विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
भविष्यपर्व.] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [१०१५
अतः आप तपस्या करते हैं, इसलिये 'तपस्वी' नामसे प्रसिद्ध हैं। हरे ! सम्पूर्ण भूत आपमें निवास करते हैं, इस-लिये आप 'भूतावास' कहलाते हैं ॥ ५३ ॥
ईशस्त्वं सर्वभूतानामीश्वरोऽसि ततो हरे ।
प्रणवः सर्ववेदानां गायत्री छन्दसां प्रभो ॥ ५४ ॥
हरे ! आप सम्पूर्ण भूतोंके ईश हैं, इसीलिये 'ईश्वर' कहे गये हैं। प्रभो ! आप समस्त वेदोंमें प्रणव और सम्पूर्ण छन्दों-में 'गायत्री' हैं ॥ ५४ ॥
अक्षराणामकारस्त्वं स्फोटस्त्वं वर्णसंश्रयः ।
रुद्राणामहमेवास्मि वसूनां पावको भवान् ॥ ५५ ॥
आप अक्षरोंमें अकार हैं। वर्णोंके आश्रित रहनेवाले स्फोट^१ हैं। रुद्रोंमें मैं अर्थात् शङ्कर हूँ और वसुओंमें आप पावक हैं ॥ ५५ ॥
अश्वत्थो वृक्षजातीनां ब्रह्मा लोकगुरुर्भवान् ।
मेरुस्त्वं पर्वतेन्द्राणां देवर्षीणां च नारदः ॥ ५६ ॥
आप वृक्ष-जातियोंमें अश्वत्थ हैं। समस्त लोकोंके गुरु ब्रह्मा हैं। श्रेष्ठ पर्वतोंमें मेरु और देवर्षियोंमें नारद हैं ॥ ५६ ॥
दानवानां भवान् दैत्यः प्रह्लादो भक्तवत्सलः ।
सर्पाणामेव सर्वेषां भवान् वासुकिसंज्ञितः ॥ ५७ ॥
आप दानवोंमें दैत्यनन्दन भक्तवत्सल प्रह्लाद हैं। समस्त सर्पोंमें आप ही वासुकि हैं ॥ ५७ ॥
गुह्यकानां च सर्वेषां भवान् धनद एव च ।
वरुणो यादसां राज। गङ्गा त्रिपथगाग् भवान् ॥ ५८ ॥
आप समस्त गुह्यकोंमें धनदाता कुबेर हैं। जल-जन्तुओंके राजा वरुण और त्रिपथगामिनी गङ्गा भी आप ही हैं ॥ ५८ ॥
आदिस्त्वं सर्वभूतानां मध्यमन्तस्तथा भवान् ।
त्वत्तः सम्भवद्विश्वं त्वयि सर्वं प्रलीयते ॥ ५९ ॥
आप समस्त भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। आपसे इस विश्वका प्रादुर्भाव हुआ है और अन्तमें सारा जगत् आप-में ही लीन हो जाता है ॥ ५९ ॥
अहं त्वं सर्वगो देव त्वमेवाहं जनार्दन ।
आवयोरन्तरं नास्ति शब्दैरर्थैर्जगत्पते ॥ ६० ॥
जनार्दन ! देव ! मैं ही आप सर्वव्यापी देवता हैं और आप ही मैं हूँ। जगत्पते ! शब्द और अर्थसे भी हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ६० ॥
नामानि तव गोविन्द यानि लोके महान्ति च ।
तान्येव मम नामानि नात्र कार्या विचारणा ॥ ६१ ॥
गोविन्द ! लोकमें जो आपके महान् नाम हैं, वे ही मेरे भी नाम हैं। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥
त्वदुपासा जगन्नाथ सैवास्ति मम गोपते ।
यश्च त्वां द्वेष्टि देवेश स मां द्वेष्टि न संशयः ॥ ६२ ॥
जगन्नाथ ! गोपते ! आपकी जो उपासना है, वही मेरी भी है। देवेश्वर ! जो आपसे द्वेष रखता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है, इसमें संशय नहीं ॥ ६२ ॥
त्वद्विस्तारो यतो देव अहं भूतपतिस्ततः ।
न तदस्ति विना देव यत् ते विरहितं हरे ॥ ६३ ॥
देव ! आपका ही विस्तार मैं हूँ, अतः आपकीही भाँति मैं भी सम्पूर्ण भूतोंका अधिपति कहलाता हूँ। देव ! हरे ! ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो आपके बिना या आपसे रहित हो ॥ ६३ ॥
यदासीद् वर्तते यच्च यच्च भावि जगत्पते ।
सर्वं त्वमेव देवेश विना किञ्चित्त्वया न हि ॥ ६४ ॥
जगत्पते ! देवेश्वर ! जो कुछ था, जो है और जो भविष्य-में होनेवाला है, वह सब आप ही हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो आपसे रहित हो ॥ ६४ ॥
स्तुवन्ति देवाः सततं भवन्तं स्वैर्गुणैः प्रभो ।
ऋक्च त्वं यजुरेवासि सामासि सततं प्रभो ॥ ६५ ॥
प्रभो ! देवता सदा आपके निजी गुणोंका बखान करके आपकी स्तुति करते हैं। भगवन् ! आप ही नित्य-निरन्तर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं ॥ ६५ ॥
किमुच्यते मया देव सर्वं त्वं भूतभावन ।
नमः सर्वात्मना देव विष्णो माधव केशव ॥ ६६ ॥
भूतभावन देव ! मैं अधिक क्या कहूँ ! आप ही सब कुछ हैं। देव ! विष्णो ! माधव ! केशव ! आपको सब प्रकारसे नमस्कार है ॥ ६६ ॥
नमस्करोमि सर्वात्मन् नमस्तेऽस्तु सदा हरे ।
नमः पुष्करनाभाय वन्दे त्वामहमीश्वर ॥ ६७ ॥
सर्वात्मन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हरे ! आपको सदा ही नमस्कार है। आप पद्मनाभ हैं, आपको नमस्कार है। ईश्वर ! मैं आपकी वन्दना करता हूँ ॥ ६७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां शिवकृतविष्णुस्तुतौ अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें शिवकृत विष्णुकी स्तुतिविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
१. सर्वदर्शनसंग्रहके अनुसार नित्य शब्द, जिससे वर्णात्मक शब्दोंके अर्थका ज्ञान होता है, जैसे कमल शब्दमें क, म और ल-ये तीन वर्ण हैं और इन तीनोंके अलग-अलग उच्चारणसे कुछ भी अभिप्राय नहीं निकलता, परंतु तीनों वर्णोंका साथ-साथ उच्चारण करनेपर जो स्फोट होता है, उसीसे कमल शब्दका अभिप्राय जाना जाता है। कुछ लोग इसी स्फोट (नित्य शब्द) को संसारका कारण मानते हैं।
| १०१६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [हरिवंशे |
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एकोननवतितमोऽध्यायः
भगवान् शङ्करका ऋषियोंको श्रीकृष्णतत्त्वका उपदेश देना
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा देवदेवेशं मुनीनाह पुनः शिवः।
एवं जानीत हे विप्रा ये भक्ता द्रष्टुमागताः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! देवदेवेश्वर श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर भगवान् शिवने पुनः मुनियोंसे कहा—'ब्राह्मणो ! जो भक्तजन यहाँ श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये आये हैं, वे सब यह जान लें ॥ १ ॥
एतदेव परं वस्तु नैतस्मात् परमस्ति वः।
एतदेव विजानीध्वमेतद् वः परमं तपः ॥ २ ॥
'ये श्रीकृष्ण ही परम वस्तु हैं, तुमलोगोंके लिये इनसे बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। ये ही तुम्हारी तपस्याके सर्वोत्तम फल हैं, इस बातको तुमलोग अच्छी तरह जान लो ॥ २ ॥
एतदेव सदा विप्रा ध्येयं सततमानसैः।
एतद् वः परमं श्रेय एतद् वः परमं धनम् ॥ ३ ॥
'विप्रगण ! सदा एकाग्रचित्त होकर नित्य-निरन्तर इन्हीं श्रीकृष्णका ध्यान करना चाहिये। ये ही तुम्हारे परम कल्याण हैं और ये ही तुम्हारे परम धन हैं ॥ ३ ॥
एतद् वो जन्मनः कृत्यमेतद् वस्तपसः फलम्।
एष वः पुण्यनिलय एष धर्मः सनातनः ॥ ४ ॥
'ये ही तुम्हारे जन्म और जीवनकी सफलता हैं। ये ही तुम्हारी तपस्याके फल हैं। ये ही तुम्हारे पुण्योंके भण्डार हैं और ये ही सनातन धर्म हैं ॥ ४ ॥
एष वो मोक्षदाता च एष मार्ग उदाहृतः।
एष पुण्यप्रदः साक्षादेतद् वः कर्मणां फलम् ॥ ५ ॥
'ये ही तुम्हे मोक्ष देनेवाले हैं और ये ही गन्तव्य मार्ग बताये गये हैं। ये ही साक्षात् पुण्यदायक और ये ही तुम्हारे सत्कर्मोंके फल हैं ॥ ५ ॥
एतदेव प्रशंसन्ति विद्वांसो ब्रह्मवादिनः।
एष त्रयीगतिर्विप्राः प्रार्थ्यो ब्रह्मविदां सदा ॥ ६ ॥
'ब्रह्मवादी विद्वान् सदा इनकी ही प्रशंसा करते हैं। ये ही तीनों वेदोंकी गति (आश्रय) हैं। ब्राह्मणो ! ब्रह्मवेत्ता पुरुष सदा इन्हींकी प्राप्तिके लिये प्रार्थना करते हैं ॥ ६ ॥
एतदेव प्रशंसन्ति सांख्ययोगसमाश्रिताः।
एष ब्रह्मविदां मार्गः कथितो वेदवादिभिः ॥ ७ ॥
'सांख्य और योगका आश्रय लेनेवाले विद्वान् इन्हींके गुण गाते हैं। वेदवादी विद्वानोंने इन्हींको ब्रह्मवेत्ताओंका मार्ग बताया है ॥ ७ ॥
एवमेव विजानीत नात्र कार्या विचारणा।
हरिरेकः सदा ध्येयो भवद्भिः सत्त्वमास्थितैः ॥ ८ ॥
'विप्रवरो ! तुम सदा ऐसा ही जानो। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले तुम-जैसे भक्तोंको सदा एकमात्र श्रीहरिका ही चिन्तन करना चाहिये ॥ ८ ॥
नान्यो जगति देवोऽस्ति विष्णोर्नारायणात् परः।
ओमित्येवं सदा विप्राः पठत ध्यात केशवम् ॥ ९ ॥
'संसारमें सर्वव्यापी नारायणसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। ब्राह्मणो ! तुम सदा ओम्का जप और भगवान् केशवका ध्यान किया करो ॥ ९ ॥
ततो निःश्रेयसप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।
एवं ध्यातो हरिः साक्षात् प्रसन्नो वो भविष्यति ॥ १० ॥
'ऐसा करनेसे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी। इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार ध्यान करनेपर साक्षात् श्रीहरि तुमलोगोंपर प्रसन्न होंगे ॥ १० ॥
भवनाशमयं देवः करिष्यति दृढं हरिः।
सदा ध्यायत हरिं विप्रा यदीच्छा प्राप्तुमच्युतम् ॥ ११ ॥
'ये भगवान् विष्णु तुम्हारे संसार-बन्धनका दृढ़तापूर्वक नाश कर डालेंगे। ब्राह्मणो ! यदि भगवान् अच्युतको प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो सदा ही उन श्रीहरिका ध्यान करो ॥ ११ ॥
एष संसारविभवं विनाशयति वो गुरुः।
स्मरध्वं सततं विष्णुं पठध्वं त्रिशरीरिणम् ॥ १२ ॥
'ये ही तुम्हारे गुरु हैं। ये संसार-बन्धनका विस्तार करनेवाली मूल-अविद्याका नाश कर डालेंगे, अतः तुमलोग ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप त्रिविध शरीर धारण करनेवाले श्रीहरिका सदा स्मरण एवं कीर्तन किया करो ॥ १२ ॥
मनःसंयमनं विप्राः कुरुध्वं यत्नतः सदा।
शुद्धेऽन्तःकरणे विष्णुः प्रसीदति तपोधनाः ॥ १३ ॥
'ब्राह्मणो ! तुमलोग सदा यत्नपूर्वक मनका संयम करो। तपोधनो ! संयमसे अन्तःकरण शुद्ध हो जानेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ॥ १३ ॥
ध्यात्वा मां सर्वयत्नेन ततो जानीत केशवम्।
उपास्योऽहं सदा विप्रा उपास्येऽस्मिन् हरौ स्मृतः ॥ १४ ॥
'ब्राह्मणो ! तुम सम्पूर्ण यत्नसे मेरा चिन्तन करके फिर केशवका ज्ञान प्राप्त करो। इन उपास्यदेव श्रीहरिमें सदा मैं ही उपास्य माना गया हूँ ॥ १४ ॥
भविष्यपर्व ] नवतितमोऽध्यायः [ १०१७
उपायोऽयं मया प्रोक्तो नात्र संदेह इत्यपि ।
अयं मायी सदा विप्रा यतध्वमघनाशने ॥ १५ ॥
'विप्रगण ! यह मैंने भगवान्की प्राप्तिका उपाय बताया, इसमें संदेह नहीं है। ये भगवान् मायाके अधिपति हैं, तुम सब लोग इन पापहारी हरिकी प्राप्तिके लिये सदा प्रयत्न करते रहो ॥ १५ ॥
यथा वो बुद्धिरखिला शुद्धा भवति यत्नतः ।
तथा कुरुत विप्रेन्द्रा यथा देवः प्रसीदति ॥ १६ ॥
'विप्रवरो ! जिस प्रकारसे यत्न करनेपर तुम्हारी सारी बुद्धि शुद्ध हो जाय और जिससे भगवान् प्रसन्न हो जायें, वैसा करो' ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तास्ततः सर्वे मुनयः पुण्यशीलिनः ।
यथावदुपगृह्णाना निरसन् संशयं नृप ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! भगवान् शङ्करके ऐसा कहनेपर उन समस्त पुण्यशील मुनियोंने यथावत् रूपसे उनके उपदेशको ग्रहण किया और अपने मनसे संशयको निकाल दिया ॥ १७ ॥
एवमेवेति तं विप्राः प्राहुः प्राञ्जलयो हरम् ।
छिन्नो नः संशयः सर्वो गृहीतोऽर्थः स तादृशः ॥ १८ ॥
उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर महादेवजीसे कहा—'भगवन् ! आपने जैसा कहा है, ऐसी ही बात है। हमारा सारा संशय नष्ट हो गया और हमने वैसा ही सिद्धान्त स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥
एतदर्थं समायाता वयमद्य तवालयम् ।
संगमाद् युवयोः सर्वो नष्टो मोहो महानिह ॥ १९ ॥
'प्रभो ! हम इसीलिये आज आपके निवासस्थानपर आये थे। आप दोनोंके समागमसे यहाँ हमारा सारा महान् मोह नष्ट हो गया ॥ १९ ॥
यथा वदसि देवेश तथा नः श्रेयसे परम् ।
यथाऽऽह भगवान् रुद्रो यतामः सततं हरौ ।
इति ते मुनयः प्रीताः प्रणेमुः केशवं हरिम् ॥ २० ॥
