विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1046, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०२० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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आरुह्य भगवान् विष्णुर्गरुडं पक्षिपुङ्गवम् ।
शङ्खी चक्री गदी खड्गी शार्ङ्गी तूणी तनुत्रवान् ॥ ३६ ॥
यथागतं जगन्नाथो ययौ बदरिकाश्रमम् ।
सायाह्ने पुण्डरीकाक्षो नित्यं मुनिंनिषेवितम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण पक्षिराज गरुड़पर आरूढ़ हो शङ्ख, चक्र, गदा, खड्ग, शार्ङ्गधनुष, तरकस और कवच धारण करके जैसे आये थे, उसी प्रकार सायंकालमें मुनिजनोंद्वारा नित्य सेवित विशाला बदरीतीर्थमें लौट आये ॥ ३६-३७ ॥
तत्र गत्वा यथायोगं विनम्य हरिरीश्वरः।
अर्चिनो मुनिभिः सर्वैर्निपसाद सुखासने ॥ ३८ ॥
वहाँ जाकर वे सर्वेश्वर श्रीहरि यथायोग्य मुनियोंको प्रणाम करके सब मुनियोंद्वारा पूजित हो सुखद आसनपर विराजमान हुए ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कैलासयात्रायां कृष्णप्रत्यागमने नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कैलासयात्राके प्रसंगमें 'श्रीकृष्णका लौटना' विषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥
एकनवतितमोऽध्यायः
पौण्ड्रकका राजाओंकी सभाओंमें अपनेको शङ्ख, चक्र आदिसे युक्त वासुदेव घोषित करना और श्रीकृष्णको पराजित करनेका मनसूबा बाँधना
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु पौण्ड्रो नृपवरोत्तमः।
बलवान् सत्त्वसम्पन्नो योद्धा विपुलविक्रमः ॥ १ ॥
वृष्णिशत्रुस्तदा राजा कृष्णद्वेषी बलात् तदा ।
नृपान् सर्वान् समाहूय प्रोवाच नृपसंसदि ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी समय राजाओंमे श्रेष्ठतम, बलवान्, सत्त्वसम्पन्न, महापराक्रमी योद्धा, वृष्णिवंशियोंसे शत्रुभाव रखनेवाला तथा श्रीकृष्णका द्वेषी पौण्ड्रक समस्त राजाओंको बलपूर्वक बुलाकर उनकी सभामें बोला—॥ १-२ ॥
जिता च पृथिवी सर्वा जिताश्च नृपसत्तमाः।
वृष्णयस्ते बलोन्मत्ताः कृष्णमाश्रित्य गर्विताः ॥ ३ ॥
'मैंने सारी पृथ्वी जीत ली और बड़े-बड़े राजाओंको पराजित कर दिया। परंतु बलोन्मत्त वृष्णिवंशी श्रीकृष्णका सहारा लेकर घमंडमें भर गये हैं ॥ ३ ॥
दास्यन्ति मे करं सर्वे न हि ते कृष्णसंश्रयात् ।
स तु कृष्णश्चक्रबलान्मामावज्ञाय तिष्ठति ॥ ४ ॥
'कृष्णका आश्रय लेकर वे सब-के-सब मुझे कर नहीं देते हैं और वह कृष्ण अपने चक्रके बलसे मेरी अवहेलना करते रहता है ॥ ४ ॥
अहं चक्रीति गर्वोऽभूत्तस्य गोपस्य सर्वदा ।
शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी शरी तूणी सहायवान् ॥ ५ ॥
एवमादिर्महागर्वस्तस्य सम्प्रति वर्तते ।
'उस ग्वालेको सदा इस बातका गर्व रहता है कि मैं चक्रधारी हूँ। मेरे पास शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष, बाण और तरकस हैं, मैं सहायतासे सम्पन्न हूँ। इस तरह इस समय उसका गर्व बहुत बढ़ा-चढ़ा है ॥ ५३ ॥
लोके च मम यन्नाम वासुदेवेति विश्रुतम् ॥ ६ ॥
अगृह्णन्मम तन्नाम गोपो मदबलान्वितः ।
'लोकमें जो मेरा वासुदेव यह प्रसिद्ध नाम है, उसे उस मदमत्त एवं बलवान् गोपमे ग्रहण कर लिया है ॥६३॥
तस्य चक्रस्य यच्चक्रं ममापि निशितं महत् ॥ ७ ॥
गर्वहन्तृ सदा तस्य नाम्ना चापि सुदर्शनम् ।
'मेरे पास भी एक विशाल एवं तीखा चक्र है, जो उसके चक्रका नाश करनेवाला है। मेरा यह चक्र सदा उस (कृष्ण) के गर्वको चूर्ण करनेमें समर्थ है, उसका नाम भी सुदर्शन है ॥ ७३ ॥
सहस्रारं महाघोरं तस्य चक्रस्य नाशनम् ॥ ८ ॥
अनेकमहतं चक्रं गोपजस्य नृपोत्तमाः।
'श्रेष्ठ राजाओ ! मेरे इस चक्रमें एक सहस्र अरे लगे हुए हैं। यह महाभयंकर है और गोपबालक श्रीकृष्णके चक्रका नाश करनेवाला है। यह अनेक रूप धारण करनेमे समर्थ और कहीं भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है ॥ ८३ ॥
ममाप्येतद् धनुर्दिव्यं शार्ङ्गं नाम महारवम् ॥ ९ ॥
गदा कौमोदकी नाम ममेय बृहती दृढा ।
कालायससहस्रस्य भारेण सुकृता मया ॥ १० ॥
'मेरा भी यह धनुष दिव्य है, सींगका बना हुआ है, इसलिये शार्ङ्गनामसे प्रसिद्ध है और बड़ी भारी टंकार-ध्वनि करता है। मेरी इस गदाका नाम भी कौमोदकी है। यह विशाल एवं सुदृढ़ है। मैंने एक सहस्र भार लोहेसे इसका निर्माण कराया है ॥ ९-१० ॥