥ १ ॥
वृष्णिशत्रुस्तदा राजा कृष्णद्वेषी बलात् तदा ।
नृपान् सर्वान् समाहूय प्रोवाच नृपसंसदि ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी समय राजाओंमे श्रेष्ठतम, बलवान्, सत्त्वसम्पन्न, महापराक्रमी योद्धा, वृष्णिवंशियोंसे शत्रुभाव रखनेवाला तथा श्रीकृष्णका द्वेषी पौण्ड्रक समस्त राजाओंको बलपूर्वक बुलाकर उनकी सभामें बोला—॥ १-२ ॥

जिता च पृथिवी सर्वा जिताश्च नृपसत्तमाः।
वृष्णयस्ते बलोन्मत्ताः कृष्णमाश्रित्य गर्विताः ॥ ३ ॥

'मैंने सारी पृथ्वी जीत ली और बड़े-बड़े राजाओंको पराजित कर दिया। परंतु बलोन्मत्त वृष्णिवंशी श्रीकृष्णका सहारा लेकर घमंडमें भर गये हैं ॥ ३ ॥

दास्यन्ति मे करं सर्वे न हि ते कृष्णसंश्रयात् ।
स तु कृष्णश्चक्रबलान्मामावज्ञाय तिष्ठति ॥ ४ ॥

'कृष्णका आश्रय लेकर वे सब-के-सब मुझे कर नहीं देते हैं और वह कृष्ण अपने चक्रके बलसे मेरी अवहेलना करते रहता है ॥ ४ ॥

अहं चक्रीति गर्वोऽभूत्तस्य गोपस्य सर्वदा ।
शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी शरी तूणी सहायवान् ॥ ५ ॥
एवमादिर्महागर्वस्तस्य सम्प्रति वर्तते ।

'उस ग्वालेको सदा इस बातका गर्व रहता है कि मैं चक्रधारी हूँ। मेरे पास शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष, बाण और तरकस हैं, मैं सहायतासे सम्पन्न हूँ। इस तरह इस समय उसका गर्व बहुत बढ़ा-चढ़ा है ॥ ५३ ॥

लोके च मम यन्नाम वासुदेवेति विश्रुतम् ॥ ६ ॥
अगृह्णन्मम तन्नाम गोपो मदबलान्वितः ।

'लोकमें जो मेरा वासुदेव यह प्रसिद्ध नाम है, उसे उस मदमत्त एवं बलवान् गोपमे ग्रहण कर लिया है ॥६३॥

तस्य चक्रस्य यच्चक्रं ममापि निशितं महत् ॥ ७ ॥
गर्वहन्तृ सदा तस्य नाम्ना चापि सुदर्शनम् ।

'मेरे पास भी एक विशाल एवं तीखा चक्र है, जो उसके चक्रका नाश करनेवाला है। मेरा यह चक्र सदा उस (कृष्ण) के गर्वको चूर्ण करनेमें समर्थ है, उसका नाम भी सुदर्शन है ॥ ७३ ॥

सहस्रारं महाघोरं तस्य चक्रस्य नाशनम् ॥ ८ ॥
अनेकमहतं चक्रं गोपजस्य नृपोत्तमाः।

'श्रेष्ठ राजाओ ! मेरे इस चक्रमें एक सहस्र अरे लगे हुए हैं। यह महाभयंकर है और गोपबालक श्रीकृष्णके चक्रका नाश करनेवाला है। यह अनेक रूप धारण करनेमे समर्थ और कहीं भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है ॥ ८३ ॥

ममाप्येतद् धनुर्दिव्यं शार्ङ्गं नाम महारवम् ॥ ९ ॥
गदा कौमोदकी नाम ममेय बृहती दृढा ।
कालायससहस्रस्य भारेण सुकृता मया ॥ १० ॥

'मेरा भी यह धनुष दिव्य है, सींगका बना हुआ है, इसलिये शार्ङ्गनामसे प्रसिद्ध है और बड़ी भारी टंकार-ध्वनि करता है। मेरी इस गदाका नाम भी कौमोदकी है। यह विशाल एवं सुदृढ़ है। मैंने एक सहस्र भार लोहेसे इसका निर्माण कराया है ॥ ९-१० ॥

भविष्यपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः १०२१

खङ्गो नन्दकनामासौ ममायं विपुलॊ दृढः।
अन्तकस्यान्तको घोरस्तस्य खङ्गस्य नाशकः ॥ ११ ॥

'मेरा यह विशाल खड्ग बहुत मजबूत है। इसका नाम नन्दक है। यह घोर खड्ग कालका भी काल और श्रीकृष्णके खड्गका नाश करनेवाला है ॥ ११ ॥