'देवेश्वर ! आप जैसा कहते हैं, वैसा करनेसे ही हमारा परम कल्याण होगा। आप भगवान् रुद्रने जैसा कहा है, उसके अनुसार हम सदा श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये यत्न करते रहेंगे। ऐसा कहकर उन प्रसन्न हुए मुनियोंने श्रीकृष्णव हरिको प्रणाम किया ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां ऋष्युपदेशे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसङ्गमें भगवान् शिवका ऋषियोंको उपदेशविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥
नवतितमोऽध्यायः
भगवान् शंकरद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका कैलाससे बदरिकाश्रममें लौटना
वैशम्पायन उवाच
ततः स भगवान् रुद्रः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
स्तुत्या प्रचक्रमे स्तोतुं विष्णुं विश्वेश्वरं हरिम् ।
अर्थाभिस्तु तदा वाग्भिर्मुनीनां शृण्वतां तथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् रुद्र सबको विस्मयमें डालते हुए-से सर्वव्यापी जगदीश्वर श्रीहरिकी स्तोत्रद्वारा स्तुति करनेको उद्यत हुए। उन्होंने उस समय मुनियोंके सुनते हुए अर्थयुक्त वाणीद्वारा इस प्रकार स्तुति आरम्भ की ॥ १ ॥
महेश्वर उवाच
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमते ।
यस्य भासा जगत् सर्वं भासते नित्यमच्युत ॥ २ ॥
नमो भगवते देव नित्यं सूर्यात्मने नमः ।
महेश्वर बोले—आप परम बुद्धिमान् भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। अच्युत देव ! जिनके प्रकाशसे ही यह सारा जगत् सदा प्रकाशित होता है, उन सूर्यरूप आप भगवान्को नित्य बारंबार नमस्कार है ॥ २ ॥
यः शीतयति शीतांगुर्लोकान् सर्वानिमान् विभुः ॥ ३ ॥
नमस्ते विष्णवे देव नित्यं सोमात्मने नमः ।
देव ! जो शीतरश्मि भगवान् चन्द्रमा इन सम्पूर्ण लोकोंको शीतलता प्रदान करते हैं, उन सोमरूप आप श्रीहरिको नित्य नमस्कार है ! नमस्कार है ॥ ३ ॥
यः प्रजाः प्रीणयत्येको विश्वात्मा भूतभावनः ॥ ४ ॥
नमः सर्वात्मने देव नमो वागात्मने हरे ।
देव ! हरे ! जो एकमात्र विश्वात्मा भूतभावन भगवान् समस्त प्रजाको तृप्ति प्रदान करते हैं, उन सर्वरूप और वाणीस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ४ ॥
यो दधार करेणासौ कुशचीरादि यत् सदा ॥ ५ ॥
दधार वेदान् सर्वांश्च तुभ्यं ब्रह्मात्मने नमः ।
जो सदा अपने हाथसे कुश, चीर आदि धारण करते हैं
| १०१८ | महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तथा जिन्होंने सम्पूर्ण वेदोंको धारण किया है, वे ब्रह्मा आप ही हैं। आपको नमस्कार है॥ ५ १/२ ॥
सर्वान् संहरते यस्तु संहारे विश्वदृक् सदा ॥ ६ ॥
क्रोधात्मासि विरूपोऽसि तुभ्यं रुद्रात्मने नमः।
जो विश्वद्रष्टा भगवान् संहारकालमें सदा समस्त लोकोंका संहार करते हैं, वे आप ही हैं। आप क्रोधरूप, विकरालरूप तथा रुद्रस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है॥ ६ १/२ ॥
सृष्टौ स्रष्टा समस्तानां प्राणिनां प्राणदायिने ॥ ७ ॥
अजाय विष्णवे तुभ्यं स्रष्ट्रे विश्वसृजे नमः।
जो सृष्टिकालमें स्रष्टा बनकर समस्त प्राणियोंको प्राणदान करते हैं, उन अजन्मा, विश्वस्रष्टा, विधाता आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है॥ ७ १/२ ॥
आदौ प्रकृतिमूलाय भूतानां प्रभवाय च ॥ ८ ॥
नमस्ते देवदेवेश प्रधानाय नमो नमः।
देवदेवेश्वर ! जो आदिमें मूल-प्रकृतिरूप है और गुणोंमें क्षोभ होनेपर क्रमशः पञ्च-महाभूतोंका उत्पादक होता है, उन प्रधानस्वरूप आपको बारंबार नमस्कार है॥ ८ १/२ ॥
पृथिव्यां गन्धरूपेण संस्थितः प्राणिनां हरे ॥ ९ ॥
दृढाय दृढरूपाय तुभ्यं गन्धात्मने नमः।
प्राणियों(के पापों)का अपहरण करनेवाले हरे! आप पृथिवीमें गन्धरूपसे स्थित हैं। आप दृढ़ हैं, दृढ़ रूपधारी हैं तथा गन्धस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है॥ ९ १/२ ॥
अपां रसाय सर्वत्र प्राणिनां सुखहेतवे ॥ १० ॥
नमस्ते विश्वरूपाय रसाय च नमो नमः।
जो प्राणियोंको सुख देनेके लिये सर्वत्र जलमें रसरूपसे निवास करते हैं, उन विश्वरूपधारी रसस्वरूप आपको बारंबार नमस्कार है॥ १० १/२ ॥
तेजसा भास्करो यस्तु घृणिर्जन्तुहितः सदा ॥ ११ ॥
तस्मै देव जगन्नाथ नमो भास्कररूपिणे।
देव ! जगन्नाथ ! जो तेजसे सूर्यतुल्य, किरणोंसे प्रकाशित तथा सदा सभी जीवोंका हित करनेवाले हैं, उन भास्कररूप आपको नमस्कार है॥ ११ १/२ ॥
वायोः स्पर्शगुणो यत्र शीतोष्णसुखदुःखदः ॥ १२ ॥
नमस्ते वायुरूपाय नमः स्पर्शात्मने हरे।
हरे ! जहाँ वायुका स्पर्श नामक गुण शीत, उष्ण एवं सुख-दुःख प्रदान करनेवाला है, वहाँ उस गुणके आश्रयभूत वायु आपके ही स्वरूप हैं। स्पर्श भी आपका ही रूप है, आपको नमस्कार है॥ १२ १/२ ॥
आकाशेऽवस्थितः शब्दः सर्वश्रोत्रनिवेशनः ॥ १३ ॥
नमस्ते भगवन् विष्णो तुभ्यं सर्वात्मने नमः।
भगवन् ! विष्णो ! आकाशस्वरूप आपमें स्थित शब्द सबके कानोंमें प्रवेश करता है। आप सर्वात्मा हैं, आपको नमस्कार है॥ १३ १/२ ॥
यो दधार जगत् सर्वं मायामानुषदेहवान् ॥ १४ ॥
नमस्तुभ्यं जगन्नाथ मायिनेऽमायदायिने।
जगन्नाथ ! आपने मायामय मनुष्य-देह धारण करके भी सम्पूर्ण जगत्को स्वयं ही धारण कर रखा है। आप मायाके स्वामी हैं तथा मायारहित मोक्षतक प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है॥ १४ १/२ ॥
नम आद्याय बीजाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ १५ ॥
अचिन्त्याय सुचिन्त्याय तस्मै चिन्त्यात्मने नमः।
आप सबके आदिकारण, निर्गुण, गुणस्वरूप, अचिन्त्य, सुचिन्त्य एवं चिन्त्यरूप हैं, उन आप परमात्माको नमस्कार है॥ १५ १/२ ॥
हराय हरिरूपाय ब्रह्मणे ब्रह्मदायिने ॥ १६ ॥
नमो ब्रह्मविदे तुभ्यं ब्रह्मब्रह्मात्मने नमः।
आप हरिरूपधारी हर हैं, ब्रह्माको वेद प्रदान करनेवाले हैं, ब्रह्मवेत्ता तथा ब्रह्म और यज्ञरूप हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !!॥ १६ १/२ ॥
नमः सहस्रशिरसे सहस्रकिरणाय च ॥ १७ ॥
नमः सहस्रवक्त्राय सहस्रनयनाय च।
आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित होते हैं। आपके मुख और नेत्र भी सहस्र (अनन्त) हैं, आपको नमस्कार है॥ १७ १/२ ॥
विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्त्रे नमो नमः ॥ १८ ॥
विश्ववक्त्रे नमो नित्यं भूतावास नमो नमः।
आप विश्व, विश्वरूप और विश्वकर्ता हैं, आपको नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप सम्पूर्ण विश्वको उपदेश देनेवाले (जगद्-गुरु) हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतोंके आवासस्थान विष्णुदेव ! आपको बारंबार नमस्कार है॥
इन्द्रियायेन्द्ररूपाय विषयाय सदा हरे ॥ १९ ॥
नमोऽश्वशिरसे तुभ्यं वेदाभरणरूपिणे।
हरे ! आप इन्द्रियरूप, विषयरूप और इन्द्ररूप हैं, आपको सदा नमस्कार है। वेद ही जिनका आभरण और रूप हैं, उन हयग्रीवरूपधारी आपको नमस्कार है॥ १९ १/२ ॥
अग्नयेऽग्निपते तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः ॥ २० ॥
सूर्याय सूर्यपुत्राय तेजसां पतये नमः।
अग्निपते ! आप अग्निरूप हैं, ग्रह-नक्षत्रोंके अधिपति हैं, सूर्य, सूर्यपुत्र तथा तेजके स्वामी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है॥ २० १/२ ॥
भविष्यपर्व ] नवतितमोऽध्यायः १०१९
नमः सोमाय सौम्याय नमः शीतात्मने हरे ॥ २१ ॥
नमो वषट्कृते तुभ्यं स्वाहास्वधास्वरूपिणे ।
नमो यज्ञाय इज्याय हविषे हव्यसंस्कृते ।
नमः स्रुवाय पात्राय यज्ञाङ्गाय पराय च ॥ २२ ॥
हरे ! आप सोम, सौम्य तथा शीतात्मा हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । आप वषट्कार तथा स्वाहा-स्वधा-स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है । आप यज्ञ, यज्ञोंद्वारा पूज-नीय तथा हविष्यरूप हैं, आपको नमस्कार है । हव्योंद्वारा संस्कृत आप परमात्माके प्रति नमस्कार है । आप स्रुव हैं, यज्ञपात्र हैं, यज्ञोंके अङ्गभूत उपकरण हैं और इन सबसे परे भी हैं, आपको नमस्कार है ॥ २१-२२ ॥
नमः प्रणवदेहाय क्षरायाप्यक्षराय च ।
वेदाय वेदरूपाय शङ्खिणे शङ्खरूपिणे ॥ २३ ॥
प्रणव आपका शरीर है । आप क्षर ( सम्पूर्ण भूत ) और अक्षर ( कूटस्थ ) हैं, आपको नमस्कार है । आप वेद हैं, वेदरूप हैं, शङ्ख ग्रहण करनेवाले और शङ्खरूपधारी हैं, आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥
गदिने खङ्गिने तुभ्यं शङ्खिने चक्रिणे नमः ।
शूलिने चर्मिणे नित्यं वरदाय नमो नमः ॥ २४ ॥
आप गदा, खड्ग, शङ्ख, चक्र, शूल और ढाल धारण करते हैं तथा सदा वर देनेवाले हैं, आपको बारंबार नम-स्कार है ॥ २४ ॥
बुद्धिप्रियाय बुद्धाय प्रबुद्धाय सुखाय च ।
हरये विष्णवे तुभ्यं नमः सर्वात्मने गुरो ॥ २५ ॥
गुरुदेव ! आप बुद्धिप्रिय, बोधसम्पन्न, प्रबुद्धस्वरूप एवं सुखरूप हैं । आप ही सबके आत्मा पापहारी विष्णु हैं, आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥
नमस्ते सर्वलोकेश सर्वकर्त्रे नमो नमः ।
नमः स्वभावशुद्धाय नमस्ते यज्ञसूकर ॥ २६ ॥
सर्वलोकेश्वर ! आप सबके कर्ता हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । यज्ञवाराह ! आप स्वभावसे ही शुद्ध हैं, आप-को बारंबार नमस्कार है ॥ २६ ॥
नमो विष्णो नमो विष्णो नमो विष्णो नमो हरे ।
नमस्ते वासुदेवाय वासुदेवाय धीमते ॥ २७ ॥
विष्णो ! आपको नमस्कार है । विष्णो ! आपको नम-स्कार है । विष्णो ! आपको नमस्कार है । हरे ! आपको नमस्कार है । सबके भीतर निवास करनेवाले बुद्धिमान् देवता वसुदेवनन्दन ! आपको नमस्कार है ॥ २७ ॥
नमः कृष्णाय कृष्णाय सर्वावास नमो नमः ।
नमो भूयो नमस्तेऽस्तु पाहि लोकान् जनार्दन ॥ २८ ॥
सबके आवासस्थान जनार्दन ! आप नामसे कृष्ण हैं, वर्णसे भी कृष्ण ही हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । आप-को पुनः नमस्कार है ! नमस्कार है !! आप सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये ॥ २८ ॥
इति स्तुत्वा जगन्नाथमुवाच मुनिसत्तमान् ।
इदं स्तोत्रमधीयाना नित्यं व्रजत केशवम् ॥ २९ ॥
शरण्यं सर्वभूतानां तत्र श्रेयो विधास्यति ।
इस प्रकार जगदीश्वर श्रीहरिकी स्तुति करके भगवान् शिवने उन श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा—'इस स्तोत्रका नित्य पाठ करते हुए तुम सब लोग भगवान् केशवकी शरणमें जाओ । वे समस्त भूतोंको शरण देनेवाले हैं, अतः तुम्हारा कल्याण करेंगे ॥ २९½ ॥
ये चेमं धारयिष्यन्ति स्तवं पापविमोचनम् ॥ ३० ॥
तेषां प्रीतः प्रसन्नात्मा पठतां शृण्वतां हरिः ।
श्रेयो दास्यति धर्मात्मा नात्र कार्या विचारणा॥ ३१ ॥
'जो लोग इस पापनाशक स्तोत्रको अपने हृदयमें धारण करेंगे; उनपर भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होंगे । प्रसन्नचित्त हुए धर्मात्मा विष्णु इसका पाठ और श्रवण करनेवाले पुरुषों-को कल्याण प्रदान करेंगे । इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३०-३१ ॥
अवश्यं मनसा ध्यात केशवं भक्तवत्सलम् ।
श्रेयः प्राप्तुं यदीच्छन्ति भवन्तः शंसितव्रताः॥ ३२ ॥
'यदि तुमलोग कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो उत्तम व्रतका पालन करते हुए निश्चय ही अपने मनसे भक्तवत्सल केशवका चिन्तन करो' ॥ ३२ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत ।
सगणः शंकरः साक्षादुमया भूतभावनः ॥ ३३ ॥
ऐसा कहकर उमासहित भूतभावन कल्याणकारी साक्षात् भगवान् रुद्र अपने गणोंके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये ॥
नेमुस्तं मुनयः सर्वे परां निर्वृतिमाययुः ।
तमेव परमं तत्त्वं मत्वा नारायणं हरिम् ।
विस्मयं परमं गत्वा मेनिरे स्वकृतार्थताम् ॥ ३४ ॥
सब मुनियोंने उन्हें नमस्कार किया और परम संतोष प्राप्त किया । पापहारी नारायणदेवको ही परम तत्त्व मानकर उन सबको बड़ा विस्मय हुआ और उन सबने अपने-आपको कृतकृत्य माना ॥ ३४ ॥
