विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1040, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०१४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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राजन्यस्तु तथा बाह्वोरासीत् संरक्षणे रतः ।
ऊर्वोर्वैश्यस्तथा विष्णो पादाच्छूद्र उदाहृतः ॥ ३७ ॥
विष्णो ! आपकी भुजाओंसे रक्षामकर्ममें रत रहनेवाले क्षत्रियकी, दोनों जाँघोंसे वैश्यकी तथा पैरोंसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई बतायी गयी है ॥ ३७ ॥
एवं वर्णा जगन्नाथ तव देहाज्जनार्दन ।
मनसस्तव देवेश चन्द्रमाः समपद्यत ॥ ३८ ॥
सुखकृत् सर्वभूतानां शीतांशुग्मितप्रभः ।
जगदीश्वर ! जनार्दन ! इस प्रकार चारों वर्ण आपके शरीरसे प्रकट हुए हैं। देवेश्वर ! आपके मनसे समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले अमित कान्तिमान् शीतरश्मि चन्द्रमाकी उत्पत्ति हुई है ॥ ३८½ ॥
अक्ष्णोः सूर्यः समुत्पन्नः सर्वप्राणिविलोचनः॥ ३९ ॥
यस्य भासा जगत् सर्वं भासते भानुमानसौ ।
मुखादिन्द्रश्च अग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत ॥ ४० ॥
आपके नेत्रोंसे समस्त प्राणियोंके नेत्रस्वरूप वे भानुमान् (अंशुमाली) सूर्य उत्पन्न हुए हैं, जिनकी प्रभासे सारा जगत् प्रकाशित होता है। आपके मुखसे इन्द्र और अग्नि तथा प्राणसे वायुदेवका प्राकट्य हुआ है ॥ ३९-४० ॥
नाभेरभूदन्तरिक्षं तव देव जनार्दन ।
द्यौरासीत् तु महाघोरा शिरसस्तव गोपते ॥ ४१ ॥
देव ! जनार्दन ! आपकी नाभिसे अन्तरिक्ष प्रकट हुआ। गोपते ! आपके मस्तकसे महाघोर द्युलोकका आविर्भाव हुआ है ॥ ४१ ॥
पद्भ्यां भूमिः समुत्पन्ना दिशः श्रोत्राज्जगत्पते ।
एवं सृष्ट्वा जगत् सर्वं व्याप्य सर्वं व्यवस्थितः ॥ ४२ ॥
जगत्पते ! आपके पैरोंसे पृथ्वी और कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करके आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ ४२ ॥
व्याप्य सर्वानिमाँल्लोकान् स्थितः सर्वत्र केशव ।
ततश्च विष्णुरनामासि धातोर्व्याप्तेश्च दर्शनात् ॥ ४३ ॥
केशव ! इन सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त होकर आप सर्वत्र विराजमान हैं। इसलिये ‘विष्’ धातुके व्याप्तिरूप अर्थका दर्शन होनेसे आप ‘विष्णु’ नाम धारण करते हैं ॥ ४३ ॥
नारा आपः समाख्यातास्तासामयनमादितः ।
यतस्त्वं भूतभव्येश तन्नारायणशब्दितः ॥ ४४ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी विष्णुदेव ! जलको नार कहते हैं, उस नारके आप आदिकालसे ही अयन (आश्रय) हैं, इसलिये ‘नारायण’ कहलाते हैं ॥ ४४ ॥
हरसि प्राणिनो देव ततो हरिरिति स्मृतः ।
शंकरोऽसि सदा देव ततः शंकरतां गतः ॥ ४५ ॥
देव ! आप प्राणियों (के पाप-ताप) का हरण करते हैं, इसलिये ‘हरि’ कहे गये हैं। देव ! आप सदा सबका ‘शम्’ (कल्याण) करते हैं, इसलिये ‘शङ्कर’ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं ॥ ४५ ॥
बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तस्माद् ब्रह्मेति शब्दितः ।
मधुरिन्द्रियनामेति ततो मधुनिषूदनः ॥ ४६ ॥
बृहत् तथा वर्धनशील होनेके कारण आपको ‘ब्रह्म’ कहते हैं। मधु नाम है इन्द्रियोंका, उनका दमन करनेके कारण आप ‘मधुसूदन’ कहलाते हैं ॥ ४६ ॥
हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तेषामीशो यतो भवान् ।
हृषीकेशस्ततो विष्णो ख्यातो देवेषु केशव ॥ ४७ ॥
केशव ! विष्णो ! हृषीक कहते हैं इन्द्रियोंको । आप उनके ईश (स्वामी अथवा प्रेरक) हैं, इसलिये देवताओंमें ‘हृषीकेश’ नामसे विख्यात हैं ॥ ४७ ॥
क इति ब्रह्मणो नाम ईशोऽहं सर्वदेहिनाम् ।
आवां तवाङ्गसम्भूतौ तस्मात् केशवनामवान् ॥ ४८ ॥
‘क’—यह ब्रह्माजीका नाम है और मैं समस्त देहधारियोंका ‘ईश’ हूँ। हम दोनों आपके शरीरसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये आप ‘केशव’ नाम धारण करते हैं ॥ ४८ ॥
मा विद्या च हरे प्रोक्ता तस्या ईशो यतो भवान् ।
तस्मान्माधवनामासि धवः स्वामीति शब्दितः ॥ ४९ ॥
हरे ! ‘मा’ कहते हैं विद्याको । आप उसके ‘धव’ (ईश्वर या स्वामी) हैं, इसलिये ‘माधव’ नामसे प्रसिद्ध हैं। धव-शब्द स्वामीका वाचक है ॥ ४९ ॥
गौरेषा तु यतो वाणी तां च वेत्थ यतो भवान् ।
गोविन्दस्तु ततो देव मुनिभिः कथ्यते भवान् ॥ ५० ॥
देव ! यह वाणी ‘गो’ नामसे प्रसिद्ध है। उसे आप जानते हैं, इसलिये मुनलोग आपको ‘गोविन्द’ कहते हैं ॥ ५० ॥
त्रिरित्येव त्रयो वेदाः कीर्तिता मुनिसत्तमैः ।
क्रमते तांस्तथा सर्वोस्त्रिविक्रम इति श्रुतः ॥ ५१ ॥
श्रेष्ठ मुनियोंने तीनों वेदोंको ‘त्रि’ नाम दिया है, आप उन तीनोंको क्रान्त (व्याप्त) करके स्थित हैं; इसलिये ‘त्रिविक्रम’ नामसे विख्यात हैं ॥ ५१ ॥
अणुर्वामननामासि यतस्त्वं वामनाख्यया ।
मननान्मुनिरेवासि यमनाद् यतिरुच्यसे ॥ ५२ ॥
आप सूक्ष्म या लघु होनेसे ‘वामन’ नाम धारण करते हैं। आपके वामन नामसे प्रसिद्ध होनेका यही हेतु है। आप मनन करनेसे ‘मुनि’ हैं और यमका पालन करनेसे ‘यति’ कहलाते हैं ॥
तपश्चरसि यस्मात् त्वं तपस्वीति च शब्दितः ।
वसन्ति त्वयि भूतानि भूतावासस्ततो हरे ॥ ५३ ॥