तत्राहं च गदी खड्गी शङ्खी चक्री तनुत्रवान्।
युधि जेता च कृष्णस्य नात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥
मां च ब्रूत नृपाश्चैव गदिनं चक्रिणं तथा।
शङ्खिनं शार्ङ्गिणं वीरं ब्रूत नित्यं नृपोत्तमाः ॥ १३ ॥

'इस प्रकार मैं गदा, खड्ग, शङ्ख, चक्र और कवचसे युक्त होकर युद्धमें श्रीकृष्णको जीत लूँगा। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है; अतः श्रेष्ठ नरपतियो ! अब तुम लोग मुझे ही सदा गदाधर, चक्रपाणि, शङ्खधारी एवं शार्ङ्गधनुर्धर वीर कहा करो ॥ १२-१३ ॥

वासुदेवेति मां ब्रूत न तु गोपं यदूत्तमम्।
एकोऽहं वासुदेवो हि हत्वा तं गोपदारकम् ॥ १४ ॥

'मुझे ही वासुदेव कहो, उस यदुश्रेष्ठ गोपको नहीं। उस गोपबालकको मारकर एकमात्र मैं ही वासुदेव रहूँगा ॥१४॥

सख्युर्मम वलाद्धन्ता नरकस्य महात्मनः।
मां तथा यदि न ब्रूत दण्ड्या भारशतैः शतम्॥ १५॥
सुवर्णस्य च निष्कस्य धान्यस्य बहुशस्तदा।

'महामनस्वी नरकासुर मेरा मित्र था, उसको इस गोपर्ने बलपूर्वक मार डाला है, (इसलिये मैं भी इसका वध करूँगा); अतः यदि तुमलोग मुझे वासुदेव नहीं कहोगे तो मैं तुमपर दस हजार भार सुवर्ण एवं निष्कका तथा बहुत-सी धान्य-राशिका दण्ड लगाऊँगा' ॥ १५ ½ ॥

तथा ब्रुवति राजेन्द्र मनसा दुस्सहं यथा ॥ १६ ॥
केचिल्लज्जासमायुक्ता आसंस्ते बलवत्तराः।
रसज्ञा बलवीर्यस्य राजानस्ते सदा नृप ॥ १७ ॥

राजाधिराज पौण्ड्रकके इस तरह मनको असह्य लगने-वाली बात कहनेपर कुछ प्रबल नरेश लज्जित होकर चुप रह गये। राजन् ! वे सब नरेश बल-वीर्यके रसज्ञ थे॥ १६-१७॥

अपरे तु नृपा राजन्नेवमेवेति चुक्रुशुः।
अन्ये बलमदोत्सिक्ता जेष्यामः केशवं रणे ॥ १८ ॥

राजन् ! दूसरे चापलूस नरेश 'ठीक है ! ठीक है !!' ऐसा कोलाहल करने लगे तथा बलके मदसे उन्मत्त हुए अन्य राजा कहने लगे कि हम युद्धमें श्रीकृष्णको अवश्य जीतेंगे ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकोक्तौ एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रककी गर्वोक्तिविषयक इक्यानेवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥


द्विनवतितमोऽध्यायः

पौण्ड्रकके यहाँ नारदजीका आगमन और उसके साथ उनकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच
ततः कैलासशिखरान्निर्गतो मुनिसत्तमः।
नारदः सर्वलोकज्ञः पौण्ड्रस्य नगरं प्रति ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके ज्ञाता मुनिश्रेष्ठ नारद कैलासशिखरसे निकलकर पौण्ड्रकके नगरकी ओर चल दिये ॥ १ ॥

अवतीर्य नभोभागात् प्रत्यागम्य नरोत्तमम्।
द्वाःस्थेन च समाज्ञप्तः प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ २ ॥

आकाशसे उतरकर द्वारपालसे राजाज्ञा प्राप्त करके उन्होंने राजाके उत्तम भवनमें प्रवेश किया और वे उस नर-श्रेष्ठ पौण्ड्रकसे मिले ॥ २ ॥

अर्घ्यादिसमुदाचारं नृपाल्लब्ध्वा महामुनिः।
निषसादासने शुभ्रे ह्यास्तृते शुभवाससा ॥ ३ ॥

राजासे अर्घ्य आदि अतिथि-सत्कार पाकर वे महामुनि सुन्दर वस्त्र बिछे हुए शुभ्र आसनपर विराजमान हुए ॥३॥