लोकपालास्तदा विष्णुं नमस्कृत्य हरिं मुदा ।
जग्मुः स्वान्यथ वेश्मानि गणैः सर्वैर्नृपोत्तम ॥ ३५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! उस समय लोकपाल भी भगवान् विष्णु श्रीहरिको प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार करके समस्त सेवकगणोंके साथ अपने-अपने निवासस्थानको चले गये ॥ ३५ ॥
| १०२० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
आरुह्य भगवान् विष्णुर्गरुडं पक्षिपुङ्गवम् ।
शङ्खी चक्री गदी खड्गी शार्ङ्गी तूणी तनुत्रवान् ॥ ३६ ॥
यथागतं जगन्नाथो ययौ बदरिकाश्रमम् ।
सायाह्ने पुण्डरीकाक्षो नित्यं मुनिंनिषेवितम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण पक्षिराज गरुड़पर आरूढ़ हो शङ्ख, चक्र, गदा, खड्ग, शार्ङ्गधनुष, तरकस और कवच धारण करके जैसे आये थे, उसी प्रकार सायंकालमें मुनिजनोंद्वारा नित्य सेवित विशाला बदरीतीर्थमें लौट आये ॥ ३६-३७ ॥
तत्र गत्वा यथायोगं विनम्य हरिरीश्वरः।
अर्चिनो मुनिभिः सर्वैर्निपसाद सुखासने ॥ ३८ ॥
वहाँ जाकर वे सर्वेश्वर श्रीहरि यथायोग्य मुनियोंको प्रणाम करके सब मुनियोंद्वारा पूजित हो सुखद आसनपर विराजमान हुए ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां कृष्णप्रत्यागमने नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसंगमें 'श्रीकृष्णका लौटना' विषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥
एकनवतितमोऽध्यायः
पौण्ड्रकका राजाओंकी सभाओंमें अपनेको शङ्ख, चक्र आदिसे युक्त वासुदेव घोषित करना और श्रीकृष्णको पराजित करनेका मनसूबा बाँधना
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु पौण्ड्रो नृपवरोत्तमः।
बलवान् सत्त्वसम्पन्नो योद्धा विपुलविक्रमः ॥ १ ॥
वृष्णिशत्रुस्तदा राजा कृष्णद्वेषी बलात् तदा ।
नृपान् सर्वान् समाहूय प्रोवाच नृपसंसदि ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी समय राजाओंमे श्रेष्ठतम, बलवान्, सत्त्वसम्पन्न, महापराक्रमी योद्धा, वृष्णिवंशियोंसे शत्रुभाव रखनेवाला तथा श्रीकृष्णका द्वेषी पौण्ड्रक समस्त राजाओंको बलपूर्वक बुलाकर उनकी सभामें बोला—॥ १-२ ॥
जिता च पृथिवी सर्वा जिताश्च नृपसत्तमाः।
वृष्णयस्ते बलोन्मत्ताः कृष्णमाश्रित्य गर्विताः ॥ ३ ॥
'मैंने सारी पृथ्वी जीत ली और बड़े-बड़े राजाओंको पराजित कर दिया। परंतु बलोन्मत्त वृष्णिवंशी श्रीकृष्णका सहारा लेकर घमंडमें भर गये हैं ॥ ३ ॥
दास्यन्ति मे करं सर्वे न हि ते कृष्णसंश्रयात् ।
स तु कृष्णश्चक्रबलान्मामावज्ञाय तिष्ठति ॥ ४ ॥
'कृष्णका आश्रय लेकर वे सब-के-सब मुझे कर नहीं देते हैं और वह कृष्ण अपने चक्रके बलसे मेरी अवहेलना करते रहता है ॥ ४ ॥
अहं चक्रीति गर्वोऽभूत्तस्य गोपस्य सर्वदा ।
शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी शरी तूणी सहायवान् ॥ ५ ॥
एवमादिर्महागर्वस्तस्य सम्प्रति वर्तते ।
'उस ग्वालेको सदा इस बातका गर्व रहता है कि मैं चक्रधारी हूँ। मेरे पास शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष, बाण और तरकस हैं, मैं सहायतासे सम्पन्न हूँ। इस तरह इस समय उसका गर्व बहुत बढ़ा-चढ़ा है ॥ ५३ ॥
लोके च मम यन्नाम वासुदेवेति विश्रुतम् ॥ ६ ॥
अगृह्णन्मम तन्नाम गोपो मदबलान्वितः ।
'लोकमें जो मेरा वासुदेव यह प्रसिद्ध नाम है, उसे उस मदमत्त एवं बलवान् गोपमे ग्रहण कर लिया है ॥६३॥
तस्य चक्रस्य यच्चक्रं ममापि निशितं महत् ॥ ७ ॥
गर्वहन्तृ सदा तस्य नाम्ना चापि सुदर्शनम् ।
'मेरे पास भी एक विशाल एवं तीखा चक्र है, जो उसके चक्रका नाश करनेवाला है। मेरा यह चक्र सदा उस (कृष्ण) के गर्वको चूर्ण करनेमें समर्थ है, उसका नाम भी सुदर्शन है ॥ ७३ ॥
सहस्रारं महाघोरं तस्य चक्रस्य नाशनम् ॥ ८ ॥
अनेकमहतं चक्रं गोपजस्य नृपोत्तमाः।
'श्रेष्ठ राजाओ ! मेरे इस चक्रमें एक सहस्र अरे लगे हुए हैं। यह महाभयंकर है और गोपबालक श्रीकृष्णके चक्रका नाश करनेवाला है। यह अनेक रूप धारण करनेमे समर्थ और कहीं भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है ॥ ८३ ॥
ममाप्येतद् धनुर्दिव्यं शार्ङ्गं नाम महारवम् ॥ ९ ॥
गदा कौमोदकी नाम ममेय बृहती दृढा ।
कालायससहस्रस्य भारेण सुकृता मया ॥ १० ॥
'मेरा भी यह धनुष दिव्य है, सींगका बना हुआ है, इसलिये शार्ङ्गनामसे प्रसिद्ध है और बड़ी भारी टंकार-ध्वनि करता है। मेरी इस गदाका नाम भी कौमोदकी है। यह विशाल एवं सुदृढ़ है। मैंने एक सहस्र भार लोहेसे इसका निर्माण कराया है ॥ ९-१० ॥
भविष्यपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः १०२१
खङ्गो नन्दकनामासौ ममायं विपुलॊ दृढः।
अन्तकस्यान्तको घोरस्तस्य खङ्गस्य नाशकः ॥ ११ ॥
'मेरा यह विशाल खड्ग बहुत मजबूत है। इसका नाम नन्दक है। यह घोर खड्ग कालका भी काल और श्रीकृष्णके खड्गका नाश करनेवाला है ॥ ११ ॥
तत्राहं च गदी खड्गी शङ्खी चक्री तनुत्रवान्।
युधि जेता च कृष्णस्य नात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥
मां च ब्रूत नृपाश्चैव गदिनं चक्रिणं तथा।
शङ्खिनं शार्ङ्गिणं वीरं ब्रूत नित्यं नृपोत्तमाः ॥ १३ ॥
'इस प्रकार मैं गदा, खड्ग, शङ्ख, चक्र और कवचसे युक्त होकर युद्धमें श्रीकृष्णको जीत लूँगा। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है; अतः श्रेष्ठ नरपतियो ! अब तुम लोग मुझे ही सदा गदाधर, चक्रपाणि, शङ्खधारी एवं शार्ङ्गधनुर्धर वीर कहा करो ॥ १२-१३ ॥
वासुदेवेति मां ब्रूत न तु गोपं यदूत्तमम्।
एकोऽहं वासुदेवो हि हत्वा तं गोपदारकम् ॥ १४ ॥
'मुझे ही वासुदेव कहो, उस यदुश्रेष्ठ गोपको नहीं। उस गोपबालकको मारकर एकमात्र मैं ही वासुदेव रहूँगा ॥१४॥
सख्युर्मम वलाद्धन्ता नरकस्य महात्मनः।
मां तथा यदि न ब्रूत दण्ड्या भारशतैः शतम्॥ १५॥
सुवर्णस्य च निष्कस्य धान्यस्य बहुशस्तदा।
'महामनस्वी नरकासुर मेरा मित्र था, उसको इस गोपर्ने बलपूर्वक मार डाला है, (इसलिये मैं भी इसका वध करूँगा); अतः यदि तुमलोग मुझे वासुदेव नहीं कहोगे तो मैं तुमपर दस हजार भार सुवर्ण एवं निष्कका तथा बहुत-सी धान्य-राशिका दण्ड लगाऊँगा' ॥ १५ ½ ॥
तथा ब्रुवति राजेन्द्र मनसा दुस्सहं यथा ॥ १६ ॥
केचिल्लज्जासमायुक्ता आसंस्ते बलवत्तराः।
रसज्ञा बलवीर्यस्य राजानस्ते सदा नृप ॥ १७ ॥
राजाधिराज पौण्ड्रकके इस तरह मनको असह्य लगने-वाली बात कहनेपर कुछ प्रबल नरेश लज्जित होकर चुप रह गये। राजन् ! वे सब नरेश बल-वीर्यके रसज्ञ थे॥ १६-१७॥
अपरे तु नृपा राजन्नेवमेवेति चुक्रुशुः।
अन्ये बलमदोत्सिक्ता जेष्यामः केशवं रणे ॥ १८ ॥
राजन् ! दूसरे चापलूस नरेश 'ठीक है ! ठीक है !!' ऐसा कोलाहल करने लगे तथा बलके मदसे उन्मत्त हुए अन्य राजा कहने लगे कि हम युद्धमें श्रीकृष्णको अवश्य जीतेंगे ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकोक्तौ एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रककी गर्वोक्तिविषयक इक्यानेवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
द्विनवतितमोऽध्यायः
पौण्ड्रकके यहाँ नारदजीका आगमन और उसके साथ उनकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
ततः कैलासशिखरान्निर्गतो मुनिसत्तमः।
नारदः सर्वलोकज्ञः पौण्ड्रस्य नगरं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके ज्ञाता मुनिश्रेष्ठ नारद कैलासशिखरसे निकलकर पौण्ड्रकके नगरकी ओर चल दिये ॥ १ ॥
अवतीर्य नभोभागात् प्रत्यागम्य नरोत्तमम्।
द्वाःस्थेन च समाज्ञप्तः प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ २ ॥
आकाशसे उतरकर द्वारपालसे राजाज्ञा प्राप्त करके उन्होंने राजाके उत्तम भवनमें प्रवेश किया और वे उस नर-श्रेष्ठ पौण्ड्रकसे मिले ॥ २ ॥
अर्घ्यादिसमुदाचारं नृपाल्लब्ध्वा महामुनिः।
निषसादासने शुभ्रे ह्यास्तृते शुभवाससा ॥ ३ ॥
राजासे अर्घ्य आदि अतिथि-सत्कार पाकर वे महामुनि सुन्दर वस्त्र बिछे हुए शुभ्र आसनपर विराजमान हुए ॥३॥
कुशलं पृष्टवान् भूयो नृपः स मुनिसत्तमम्।
उवाच नारदं भूयः पौण्ड्रको वलगर्वितः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् बलके घमंडमें भरे हुए राजा पौण्ड्रकने पहले तो मुनिश्रेष्ठ नारदसे कुशल-समाचार पूछा, फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४ ॥
भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वकार्येषु पण्डितः।
प्रथितो देवसिद्धेषु गन्धर्वेषु महात्मसु ॥ ५ ॥
सर्वत्रगो निराबाधो गत्वा सर्वत्र सर्वदा।
अगम्यं तव विप्रेन्द्र ब्रह्माण्डे न हि किंचन।
'विप्रवर ! आप सर्वत्र कुशल हैं, समस्त कार्योंमें पण्डित हैं। देवताओं, सिद्धों और महात्मा गन्धर्वोंमें आपकी ख्याति है। आप बिना किसी बाधाके सर्वत्र जा सकते हैं। सदा सब जगह आपकी पहुँच है। इस ब्रह्माण्डमें कोई भी स्थान आपके लिये अगम्य नहीं है ॥ ५-½ ॥
नारदेदं वद त्वं हि यत्र यत्र गतो भवान् ॥ ६ ॥
| १०२२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तत्र तत्र तपःसिद्धो लोके प्रथितवीर्यवान् ।
पौण्ड्र एव च विख्यातो वासुदेवेति शब्दितः ॥ ७ ॥
'नारदजी ! यह तो बताइये, आप जहाँ-जहाँ गये हैं, वहाँ-वहाँ यह तपःसिद्ध और लोकमें विख्यात बलशाली पौण्ड्रक ही 'वासुदेव' नामसे विख्यात है न ? ॥ ६-७ ॥
शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी खड्गी तूणी तनुत्रवान् ।
विजेता राजसिंहानां दाता सर्वस्य सर्वदा ॥ ८ ॥
'मैं ही शङ्खधारी, चक्रपाणि, गदाधर और शार्ङ्गधनुर्धर हूँ। तलवार और तरकस लेकर कवच धारण करके अनेकानेक राजसिंहोंपर विजय पानेवाला मैं ही हूँ। मैं ही सदा सबको सब कुछ देनेवाला हूँ ॥ ८ ॥
भोक्ता राज्यस्य सर्वस्य शास्ता राज्ञां बलाद् बली ।
अजेयः शत्रुसैन्यानां रक्षिता स्वजनस्य च ॥ ९ ॥
'मैं समस्त राज्यका भोक्ता और बलपूर्वक शासन करनेवाला बलवान् राजा हूँ, शत्रुसैनिकोंके लिये अजेय तथा स्वजनोंका रक्षक हूँ ॥ ९ ॥
योऽद्य गोपकनामासौ वासुदेवेति शब्दितः ।
तस्य वीर्यबले न स्तो नाम्नोऽस्य मम धारणे ॥ १० ॥
'आजकल जो वह गोप वासुदेव नामसे विख्यात हो रहा है, उसमें इतना बल और पराक्रम नहीं है, जिससे वह मेरा नाम धारण कर सके ॥ १० ॥
स हि गोपो वृथा बाल्याद् धारयत्येव नाम मे ।
इदं निश्चित्य विप्रन्द्र एक एव भवाम्यहम् ॥ ११ ॥
वासुदेवो जगत्यस्मिन् निर्जित्य बलिनं यदुम् ।
'वह ग्वाला अज्ञानवश व्यर्थ ही मेरा नाम धारण करता है। विप्रवर ! आप निश्चितरूपसे यह जान लीजिये कि मैं उस बलवान् यादवको जीतकर अकेला ही इस जगत्में वासुदेव रहूँगा ॥ १११/२ ॥
वृष्णीन् सर्वान् बलात् क्षिप्त्वा निहनिष्ये च तां पुरीम् ॥
द्वारकां विष्णुनिलयां योद्धा चाहं महामते ।
एते च बलिनः सर्वे नृपा मम समागताः ॥ १३ ॥
'समस्त वृष्णिवंशियोंको बलपूर्वक पराजित करके श्रीकृष्णकी निवासभूता द्वारकापुरीको नष्ट कर डालूँगा। महामते ! मैं स्वयं तो युद्ध करूँगा ही, ये समस्त बलवान् राजा भी मेरी ओरसे युद्धके लिये आये हैं ॥ १२-१३ ॥
अश्वाश्च वेगिनः सन्ति रथा वायुजवा मम ।
उष्ट्रा मत्ताः सहस्रं च गजा नियुतमेव च ॥ १४ ॥
एतेनाहं बलेनाजौ हनिष्ये केशवं रणे ।
'मेरे पास बहुत-से वेगशाली अश्व हैं, वायुके समान वेगशाली रथ हैं, सहस्रों मतवाले ऊँट और लाखों मदमत्त हाथी हैं। इस विशाल सेनाके साथ रणभूमिमें मैं श्रीकृष्णका वध कर डालूँगा ॥ १४१/२ ॥
तस्मादेवं सदा विप्र वद ब्रह्मन् पुरे मम ॥ १५ ॥
इन्द्रस्यापि सदा विप्र वद नारद साम्प्रतम् ।
प्रार्थनैषा मम विभो नमस्ये त्वां तपोधन ॥ १६ ॥
