विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1041, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व.] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [१०१५
अतः आप तपस्या करते हैं, इसलिये 'तपस्वी' नामसे प्रसिद्ध हैं। हरे ! सम्पूर्ण भूत आपमें निवास करते हैं, इस-लिये आप 'भूतावास' कहलाते हैं ॥ ५३ ॥
ईशस्त्वं सर्वभूतानामीश्वरोऽसि ततो हरे ।
प्रणवः सर्ववेदानां गायत्री छन्दसां प्रभो ॥ ५४ ॥
हरे ! आप सम्पूर्ण भूतोंके ईश हैं, इसीलिये 'ईश्वर' कहे गये हैं। प्रभो ! आप समस्त वेदोंमें प्रणव और सम्पूर्ण छन्दों-में 'गायत्री' हैं ॥ ५४ ॥
अक्षराणामकारस्त्वं स्फोटस्त्वं वर्णसंश्रयः ।
रुद्राणामहमेवास्मि वसूनां पावको भवान् ॥ ५५ ॥
आप अक्षरोंमें अकार हैं। वर्णोंके आश्रित रहनेवाले स्फोट^१ हैं। रुद्रोंमें मैं अर्थात् शङ्कर हूँ और वसुओंमें आप पावक हैं ॥ ५५ ॥
अश्वत्थो वृक्षजातीनां ब्रह्मा लोकगुरुर्भवान् ।
मेरुस्त्वं पर्वतेन्द्राणां देवर्षीणां च नारदः ॥ ५६ ॥
आप वृक्ष-जातियोंमें अश्वत्थ हैं। समस्त लोकोंके गुरु ब्रह्मा हैं। श्रेष्ठ पर्वतोंमें मेरु और देवर्षियोंमें नारद हैं ॥ ५६ ॥
दानवानां भवान् दैत्यः प्रह्लादो भक्तवत्सलः ।
सर्पाणामेव सर्वेषां भवान् वासुकिसंज्ञितः ॥ ५७ ॥
आप दानवोंमें दैत्यनन्दन भक्तवत्सल प्रह्लाद हैं। समस्त सर्पोंमें आप ही वासुकि हैं ॥ ५७ ॥
गुह्यकानां च सर्वेषां भवान् धनद एव च ।
वरुणो यादसां राज। गङ्गा त्रिपथगाग् भवान् ॥ ५८ ॥
आप समस्त गुह्यकोंमें धनदाता कुबेर हैं। जल-जन्तुओंके राजा वरुण और त्रिपथगामिनी गङ्गा भी आप ही हैं ॥ ५८ ॥
आदिस्त्वं सर्वभूतानां मध्यमन्तस्तथा भवान् ।
त्वत्तः सम्भवद्विश्वं त्वयि सर्वं प्रलीयते ॥ ५९ ॥
आप समस्त भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। आपसे इस विश्वका प्रादुर्भाव हुआ है और अन्तमें सारा जगत् आप-में ही लीन हो जाता है ॥ ५९ ॥
अहं त्वं सर्वगो देव त्वमेवाहं जनार्दन ।
आवयोरन्तरं नास्ति शब्दैरर्थैर्जगत्पते ॥ ६० ॥
जनार्दन ! देव ! मैं ही आप सर्वव्यापी देवता हैं और आप ही मैं हूँ। जगत्पते ! शब्द और अर्थसे भी हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ६० ॥
नामानि तव गोविन्द यानि लोके महान्ति च ।
तान्येव मम नामानि नात्र कार्या विचारणा ॥ ६१ ॥
गोविन्द ! लोकमें जो आपके महान् नाम हैं, वे ही मेरे भी नाम हैं। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥
त्वदुपासा जगन्नाथ सैवास्ति मम गोपते ।
यश्च त्वां द्वेष्टि देवेश स मां द्वेष्टि न संशयः ॥ ६२ ॥
जगन्नाथ ! गोपते ! आपकी जो उपासना है, वही मेरी भी है। देवेश्वर ! जो आपसे द्वेष रखता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है, इसमें संशय नहीं ॥ ६२ ॥
त्वद्विस्तारो यतो देव अहं भूतपतिस्ततः ।
न तदस्ति विना देव यत् ते विरहितं हरे ॥ ६३ ॥
देव ! आपका ही विस्तार मैं हूँ, अतः आपकीही भाँति मैं भी सम्पूर्ण भूतोंका अधिपति कहलाता हूँ। देव ! हरे ! ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो आपके बिना या आपसे रहित हो ॥ ६३ ॥
यदासीद् वर्तते यच्च यच्च भावि जगत्पते ।
सर्वं त्वमेव देवेश विना किञ्चित्त्वया न हि ॥ ६४ ॥
जगत्पते ! देवेश्वर ! जो कुछ था, जो है और जो भविष्य-में होनेवाला है, वह सब आप ही हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो आपसे रहित हो ॥ ६४ ॥
स्तुवन्ति देवाः सततं भवन्तं स्वैर्गुणैः प्रभो ।
ऋक्च त्वं यजुरेवासि सामासि सततं प्रभो ॥ ६५ ॥
प्रभो ! देवता सदा आपके निजी गुणोंका बखान करके आपकी स्तुति करते हैं। भगवन् ! आप ही नित्य-निरन्तर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं ॥ ६५ ॥
किमुच्यते मया देव सर्वं त्वं भूतभावन ।
नमः सर्वात्मना देव विष्णो माधव केशव ॥ ६६ ॥
भूतभावन देव ! मैं अधिक क्या कहूँ ! आप ही सब कुछ हैं। देव ! विष्णो ! माधव ! केशव ! आपको सब प्रकारसे नमस्कार है ॥ ६६ ॥
नमस्करोमि सर्वात्मन् नमस्तेऽस्तु सदा हरे ।
नमः पुष्करनाभाय वन्दे त्वामहमीश्वर ॥ ६७ ॥
सर्वात्मन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हरे ! आपको सदा ही नमस्कार है। आप पद्मनाभ हैं, आपको नमस्कार है। ईश्वर ! मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥ ६७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवकृतविष्णुस्तुतौ अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवकृत विष्णुकी स्तुतिविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
१. सर्वदर्शनसंग्रहके अनुसार नित्य शब्द, जिससे वर्णात्मक शब्दोंके अर्थका ज्ञान होता है, जैसे कमल शब्दमें क, म और ल-ये तीन वर्ण हैं और इन तीनोंके अलग-अलग उच्चारणसे कुछ भी अभिप्राय नहीं निकलता, परंतु तीनों वर्णोंका साथ-साथ उच्चारण करनेपर जो स्फोट होता है, उसीसे कमल शब्दका अभिप्राय जाना जाता है। कुछ लोग इसी स्फोट (नित्य शब्द) को संसारका कारण मानते हैं।