कुशलं पृष्टवान् भूयो नृपः स मुनिसत्तमम्।
उवाच नारदं भूयः पौण्ड्रको वलगर्वितः ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् बलके घमंडमें भरे हुए राजा पौण्ड्रकने पहले तो मुनिश्रेष्ठ नारदसे कुशल-समाचार पूछा, फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४ ॥

भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वकार्येषु पण्डितः।
प्रथितो देवसिद्धेषु गन्धर्वेषु महात्मसु ॥ ५ ॥
सर्वत्रगो निराबाधो गत्वा सर्वत्र सर्वदा।
अगम्यं तव विप्रेन्द्र ब्रह्माण्डे न हि किंचन।

'विप्रवर ! आप सर्वत्र कुशल हैं, समस्त कार्योंमें पण्डित हैं। देवताओं, सिद्धों और महात्मा गन्धर्वोंमें आपकी ख्याति है। आप बिना किसी बाधाके सर्वत्र जा सकते हैं। सदा सब जगह आपकी पहुँच है। इस ब्रह्माण्डमें कोई भी स्थान आपके लिये अगम्य नहीं है ॥ ५-½ ॥

नारदेदं वद त्वं हि यत्र यत्र गतो भवान् ॥ ६ ॥

१०२२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तत्र तत्र तपःसिद्धो लोके प्रथितवीर्यवान् ।
पौण्ड्र एव च विख्यातो वासुदेवेति शब्दितः ॥ ७ ॥
'नारदजी ! यह तो बताइये, आप जहाँ-जहाँ गये हैं, वहाँ-वहाँ यह तपःसिद्ध और लोकमें विख्यात बलशाली पौण्ड्रक ही 'वासुदेव' नामसे विख्यात है न ? ॥ ६-७ ॥

शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी तूणी तनुत्रवान् ।
विजेता राजसिंहानां दाता सर्वस्य सर्वदा ॥ ८ ॥
'मैं ही शङ्खधारी, चक्रपाणि, गदाधर और शार्ङ्गधनुर्धर हूँ। तलवार और तरकस लेकर कवच धारण करके अनेकानेक राजसिंहोंपर विजय पानेवाला मैं ही हूँ। मैं ही सदा सबको सब कुछ देनेवाला हूँ ॥ ८ ॥

भोक्ता राज्यस्य सर्वस्य शास्ता राज्ञां बलाद् बली ।
अजेयः शत्रुसैन्यानां रक्षिता स्वजनस्य च ॥ ९ ॥
'मैं समस्त राज्यका भोक्ता और बलपूर्वक शासन करनेवाला बलवान् राजा हूँ, शत्रुसैनिकोंके लिये अजेय तथा स्वजनोंका रक्षक हूँ ॥ ९ ॥

योऽद्य गोपकनामासौ वासुदेवेति शब्दितः ।
तस्य वीर्यबले न स्तो नाम्नोऽस्य मम धारणे ॥ १० ॥
'आजकल जो वह गोप वासुदेव नामसे विख्यात हो रहा है, उसमें इतना बल और पराक्रम नहीं है, जिससे वह मेरा नाम धारण कर सके ॥ १० ॥

स हि गोपो वृथा बाल्याद् धारयत्येव नाम मे ।
इदं निश्चित्य विप्रन्द्र एक एव भवाम्यहम् ॥ ११ ॥
वासुदेवो जगत्यस्मिन् निर्जित्य बलिनं यदुम् ।
'वह ग्वाला अज्ञानवश व्यर्थ ही मेरा नाम धारण करता है। विप्रवर ! आप निश्चितरूपसे यह जान लीजिये कि मैं उस बलवान् यादवको जीतकर अकेला ही इस जगत्में वासुदेव रहूँगा ॥ १११/२ ॥

वृष्णीन् सर्वान् बलात् क्षिप्त्वा निहनिष्ये च तां पुरीम् ॥
द्वारकां विष्णुनिलयां योद्धा चाहं महामते ।
एते च बलिनः सर्वे नृपा मम समागताः ॥ १३ ॥
'समस्त वृष्णिवंशियोंको बलपूर्वक पराजित करके श्रीकृष्णकी निवासभूता द्वारकापुरीको नष्ट कर डालूँगा। महामते ! मैं स्वयं तो युद्ध करूँगा ही, ये समस्त बलवान् राजा भी मेरी ओरसे युद्धके लिये आये हैं ॥ १२-१३ ॥