'विप्रवर ! ब्रह्मन् ! आप प्रत्येक नगरमें मेरे लिये सदा ऐसी ही बात कहें। नारद बाबा ! इस समय इन्द्रके समक्ष भी आपको सदा मेरे बल-पराक्रमकी ही बात करनी चाहिये। विभो ! तपोधन ! यही मेरी प्रार्थना है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ' ॥ १५-१६ ॥
नारद उवाच
सर्वत्रगः सदा चास्मि यावद् ब्रह्माण्डसंस्थितिः ।
आचार्यः सर्वकार्येषु गमने केनचिन्नृप ॥ १७ ॥
नारदजीने कहा—नरेश्वर ! जहाँतक ब्रह्माण्डकी स्थिति है, मैं सदा सर्वत्र जा सकता हूँ। किसी भी पुरुषको अपने समस्त कार्योंके लिये मेरी शरण लेनी चाहिये। सर्वत्र जानेकी कलामें तो मैं आचार्य ही हूँ ॥ १७ ॥
किं तु वक्तुं तथा राजन्नुत्सहे नृपसत्तम ।
महीं शासति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने ॥ १८ ॥
विष्णौ सर्वत्रगे देवे दुष्टान् हत्वा सबान्धवान् ।
वासुदेवेति को नाम तिष्ठत्यस्मिन् धराविति ॥ १९ ॥
राजन् ! नृपश्रेष्ठ ! तुम जैसा चाहते हो, वैसी बात कहनेका उत्साह मैं कैसे कर सकता हूँ। जबतक बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त दुष्टोंका वध करके सर्वत्र जा सकनेवाले सर्वव्यापी देव, देवेश्वर, चक्रपाणि जनार्दन इस पृथ्वीका शासन कर रहे हैं, तबतक उन श्रीहरिके रहते हुए दूसरा कौन वासुदेव कहला सकता है ॥ १८-१९ ॥
को नाम वक्तुमेवेदं कृष्णे शासति गोमती ।
अज्ञानाद् वक्तुमेवं च समर्थाः प्राकृता जनाः ॥ २० ॥
सूर्य-किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले द्युलोक और भूलोकपर जबतक श्रीकृष्णका शासन चल रहा है, तबतक कौन मनुष्य ऐसी बात कह सकता है। कि, पौण्ड्रक वासुदेव है'। तुम्हारे-जैसे मूढ़ मनुष्य ही अज्ञानवश ऐसी बात कहनेमें समर्थ हो सकते हैं ॥ २० ॥
हरिः सर्वत्रगो विष्णुर्दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
अचिन्त्यविभवो विष्णुः शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ २१ ॥
सर्वत्र जानेकी क्षमता रखनेवाले, अचिन्त्य वैभवशाली, पापहारी, सर्वव्यापी, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर विष्णु तुम्हारे घमंडको दूर कर देंगे ॥ २१ ॥
भविष्यपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः १०२३
आदिदेवः पुराणात्मा दर्पं ते व्यपनेष्यति ।
हास्यमेतन्महाराज यच्च वै तत्र संस्थितम् ॥ २२ ॥
शाङ्गं खड्गं तथा राजन् महाघोरं न दाप्यते ।
अतीव हासकालोऽयं तव सम्प्रति वर्तते ॥ २३ ॥
महाराज ! आदिदेव, पुराणपुरुष श्रीकृष्ण तुम्हारे दर्पका दलन कर देंगे। तुम जो कुछ सोचते या कहते हो, यह उपहासकी बात है। राजन् ! श्रीकृष्णके पास जो शाङ्ग-धनुष और महाभयंकर खड्ग है, उनका तुम्हारे इन अस्त्रोंसे उच्छेद नहीं हो सकता। इस समय तुम्हारे लिये यह महान् हासका समय आ पहुँचा है ॥ २२-२३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकनारदसंवादे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक और नारदका संवादविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥
त्रिनवतितमोऽध्यायः
नारदजीका श्रीकृष्णके पास जाना और पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमण
वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो महाराज पौण्ड्रो मदबलान्वितः ।
नारदं विप्रवयं तं प्रोवाच नृपसंसदि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज ! तदनन्तर बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाला पौण्ड्रक कुपित हो उस राजसभामें विप्रवर नारदजीसे बोला— ॥ १ ॥
किमिदं प्राह विप्रर्षे राजाहं च द्विजैः सह ।
गच्छ त्वं काममथ वा मुने शापप्रदः सदा ॥ २ ॥
भीतस्त्वत्तो महाबुद्धे गच्छ त्वं काममद्य हि ।
'ब्रह्मर्षे ! आप यह क्या कहते हैं ? मैं राजा हूँ और इन ब्राह्मणोंके साथ हूँ। मुने ! आप सदा शाप देनेवाले हैं, अतः अपनी इच्छाके अनुसार यहाँसे चले जाइये। महाबुद्धे ! मैं आपसे डरता हूँ, अतः चाहें तो अभी चले जाइये' ॥ २ ॥
इत्युक्तो नृपवर्येण तूष्णीमेव स नारदः ॥ ३ ॥
जगामाकाशगमनो यत्र तिष्ठति केशवः ।
नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रकके ऐसा कहनेपर आकाशचारी नारदजी चुपचाप वहाँसे उस स्थानको चले गये, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण थे ॥ ३ ॥
स गत्वा विष्णुसंकाशं विष्णोः सर्वमशंसत ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुर्यथेष्टं वदतामिति ।
दर्पं तस्यापनेष्यामि श्वोभूते द्विजसत्तम ॥ ५ ॥
श्रीकृष्णके पास जाकर उन्होंने उनसे उसकी सारी बातें कह सुनायीं। उन्हें सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'द्विजश्रेष्ठ ! पौण्ड्रक जैसा चाहे बकता रहे, कल मैं उसका घमंड दूर कर दूँगा' ॥ ४-५ ॥
इत्युक्त्वा विररामेव तस्मिन् वदरिकाश्रमे ।
ततः पौण्ड्रो महाबाहुर्बलैर्बहुभिरीश्वरः ॥ ६ ॥
ऐसा कहकर उस बदरिकाश्रममें भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो रहे। इधर सामर्थ्यशाली महाबाहु पौण्ड्रकने बहुत-सी सेनाओंके साथ द्वारकापुरीको प्रस्थान किया ॥ ६ ॥
अश्वैरनेकसाहस्रैर्गजैर्बहुभिरन्वितः ।
शस्त्रकोटिसमायुक्तः स राजा सत्यसंगरः ॥ ७ ॥
अनेक सहस्र अश्वों, बहुसंख्यक हाथियों और करोड़ों अस्त्र-शस्त्रोंसे संयुक्त हुआ वह सत्यप्रतिज्ञ राजा द्वारकाकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ७ ॥
अनेकशतसाहस्रैः पत्तिभिश्च समन्वितः ।
एकलव्यप्रभृतिभी राजभिश्च समन्ततः ॥ ८ ॥
उसके साथ कई लाख पैदल सैनिक थे। एकलव्य आदि राजा उसे सब ओरसे घेरकर चलते थे ॥ ८ ॥
अष्टौ रथसहस्राणि नागानामयुतं तथा ।
अर्बुदं पत्तिसंघानां तद्बलं समपद्यत ॥ ९ ॥
आठ हजार रथ, दस हजार हाथी और एक अर्बुद (दस करोड़) पैदल सैनिकोंसे वह सारी सेना सम्पन्न थी ॥ ९ ॥
एतेन च बलेनाजौ प्रस्फुरन् नृपसत्तमः ।
विरराज महाराज उदयस्थो महारविः ॥ १० ॥
महाराज ! इस विशाल सेनासे युद्धस्थलमें प्रकाशित होनेवाला नृपश्रेष्ठ पौण्ड्रक उदयगिरिपर प्रकाशमान महासूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ १० ॥
स ययौ मध्यरात्रेण नगरीं द्वारकामथ ।
पत्तयो दीपिकाहस्ता रात्रौ तमसि दारुणे ॥ ११ ॥
उसने आधी रातके समय द्वारकापुरीपर धावा किया। रातके उस भयंकर अन्धकारमें पैदल सैनिकोंके हाथोंमें जलती हुई मशालें ले रखी थीं ॥ ११ ॥
ययुर्विविधशस्त्रौघाः सम्पत्तन्तो महाबलाः ।
द्वारकां वीर्यसम्पन्नां महाघोरां नृपोत्तमाः ॥ १२ ॥
वे महाबली श्रेष्ठ नरेश नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो पराक्रमशालिनी महाघोर द्वारकापुरीपर आक्रमण करनेके लिये जा रहे थे ॥ १२ ॥
१०२४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
रथं महान्तमारुह्य शस्त्रौघैश्च समावृतम्।
पट्टिशासिसमाकीर्णं गदापरिघसंकुलम् ॥ १३ ॥
शक्तितोमरसंकीर्णं ध्वजमालासमाचितम्।
किङ्किणीजालसंयुक्तं शरासिप्राससंयुतम् ॥ १४ ॥
महाघोरं महारौद्रं युगान्तजलदोपमम्।
धनुर्गदासमाकीर्णं महावाद्योपमं महत् ॥ १५ ॥
अग्न्यर्कसदृशाकारं ययौ द्वारवतीमनु।
गृहीतदीपिको राजा वीर्यवान् बलवान् नृप ॥ १६ ॥
नरेश्वर ! पराक्रमी एवं बलवान् राजा पौण्ड्रक भी मशालें साथ लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थित हुआ। वह रथ नाना प्रकारके शस्त्रसमूहोंसे भरा हुआ था। पट्टिश, खड्ग, गदा और परिघोंसे परिपूर्ण था, शक्ति, तोमर, बाण, खड्ग और प्राससे सम्पन्न था, अनेकों ध्वज उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। घुँघरू लगी हुई झालरोंसे उस रथको सजाया गया था। उसमें धनुष और गदाएँ यथा-स्थान रखी गयी थीं। वह महाघोर महारौद्र विशाल रथ प्रलयकालीन मेघ एवं महावाद्यके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाला था। उसका स्वरूप अग्नि और सूर्यके तुल्य प्रकाशमान था ॥ १३–१६ ॥
हन्तुमैच्छज्जगन्नाथं वृष्णींश्चैव समन्ततः।
आकर्षन् बलमुख्यांस्तान् राज्ञः सर्वान् महाद्युतिः ॥ १७ ॥
पुरद्वारं समासाद्य बलं संस्थाप्य यत्नतः।
इदं प्रोवाच राजा तु नृपान् सर्वानवस्थितान् ॥ १८ ॥
महातेजस्वी राजा पौण्ड्रक जगदीश्वर श्रीकृष्णको तथा उनके चारों ओर खड़े होनेवाले वृष्णिवंशी वीरोंको मार डालना चाहता था। वह अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य सभी राजाओंको अपने साथ खींच ले गया और नगरद्वारपर पहुँचकर वहाँ सेनाको यत्नपूर्वक स्थापित करके सब ओर खड़े हुए समस्त नरेशोंसे इस प्रकार बोला— ॥ १७-१८ ॥
ताड्यतामत्र भेरी तु नाम विश्राव्य मामकम्।
युध्यतां युध्यतामत्र देयं वा प्रतिदीयताम् ॥ १९ ॥
आगतः पौण्ड्रको राजा युद्धार्थी वीर्यवत्तरः।
हन्तुकामः समग्रान् वै कृष्णबाहुबलाश्रयान् ॥ २० ॥
“वीरो ! रणभेरी बजाओ और मेरा नाम सुनाकर कहो—'यादवो ! यहाँ आकर युद्ध करो ! युद्ध करो !! अथवा देने योग्य राजकीय कर प्रदान करो। महान् पराक्रमी राजा पौण्ड्रक युद्धके लिये पधारे हैं और श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेनेवाले तुम समस्त यादवोंका वध करना चाहते हैं'” ॥ १९-२० ॥
इति ते प्रेषिताः सर्वे समीयुः सूचकान् बहून्।
दीपिकाश्च प्रदीव्यन्ते बह्वयः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥
इतश्चेतश्च राजानो युध्यन्ते युद्धलालसाः।
पुरीं ते पुरतस्तत्र क्षत्रियाः शस्त्रिणस्तदा ॥ २२ ॥
सिंहनादं प्रकुर्वन्तः शस्त्रधारासमाकुलाः।
कुतोऽयं वृष्णिप्रवरः कुतो राजा जगत्पतिः ॥ २३ ॥
कुतोऽयं सात्यकिर्वीरः कुतो हार्दिक्य एव च।
कुतो नु बलभद्रश्च सर्वयादवसत्तमः।
इत्येवं कथयन्तो वै राजानः सर्व एव ते ॥ २४ ॥
आदाय शस्त्राणि बहूनि सर्वतः
शरांश्च चापानि बहूनि सर्वे।
युद्धाय सन्नाहनिबद्धशो युयु-
र्हरेः पुरीं द्वारवतीं नृपोत्तमाः ॥ २५ ॥
इस प्रकार भेजे गये वे समस्त नरेश बहुसंख्यक सूचकों (बाहर-भीतरके वृत्तान्तको जाननेवाले यादव भटों) से मिले। उस समय बहुतेरी मशालें लाखोंकी संख्यामें जल रही थीं। युद्धकी लालसा रखनेवाले राजाओंने इधर-उधर युद्ध छेड़ दिया था। वहाँ पुरीके द्वारपर शस्त्रधारी क्षत्रिय सिंहनाद करते हुए शस्त्रोंकी धारा बरसा रहे थे और कहते थे 'कहाँ है वृष्णिवंशका श्रेष्ठ वीर ? कहाँ है राजा जगदीश्वर ? कहाँ है यह वीर सात्यकि ? कहाँ है कृतवर्मा और कहाँ है सर्वयादवशिरोमणि बलभद्र ?' ऐसा कहते हुए वे समस्त श्रेष्ठ राजा सब ओरसे बहुतेरे अस्त्र-शस्त्र, बाण और बहुसंख्यक धनुष ले युद्धके लिये कमर कसकर श्रीहरिकी द्वारकापुरीपर धावा बोलने लगे ॥ २१–२५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकस्य द्वारकागमने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकका द्वारकापर आक्रमणविषयक तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
चतुर्नवतितमोऽध्यायः
यादववीरोंद्वारा पौण्ड्रककी सेनाका और एकलव्यद्वारा यादवसेनाका संहार
वैशम्पायन उवाच
ततश्च यादवाः सर्वे दृष्ट्वा सैनिकसंचयम्।
रात्रौ च व्यसनं प्राप्तं महाशस्त्रसमाकुलम् ॥ १ ॥
महावातसमुद्भूतं कल्पान्ते सागरोपमम्।
संनद्धाः समपद्यन्त शस्त्रिणो युद्धलालसाः ॥ २ ॥
गृहीतदीपिकाः सर्वे यादवाः शस्त्रयोधिनः।
भविष्यपर्व ] चतुर्नवतितमोऽध्यायः [ १०२५
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर समस्त यादवोंने देखा कि शत्रुसैनिकोंका बड़ा भारी जमाव हो रहा है। वे सब-के-सब महान् अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हैं और प्रचण्ड वायुसे उमड़े हुए प्रलयकालके समुद्रकी भाँति दिखायी देते हैं। विशेषतः रात्रिके समय यह महान् संकट प्राप्त हुआ है। यह देख और सोचकर वे समस्त यादव युद्धकी लालसासे अस्त्र-शस्त्र लेकर कमर कसकर तैयार हो गये। उन सभी शस्त्रयोधी यादवोंने अपने हाथोंमें मशालें ले रखी थीं ॥ १-२ ॥
सात्यकिर्बलभद्रश्च हार्दिक्यो निशठस्तथा ॥ ३ ॥
उद्धवोऽथ महाबुद्धिरुग्रसेनो महाबलः ।
अन्ये च यादवाः सर्वे कवचप्रग्रहे रताः ॥ ४ ॥
सात्यकि, बलभद्र, हार्दिक्य (कृतवर्मा), निशठ, परम बुद्धिमान् उद्धव, महाबली उग्रसेन तथा अन्य सब यादववीर कवच बाँधने लगे ॥ ३-४ ॥
समस्तयुद्धकुशला रात्रौ सन्नाहयोधिनः ।
शस्त्रिणः खड्गिनश्चैव सर्वे शस्त्रसमाकुलाः ॥ ५ ॥
ये सब-के-सब सम्पूर्ण युद्धोंमें कुशल, रातमें भी कमर कसकर जूझनेवाले, शस्त्रधारी और खड्गधारी थे। सभी सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे ॥ ५ ॥
युद्धाय समपद्यन्त बहवो बाहुशालिनः ।
रथिनो गजिनश्चैव सादिनः सायुधास्तथा ॥ ६ ॥
वे बहुसंख्यक बाहुशाली वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये। उनके साथ रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और शस्त्रधारी पैदल योद्धा भी थे ॥ ६ ॥
नित्ययुक्ता महात्मानो धन्विनः पुरुषोत्तमाः ।
निर्ययुर्नगरात् तूर्णं दीपिकाभिः समन्ततः ॥ ७ ॥
वे नित्य उद्यत रहनेवाले, महामनस्वी, धनुर्धर, पुरुषप्रवर वीर सब ओरसे मशालोंके साथ तुरंत नगरसे बाहर निकले ॥ ७ ॥
कुतः पौण्ड्रक इत्येवं वदन्तः सर्वसात्वताः ।
दीपिकादीपितो देशो निस्तमाः समपद्यत ॥ ८ ॥
वे समस्त यादव यह कहते हुए निकले कि 'कहाँ है पौण्ड्रक?' मशालोंसे प्रकाशित हुआ वह देश सर्वथा अन्धकाररहित हो गया ॥ ८ ॥
ततो वितिमिरो देशः समन्तात् प्रत्यपद्यत ।
युद्धं समभवद् घोरं वृष्णिभिः शत्रुभिः सह ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् वह स्थान सब ओरसे अन्धकारशून्य हो गया। उस समय वहाँ शत्रुओंके साथ वृष्णिवंशियोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥
ततो महान् समभवत् संनादो रोमहर्षणः ।
हया हयैः समायुक्ताः गजाश्च गजयूथपैः ॥ १० ॥
रथा रथैः समायुक्ताः सादिभिः सादिनस्तथा ।
फिर तो महान् कोलाहल होने लगा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। घोड़े घोड़ोंसे, गजराज गजराजोंसे, रथ रथोंसे और सवार सवारोंसे भिड़ गये ॥ १० ॥
खड्गिनः खड्गिभिः सार्धं गदिभिर्गदिनस्तथा ॥ ११ ॥
परस्परव्यतीकारो रण आसीत् सुदारुणः ।
महाप्रलयसंक्षोभः शब्दस्तेषां महात्मनाम् ॥ १२ ॥
खड्गधारी वीर खड्गधारियोंसे और गदाधारी गदाधारियोंसे लड़ने लगे। उस रणभूमिमें उभयपक्षके सैनिकोंका परस्पर बड़ा भयंकर बोल-मेल हो गया। उन महामनस्वी वीरोंके गर्जन-तर्जनका शब्द महाप्रलयके समय उमड़े हुए समुद्रोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ११-१२ ॥
धावन्तः प्रहरन्त्येतान् घ्नन्त्येतान् सर्वतो नृपान् ।
अयमेष महाबाहुः खड्गी पतति वीर्यवान् ॥ १३ ॥
अयमेष शरो घोरो वर्ततेऽतिसुदारुणः ।
गदी चायं महावीर्यः सर्वान् नो बाधते नृपः ॥ १४ ॥
दोनों ओरके योद्धा धावा करके विपक्षी सैनिकोंपर प्रहार करते और इन समस्त नरेशोंको घायल करते थे। (वहाँ आपसमें इस प्रकारकी चर्चाएँ होती थीं) 'यह खड्गधारी महाबाहु पराक्रमी वीर धराशायी हो रहा है। यह अत्यन्त दारुण बाण बड़ा ही भयंकर है। यह गदाधारी महापराक्रमी नरेश हम सब लोगोंको पीड़ा दे रहा है ॥ १३-१४ ॥
अयं रथी शरी चापी गदी तूणी तनुत्रवान् ।
पट्टिशी सर्वतो याति कुन्तपाणिरयं बली ॥ १५ ॥
'यह धनुष, बाण, गदा, तरकस, कवच, पट्टिश और कुन्त धारण करनेवाला बलवान् रथी वीर रणभूमिमें सब ओर विचर रहा है ॥ १५ ॥
अयमत्र महाशूली संश्रितः सर्वतो दिशम् ।
गजोऽयं सविषाणाग्रो वर्तते सर्वतः प्रति ॥ १६ ॥
'यह महाशूलधारी योद्धा यहाँ सारी दिशाओंमें चक्कर लगाता है। यह हाथी अपने दाँतोंका अग्रभाग सामने किये सब ओर दौड़ लगाता है' ॥ १६ ॥
अतिसर्वव्रगः शूरो वेगवान् वातसंनिभः ।
शराञ्छरैः समाहन्ति दण्डान् दण्डैर्जगत्पते ॥ १७ ॥
राजन् ! कोई-कोई वेगशाली शूरवीर वायुके समान अत्यन्त तीव्र गतिसे सर्वत्र जा पहुँचता और अपने बाणोंसे शत्रुओंके बाणोंका तथा दण्डोंसे उनके दण्डोंका नाश कर देता था ॥ १७ ॥
कुन्तान् कुन्तैः समाजघ्नुर्गदाभिश्च गदास्तथा ।
परिघान् परिधैः सार्धं शूलाञ्छूलैः समन्ततः ॥ १८ ॥
कितने ही योद्धा कुन्तों (भालों) से कुन्तोंका, गदाओंसे
म० १० ३३-
| १०२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
गदाओंका, परिघोंसे परिघोंका, साथ ही सब ओर शूलोंसे शूलोंका उच्छेद कर डालते थे ॥ १८ ॥
एवं तेषां महाराज कुर्वतां रणमुत्तमम् ।
संग्रामः सुमहानासीच्छब्दश्चापि महानभूत् ॥ १९ ॥
महाराज जनमेजय ! इस प्रकार उत्तम युद्ध करते हुए उन योद्धाओंमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया और महान् कोलाहल होने लगा ॥ १९ ॥
भूतानि सुबहून्याजौ शब्दवन्ति महान्ति च ।
प्रादुरासंन् सहस्राणि शङ्खानां भीमनिःस्वनः ॥ २० ॥
उस युद्धस्थलमें बहुत-से बड़े-बड़े प्राणी भाँति-भाँतिके शब्द करते हुए सहस्रोंकी संख्यामें प्रकट हो गये। वहाँ होने-वाली शङ्खोंकी ध्वनि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी ॥ २० ॥
रात्रौ प्रादुरभूच्छब्दः संग्रामे रोमहर्षणः ।
वर्तमाने महायुद्धे वृष्णीनां चैव तैः सह ॥ २१ ॥
केचिद् ग्रस्ताः समापेतुः पृथिव्यां पृथिवीक्षितः ।
रात्रिमें उस संग्रामके भीतर बड़ा रोमाञ्चकारी शब्द प्रकट होने लगा। शत्रुओंके साथ होनेवाले वृष्णिवंशियोंके उस महायुद्धमें कितने ही भूपाल कालके ग्रास बनकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २१३ ॥
केचिच्च पतिताः श्लिष्टाः विप्रकीर्णशिरोरुहाः ॥ २२ ॥
पेतुरुर्व्यां महावीर्या राजानः शस्त्रपाणयः ।
कितने ही महापराक्रमी राजा हाथमें शस्त्र लिये ही एक दूसरेसे सटे हुए गिरते और सिरके बाल बिखेरे धराशायी हो जाते थे ॥ २२३ ॥
केचित् तु भिन्नवर्माणः समापेतुः सहस्रधा ॥ २३ ॥
परस्परं समाश्रित्य परस्परवधैषिणः ।
न्यस्तशस्त्रा महात्मानः समन्तात् क्षतविग्रहाः ॥ २४ ॥
पेतुर्गतासवः केचिद् यमराष्ट्रविवर्धनाः ।
एवं ते निहता राजन् योधिनः सर्व एव तु ॥ २५ ॥
कितने ही योद्धा कवच विदीर्ण हो जानेके कारण सहस्रों टुकड़े होकर गिर पड़ते थे। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले कितने ही महामनस्वी योद्धा परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करके सब ओरसे शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेपर प्राणशून्य होकर गिर पड़ते और यमराजके राष्ट्रकी वृद्धि करते थे। राजन् ! इस प्रकार युद्धमें भाग लेनेवाले वे सब नरेश वहाँ मारे गये ॥ २३-२५ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शूर एकलव्यो निषादपः ।
धनुर्गृह्य महाघोरं कालान्तकयमोपमः ॥ २६ ॥
शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामास यादवान् ।
इसी बीचमें निषादोंका अधिपति शूरवीर एकलव्य, जो काल, अन्तक और यमके समान भयंकर था, महाघोर धनुष लेकर सहस्रों बाणोंद्वारा यादवोंको पीड़ा देने लगा ॥ २६३ ॥
परःशतैः शराणां तु निशितैर्मर्मभेदिभिः ॥ २७ ॥
वृष्णीनां च बलं सर्वं पोथयामास सर्वतः ।
युध्यतः शस्त्रपाणींश्च क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान् ॥ २८ ॥
उसने सैकड़ों तीखे और मर्मभेदी बाणोंसे वृष्णिवंशियोंकी सारी सेनाको मार गिराया। हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर जूझनेवाले अत्यन्त बलशाली क्षत्रियोंको भी धराशायी कर दिया ॥ २७-२८ ॥
निशठं पञ्चविंशत्या शराणां नतपर्वणाम् ।
सारणं दशभिर्विद्ध्वा हार्दिक्यं पञ्चभिः शरैः ॥ २९ ॥
उग्रसेनं नवत्याशु वसुदेवं च सप्तभिः ।
उद्धवं दशभिश्चैव ह्यक्रूरं पञ्चभिः शरैः ॥ ३० ॥
उसने झुकी हुई गाँठवाले पचीस बाणोंसे निशठको, दस बाणोंसे सारणको, पाँचसे कृतवर्माको, नब्बे बाणोंसे उग्रसेनको तथा सात सायकोंद्वारा वसुदेवको भी उग्रतापूर्वक घायल करके दस बाणोंसे उद्धवको और पाँच सायकोंसे अक्रूरको भी बींध डाला ॥ २९-३० ॥
एवमेकैकशः सर्वे निहता निशितैः शरैः ।
विद्राव्य यादवीं सेनां नाम विश्राव्य वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
इस प्रकार एक-एक करके उस पराक्रमी वीरने तीखे बाणोंद्वारा सभी यादव-वीरोंको घायल कर दिया तथा यादवी सेनाको भगाकर वह अपना नाम सुनाते हुए इस प्रकार कहने लगा— ॥ ३१ ॥
एकलव्यो यदुवृषान् वीर्यवान् वलवानहम् ।
इदानीं सात्यकिर्वीरः क्व यास्यति महाबलः ॥ ३२ ॥
मदमत्तो हली साक्षात् क्व यातीह गदाधरः ।
इत्याह सिंहनादेन सिंहान् विस्त्रापयन्निव ॥ ३३ ॥
'मैं बलवान् एवं पराक्रमी वीर एकलव्य हूँ। इस समय महाबली वीर सात्यकि मुझसे बचकर कहाँ जायँगे ? बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाले साक्षात् हलधर हाथमें गदा लिये कहाँ जा रहे हैं ?' इस प्रकार वह यदुकुलके श्रेष्ठ वीरोंको ललकार कर कहता और अपने सिंहनादसे सिंहोंको भी विस्मित-सा किये देता था ॥ ३२-३३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकवधे रात्रियुद्धे चतुर्र्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रकवधके प्रसङ्गमें रात्रिकालका युद्धविषयक चौरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
भविष्यपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः १०३७
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
पौण्ड्रकद्वारा पूर्वद्वारके परकोटोंको तोड़नेका प्रयत्न, सात्यकि आदि यादववीरोंका रक्षाके लिये पहुँचना, सात्यकिका वायव्यास्त्रद्वारा पौण्ड्रकसैनिकोंको भगाकर पौण्ड्रकको युद्धके लिये ललकारना और पौण्ड्रककी गर्वोक्ति
वैशम्पायन उवाच
निवृत्तेष्वथ सैन्येषु वृष्णिवीरेषु चैव हि।
भीतेष्वथ महाराज हतेषु युधि सर्वतः॥ १ ॥
दीपिकासु प्रशान्तासु निःशब्दे सति सर्वतः।
जितमित्येव यन्मत्वा वृष्णीनां बलमुत्तमम्॥ २ ॥
ततः पौण्ड्रो महावीर्यो बभाषे सैनिकान् स्वकान्।
शीघ्रं गच्छत राजेन्द्राइङ्कैः कुन्तैः पुरीमिमाम्॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! जब यादवोंकी सारी सेना और वृष्णिवंशी वीर युद्धमें घायल और भयभीत होकर सब ओरसे लौट गये, सारी मशालें बुझ गयीं और चारों ओर सन्नाटा छा गया, तब यह समझकर कि वृष्णिवंशियोंकी उत्तम सेना पराजित हो गयी, महापराक्रमी पौण्ड्रक अपने सैनिकोंसे बोला—'राजेन्द्रगण! शीघ्र जाओ और टक्कों तथा कुन्तोंसे इस पुरीको खोद डालो॥ १—३ ॥'
कुठारैः कुन्तलैश्चैव पाषाणैः सर्वतोदिशम्।
कर्षणस्थैः सुपाषाणैः सर्वतो यात भूमिपाः॥ ४ ॥
'भूमिपालो! कुठार, कुन्तल (हल), पाषाण तथा पत्थर फेंकनेवाले यन्त्रोंपर रखे गये बड़े-बड़े प्रस्तर-खण्ड लेकर इस पुरीके चारों ओर चले जाओ॥ ४ ॥'
भिद्यन्तां प्राकारचयाः प्रासादाश्च समन्ततः।
गृह्णन्तां कन्यकाः सर्वा दास्यश्चैव समन्ततः॥ ५ ॥
'इस पुरीके परकोटे विदीर्ण कर डालो, महलोंको भी सब ओरसे गिरा दो, समस्त यादव कन्याओं और दासियोंको भी अपने अधिकारमें कर लो॥ ५ ॥'
गृह्णन्तां वसुमुख्यानि धनानि सुवहून्यथ।
ते तथेति महात्मानो राजानः सर्व एव तु॥ ६ ॥
कुठारैः सर्वतश्चैव चिच्छिदुः पौण्ड्रकाज्ञया।
प्राकारांश्चैव सर्वत्र प्रासादान् नरसंचयान्॥ ७ ॥
'मुख्य-मुख्य रत्न और बहुत सी धनराशियोंको लूट लो।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सभी महामनस्वी नरेश पौण्ड्रककी आज्ञासे कुठारोंद्वारा सब ओरसे पुरीके परकोटोंको तथा सब ओर मनुष्योंके समुदायसे भरे हुए महलोंको छिन्न-भिन्न करने लगे॥ ६-७ ॥
अथ तत्र महाशब्दः प्रादुरासीत् समन्ततः।
टङ्केषु पात्यमानेषु प्राकारेषु महाबलैः॥ ८ ॥
उन महाबली वीरोंद्वारा जब परकोटोंपर टङ्क गिराये जाने लगे, उस समय चारों ओर बड़ा भारी शब्द होने लगा॥ ८ ॥
पूर्वद्वारे महाराज भित्त्वाः प्राकारसंचयाः।