अश्वाश्च वेगिनः सन्ति रथा वायुजवा मम ।
उष्ट्रा मत्ताः सहस्रं च गजा नियुतमेव च ॥ १४ ॥
एतेनाहं बलेनाजौ हनिष्ये केशवं रणे ।
'मेरे पास बहुत-से वेगशाली अश्व हैं, वायुके समान वेगशाली रथ हैं, सहस्रों मतवाले ऊँट और लाखों मदमत्त हाथी हैं। इस विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें मैं श्रीकृष्णका वध कर डालूँगा ॥ १४१/२ ॥

तस्मादेवं सदा विप्र वद ब्रह्मन् पुरे मम ॥ १५ ॥
इन्द्रस्यापि सदा विप्र वद नारद साम्प्रतम् ।
प्रार्थनैषा मम विभो नमस्ये त्वां तपोधन ॥ १६ ॥
'विप्रवर ! ब्रह्मन् ! आप प्रत्येक नगरमें मेरे लिये सदा ऐसी ही बात कहें। नारद बाबा ! इस समय इन्द्रके समक्ष भी आपको सदा मेरे बल-पराक्रमकी ही बात करनी चाहिये। विभो ! तपोधन ! यही मेरी प्रार्थना है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ' ॥ १५-१६ ॥

नारद उवाच

सर्वत्रगः सदा चास्मि यावद् ब्रह्माण्डसंस्थितिः ।
आचार्यः सर्वकार्येषु गमने केनचिन्नृप ॥ १७ ॥
नारदजीने कहा—नरेश्वर ! जहाँतक ब्रह्माण्डकी स्थिति है, मैं सदा सर्वत्र जा सकता हूँ। किसी भी पुरुषको अपने समस्त कार्योंके लिये मेरी शरण लेनी चाहिये। सर्वत्र जानेकी कलामें तो मैं आचार्य ही हूँ ॥ १७ ॥

किं तु वक्तुं तथा राजन्नुत्सहे नृपसत्तम ।
महीं शासति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने ॥ १८ ॥
विष्णौ सर्वत्रगे देवे दुष्टान् हत्वा सबान्धवान् ।
वासुदेवेति को नाम तिष्ठत्यस्मिन् धराविति ॥ १९ ॥
राजन् ! नृपश्रेष्ठ ! तुम जैसा चाहते हो, वैसी बात कहनेका उत्साह मैं कैसे कर सकता हूँ। जबतक बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त दुष्टोंका वध करके सर्वत्र जा सकनेवाले सर्वव्यापी देव, देवेश्वर, चक्रपाणि जनार्दन इस पृथ्वीका शासन कर रहे हैं, तबतक उन श्रीहरिके रहते हुए दूसरा कौन वासुदेव कहला सकता है ॥ १८-१९ ॥

को नाम वक्तुमेवेदं कृष्णे शासति गोमती ।
अज्ञानाद् वक्तुमेवं च समर्थाः प्राकृता जनाः ॥ २० ॥
सूर्य-किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले द्युलोक और भूलोकपर जबतक श्रीकृष्णका शासन चल रहा है, तबतक कौन मनुष्य ऐसी बात कह सकता है। कि, पौण्ड्रक वासुदेव है'। तुम्हारे-जैसे मूढ़ मनुष्य ही अज्ञानवश ऐसी बात कहनेमें समर्थ हो सकते हैं ॥ २० ॥

हरिः सर्वत्रगो विष्णुर्दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
अचिन्त्यविभवो विष्णुः शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ २१ ॥
सर्वत्र जानेकी क्षमता रखनेवाले, अचिन्त्य वैभवशाली, पापहारी, सर्वव्यापी, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर विष्णु तुम्हारे घमंडको दूर कर देंगे ॥ २१ ॥

भविष्यपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः १०२३


आदिदेवः पुराणात्मा दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
हास्यमेतन्महाराज यच्च वै तत्र संस्थितम् ॥ २२ ॥
शाङ्गं खड्गं तथा राजन् महाघोरं न दाप्यते ।
अतीव हासकालोऽयं तव सम्प्रति वर्तते ॥ २३ ॥

महाराज ! आदिदेव, पुराणपुरुष श्रीकृष्ण तुम्हारे दर्पका दलन कर देंगे। तुम जो कुछ सोचते या कहते हो, यह उपहासकी बात है। राजन् ! श्रीकृष्णके पास जो शाङ्ग-धनुष और महाभयंकर खड्ग है, उनका तुम्हारे इन अस्त्रोंसे उच्छेद नहीं हो सकता। इस समय तुम्हारे लिये यह महान् हासका समय आ पहुँचा है ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकनारदसंवादे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक और नारदका संवादविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥


त्रिनवतितमोऽध्यायः

नारदजीका श्रीकृष्णके पास जाना और पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमण

वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो महाराज पौण्ड्रो मदबलान्वितः ।
नारदं विप्रवयं तं प्रोवाच नृपसंसदि ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज ! तदनन्तर बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाला पौण्ड्रक कुपित हो उस राजसभामें विप्रवर नारदजीसे बोला— ॥ १ ॥

किमिदं प्राह विप्रर्षे राजाहं च द्विजैः सह ।
गच्छ त्वं काममथ वा मुने शापप्रदः सदा ॥ २ ॥
भीतस्त्वत्तो महाबुद्धे गच्छ त्वं काममद्य हि ।

'ब्रह्मर्षे ! आप यह क्या कहते हैं ? मैं राजा हूँ और इन ब्राह्मणोंके साथ हूँ। मुने ! आप सदा शाप देनेवाले हैं, अतः अपनी इच्छाके अनुसार यहाँसे चले जाइये। महाबुद्धे ! मैं आपसे डरता हूँ, अतः चाहें तो अभी चले जाइये' ॥ २ ॥

इत्युक्तो नृपवर्येण तूष्णीमेव स नारदः ॥ ३ ॥
जगामाकाशगमनो यत्र तिष्ठति केशवः ।

नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकके ऐसा कहनेपर आकाशचारी नारदजी चुपचाप वहाँसे उस स्थानको चले गये, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण थे ॥ ३ ॥

स गत्वा विष्णुसंकाशं विष्णोः सर्वमशंसत ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुर्यथेष्टं वदतामिति ।
दर्पं तस्यापनेष्यामि श्वोभूते द्विजसत्तम ॥ ५ ॥

श्रीकृष्णके पास जाकर उन्होंने उनसे उसकी सारी बातें कह सुनायीं। उन्हें सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'द्विजश्रेष्ठ ! पौण्ड्रक जैसा चाहे बकता रहे, कल मैं उसका घमंड दूर कर दूँगा' ॥ ४-५ ॥

इत्युक्त्वा विररामेव तस्मिन् वदरिकाश्रमे ।
ततः पौण्ड्रो महाबाहुर्बलैर्बहुभिरीश्वरः ॥ ६ ॥

ऐसा कहकर उस बदरिकाश्रममें भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो रहे। इधर सामर्थ्यशाली महाबाहु पौण्ड्रकने बहुत-सी सेनाओंके साथ द्वारकापुरीको प्रस्थान किया ॥ ६ ॥

अश्वैरनेकसाहस्रैर्गजैर्बहुभिरन्वितः ।
शस्त्रकोटिसमायुक्तः स राजा सत्यसंगरः ॥ ७ ॥

अनेक सहस्र अश्वों, बहुसंख्यक हाथियों और करोड़ों अस्त्र-शस्त्रोंसे संयुक्त हुआ वह सत्यप्रतिज्ञ राजा द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ७ ॥

अनेकशतसाहस्रैः पत्तिभिश्च समन्वितः ।
एकलव्यप्रभृतिभी राजभिश्च समन्ततः ॥ ८ ॥

उसके साथ कई लाख पैदल सैनिक थे। एकलव्य आदि राजा उसे सब ओरसे घेरकर चलते थे ॥ ८ ॥

अष्टौ रथसहस्राणि नागानामयुतं तथा ।
अर्बुदं पत्तिसंघानां तद्बलं समपद्यत ॥ ९ ॥

आठ हजार रथ, दस हजार हाथी और एक अर्बुद (दस करोड़) पैदल सैनिकोंसे वह सारी सेना सम्पन्न थी ॥ ९ ॥

एतेन च बलेनाजौ प्रस्फुरन् नृपसत्तमः ।
विरराज महाराज उदयस्थो महारविः ॥ १० ॥

महाराज ! इस विशाल सेनासे युद्धस्थलमें प्रकाशित होनेवाला नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रक उदयगिरिपर प्रकाशमान महासूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ १० ॥

स ययौ मध्यरात्रेण नगरीं द्वारकामथ ।
पत्तयो दीपिकाहस्ता रात्रौ तमसि दारुणे ॥ ११ ॥

उसने आधी रातके समय द्वारकापुरीपर धावा किया। रातके उस भयंकर अन्धकारमें पैदल सैनिकोंके हाथोंमें जलती हुई मशालें ले रखी थीं ॥ ११ ॥

ययुर्विविधशस्त्रौघाः सम्पत्तन्तो महाबलाः ।
द्वारकां वीर्यसम्पन्नां महाघोरां नृपोत्तमाः ॥ १२ ॥

वे महाबली श्रेष्ठ नरेश नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो पराक्रमशालिनी महाघोर द्वारकापुरीपर आक्रमण करनेके लिये जा रहे थे ॥ १२ ॥

१०२४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

रथं महान्तमारुह्य शस्त्रौघैश्च समावृतम्।
पट्टिशासिसमाकीर्णं गदापरिघसंकुलम् ॥ १३ ॥
शक्तितोमरसंकीर्णं ध्वजमालासमाचितम्।
किङ्किणीजालसंयुक्तं शरासिप्राससंयुतम् ॥ १४ ॥
महाघोरं महारौद्रं युगान्तजलदोपमम्।
धनुर्गदासमाकीर्णं महावाद्योपमं महत् ॥ १५ ॥
अग्न्यर्कसदृशाकारं ययौ द्वारवतीमनु।
गृहीतदीपिको राजा वीर्यवान् बलवान् नृप ॥ १६ ॥

नरेश्वर ! पराक्रमी एवं बलवान् राजा पौण्ड्रक भी मशालें साथ लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थित हुआ। वह रथ नाना प्रकारके शस्त्रसमूहोंसे भरा हुआ था। पट्टिश, खड्ग, गदा और परिघोंसे परिपूर्ण था, शक्ति, तोमर, बाण, खड्ग और प्राससे सम्पन्न था, अनेकों ध्वज उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। घुँघरू लगी हुई झालरोंसे उस रथको सजाया गया था। उसमें धनुष और गदाएँ यथा-स्थान रखी गयी थीं। वह महाघोर महारौद्र विशाल रथ प्रलयकालीन मेघ एवं महावाद्यके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाला था। उसका स्वरूप अग्नि और सूर्यके तुल्य प्रकाशमान था ॥ १३–१६ ॥

हन्तुमैच्छज्जगन्नाथं वृष्णींश्चैव समन्ततः।
आकर्षन् बलमुख्यांस्तान् राज्ञः सर्वान् महाद्युतिः ॥ १७ ॥
पुरद्वारं समासाद्य बलं संस्थाप्य यत्नतः।
इदं प्रोवाच राजा तु नृपान् सर्वानवस्थितान् ॥ १८ ॥

महातेजस्वी राजा पौण्ड्रक जगदीश्वर श्रीकृष्णको तथा उनके चारों ओर खड़े होनेवाले वृष्णिवंशी वीरोंको मार डालना चाहता था। वह अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य सभी राजाओंको अपने साथ खींच ले गया और नगरद्वारपर पहुँचकर वहाँ सेनाको यत्नपूर्वक स्थापित करके सब ओर खड़े हुए समस्त नरेशोंसे इस प्रकार बोला— ॥ १७-१८ ॥

ताड्यतामत्र भेरी तु नाम विश्राव्य मामकम्।
युध्यतां युध्यतामत्र देयं वा प्रतिदीयताम् ॥ १९ ॥
आगतः पौण्ड्रको राजा युद्धार्थी वीर्यवत्तरः।
हन्तुकामः समग्रान् वै कृष्णबाहुबलाश्रयान् ॥ २० ॥

“वीरो ! रणभेरी बजाओ और मेरा नाम सुनाकर कहो—'यादवो ! यहाँ आकर युद्ध करो ! युद्ध करो !! अथवा देने योग्य राजकीय कर प्रदान करो। महान् पराक्रमी राजा पौण्ड्रक युद्धके लिये पधारे हैं और श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेनेवाले तुम समस्त यादवोंका वध करना चाहते हैं'” ॥ १९-२० ॥

इति ते प्रेषिताः सर्वे समीयुः सूचकान् बहून्।
दीपिकाश्च प्रदीव्यन्ते बह्वयः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥
इतश्चेतश्च राजानो युध्यन्ते युद्धलालसाः।
पुरीं ते पुरतस्तत्र क्षत्रियाः शस्त्रिणस्तदा ॥ २२ ॥
सिंहनादं प्रकुर्वन्तः शस्त्रधारासमाकुलाः।
कुतोऽयं वृष्णिप्रवरः कुतो राजा जगत्पतिः ॥ २३ ॥
कुतोऽयं सात्यकिर्वीरः कुतो हार्दिक्य एव च।
कुतो नु बलभद्रश्च सर्वयादवसत्तमः।
इत्येवं कथयन्तो वै राजानः सर्व एव ते ॥ २४ ॥
आदाय शस्त्राणि बहूनि सर्वतः
शरांश्च चापानि बहूनि सर्वे।
युद्धाय सन्नाहनिबद्धशो युयु-
र्हरेः पुरीं द्वारवतीं नृपोत्तमाः ॥ २५ ॥