श्रुत्वा शब्दं महाघोरं सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः॥ ९ ॥
महाराज! पूर्वद्वारपर जो बहुत-से परकोटे थे, वे प्रायः विदीर्ण कर दिये गये। परकोटोंके गिराये जानेका महाभयंकर शब्द सुनकर सात्यकि क्रोधसे मूर्छित हो गये॥ ९ ॥
मयि सर्वं समारोप्य केशवो यादवेश्वरः।
गतः कैलासशिखरं द्रष्टुं शंकरमव्ययम्॥ १० ॥
अवश्यं हि मया रक्ष्या पुरी द्वारवती त्वियम्।
इति संचिन्त्य मनसा धनुरादाय सत्वरम्॥ ११ ॥
रथं महान्तमारुह्य दारुकस्य महात्मनः।
पुत्रेण संस्कृतं घोरं यन्ता च स्वयमेव हि॥ १२ ॥
उन्होंने सोचा—'यदुनाथ केशव इस पुरीकी रक्षाका सारा भार मुझपर ही रखकर अविनाशी भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कैलासपर्वतके शिखरपर गये हैं। अतः इस समय इस द्वारकापुरीकी रक्षा मुझे अवश्य करनी चाहिये। मन-ही-मन ऐसा सोचकर वे तुरंत धनुष लेकर एक विशाल एवं भयंकर रथपर आरूढ हुए, जिसे महात्मा दारुकके पुत्रने सजाया था और वह स्वयं ही उसका सारथि बना था॥ १०—१२ ॥'
धनुर्महत् तदादाय शरांश्चाशीविषोपमान्।
आमुच्य कवचं घोरं शस्त्रसम्पातदुःसहम्॥ १३ ॥
अङ्गदी कुण्डली तूणी शरी चापी गदासिमान्।
ययौ युद्धाय शैनेयः संस्मरन् केशवं वचः॥ १४ ॥
वे वह विशाल धनुष और विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण लेकर शस्त्रोंका प्रहार जिसकी टंकारको कठिनतासे सह सके ऐसे भयंकर कवचको धारण करके बाजूबंद, कुण्डल, तरकस, बाण, धनुष, गदा और खड्गसे संयुक्त हो सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंको स्मरण करते हुए युद्धके लिये चल दिये॥ १३-१४ ॥
दीपिकादीपिते देशे ययौ सात्यकिरुत्तमः।
तथैव बलदेवोऽपि रथमारुह्य भास्वरम्॥ १५ ॥
गदी शरी महावीर्यः प्रायाद् रणचिकीर्षया।
सिंहनादं प्रकुर्वन्तो मुञ्चन्तो भैरवं रवम्॥ १६ ॥
जो स्थान मशालोंसे प्रकाशित था, वहीं उत्तम वीर
१०२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सात्यकि गये। उसी प्रकार महापराक्रमी बलदेव भी युद्ध करनेकी इच्छासे गदा और धनुष-बाण ले तेजस्वी रथपर आरूढ हो वहाँ तीव्र गतिसे गये। उनके साथके सभी सैनिक भयंकर सिंहनाद करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ १५-१६॥
उद्धवोऽपि बली साक्षाद्गजमारुह्य सत्वरम्।
मत्तं महारवं घोरं संग्रामे नीतिमत्तरः॥ १७॥
ययौ नीतिं विचिन्वानः परां प्रीतिं महाबलः।
अन्ये च वृष्णयः सर्वे ययुः संग्रामलालसाः॥ १८॥
नीतिमानोंमें श्रेष्ठ, महापराक्रमी बलवान् उद्धव भी उत्तम नीति और प्रीतिका अनुसंधान करते हुए महान् गर्जन करनेवाले भयंकर मतवाले हाथीपर आरूढ़ हो तुरंत ही संग्रामभूमिकी ओर चल दिये। अन्य सब वृष्णिवंशी योद्धा भी संग्रामकी लालसा लेकर वहाँ गये॥ १७-१८॥
रथान् गजान् समारुह्य हार्दिक्यप्रमुखस्तथा।
दीपिकाभिश्च सर्वत्र पुरोवृत्ताभिरीश्वराः॥ १९॥
सिंहनादं प्रकुर्वन्तः स्मरन्तः केशवं वचः।
कृतवर्मा आदि प्रधान-प्रधान सामर्थ्यशाली योद्धा भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंका स्मरण करके रथों और हाथियोंपर आरूढ़ हो सर्वत्र अपने आगे मशालोंको जलवाकर सिंहनाद करते हुए चले॥ १९ १/२॥
पूर्वद्वारं समागम्य वृष्णयो युद्धलालसाः॥ २०॥
ते समेत्य यथायोगं स्थितास्तत्र महाबलाः।
पूर्वद्वारपर आकर युद्धकी इच्छावाले महाबली वृष्णिवंशी योद्धा यथायोग्य एक दूसरेसे मिलकर युद्धकी लालसासे वहाँ डट गये॥ २० १/२॥
स्थिते सैन्ये महाघोरे दीपिकादीपिते पथि॥ २१॥
शिनिर्वीरः शरी चापी गदी तूणीरवान् विभो।
वायव्यास्त्रं समादाय योजयित्वा महाशरम्॥ २२॥
आकर्णं तूर्णमाकृष्य धनुःप्रवरमुत्तमम्।
मुमोच परसैन्येषु शिनिर्वीरः प्रतापवान्॥ २३॥
राजन्! मशालोंसे प्रकाशित हुए पथपर जब वह महाभयंकर सेना खड़ी हो गयी, तब धनुष, बाण, तरकस और गदासे युक्त हो वीरवर प्रतापी सात्यकिने वायव्यास्त्र लेकर उसके द्वारा अपने महान् बाणको संयुक्त करके उस उत्तम एवं श्रेष्ठ धनुषको पूरे कानतक खींचकर वह अस्त्र शत्रुओंकी सेनापर छोड़ दिया॥ २१—२३॥
वायव्यास्त्रेण ते सर्वे तत्रस्था नरसत्तमाः।
विजिता ह्यस्त्रवीर्येण यत्र तिष्ठति पौण्ड्रकः॥ २४॥
वहाँ खड़े हुए शत्रुपक्षके सभी श्रेष्ठ योद्धा वायव्यास्त्रसे पीड़ित हो उस अस्त्रकी शक्तिसे पराजित हो वहीं जा पहुँचे, जहाँ पौण्ड्रक खड़ा था॥ २४॥
तत्र गत्वा स्थिताः सर्वे निर्धूता वातरंहसा।
यत्र पूर्वे स्थिताः सर्वे विद्रुता राजसत्तमाः॥ २५॥
वायुके वेगसे कम्पित हो वे सभी श्रेष्ठ नरेश भागकर उसी स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ पहले खड़े थे॥ २५॥
तत्र स्थित्वा च शैनेयः शरमादाय सत्वरम्।
निशितं सर्पभोगाभं चभाषे सात्यकिस्तदा॥ २६॥
पूर्वद्वारपर खड़े हुए शिनिवंशी सात्यकि तुरंत ही एक सर्पाकार तीखा बाण ले बोले—॥२६॥
क्क इदानीं महाबुद्धिः पौण्ड्रको राजसत्तमः।
स्थितोऽस्मि व्यवसायेन शरी चापी महाबलः॥ २७॥
यदि द्रष्टा दुरात्मानं ततो हन्ता नृपाधमम्।
भृत्योऽस्मि केशवस्याहं जिघांसुः पौण्ड्रकं स्थितः॥२८॥
'राजाओंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् पौण्ड्रक इस समय कहाँ है? मैं महाबली सात्यकि धनुष-बाण लेकर उसके साथ युद्धके निश्चयसे यहाँ खड़ा हूँ। यदि उस दुरात्मा नीच नरेशको मैं देख लूँगा तो बिना मारे नहीं रहूँगा। मैं भगवान् श्रीकृष्णका सेवक हूँ और पौण्ड्रकका वध करनेके लिये यहाँ खड़ा हूँ॥ २७-२८॥
छित्त्वा शिरस्तु तस्यास्य सर्वक्षत्रस्य पश्यतः।
बलिं दास्यामि गृध्रेभ्यः श्वभ्यश्चैव दुरात्मनः॥ २९॥
'मैं समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उस दुरात्माका सिर काटकर गीधों और कुत्तोंको उसकी बलि दे दूँगा॥ २९॥
को नाम ईदृशं कर्म चौरवच्च समाचरेत्।
सुप्तेषु निशि सर्वत्र यादवेषु महात्मसु॥ ३०॥
चौरोऽयं सर्वथा राजा न हि राजा बलान्वितः।
यदि शक्तो न कुर्याच्च चौर्यमेवं नृपाधमः॥ ३१॥
'रातमें जब सर्वत्र महात्मा यादव सो रहे हों, कौन श्रेष्ठ पुरुष इस तरह चोरकी भाँति जघन्य कर्म कर सकता है? यह बलवान् राजा नहीं, सर्वथा चोर है। यदि इस नीच नरेशमें शक्ति होती तो यह इस तरह चोरी न करता॥३०-३१॥
अहोऽस्य बलिनो राज्ञश्चौरकार्यं प्रकुर्वतः।
सर्वथाऽऽगमनं तस्य न हि पश्यामि साम्प्रतम्॥ ३२॥
'अहो! चोरका काम करनेवाले इस बलवान् राजाका मेरे सामने किसी तरह आगमन नहीं हो रहा है। मैं उस चोरको इस समय देख नहीं पा रहा हूँ'॥ ३२॥
इत्युक्त्वा सात्यकिर्वीरः प्रजहास महाबलः।
विस्फार्य सुदृढं चापं संदधे कार्मुके शरम्॥ ३३॥
ऐसा कहकर महाबली वीर सात्यकि जोर-जोरसे हँसने लगे। उन्होंने अपने सुदृढ़ धनुषको कानतक खींचकर उसपर बाणका संधान किया॥ ३३॥
| भविष्यपर्व ] | षण्णवतितमोऽध्यायः | १०२९ |
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आकर्ण्य वचनं वीरः सात्यकेस्तस्य धीमतः।
क्व नु कृष्णः क्व गोपालः कुतः सोऽथ प्रवर्तते ॥ ३४ ॥
स्त्रीहन्ता पशुहन्ता च क्व च स्वामीति सेवितः।
स इदानीं क्व वर्तत गृहीत्वा मम नाम तत् ॥ ३५ ॥
बुद्धिमान् वीर सात्यकिका यह वचन सुनकर वीर पौण्ड्रक बोल उठा—'कहाँ है कृष्ण ! कहाँ है वह ग्वाला ? स्त्री और पशुकी हत्या करनेवाला कृष्ण इस समय कहाँ है ? जो यहाँ स्वामी बनकर सेवा लेता है, वह मेरा शत्रु कहाँ है ? मेरा नाम ग्रहण करके वह अब कहाँ छिपा हुआ है ? ॥ ३४-३५ ॥
हन्ता सख्युर्महावीर्यो नरकस्य महात्मनः।
ममैव तात युद्धेऽस्मिन् हते तस्मिन् दुरात्मनि ॥ ३६ ॥
'उसने मेरे ही मित्र महात्मा नरकासुरका वध किया है, इसीलिये वह महापराक्रमी बना फिरता है। तात ! इस युद्धमें उस दुरात्माके मारे जानेपर मेरा क्रोध शान्त होगा ॥
गच्छ त्वं कामतो वीर योद्धुं न क्षमते भवान्।
अथवा तिष्ठ किंचित्तु ततो द्रक्ष्यसि मे बलम् ॥ ३७ ॥
'वीर ! तुम इच्छानुसार लौट जाओ। तुममें मेरे साथ युद्ध करनेकी क्षमता नहीं है। अथवा थोड़ी देर ठहर जाओ, फिर स्वयं ही मेरा बल देख लोगे ॥ ३७ ॥
शिरस्ते पातयिष्यामि शरैर्घोरैर्दुरासदैः।
हतस्य तव वीरेह भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ३८ ॥
'वीर ! मैं भयंकर दुर्जय बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर काट गिराऊँगा ! इस रणभूमिमें मेरेद्वारा मारे जानेपर यहाँकी भूमि तुम्हारा रक्तपान करेगी ॥ ३८ ॥
श्रोष्यते स तथा गोपो हतः सात्यकिरित्यपि।
यो गर्वस्तस्य गोपस्य सर्वदा वर्तते महान् ॥ ३९ ॥
विनश्यति स तु क्षिप्रं हते त्वयि यदूत्तम ।
'वह ग्वाला भी सुन लेगा कि सात्यकि मारा गया। यदुश्रेष्ठ ! उस गोपको जो सदा महान् गर्व बना रहता है, वह तुम्हारे मारे जानेपर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा ॥ ३९॥
त्वयि रक्षां समादिश्य गोपः कैलासपर्वतम् ॥ ४० ॥
गत इत्येवमस्माभिः श्रुतं पूर्वे महामते।
'महामते ! हमलोगोंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वह गोप तुम्हारे ऊपर नगरकी रक्षाका भार रखकर कैलास-पर्वतपर गया है ॥ ४०॥
शरं गृहाण निशितं यदि शक्तोऽसि सात्यके।
इत्युक्त्वा बाणमादाय ययौ योद्धुं व्यवस्थितः॥ ४१ ॥
'सात्यके ! यदि तुममें शक्ति हो तो कोई तीखा बाण हाथमें लो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण लेकर आगे बढ़ा और युद्धके लिये डट गया ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकवधे रात्रियुद्धे सात्यकिपौण्ड्रकभाषणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक-वधके प्रसंगमें रात्रियुद्धके समय सात्यकि और पौण्ड्रकका संवादविषयक पंचानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥
षण्णवतितमोऽध्यायः
पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो महाराज सात्यकिर्वृष्णिपुङ्गवः।
उवाच वचनं राजन् वासुदेवं स्मरन्निव ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! तदनन्तर वृष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिने कुपित होकर भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए-से इस प्रकार कहा—॥
अवोचदीदृशं वाक्यं वासुदेवं नृपाधमः।
को नाम जगतां नाथमित्थं ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥ २ ॥
'पौण्ड्रक ! तू राजाओंमे अधम है। इसीलिये भगवान् वासुदेवके प्रति तूने ऐसी बात कह डाली है। अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन ऐसा पुरुष होगा, जो जगन्नाथ श्रीकृष्णके प्रति ऐसी बात कह सकेगा ? ॥ २ ॥
मृत्युस्त्वां सर्वथा याति वदन्तं तादृशं वचः।
जिह्वा ते शतधा दीर्याद् वदतस्तादृशं वचः ॥ ३ ॥
'वैसी कठोर बात कहते हुए तेरे पीछे-पीछे सर्वथा मृत्यु चल रही है। इस तरहकी अनुचित बात कहते समय तेरी जिह्वाके सौ-सौ टुकड़े हो जाने चाहिये ॥ ३ ॥
एष ते पातयिष्यामि शिरः कायाच्च पौण्ड्रक।
यन्नाम वासुदेवेति तव सम्प्रति वर्तते ॥ ४ ॥
यावत् पतति कायात् ते शिरस्तावत् प्रवर्तते।
स एव श्वो न भगवान् वासुदेवो भविष्यसि ॥ ५ ॥
'पौण्ड्रक ! मैं अभी तेरा सिर धड़से काट गिराऊँगा। इस समय जिनका वासुदेव नाम तेरे साथ जुड़ा हुआ है, वह तभीतक है, जबतक कि धड़से तेरा सिर नीचे नहीं गिर जाता। अब कलसे तू भगवान् वासुदेव नहीं रह जायगा (कालका ग्रास बन जायगा) ॥ ४-५ ॥
एक एव जगन्नाथः कर्ता सर्वस्य सर्वगः।
दुरात्मन् सर्वथा देवो भविष्यति न संशयः॥ ६ ॥
१०३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'दुरात्मन् ! जो सबके कर्ता और सर्वव्यापी हैं, वे एकमात्र जगदीश्वर श्रीकृष्ण ही सर्वथा वासुदेव बने रहेंगे- इसमें संशय नहीं है ॥ ६॥
एष तेऽहं शिरः कायात् पातयिष्यामि राजक ।
यदसौ भगवान् विष्णुर्नागमिष्यति साम्प्रतम् ॥ ७॥
अस्त्रवीर्यं बलं चैव सर्वं दर्शय साम्प्रतम् ।