इस प्रकार भेजे गये वे समस्त नरेश बहुसंख्यक सूचकों (बाहर-भीतरके वृत्तान्तको जाननेवाले यादव भटों) से मिले। उस समय बहुतेरी मशालें लाखोंकी संख्यामें जल रही थीं। युद्धकी लालसा रखनेवाले राजाओंने इधर-उधर युद्ध छेड़ दिया था। वहाँ पुरीके द्वारपर शस्त्रधारी क्षत्रिय सिंहनाद करते हुए शस्त्रोंकी धारा बरसा रहे थे और कहते थे 'कहाँ है वृष्णिवंशका श्रेष्ठ वीर ? कहाँ है राजा जगदीश्वर ? कहाँ है यह वीर सात्यकि ? कहाँ है कृतवर्मा और कहाँ है सर्वयादवशिरोमणि बलभद्र ?' ऐसा कहते हुए वे समस्त श्रेष्ठ राजा सब ओरसे बहुतेरे अस्त्र-शस्त्र, बाण और बहुसंख्यक धनुष ले युद्धके लिये कमर कसकर श्रीहरिकी द्वारकापुरीपर धावा बोलने लगे ॥ २१–२५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकस्य द्वारकागमने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमणविषयक तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥


चतुर्नवतितमोऽध्यायः

यादववीरोंद्वारा पौण्ड्रककी सेनाका और एकलव्यद्वारा यादवसेनाका संहार

वैशम्पायन उवाच
ततश्च यादवाः सर्वे दृष्ट्वा सैनिकसंचयम्।
रात्रौ च व्यसनं प्राप्तं महाशस्त्रसमाकुलम् ॥ १ ॥
महावातसमुद्भूतं कल्पान्ते सागरोपमम्।
संनद्धाः समपद्यन्त शस्त्रिणो युद्धलालसाः ॥ २ ॥
गृहीतदीपिकाः सर्वे यादवाः शस्त्रयोधिनः।

भविष्यपर्व ] चतुर्नवतितमोऽध्यायः [ १०२५


वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर समस्त यादवोंने देखा कि शत्रुसैनिकोंका बड़ा भारी जमाव हो रहा है। वे सब-के-सब महान् अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हैं और प्रचण्ड वायुसे उमड़े हुए प्रलयकालके समुद्रकी भाँति दिखायी देते हैं। विशेषतः रात्रिके समय यह महान् संकट प्राप्त हुआ है। यह देख और सोचकर वे समस्त यादव युद्धकी लालसासे अस्त्र-शस्त्र लेकर कमर कसकर तैयार हो गये। उन सभी शस्त्रयोधी यादवोंने अपने हाथोंमें मशालें ले रखी थीं ॥ १-२ ॥

सात्यकिर्बलभद्रश्च हार्दिक्यो निशठस्तथा ॥ ३ ॥
उद्धवोऽथ महाबुद्धिरुग्रसेनो महाबलः ।
अन्ये च यादवाः सर्वे कवचप्रग्रहे रताः ॥ ४ ॥

सात्यकि, बलभद्र, हार्दिक्य (कृतवर्मा), निशठ, परम बुद्धिमान् उद्धव, महाबली उग्रसेन तथा अन्य सब यादववीर कवच बाँधने लगे ॥ ३-४ ॥

समस्तयुद्धकुशला रात्रौ सन्नाहयोधिनः ।
शस्त्रिणः खड्गिनश्चैव सर्वे शस्त्रसमाकुलाः ॥ ५ ॥

ये सब-के-सब सम्पूर्ण युद्धोंमें कुशल, रातमें भी कमर कसकर जूझनेवाले, शस्त्रधारी और खड्गधारी थे। सभी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे ॥ ५ ॥

युद्धाय समपद्यन्त बहवो बाहुशालिनः ।
रथिनो गजिनश्चैव सादिनः सायुधास्तथा ॥ ६ ॥

वे बहुसंख्यक बाहुशाली वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके साथ रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और शस्त्रधारी पैदल योद्धा भी थे ॥ ६ ॥

नित्ययुक्ता महात्मानो धन्विनः पुरुषोत्तमाः ।
निर्ययुर्नगरात् तूर्णं दीपिकाभिः समन्ततः ॥ ७ ॥

वे नित्य उद्यत रहनेवाले, महामनस्वी, धनुर्धर, पुरुषप्रवर वीर सब ओरसे मशालोंके साथ तुरंत नगरसे बाहर निकले ॥ ७ ॥

कुतः पौण्ड्रक इत्येवं वदन्तः सर्वसात्वताः ।
दीपिकादीपितो देशो निस्तमाः समपद्यत ॥ ८ ॥

वे समस्त यादव यह कहते हुए निकले कि 'कहाँ है पौण्ड्रक?' मशालोंसे प्रकाशित हुआ वह देश सर्वथा अन्धकाररहित हो गया ॥ ८ ॥

ततो वितिमिरो देशः समन्तात् प्रत्यपद्यत ।
युद्धं समभवद् घोरं वृष्णिभिः शत्रुभिः सह ॥ ९ ॥

तत्पश्चात् वह स्थान सब ओरसे अन्धकारशून्य हो गया। उस समय वहाँ शत्रुओंके साथ वृष्णिवंशियोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥

ततो महान् समभवत् संनादो रोमहर्षणः ।
हया हयैः समायुक्ताः गजाश्च गजयूथपैः ॥ १० ॥
रथा रथैः समायुक्ताः सादिभिः सादिनस्तथा ।

फिर तो महान् कोलाहल होने लगा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। घोड़े घोड़ोंसे, गजराज गजराजोंसे, रथ रथोंसे और सवार सवारोंसे भिड़ गये ॥ १० ॥

खड्गिनः खड्गिभिः सार्धं गदिभिर्गदिनस्तथा ॥ ११ ॥
परस्परव्यतीकारो रण आसीत् सुदारुणः ।
महाप्रलयसंक्षोभः शब्दस्तेषां महात्मनाम् ॥ १२ ॥

खड्गधारी वीर खड्गधारियोंसे और गदाधारी गदाधारियोंसे लड़ने लगे। उस रणभूमिमें उभयपक्षके सैनिकोंका परस्पर बड़ा भयंकर बोल-मेल हो गया। उन महामनस्वी वीरोंके गर्जन-तर्जनका शब्द महाप्रलयके समय उमड़े हुए समुद्रोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ११-१२ ॥

धावन्तः प्रहरन्त्येतान् घ्नन्त्येतान् सर्वतो नृपान् ।
अयमेष महाबाहुः खड्गी पतति वीर्यवान् ॥ १३ ॥
अयमेष शरो घोरो वर्ततेऽतिसुदारुणः ।
गदी चायं महावीर्यः सर्वान् नो बाधते नृपः ॥ १४ ॥

दोनों ओरके योद्धा धावा करके विपक्षी सैनिकोंपर प्रहार करते और इन समस्त नरेशोंको घायल करते थे। (वहाँ आपसमें इस प्रकारकी चर्चाएँ होती थीं) 'यह खड्गधारी महाबाहु पराक्रमी वीर धराशायी हो रहा है। यह अत्यन्त दारुण बाण बड़ा ही भयंकर है। यह गदाधारी महापराक्रमी नरेश हम सब लोगोंको पीड़ा दे रहा है ॥ १३-१४ ॥

अयं रथी शरी चापी गदी तूणी तनुत्रवान् ।
पट्टिशी सर्वतो याति कुन्तपाणिरयं बली ॥ १५ ॥

'यह धनुष, बाण, गदा, तरकस, कवच, पट्टिश और कुन्त धारण करनेवाला बलवान् रथी वीर रणभूमिमें सब ओर विचर रहा है ॥ १५ ॥

अयमत्र महाशूली संश्रितः सर्वतो दिशम् ।
गजोऽयं सविषाणाग्रो वर्तते सर्वतः प्रति ॥ १६ ॥

'यह महाशूलधारी योद्धा यहाँ सारी दिशाओंमें चक्कर लगाता है। यह हाथी अपने दाँतोंका अग्रभाग सामने किये सब ओर दौड़ लगाता है' ॥ १६ ॥

अतिसर्वव्रगः शूरो वेगवान् वातसंनिभः ।
शराञ्छरैः समाहन्ति दण्डान् दण्डैर्जगत्पते ॥ १७ ॥

राजन् ! कोई-कोई वेगशाली शूरवीर वायुके समान अत्यन्त तीव्र गतिसे सर्वत्र जा पहुँचता और अपने बाणोंसे शत्रुओंके बाणोंका तथा दण्डोंसे उनके दण्डोंका नाश कर देता था ॥ १७ ॥

कुन्तान् कुन्तैः समाजघ्नुर्गदाभिश्च गदास्तथा ।
परिघान् परिधैः सार्धं शूलाञ्छूलैः समन्ततः ॥ १८ ॥

कितने ही योद्धा कुन्तों (भालों) से कुन्तोंका, गदाओंसे


म० १० ३३-