नातः परतरं राजन् वीर्यं च तव वर्तते ॥ ८ ॥
'तुच्छ नरेश ! मैं अभी तेरे मस्तकको शरीरसे काट गिराता हूँ । इस समय वे भगवान् श्रीकृष्ण जबतक लौटकर नहीं आ जाते, तबतक ही तू अपना सारा अस्त्रबल और पराक्रम दिखा ले । राजन् ! इससे बढ़कर तुझे अपने बल-पराक्रमको प्रकट करनेका अवसर नहीं मिलेगा ॥ ७-८ ॥
सर्वं दर्शय यत्नेन स्थितोऽस्मि व्यवसायवान् ।
शरी चापी गदी खड्गी सर्वथाहमुपस्थितः ॥ ९ ॥
'मैं युद्धका निश्चय लेकर खड़ा हूँ । तू यत्नपूर्वक अपनी सारी शक्ति दिखा । मैं धनुष, बाण, गदा और खड्गसे युक्त हो सर्वदा तेरा सामना करनेके लिये उपस्थित हूँ ॥ ९ ॥
नैतन्नगरमायासीः सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ।
सर्वथा कृतकृत्योऽस्मि दृष्ट्वा त्वां वासुदेवकम् ॥ १० ॥
'मैं सच कहता हूँ, तू आजसे पहले इस नगरमें नहीं आया था । तुझ-जैसे वासुदेवके पुतलेको देखकर मैं कृतकृत्य हो गया हूँ ॥ १० ॥
तवाहं तिलशः कृत्वा श्वभ्यो दास्यामि राजक ।
इत्युक्त्वा बाणमादाय वासुदेवं महाबलः ॥ ११ ॥
आकर्णपूर्णमाकृष्य विव्याध निशितं शरम् ।
'अधम नरेश ! तेरे शरीरके तिलके बराबर टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तोंको बाँट दूँगा । वासुदेव नामधारी पौण्ड्रकसे ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने एक तीखा बाण लेकर उसे कान-तक खींचकर छोड़ा और पौण्ड्रकको घायल कर दिया ॥
स तेन विद्धो यदुना वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १२ ॥
वमञ्छोणितमत्युष्णमङ्गानेत्रान्नृपोत्तम ।
नृपश्रेष्ठ ! यदुवंशी वीर सात्यकिके द्वारा बाणसे घायल किये जानेपर प्रतापी वीर वासुदेव अपने अङ्गों और नेत्रोंसे अत्यन्त गरम-गरम रक्त बहाने लगा ॥ १२३ ॥
ततश्चुक्रोध नृपतिर्वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १३ ॥
नवभिर्दशभिश्चैव शरैः संनतपर्वभिः ।
विव्याध सात्यकिं राजा नदंश्च बहुधा किल ॥ १४ ॥
तब प्रतापी राजा वासुदेव भी कुपित हो उठा । उसने बारंबार सिंहनाद करते हुए झुकी हुई गाँठवाले नौ-दस बाणोंसे सात्यकिको घायल कर दिया ॥ १३-१४ ॥
ततो नाराचमादाय निशितं यमसंनिभम् ।
धनुराकृष्य भगवान् वासुदेवो नृपोत्तम ॥ १५ ॥
विव्याध सात्यकिं भूयो निशि प्रह्लादयन् स्वकान् ।
नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् तथाकथित भगवान् वासुदेव पौण्ड्रकने धनुष खींचकर उसपर यमराजके समान भयंकर तीखे नाराचका संधान किया और उस रातमें अपने सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः सात्यकिको घायल कर दिया ॥ १५३ ॥
नाराचेन समाविद्धः सात्यकिः सत्यसङ्गरः ॥ १६ ॥
ललाटे सुदृढं वीरो वृष्णीनामग्रणीस्तदा ।
निपसाद रथोपस्थे निश्चेष्ट इव सत्तमः ॥ १७ ॥
ललाटमें उस नाराचकी गहरी चोट खाकर वृष्णिवंशके अग्रगण्य वीर सत्यप्रतिज्ञ सात्यकि, जो सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे, अपने रथके पिछले भागमें निश्चेष्टकी भाँति बैठ गये ॥
ततः स पौण्ड्रको राजा विद्ध्वा दशभिराशुगैः ।
सारथिं पञ्चविंशत्या हयांश्च चतुरो नृप ॥ १८ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर राजा पौण्ड्रकने दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा सारथिको और पचीस बाणोंसे सात्यकिके चारों घोड़ोंको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ १८ ॥
ते हया रुधिराक्ताङ्गाः सारथिश्च समन्ततः ।
विह्वलाः समपद्यन्त वासुदेवस्य पश्यतः ॥ १९ ॥
वे घोड़े और सारथि सब ओरसे घायल हो खूनसे लथ-पथ हो गये और वासुदेवके सामने ही अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥ १९ ॥
वासुदेवो रथे चापि सिंहनादं समाददे ।
तेन नादेन तत्राभूद् विबुद्धः सात्यकिर्नृप ॥ २० ॥
नरेश्वर ! वासुदेव अपने रथपर बैठा हुआ जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा । उसकी उस गर्जनासे सात्यकि मूर्च्छासे जग उठे ॥ २० ॥
विद्धान् हयांस्तथा दृष्ट्वा सारथिं च तथागतम् ।
शैनेयोऽथ महावीर्यो रुषितो नृपसत्तम ॥ २१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! अपने घोड़ों और सारथिको इस प्रकार घायल हुआ देख महापराक्रमी सात्यकि रोषसे भर गये ॥ २१ ॥
अलं द्रक्ष्यामि ते वीर्यमित्युक्त्वा बाणमाददे ।
विव्याध तेन बाणेन वक्षस्येनं महाबलः ॥ २२ ॥
वे बोले—'अब देखूँगा कि तुझमें कितना बल है ।' ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने बाण हाथमें लिया और उसके द्वारा पौण्ड्रककी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २२ ॥
ततश्चचाल तेनाऽसौ वासुदेवः शरेण ह ।
सुस्राव रुधिरं घोरमत्युष्णं वक्षसो नृप ॥ २३ ॥
रथोपस्थे पपाताशु निःश्वसन्नुरगो यथा ।
कृत्यं चापि न जानाति केवलं निपसाद ह ॥ २४ ॥
राजन् ! उस बाणसे घायल होकर वासुदेव युद्धस्थलमें
| भविष्यपर्व ] | षण्णवतितमोऽध्यायः | १०३१ |
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काँप उठा और उसकी छातीसे अत्यन्त गरम-गरम भयंकर रक्तकी धारा बहने लगी। वह फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचता हुआ तुरंत रथकी बैठकमें गिर पड़ा। उसे कर्तव्यका भी ज्ञान न रहा। वह केवल रथपर बैठा रहा॥
सात्यकिस्तु रथं विद्ध्वा दशभिः सायकैस्तथा ।
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन वासुदेवस्य वृष्णिपः ॥ २५ ॥
इधर वृष्णिवंशके पालक वीर सात्यकिने दस बाणोंसे रथको छिन्न-भिन्न करके एक भल्लसे वासुदेवकी ध्वजा काट डाली ॥ २५ ॥
हयांश्च चतुरो हत्वा बाणैः सारथिमेव च ।
युयुधानोऽथ राजेन्द्र पौण्ड्रकस्य च पश्यतः ॥ २६ ॥
सारथेश्च शिरः कायादहरत् स रथात् तदा ।
रथग्रन्थिश्च चिच्छेद हयाश्च व्यसवोऽभवन् ॥ २७ ॥
राजेन्द्र ! इसके बाद सात्यकिने पौण्ड्रकके देखते-देखते बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ों और सारथिको घायल करके सारथिके सिरको धड़से अलग करके रथसे नीचे गिरा दिया। रथकी ग्रन्थियोंको काट डाला, पौण्ड्रकके घोड़े भी प्राणहीन हो गये ॥ २६-२७ ॥
चक्रं च तिलशः कृत्वा बाणैर्दशभिरञ्जसा ।
जहास विपुलं राजन् वासुदेवं महाबलः ॥ २८ ॥
तदनन्तर दस बाणोंसे अनायास ही रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला। राजन् ! यह सब करके महाबली सात्यकि वासुदेवपर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ २८ ॥
ततः परं महत्प्रायं सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।
शब्दं कृत्वा बली साक्षात् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ २९ ॥
शरैः सप्ततिसंख्याकैरर्दयामास सत्वरम् ।
इसके बाद वृष्णिनन्दन बलवान् वीर सात्यकिने जोर-जोरसे सिंहनाद करके सम्पूर्ण क्षत्रियोंके देखते-देखते सत्तर बाण मारकर मिथ्या वासुदेवको तुरंत पीड़ित कर दिया ॥
ते शराः शलभाकारा निपेतुः सर्वशस्तदा ॥ ३० ॥
शिरस्तः पार्श्वतश्चैव पृष्ठतः पुरतस्तथा ।
केवलं धैर्यनिश्चयस्तृषार्तः शरवान् यथा ॥ ३१ ॥
यथा मनस्वी रिक्तश्च तथा तिष्ठति पौण्ड्रकः ।
वे बाण टिड्डियोंके समान सब ओरसे उसपर पड़ने लगे। सिरपर, अगल-बगलमें, पीठपर और सामनेसे उन बाणोंकी चोट खाता हुआ वह केवल धैर्यके सहारे प्याससे पीड़ित पुरुषकी भाँति बाणोंसे बिंधा हुआ खड़ा रहा । जैसे उदार पुरुष निर्धन हो जाय और किसीको कुछ दे न सके, इसी प्रकार पौण्ड्रक प्रतीकारशून्य होकर वहाँ चुपचाप खड़ा रहा ॥ ३०-३१ १/२ ॥
ततश्चुक्रोध बलवान् वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥
अर्धचन्द्रं समादाय विव्याध युधि सात्यकिम् ।
इसके बाद बलवान् एवं प्रतापी वीर वासुदेवने कुपित हो अर्धचन्द्र लेकर युद्धस्थलमें सात्यकिको घायल कर दिया !
विद्ध्वा सप्तभिरायान्तं क्रोधेन प्रस्फुरन्निव ॥ ३३ ॥
विद्धोऽथ सात्यकिस्तेन शरैः पञ्चभिराशुगैः ।
चापं चिच्छेद पौण्ड्रस्य सिंहनादं व्यनिनदत् ॥ ३४ ॥
उस समय वासुदेव क्रोधसे उद्दीप्त-सा हो रहा था । उसने अपने सामने आते हुए सात्यकिको सात बाणोंसे बींध डाला। उसके द्वारा घायल किये गये सात्यकिने पाँच शीघ्रगामी बाणोंद्वारा पौण्ड्रकके धनुषको काट डाला और बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ३३-३४ ॥
वासुदेवो गदां गृह्य भ्रामयित्वा पदात्पदम् ।
त्वरितं पातयामास सात्यकेर्वक्षसि प्रभो ॥ ३५ ॥
प्रभो ! तब वासुदेवने गदा हाथमें लेकर उसे पग-पगपर घुमाते हुए तुरंत सात्यकिकी छातीपर दे मारा ॥ ३५ ॥
सव्येन तां समाकृष्य करेण यदुनन्दनः ।
शरं प्रगृह्य विव्याध सात्यकिर्युधि पौण्ड्रकम् ॥ ३६ ॥
यदुनन्दन सात्यकिने उस गदाको बायें हाथसे खींचकर एक बाण हाथमें ले उसके द्वारा पौण्ड्रकको युद्धमें घायल कर दिया ॥ ३६ ॥
तमन्तरे गृहीत्वाशु वासुदेवः प्रतापवान् ।
शक्तिभिर्दशभिश्चैव सात्यकिं निजघान ह ॥ ३७ ॥
इसी बीचमें प्रतापी वासुदेवने सात्यकिको लक्ष्य करके शीघ्र ही दस शक्तियोंद्वारा प्रहार किया ॥ ३७ ॥
ताभिर्विद्धो रणे वीरः सात्यकिः सत्यसंगरः ।
अपास्य धनुरन्यत् तद् धनुरदाय सत्वरम् ।
आजघान तदा वीरो वृष्णीनामग्रणीर्नृप ॥ ३८ ॥
राजन् ! उन शक्तियोंसे बिंधे हुए सत्यप्रतिज्ञ वीर सात्यकिने उस धनुषको फेंककर तुरंत दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और उसके द्वारा वृष्णिवंशके उस अग्रणी वीरने उस समय शत्रुओंको घायल करना आरम्भ किया ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां पौण्ड्रकसात्यकियुद्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णकी कैलासयात्राके प्रसङ्गमें पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्धविषयक छियानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥
| १०३२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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सप्तनवतितमोऽध्यायः
सात्यकि और पौण्ड्रकका युद्ध
वैशम्पायन उवाच
ततः क्रुद्धो गदापाणिः सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।
वासुदेवं जघानाशु गदया तीक्ष्णया नृप ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! तदनन्तर वृष्णि-कुलको आनन्दित करनेवाले सात्यकिने कुपित हो गदा हाथमें ले ली और उस दुःसह गदासे शीघ्र ही वासुदेवपर आघात किया ॥ १ ॥
सात्यकिं वासुदेवस्तु गदयाभ्यहनद् बली ।
तावुद्यतगदौ वीरौ शुशुभाते सुदारुणौ ॥ २ ॥
दृप्तौ वने यथा सिंहौ परस्परवधैषिणौ ।
इसी तरह बलवान् वीर वासुदेवने भी सात्यकिपर गदासे प्रहार किया। गदा उठाये वे दोनों अत्यन्त भयंकर वीर वनमें एक दूसरेके वधकी इच्छावाले दो बलाभिमानी सिंहोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २ ॥
ततः स सात्यकिः क्रुद्धः सव्यं मण्डलमागमत् ॥ ३ ॥
दक्षिणं वासुदेवस्तु तं जघान स्तनान्तरे ।
युयुधानोऽथ वीरस्तु बाह्वोर्मध्यमताडयत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने बायें पैंतरेका आश्रय लिया और वासुदेवने दाहिने पैंतरेका। उसने सात्यकिकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही वीर सात्यकिने भी उसकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्षःस्थल) में गदासे आघात किया ॥ ३-४ ॥
दृढं स ताडितो वीरो जानुभ्यामपतद् भुवि ।
तत उत्थाय वीरस्तु ललाटेऽभ्यहनद् गदाम् ॥ ५ ॥
विषण्णः किंचिदास्थाय तत उत्थाय सत्वरम् ।
गदयाभ्यहनद् वीरः सात्यकिः पौण्ड्रसत्तमम् ॥ ६ ॥
उस गदाकी गहरी चोट खाकर वीर वासुदेव घुटनोंके बल गिर पड़ा। फिर उठकर उस वीरने सात्यकिके ललाटपर गदा मारी। सात्यकि भी कुछ पीड़ित हो बैठे रह गये, फिर तुरंत उठकर वीर सात्यकिने पौण्ड्रदेशके उस श्रेष्ठ योद्धा वासुदेवपर गदासे चोट की ॥ ५-६ ॥
वासुदेवो बली वीरः साक्षान्मृत्युरिवापरः ।
जघान गदया वृष्णिं निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ७ ॥
वीर वासुदेव बड़ा बलवान् था। वह साक्षात् दूसरे मृत्युके समान प्रतीत होता था। वह सात्यकिकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रोंसे उन्हें दग्ध कर डालेगा। उसने गदासे सात्यकिपर चोट की ॥ ७ ॥
स तया ताडितो धूर्णिर्गदया बाहुमुक्तया ।
आलम्ब्य भूमिं सहसा मृत्योरङ्कगतो यथा ॥ ८ ॥
उसकी भुजाओंद्वारा छोड़ी गयी उस गदासे आहत हो सात्यकिने सहसा धरतीका सहारा ले लिया, मानो वह मृत्युके अङ्कमें पहुँच गये हों ॥ ८ ॥
संज्ञां पुनः समालभ्य पाणिभ्यां दृढमेव च ।
गदां तस्य महाराज गृहीत्वा प्रयहेण ह ॥ ९ ॥
द्विधा कृत्वा महागुर्वी गदां कालायसीं शुभाम् ।
उत्सृज्य सहसा वीरः सिंहनादं व्यनीनदत् ॥ १० ॥
महाराज ! फिर होशमें आकर उन्होंने शत्रु की चलायी हुई गदाको उछलकर दोनों हाथोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और काले लोहेकी बनी हुई उस सुन्दर एवं बड़ी भारी गदाके सहसा दो टुकड़े करके उसे दूर फेंक दिया। इसके बाद वीर सात्यकिने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ९-१० ॥
तत उत्सृज्य राजा तु वासुदेवो महाबलः ।
सव्येन सात्यकिं गृह्य दक्षिणेन करेण ह ॥ ११ ॥
मुष्टिं कृत्वा महाघोरां वासुदेवः प्रतापवान् ।
ताडयामास मध्ये तु स्तनयोः सात्यकेर्नृप ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! तब महाबली एवं प्रतापी राजा वासुदेवने उस गदाको त्यागकर सात्यकिको बायें हाथसे पकड़ लिया और दाहिने हाथसे बड़ी भयंकर मुट्ठी बाँधकर सात्यकिके दोनों स्तनोंके बीचमें प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥
शैनेयो वृष्णिवीरस्तु गदामुत्सृज्य सत्वरम् ।
तलेनाभ्यहनद् वीरो वासुदेवं रणाजिरे ॥ १३ ॥
तब वृष्णिवीर सात्यकिने भी तुरंत अपनी गदा नीचे डाल दी और समराङ्गणमें वासुदेवको एक तमाचा जड़ दिया ॥ १३ ॥
तलेन वासुदेवोऽपि सात्यकिं सत्यसंगरम् ।
तयोरेवं महाघोरं तलयुद्धं प्रवर्तत ॥ १४ ॥
फिर वासुदेवने भी सत्यप्रतिज्ञ सात्यकिको थप्पड़से मारा। इस प्रकार उन दोनोंमें बड़ा भयंकर थप्पड़ोंका युद्ध आरम्भ हो गया ॥ १४ ॥
जानुभ्यां मुष्टिभिश्चैव बाहुभ्यां शिरसा तथा ।
उरसोरः समाहत्य जानुभ्यां जानुनी तथा ॥ १५ ॥
कराभ्यां करमाहत्य तौ युद्धं संप्रचक्रतुः ।
तालयोस्तत्र राजेन्द्र वृक्षयोः संनिकर्षयोः ॥ १६ ॥
वने यथा निरुत्पन्नस्तथैवाभून्महास्वनः ।
राजेन्द्र ! घुटनोंसे, मुक्कोंसे, भुजाओंसे और मस्तकसे भी उस समय उनमें युद्ध होने लगा। वे छातीसे छातीपर,
भविष्यपर्व ]
अष्टनवतितमोऽध्यायः
१०३३
घुटनोंसे घुटनोंपर और हाथोंसे हाथोंपर आघात करते हुए युद्ध करते थे। जैसे वनमें दो निकटवर्ती तालवृक्षोंके टकरानेका शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनोंके युद्धमें बड़ी भारी आवाज हो रही थी॥ १५-१६॥
तावाभौ प्रथितौ वीरावुभौ पौण्ड्रकसात्यकी ॥ १७ ॥
निशि स्तिमितमूकायां शस्त्रं त्यक्त्वा महाबलौ।
युयुधाते महारङ्गे मल्लौ द्वाविव विश्रुतौ ॥ १८ ॥
उस नीरव एवं निस्तब्ध निशामें समराङ्गणमें वे दोनों प्रख्यात वीर महाबली पौण्ड्रक और सात्यकि अपना-अपना शस्त्र त्यागकर विशाल अखाड़ेमे उतरे हुए दो सुप्रसिद्ध पहलवानोंकी भाँति युद्ध कर रहे थे ॥ १७-१८ ॥
उभे सेने महाराज्ञोः संशयं जग्मतुस्तदा ।
किं नु स्यात् सात्यकिर्वीरो हतस्तेन भविष्यति ॥ १९ ॥
आहोस्वित् वासुदेवस्तु हतस्तेन महात्मना ।
महाराज उग्रसेन और पौण्ड्रक दोनोंकी सेनाएँ उस समय संशयमें पड़ गयी थीं कि 'क्या वीर सात्यकि वासुदेवके द्वारा मारे जायेंगे अथवा वासुदेव ही उस महात्माके द्वारा मार डाला जायगा ॥ १९॥
अद्य वै तौ महावीरौ परस्परवधैषिणौ ॥ २० ॥
युध्यमानौ महावीरौ तदा स्वर्गं गमिष्यतः ।
अन्यथा नोपरम्येतां युद्धाद् वीरौ सुनिश्चितौ ॥ २१ ॥
'आज वे दोनों महावीर एक दूसरेका वध करनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए निश्चय ही स्वर्गलोकको चले जायेंगे; अन्यथा ये दोनों दृढ़ निश्चयवाले वीर युद्धसे विरत नहीं होंगे ॥ २०-२१ ॥
अहो वीर्यमहो धैर्यमेतयोर्बलशालिनोः ।
एतौ महाबलौ लोके एतौ प्रकृतिसत्तमौ ॥ २२ ॥
नैवं युद्धं महाघोरमासीद् देवासुरेष्वपि ।
न श्रुतो न च वा दृष्टः संग्रामोऽयं कदाचन ॥ २३ ॥
'अहो ! इन बलशाली वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों इस जगत्में महाबली हैं और ये ही स्वभावतः श्रेष्ठ पुरुष हैं। देवताओं और असुरोंमें भी कभी ऐसा महाभयंकर युद्ध नहीं हुआ था। ऐसा संग्राम न तो कभी सुना गया था और न कभी देखनेमें आया था' २२-२३
एते वै सैनिका ब्रूयुः सेनयोरुभयोरपि ।
रात्रौ निशीथे मेघौघे दृष्ट्वा युद्धं सुदारुणम् ॥ २४ ॥
इस प्रकार दोनों सेनाओंके सैनिक मेघोंकी घटासे घिरे हुए रात्रिके निशीथकालमें उस भयंकर युद्धको देखकर उपर्युक्त बाते कहते थे ॥ २४ ॥
अथ तौ बाहुभिर्वीरौ सनिपेततुरञ्जसा ।
दशभिर्मुष्टिभिर्जघ्ने सात्यकिः पौण्ड्रकं तदा ॥ २५ ॥
तदनन्तर वे दोनों वीर अनायास ही परस्पर बाहुयुद्ध करने लगे। उस समय सात्यकिने पौण्ड्रकको दस मुक्के मारे ॥ २५ ॥
पञ्चभिः सात्यकिं पौण्ड्रः समाजघ्ने महाबलः ।
तयोश्चटचटाशब्दो ब्रह्माण्डक्षोभणो महान् ।
प्रादुरासीत् तु सर्वत्र सर्वान् विस्मापयन्निव ॥ २६ ॥
महाबली पौण्ड्रकने सात्यकिको पाँच मुक्के मारे। उन दोनोंके मुक्कोंका महान् चटचट शब्द समूचे ब्रह्माण्डको क्षुब्ध किये देता था। वह शब्द सबको विस्मयमें डालतों हुआ-सा सर्वत्र प्रकट होता (सुनायी पड़ता) था ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौण्ड्रकसात्यकियुद्धे सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौण्ड्रक और सात्यकिका युद्धविषयक सत्तानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥
अष्टनवतितमोऽध्यायः
बलभद्र और एकलव्यका युद्ध तथा बलभद्रद्वारा निषादोंका संहार
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्ध एकलव्यो निषादपः ।
बलभद्रमभि क्षिप्रं धनुरादाय सत्वरम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी बीचमें निषादराज एकलव्य कुपित हो तुरंत धनुष लेकर बलभद्रजीके सामने गया ॥ १ ॥
नाराचैर्दशभिर्विद्ध्वा वाणैश्च दशभिः परैः।
विच्छेद धनुर्गुर्वी तत् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ २ ॥
उसने दस नाराचोंसे उन्हें घायल करके दूसरे दस बाणोंसे समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उनके धनुषको बीचसे काट डाला ॥ २ ॥
सूतं दशभिराहत्य रथं त्रिंशद्भिरेव च।
ध्वजं चिच्छेद भल्लेन निषादस्य जगत्पतिः ॥ ३ ॥
तब जगदीश्वर बलरामजीने दस बाणोंसे निषादके सारथिको आहत करके तीस बाणोंसे उसके रथको जगह-जगहसे तोड़ डाला ॥ ३ ॥
ततः परं महच्चापं निषादो वीर्यसम्मतः ।
दृढमौर्व्या समायुक्तं दशतालप्रमाणतः ॥ ४ ॥
| १०३४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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कामपालं शरेणाशु जघान जनमध्यतः।
तत्पश्चात् पराक्रमी निषादने एक विशाल धनुष, जिसकी लंबाई लगभग साढे चार हाथकी थी तथा जो सुदृढ प्रत्यङ्गा-से युक्त था, लेकर तुरंत ही एक बाणद्वारा उस जन-समुदायके मध्यभागमें बलभद्रजीको घायल कर दिया ॥४॥
बलदेवो महावीर्यः सर्पः शेष इव श्वसन् ॥ ५ ॥
दशभिस्तद्धनुर्दिव्यं शरैः सर्पसमैर्बलः।
चिच्छेद मुष्टिदेशे तु माधवो माधवाग्रजः ॥ ६ ॥
तब श्रीकृष्णके बड़े भाई मधुवंशी महापराक्रमी बलदेवजीने फुफकारते हुए शेषनागके समान लंबी साँस खींचकर दस सर्पाकार बाणोंद्वारा एकलव्यके दिव्य धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला ॥ ५-६ ॥
एकलव्यो निषादेशः खड्गमादाय सत्वरः।
प्राहिणोद् बलमादाय निशितं घोरविग्रहम् ॥ ७ ॥
यह देख निषादराज एकलव्यने बड़ी उतावलीके साथ एक तेज धारवाली भयंकर तलवार लेकर उसे बलदेवजीपर दे मारा ॥ ७ ॥
तमन्तरे पटुर्वीरो वृष्णिवीरः प्रतापवान्।
तिलशः पञ्चभिर्बाणैश्चकार यदुनन्दनः ॥ ८ ॥
युद्ध करनेमें कुशल प्रतापी वृष्णिवीर शौर्यसम्पन्न यदुनन्दन बलरामने पाँच बाणोंद्वारा बीचमें ही उस तलवारको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ८ ॥
ततोऽपरं महत् खड्गं सर्वकालायसं शुभम्।
प्राहिणोत् सारथेः कायमालोक्यथ निषादजः ॥ ९ ॥
तदनन्तर निषादपुत्रने बलभद्रजीके सारथिके शरीरको लक्ष्य करके एक दूसरा विशाल खड्ग चलाया, जो सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ और सुन्दर था ॥ ९ ॥
तं चापि दशभिर्वीरो माधवो यदुनन्दनः।
बाह्वोरन्तरयोश्चैव निर्विभेद महारणे ॥ १० ॥
परंतु यदुनन्दन वीर माधवने उस महासमरमें उसकी दोनों भुजाओंके बीचमें ही दस बाण मारकर उस खड्गके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ १० ॥
ततः शक्तिं समादाय घण्टामालाकुलां नृपः।
निषादो बलदेवाय प्रेषयित्वा महाबलः ॥ ११ ॥
सिंहनादं महाघोरमकरोत् स निषादपः।
तब महाबली निषादराजने घण्टा-मालाओंसे सुशोभित एक शक्ति हाथमें लेकर उसे बलदेवजीपर चलाया और बड़ा भयंकर सिंहनाद किया ॥ ११॥
सा शक्तिः सर्वकल्याणी बलदेवमुपागमत् ॥ १२ ॥
उत्पतन्तीं महाघोरां बलभद्रः प्रतापवान्।
आदायाथ निषादेशं सर्वान् विस्मापयन्निव ॥ १३ ॥
तथैव तं जघानाशु वक्षोदेशे च माधवः।
वह सर्वकल्याणी शक्ति जब बलदेवजीके पास आयी, तब प्रतापी बलभद्रजीने ऊपरको उठती हुई उस महाघोर शक्तिको हाथसे पकड़ लिया। फिर सबको विस्मयमें डालते हुए-से माधवने उसी शक्तिसे निषादराजकी छातीमें तत्काल गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२-१३॥
स तया ताडितो वीरः स्वशक्त्याथ निषादपः ॥ १४ ॥
विह्वलः सर्वगात्रेषु निपपात महीतले।
प्राणसंशयमापन्नो निषादो रामताडितः ॥ १५ ॥
अपनी ही शक्तिसे ताड़ित होकर वीर निषादराजका सारा शरीर व्याकुल हो उठा और वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। बलरामद्वारा आहत हुआ निषाद एकलव्य प्राणसंशयकी स्थितिमें पहुँच गया था ॥ १४-१५॥
निषादास्तस्य राजेन्द्र शतशोऽथ सहस्रशः।
अष्टाशीतिसहस्राणि निषादास्तस्य योधिनः ॥ १६ ॥
राजेन्द्र ! उस निषादके सैकड़ों और हजारों निषाद सहायक थे। उसकी सेनामें अठासी हजार निषाद योद्धा मौजूद थे ॥ १६ ॥
गदिनः खड्गिनश्चैव महेष्वासा महाबलाः।
शरैरनेकसाहस्रैः शक्तिभिश्च परश्वधैः ॥ १७ ॥
गदाभिः पट्टिशैः शूलैः परिघैः प्रासतोमरैः।
कुन्तैश्च कुठारैश्च यादवानां महौजसाम् ॥ १८ ॥
शलभा इव राजेन्द्र दीप्यमानं हुताशनम्।
ते शरैः पातयांचक्रू रामं राममिवापरम् ॥ १९ ॥
राजाधिराज ! वे जैसे पतंगे जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार वे महाबली महाधनुर्धर निषाद गदा और खड्गसे युक्त हो अनेक सहस्र बाणों, शक्तियों, फरसों, गदाओं, पट्टिशों, शूलों, परिघों, प्रासों, तोमरों, कुन्तों और कुठारोंद्वारा महाबली यादवोंके बीचमें खड़े हुए दूसरे श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी बलरामपर प्रहार करने लगे। उन्होंने उनपर बहुत-से बाण मारे ॥ १७–१९ ॥
केचित् कुठारैराघ्नन्तः केचित् कुन्तैः परश्वधैः।
गदाभिः केचिदाघ्नन्ति शक्तिभिश्च तथा परे ॥ २० ॥
निजघ्नुः सहसा रामं स्फुरन्तं पावकं यथा।
प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले बलरामपर कुछ निषादोंने कुठारोंसे प्रहार किया, कुछ निषादोंने कुन्तों और फरसोंद्वारा आघात किया। कोई गदासे चोट करते थे तो कोई शक्तियोंसे। इस प्रकार उन्होंने सहसा प्रहार आरम्भ कर दिया ॥ २०॥
ततः क्रुद्धो हली साक्षाद्वलमुद्यम्य सत्वरम् ॥ २१ ॥
सर्वानार्कषयामास मुसलेन हि पीडयन्।